रविवार, 21 जुलाई 2019

आखिर ! कैसे हुआ म्लेच्छों का जन्म ?

जय सियाराम  जय जय हनुमान
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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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आखिर ! कैसे हुआ म्लेच्छों का जन्म ?





   म्लेच्छवंशीय राजाओं का वर्णन तथा म्लेच्छ-भाषा आदि का संक्षिप्त परिचय
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शौनक ने पूछा – त्रिकालज्ञ महामुने ! उस प्रद्योत ने कैसे म्लेच्छ-यज्ञ किया ? मुझे यह सब बतलायें |
श्रीसूतजी ने कहा – महामुने ! किसी समय क्षेमक के पुत्र प्रद्योत हस्तिनापुर में विराजमान थे | उससमय नारदजी वहाँ आये | उनको देखकर प्रसन्न हो राजा प्रद्योत ने विधिवत उनकी पूजा की | सुखपूर्वक बैठे हुए मुनिने राजा प्रद्योत से कहा – ‘म्लेच्छों के द्वारा मारे गये तुम्हारे पिता यमलोक को चले गये है | म्लेच्छ यज्ञ के प्रभाव से उनकी नरक से मुक्ति होगी और उन्हें स्वर्गीय गति प्राप्त होगी |
अत: तुम म्लेच्छ यज्ञ करो |’ यह सुनकर राजा प्रद्योत की आँखे क्रोधसे लाल हो गयी | तब उन्होंने वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलाकर कुरुक्षेत्र में म्लेच्छ-यज्ञ को तत्काल आरम्भ करा दिया | सोलह योजन में चतुष्कोण यज्ञ कुंड का निर्माणकर देवताओं का आवाह्नकर उस राजाने म्लेच्छों का हनन किया |
ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर अभिषेक कराया | इस यज्ञ के प्रभाव से उनके पिता क्षेमक स्वर्गलोक चले गये | तभीसे राजा प्रद्योत सर्वत्र पृथ्वीपर म्लेच्छहन्ता (म्लेच्छों को मारनेवाले) नामसे प्रसिद्ध हो गये | उनका पुत्र वेद्वान नामसे प्रसिद्ध हुआ |
म्लेच्छरूपमें स्वयं कलिने ही राज्य किया था | अनन्तर कलिने अपनी पत्नी के साथ नारायण की पूजाकर दिव्य स्तुति की; स्तुति से प्रसन्न होकर नारायण प्रकट हो गये | कलि ने उनसे कहा – ‘हे नाथ ! राजा वेद्वान के पिता प्रद्योत ने मेरे स्थान का विनाश कर दिया है और मेरे प्रिय म्लेच्छों को नष्ट कर दिया हैं |’
भगवान ने कहा – कले ! कई कारणों से अन्य युगों की अपेक्षा तुम श्रेष्ठ हो | अनेक रूपों को धारणकर मैं तुम्हारी इच्छा को पूर्ण करूँगा | आदम नाम का पुरुष और ह्व्यवती (हौवा) नामकी पत्नीसे म्लेच्छवशों की वृद्धि करनेवाले उत्पन्न होंगे |
यह कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये और कलियुग को इससे बहुत आनंद हुआ | उसने नीलाचल पर्वतपर आकर कुछ दिनोंतक निवास किया |
राजा वेद्वान को सुनंद नामका पुत्र हुआ और बिना संतति के ही वह मृत्यु को प्राप्त हुआ | इसके बाद आर्यावर्त देश सभी प्रकार क्षीण हो गया और धीरे-धीरे म्लेच्छों का बल बढ़ने लगा |
तब नैमिषारण्य निवासी अठासी हजार ऋषि-मुनि हिमालयपर चले गये और वे बदरी क्षेत्र में आकर भगवान् विष्णु की कथा-वार्ता में संलग्न हो गये |
सूतजी ने पुन: कहा – मुने ! द्वापर युग के सोलह हजार वर्ष शेष काल में आर्य-देश की भूमि अनेक किर्तियों से समन्वित रही; पर इतने समय में कहीं शुद्र और कहीं वर्णसंकर राजा भी हुए |
आठ हजार दो सौ दो वर्ष द्वापर युग के शेष रह जानेपर यह भूमि म्लेच्छ देश के राजाओं के प्रभाव में आने लग गयी | म्लेच्छों का आदि पुरुष आदम, उसकी स्त्री हव्यवती (हौवा)दोनों इन्द्रियों का दमनकार ध्यानपरायण रहते थे |
ईश्वर ने प्रदान नगर के पूर्वभाग में चार कोसवाला एक रमणीय महावन का निर्माण किया | पापवृक्ष के नीचे जाकर कलियुग सर्परूप धारणकर हौवा के पास आया | उस धूर्त कलि ने हौवा को धोखा देकर गूलर के पत्तों में लपेटकर दूषित वायुयुक्त फल उसे खिला दिया, जिससे विष्णु की आज्ञा भंग हो गयी |
इससे अनेक पुत्र हुए, जो सभी म्लेच्छ कहलाये | आदम पत्नी के साथ स्वर्ग चला गया | उसका श्वेत नामसे विख्यात श्रेष्ठ पुत्र हुआ, जिसकी एक सौ बारह वर्ष की आयु कही गयी है |
उसका पुत्र अनुह हुआ, जिसने अपने पितासे कुछ कम ही वर्ष शासन किया | उसका पुत्र कीनाश था, जिसने पितामह के समान राज्य किया | महल्लल नामका उसका पुत्र हुआ, उसका पुत्र मानगर हुआ | उसको विरद नामका पुत्र हुआ और अपने नामसे नगर बसाया |
उसका पुत्र विष्णुभक्तिपरायण हनूक हुआ | फलोंका हवन कर उसने अध्यात्मतत्व का ज्ञान प्राप्त किया | म्लेच्छधर्मपरायण वह सशरीर स्वर्ग चला गया | इसने द्विजों के आचार-विचार का पालन किया और देवपूजा भी की, फिर भी वह विद्वानों के द्वारा म्लेच्छ ही कहा गया | मुनियों के द्वारा विष्णुभक्ति, अग्निपूजा, अहिंसा, तपस्या और इन्द्रियदमन – ये म्लेच्छों के धर्म कहे गये हैं |
हनूक का पुत्र मतोच्छिल हुआ | उसका पुत्र लोमक हुआ, अन्तमें उसने स्वर्ग प्राप्त किया | तदनंतर उसका न्यूह नामका पुत्र हुआ, न्यूह के सीम, शम और भाव – ये तीन पुत्र हुए | न्यूह आत्मध्यान-परायण तथा विष्णुभक्त था | किसीसमय उसने स्वप्न में विष्णु का दर्शन प्राप्त किया और उन्होंने न्यूह से कहा – ‘वत्स ! सुनो, आजसे सातवे दिन प्रलय होगा |
हे भक्तश्रेष्ठ ! तुम सभी लोगों के साथ नावपर चढ़कर अपने जीवन की रक्षा करना | फिर तुम बहुत विख्यात व्यक्ति बन जाओगे | भगवान् की बात मानकर उसने एक सुदृढ़ नौका का निर्माण कराया, जो तीन सौ हाथ लम्बी, पचास हाथ चौड़ी और तीस हाथ ऊँची थी और सभी जीवों से समन्वित थी |
विष्णु के ध्यानमें तत्पर होता हुआ वह अपने वंशजो के साथ उस नावपर चढ़ गया | इसी बीच इन्द्रदेव ने चालीस दिनोंतक लगातार मेघोंसे मूसलधार वृष्टि करायी | सम्पूर्ण भारत सागरों के जलसे प्लावित हो गया | चारों सागर मिल गए, पृथ्वी डूब गयी, पर हिमालय पर्वत का बदरी-क्षेत्र पानीसे ऊपर ही रहा, वह नहीं डूब पाया |
अट्ठासी हजार बम्ह्वादी मुनिगण, अपने शिष्यों के साथ वही स्थिर और सुरक्षित रहें | न्यूह भी अपनी नौका के साथ वहीँ आकर बच गये | संसार के शेष सभी प्राणी विनष्ट हो गये | उससमय मुनियों ने विष्णुमाया की स्तुति की |
मुनियों ने कहा – ‘महाकाली को नमस्कार हैं, माता देवकी को नमस्कार हैं, विष्णुपत्नी महालक्ष्मी को, राधादेवी को और रेवती, पुष्पवती तथा स्वर्णवती को नमस्कार है | कामाक्षी, माया और माताको नमस्कार है |
महावायु के प्रभाव से –मेघों के भयंकर शब्द से एवं उग्र जल की धाराओं से दारुण भय उत्पन्न हो गया है | भैरवि ! तुम इस भयसे हम किंकरों की रक्षा करो |’ देवीने प्रसन्न होकर जल की वृद्धि को तुरंत शांत कर दिया | हिमालय की प्रान्तवर्ती सिशिना नाम की भूमि एक वर्ष में जलके हट जानेपर स्थल के रूप में दीखने लगी | न्यूह अपने वंशजों के साथ उस भूमिपर आकर निवास करने लगा |
शौनक ने कहा – मुनीश्वर ! प्रलय के बाद इससमय जो कुछ वर्तमान है, उसे अपनी दिव्य दृष्टी के प्रभाव से जानकार बतलायें |
सुतजी बोले – शौनक ! न्यूह नामका पूर्वंनिर्दिष्ट म्लेच्छ राजा भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहने लगा, इससे भगवान् विष्णु ने प्रसन्न होकर उसके वंश की वृद्धी की | उसने वेद-वाक्य और संस्कृत से बहुर्भुत म्लेच्छ भाषा का विस्तार किया उधर कलि की वृद्धि के लिये ब्राह्मी भाषा को अपशब्दवाली भाषा बनाया और उसने अपने तीन पुत्रों – सीम, शम तथा भाव के नाम क्रमशः सिम, ह्यम तथा याकूत रख दिये |
याकूत के सात पुत्र हुए – जुम्र, माजूज, मादी, यूनान, तुवलोम, सक तथा तीरास | इन्हीं के नामपर अलग-अलग देश प्रसिद्ध हुए | जुम्र के दस पुत्र हुए | उनके नामों से भी देश प्रसिद्ध हुए | यूनान की अलग-अलग संताने इलीश, तरलीश,कित्ती और हुदा – इन चार नामोंसे प्रसिद्ध हुई तथा उनके नामसे भी अलग-अलग देश बसे |
न्यूह के द्वितीय पुत्र हाम (शम) से चार पुत्र कहे गये है – कुश, मिश्र, कुज, कनाआ | इनके नामपर भी देश प्रसिद्ध हैं | कुश के छ: पुत्र हुए – सवा, हबील, सर्वत, उर्गम, सवतिका और महाबली निमरुह | इनकी भी कलन, सिना, रोरक, अक्कद, वायुन और रसनादेशक आदि संताने हुई | इतनी बाते ऋषियों को सुनाकर सूतजी समाधिस्थ हो गये |
बहुत वर्षों के बाद उनकी समाधि खुली और वे कहने लगे – ‘ऋषियों ! अब मैं न्यूह के जेष्ठ पुत्र राजा सिम के वंश का वर्णन करता हूँ, म्लेच्छ राजा सिमने पाँच सौ वर्षोतक भलीभाँति राज्य किया | अर्कन्सद उसका पुत्र था, जिसने चार सौ चौतीस वर्षोतक राज्य किया |
उसका पुत्र सिंहल हुआ, उसने भी चार सौ साठ वर्षोतक राज्य किया | उसका पुत्र फलज हुआ, जिसने दो सौ चालीस वर्षोतक राज्य किया | उसका पुत्र रऊ हुआ, उसने दो सौ सैंतीस वर्षोतक राज्य किया | उसके जुज नामक पुत्र हुआ, पिताके समान ही उसने राज्य किया | उसका पुत्र नहुर हुआ, उसने एक सौ साठ वर्षोतक राज्य किया | हे राजन ! अनेक शत्रुओं का भी उसने विनाश किया | नहुर का पुत्र ताहर हुआ, पिताके समान उसने राज्य किया | उसके अविराम, नहुर और हारन – ये तीन पुत्र हुए |
हे मुने ! इसप्रकार मैंने नाममात्र से म्लेच्छ राजाओं के वंशो का वर्णन किया | सरस्वती के शापसे ये राज म्लेच्छ भाषा भाषी हो गये और अचारमे वृद्धि हुई, किन्तु मैंने संक्षेप में ही इन वंशों का वर्णन किया |
संस्कृत भाषा भारतवर्ष में ही किसी तरह बची रही | अन्य भागों में म्लेच्छ भाषा ही आनंद देनेवाली हुई |
सूतजी पुन: बोले – भार्गवतनव महामुने शौनक ! तीन सहस्त्र वर्ष कलियुग के बीत जानेपर अवन्ती नगरीमें शंख नाम का एक राजा हुआ और म्लेच्छ देश में शकों का राजा राज्य करता था | इनकी अभिवृद्धि का कारण सुनो |
दो हजार वर्ष कलियुग के बीत जानेपर म्लेच्छवंश की अधिक वृद्धि हुई और विश्व के अधिकांश भाग की भूमि म्लेच्छमयी हो गयी तथा भाँती-भाँती के मत चल पड़े |
सरस्वती का तट ब्रम्हावर्त क्षेत्र ही शुद्ध बचा था | मुशा नामका व्यक्ति म्लेच्छों का आचार्य और पूर्व पुरुष था | उसने अपने मतको सारे संसार में फैलाया |
कलियुग के आनेसे भारत में देवपूजा और वेदभाषा प्राय: नष्ट हो गयी | भारतमें भी धीरे-धीरे प्राकृत और म्लेच्छ भाषा का प्रचार प्रारम्भ हुआ |
व्रजभाषा और महाराष्ट्री – ये प्राकृत के मुख्य भेद है | इन भाषाओं के और भी चार लाख सूक्ष्म भेद है | प्राकृत में पानीय को पानी और बुभुक्षा को भूख कहा जाता हैं |
इसी तरहसे म्लेच्छ भाषा में पितृ को पैतर फादर और भ्रातू को बादर-ब्रदर कहते हैं | इसीप्रकार आहुति को आजु, जानु को जैनु, रविवार को संडे, फाल्गुन को फरवरी और षष्टि को सिक्सटी कहते हैं |
भारत में अयोध्या, मथुरा, काशी आदि पवित्र सात पूरियाँ हैं, उनमें भी अब हिंसा होने लग गयी हैं |डाकू, शवर, भिल्ल तथा मुर्ख व्यक्ति भी आर्यदेश – भारतवर्ष में भर गये है | म्लेच्छदेश में म्लेच्छ-धर्म को माननेवाले सुख से रहते हैं | यही कलियुग की विशेषता है | भारत और इसके द्वीपों में म्लेच्छों का राज्य रहेगा, ऐसा समझकर हे मुनिश्रेष्ठ ! आपलोग हरि का भजन करे |
इति श्री प्रतिसर्गपर्व का चौथा और पाँचवा अध्याय पूरा हुआ |
– हरि ॐ हरि ॐ –
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रविवार, 14 जुलाई 2019

शानि,गुरु,राहु ,मंगल :---यदि बैठे हैं कुंडली में :--बैठे ग्रहों के फल


शनि दशा के फल 
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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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शनि की दशा का सामान्य फल कहा गया है कि इस दशा में बकरा, ऊँट, गधा, पक्षी, वृद्ध महिला, धन व नीचकुल के अधिपत्य का लाभ होता है. इस दशा में मनुष्यों के द्वारा ही व्यक्ति आतंक व दारिद्रय के कष्ट से दु:खी रहता है. बुद्धि का नाश हो जाता है तथा गोपनीय आचरण से मर्माहत हो जाता है. दुष्ट व्यक्तियों के द्वारा इसके धन का नाश हो जाता है. घर-परिवार में किसी ना किसी को रोग घेरे रहता है जिससे व्यक्ति का मन सदा खिन्न रहता है. मित्रादि शत्रु बन जाते हैं, कुल में विवाद रहता है और व्यक्ति की दीन अवस्था रहती है. इस दशा में विदेश यात्रा होती है, धन तथा कुल की हानि भी देखी गई है. विपदा किसी ना किसी रुप में आती रहती है. मन व्याकुल रहता है और अशुभ फल मिलने की संभावना ज्यादा रहती है. 

शनि के निर्बल होने पर इस दशा में व्यक्ति निद्रा, आलस्य, कफ, वायु तथा पित्त संबंधी रोगों से परेशान रह सकता है. दाद, खुजली तथा हैजा जैसे रोगों से ग्रस्त हो सकता है. इस दशा में व्यक्ति किसी वृद्धा की इच्छा मन में रख सकता है. 

अगर शनि शुभ अवस्था में जन्म कुंडली में स्थित है तब व्यक्ति प्रतापी होता है, लक्ष्मी संपन्न होता है, ग्रामादि का अधिपति होता है, देवताओं व ब्राह्मणों में आस्था रहती है. व्यक्ति स्वर्ण, वस्त्र, हाथी-घोड़ों से सुखी रहता है. व्यक्ति काव्य कला जैसे क्रिया-कलापों में अत्यधिक निपुण होता है. इस दशा में जातक सुशील तथा कीर्तिवान होता है. जीवन में जो प्राप्तियाँ पहले से मिली हुई हैं, इस दशा में उनसे और सुखी होता है. इस दशा में जातक अपने कुल में श्रेष्ठ रहता है, व्यक्ति अत्यधिक विनम्र होता है, देवताओं तथा ब्राह्मणों की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहता है. 

शनि की दशा में व्यक्ति बुद्धिमान, दानी, सुशील और अनेकों कौशल से युक्त होता है. देवताओं तथा ब्राह्मणों के लिए गृह आदि का निर्माण भी व्यक्ति इस दशा में करवाता है. 

 

परमोच्च शनि का दशा फल 

यदि जन्म कुंडली में शनि अपनी अति उच्च राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति किसी ग्राम अथवा सभा मण्डल का आधिपत्य प्राप्त करता है. व्यक्ति सुशील तो होता ही है साथ ही विनोदप्रिय भी होता है लेकिन इस दशा में व्यक्ति के पिता का निधन होता है और स्वजनों के साथ क्लेश रहता है. 

 

उच्च शनि का दशा फल 

यदि जन्म कुंडली में शनि अपनी उच्च राशि में स्थित है तब व्यक्ति इसकी दशा में अपने देश का त्याग करता है. व्यक्ति को मानसिक रोग अथवा कष्ट होते हैं. यह कष्ट किसी भी रुप में व्यक्ति को भुगतने पड़ सकते हैं. व्यक्ति के व्यवसाय की हानि होती है. इस दशा में कृषि की भी हानि होती है और सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों से विरोध रहता है. 

 

मूलत्रिकोण शनि का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में शनि अपनी मूल त्रिकोण राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति देश में इधर-उधर घूमने वाला होता है. व्यक्ति वन में निवास करने वाला होता है. दो नामधारी होता है, किसी सभा और नगर का अधिपति भी हो सकता है. व्यक्ति का अपनी स्त्री व पुत्र से विरोध भी हो सकता है. 

 

स्वराशि शनि का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में शनि अपनी ही राशि मकर या कुंभ में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति के बल, पुरुषत्व तथा कीर्ति में वृद्धि होती है. व्यक्ति सरकार का आश्रय प्राप्त करता है. इस दशा में व्यक्ति स्वर्ण, आभूषण, भूमि आदि पाता है. धैर्यवान होता है, अपने नाम के अनुकूल गुण संपन्न और सुखी होता है. 

 

अतिमित्र और मित्र राशि में शनि का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में शनि अपनी अतिमित्र राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति सरकार से सम्मान पाता है. पुत्र-स्त्री व धन आदि से सुखी होता है. पशु, भैंस, कृषि संबंधी चीजों का व्यापार करने वाला होता है. 

मित्र राशि में स्थित शनि की दशा में व्यक्ति शिल्प के कार्यों में निपुण होता है. अपने ज्ञान बल से युक्त होकर प्रतापी होता है लेकिन इसकी दशा में व्यक्ति दु:खी रहता है. 

 

सम राशि में शनि का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में शनि अपनी सम राशि में स्थित हो तब इसकी दशा में व्यक्ति सभी से एक समान व्यवहार करता है चाहे वह घर वाले हों अथवा बाहर वाले लोग हों. इस दशा में व्यक्ति को अपने नौकरों की ओर से संकट का सामना करना पड़ सकता है. अपने बंधु-बांधवों से वैर भी इसी दशा में होता है. वात-पित्त संबंधी विकारों से शारीरिक कष्ट होता है. इस दशा में व्यक्ति को कोई ना कोई क्षति भी होती है. 

 

आरोहिणी शनि का दशाफल 

जन्म कुंडली में यदि शनि आरोहिणी अवस्था (नीच और उच्च राशि के मध्य स्थित है) में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति का भाग्योदय सरकारी सहयोग के द्वारा होता है. इस दशा में व्यक्ति को वाणिज्य, कृषि, भूमि, हाथी, घोड़े, वाहन तथा स्त्री-पुत्रों का लाभ होता है. 

 

अवरोहिणी शनि का दशाफल 

जन्म कुंडली में शनि यदि अवरोहिणी अवस्था (उच्च और नीच राशि के मध्य स्थित है) में स्थित है तब इस दशा में सरकार की नाराजगी हो सकती है जिसके कारण स्थान परिवर्तन करना पड़ सकता है. धन की हानि उठानी पड़ सकती है और स्त्री-पुत्रों से भी हानि उठानी पड़ सकती है. भाग्य साथ नहीं देता है और सरकार की ओर से डर लगा रहता है. इस दशा में व्यक्ति को दासता भी झेलनी पड़ सकती है. गुदा तथा आँखों के रोग से व्यक्ति कष्ट उठाता है.  

 

शत्रु तथा अतिशत्रु राशि में शनि का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में शनि अपनी शत्रु राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति वेश्याओं से धन प्राप्त करता है. इस दशा में व्यक्ति की भूमि का नाश हो जाता है. खेती-बाड़ी की हानि होती है, व्यक्ति अपने पद से हट जाता है. इस दशा में व्यक्ति शारीरिक दुर्बलता पाता है और लोगों से शत्रुता होती है.  

 

यदि जन्म कुंडली में शनि अतिशत्रु राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति की स्थानच्युति होती है अर्थात व्यक्ति अपने स्थान से हट जाता है. बन्धुओं से विरोध होता है, चोर तथा अग्नि से भय रहता है. सरकार अथवा सरकारी कर्मचारियों की ओर से भी भय बना रहता है और इनकी ओर से बाधाएँ उत्पन्न होती रहती है. शनि की इस दशा में नौकर व्यक्ति से नाराज रहते हैं और स्त्री व संतान भी नाराज रहती है. 

 

नीच राशि में शनि का दशाफल 

जन्म कुंडली में यदि शनि अपनी नीच राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति को स्त्री-पुत्रादि से हानि होती है, भाई-बन्धुओं की हानि होती है और बहुत बड़े कष्ट उठाकर अथवा नीचवृत्ति से व्यक्ति अपना जीवनयापन करता है. 

 

उच्च ग्रह से युक्त शनि का दशाफल 

जन्म कुंडली में यदि शनि किसी उच्च के ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति को बहुत-से सुखों की प्राप्ति होती है. थोड़ा-सा राज्य सुख भी मिल जाता है. कृषि संबंधी वस्तुओं का लाभ व्यक्ति को इस दशा में मिलता है. इस दशा में सेवाकर्मियों का नाश होता है. 

 

नीच ग्रह से युक्त शनि का दशाफल 

जन्म कुंडली में शनि यदि किसी नीच ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति को बहुत ज्यादा कष्ट तथा भय सताते रहते हैं. व्यक्ति छल-कपट करने वाला होता है और कई बार व्यक्ति की आर्थिक स्थिति इतनी बदतर हो जाती है कि व्यक्ति के फाके मारने अथवा उपवास की स्थिति पैदा हो जाती है. इस दशा में व्यक्ति निम्न वृत्ति के द्वारा अपना जीवनयापन करता है. 

 

शुभ ग्रह से युक्त शनि का दशाफल 

जन्म कुंडली में शनि यदि किसी शुभ ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति किसी विशेष ज्ञान में वृद्धि करता है. व्यक्ति परोपकार के काम करता है, सरकार की ओर से उसके भाग्य में वृद्धि होती है जिससे भाग्य से सुख पाता है. इस दशा में व्यक्ति काले वर्ण की वस्तुओं के धान्य से लाभ पाता है और यदि व्यक्ति लोहे का काम करता है तब उससे भी लाभ पाता है. 

 

अशुभ या पाप ग्रह से युक्त शनि का दशाफल 

जन्म कुंडली में यदि शनि किसी पापी अथवा अशुभ ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति अत्यधिक पापकर्म करने वाला होता है. इस दशा में व्यक्ति नीच स्त्रियों की संगति में रहने वाला होता है. इस दशा में व्यक्ति चोरों तथा निम्न स्तर के लोगों से विवाद रहता है और स्त्री के बिना ही इसे रहना पड़ता है. 

 

शुभ ग्रह से दृष्ट शनि का दशाफल 

जन्म कुंडली में शनि यदि किसी शुभ ग्रह से दृष्ट है तब इसकी दशा में व्यक्ति के धन में वृद्धि होती है, स्त्री, संतान तथा नौकर-चाकरों की वृद्धि होती है लेकिन बाद में अत्यधिक कष्ट होता है. गाय, भूमि, व्यवसाय तथा कृषि का नाश होता है. 

 

अशुभ या पाप ग्रह से दृष्ट शनि का दशाफल 

जन्म कुंडली में यदि शनि पाप अथवा अशुभ ग्रह से दृष्ट है तब इसकी दशा में धन, स्त्री, पुत्रादि का नाश होता है. भाईयों तथा सेवकों का भी इस दशा में नाश होता है. इस दशा में व्यक्ति का किसी न किसी से विवाद चलता रहता है. इस दशा में व्यक्ति कुभोजन प्राप्त करता है तथा खराब गंध आदि प्राप्त होते हैं.

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बृहस्पति दशा का फल

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गुरु दशा के सामान्य फल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु की दशा चलती है तब व्यक्ति को स्थान प्राप्ति होती है, वाहन का सुख होता है, सरकारी अधिकारियों से संबंध बनते हैं अथवा उनसे मित्रता होती है. यदि कोई व्यवसाय करता है तो उसके काम में वृद्धि होती है. मन प्रसन्न रहता है, वैभव की प्राप्ति होती है, व्यक्ति का ज्ञान बढ़ता है. स्त्री-पुत्रादि के सुख में वृद्धि होती है. इस दशा में सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों की ओर से उत्तम भूमि की प्राप्ति होती है. सुन्दर पत्नी/पति मिलता है, गुरुजनों से सम्मान की प्राप्ति होती है और व्यक्ति उत्तम व अच्छी विद्या से युक्त होता है. 

बृहस्पति की दशा में स्त्री-पुत्र, धन-धान्य, मित्र तथा रत्नों आदि का लाभ व्यक्ति को मिलता है. आरोग्य लाभ होता है, शत्रु पर विजय प्राप्त होती है और सुख की प्राप्ति होती है. इस दशा में व्यक्ति का आचरण भी शुद्ध हो जाता है क्योंकि गुरु स्वयं सात्विक ग्रह है और ज्ञान के कारक कहे गए हैं. शास्त्रों व पुराणों को पढ़ने की इच्छा बली होती है और व्यक्ति का स्वभाव विनम्र होता है. सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों की कृपा से व्यक्ति के मनोरथ पूर्ण होते हैं. 

इस दशा में व्यक्ति सुशील होकर देवताओं की अर्चना तथा ब्राह्मणों की सेवा करने वाला होता है. वैभव से संपन्न होता है तथा बुद्धिमान होता है और धनादि की कमी नहीं होती है. व्यक्ति का उठना-बैठना अच्छी संगत के लोगों के मध्य रहता है. अपने कुल-परिवार में व्यक्ति वरिष्ठ होता है और गुणों की खान होता है. इस दशा में व्यक्ति सरकारी अधिकारी अथवा सरकार में मंत्री हो सकता है. इस दशा में व्यक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं. 

व्यक्ति आस्थावान होता है अर्थात यज्ञादि, ब्राह्मण तथा ईश्वर में आस्था रखने वाला होता है. वैभव संपन्न व धनी व्यक्ति होता है. पुत्रों की ओर से संतोष रहता है, बलशाली होता है, अपने कुल में श्रेष्ठ होता है. व्यक्ति भूत-भविष्य को जानने वाला अथवा इसमें रुचि रखने वाला होता है. उच्च कुलीन लोगों की संगत रहती है, सद्बुद्धि से युक्त होता है और शीलवान होने के साथ-साथ धैर्यवान होता है. 

गुरु दशा के उपरोक्त फल सामान्य है अर्थात अगर गुरु अच्छी स्थिति में हैं तब ऎसे फल मिलेगें अन्यथा नहीं मिलेगें. यदि गुरु जन्म कुंडली में अशुभ है तब अपनी दशा में व्यक्ति को पेट संबंधित विकार हो सकते हैं, गुल्म, प्लीहा और गले से संबंधित विकार हो सकते हैं. 

 

परमोच्च गुरु का दशा फल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु अपनी उच्च राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति को राज्य की प्राप्ति होती है किन्तु अब राजा तो रहे नहीं है इसलिए इस दशा में सरकार में किसी अच्छे पद की प्राप्ति होती है. व्यक्ति परम सुख का अनुभव करता है और उसकी कीर्ति पताका चारों ओर लहराती है. मन को सुकून देने वाले काम व्यक्ति करता है. वाहनादि का सुख व्यक्ति को मिलता है. उच्च सरकारी पद की प्राप्ति से लाभ होता है. इस दशा में व्यक्ति अपने कुल का अधिपति भी होता है. 

 

उच्च गुरु का दशाफल 

गुरु अथवा बृहस्पति कर्क राशि में उच्च का होता है और जब उच्च के गुरु की दशा आती है तब सरकारी अथवा सरकारी अधिकारियों की अनुकम्पा जातक पर काफी रहती है. सरकार की अनुकम्पा से व्यक्ति का भाग्योदय होता है और वह जीवन में उत्तरोत्तर उन्नति करता है. इस दशा में व्यक्ति विदेश यात्रा काफी करता है. वैभव आदि की प्राप्ति होती है और दु:खों से छुटकारा मिलता है लेकिन उच्च के गुरु की दशा में व्यक्ति में स्वाभिमान भी बहुत रहता है और कभी-कभी तो यह घमंड का रूप भी ले लेता है. 

 

मूलत्रिकोण गुरु दशा का फल 

गुरु जब जन्म कुंडली में अपनी मूलत्रिकोण राशि में रहता है तब सरकार की ओर से लाभ होता है. स्त्री-पुत्रादि अथवा संतान से सुख की प्राप्ति होती है. धन की कमी नहीं रहती है और वाहन का सुख भी जातक को मिलता है. अपने स्वप्रयासों से व्यक्ति को धन की प्राप्ति होती है. इस दशा में धर्म-कर्म में रुचि तथा यज्ञादि कराने में भी रुचि रहती है. व्यक्ति को उच्च पद की प्राप्ति होती है तथा लोगों के मध्य जातक लोकप्रियता पाता है. 

 

स्वराशिगत गुरु का दशाफल 

अगर जन्म कुंडली में गुरु अपनी स्वराशि धनु अथवा मीन में स्थित होता है तब सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों से धन का लाभ होता है. जमीन व धान्यादि का लाभ होता है, जातक सुखी होता है और वस्त्राभूषण की प्राप्ति होती है. व्यक्ति मिष्टान्न ज्यादा ग्रहण करता है, मनभावन चीजों की पूर्त्ति करता है और वेद शास्त्रों में रुचि रहती है. काव्यादि में भी जातक की विशेष रुचि रहती है. 

 

अतिमित्र राशि में गुरु का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु अथवा बृहस्पति अपनी अतिमित्र राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति राजा से पूज्य होता है अर्थात सरकार उसका काफी सम्मान करती है जैसे कि किसी को पूजा जा रहा हो. व्यक्ति भेरी (एक प्रकार का वाद्य यंत्र जो मुँह से बजाया जाता है) तथा मृदंग आदि वाद्यों से युक्त रहता है. वाहन आदि से संपन्न होता है तथा हर तरह से सौभाग्यशाली होता है. 

 

मित्रराशि में गुरु का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु अपनी मित्र राशि में स्थित हो तब सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों से व्यक्ति की मित्रता होती है, व्यक्ति की कीर्त्ति चारों ओर फैलती है. व्यक्ति विद्या-विवाद में विजय हासिल करता है. अन्न आदि से हर प्रकार से सुखी रहता है और व्यक्ति परोपकार करने वाला होता है. इस दशा में व्यक्ति को मिष्टान्न व सुगन्ध आदि का लाभ होता है. 

 

समराशि में गुरु का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में बृहस्पति अपनी समराशि में स्थित है तब अपनी दशा में सरकार के द्वारा इसका भाग्योदय होता है. खेती-बाड़ी अथवा कृषि संबंधी कर्म से लाभ होता है. भले ही यह प्रत्यक्ष रुप से कृषि कर्म ना करता हो लेकिन किसी ना किसी रुप में इससे लाभ होता है. गोधन पाता है, धनी होता है और मनोविलास से लाभ पाता है. हर तरह से सुखी व संपन्न कहा जा सकता है. मित्रों से लाभ, वस्त्र व आभूषणों का लाभ होता है. 

 

आरोही या आरोहिणी गुरु का दशाफल 

यदि गुरु जन्म कुंडली में आरोही अवस्था में स्थित है अर्थात नीच व उच्च राशि के मध्य है तब इसकी दशा में व्यक्ति का समाज-सोसायटी में महत्व बढ़ता है. धन व भूमि आदि की प्राप्ति होती है. व्यक्ति की अभिरुचि गाने आदि में बढ़ जाती है. स्त्री व संतान आदि से सुख मिलता है. सरकार की ओर से सम्मान पाता है. अपने स्वप्रयासों तथा पराक्रम के बल पर यश पाता है व प्रतापी होता है. मण्डलाधिपति होता है, ब्राह्मण तथा सरकार से धन लाभ होता है. जातक मेधावी होता है, विद्वान व विनीत (सरल स्वभाव) होता है. 

 

अवरोहिणी गुरु दशा का फल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु अथवा बृहस्पति अवरोहिणी अवस्था में है अर्थात उच्च व नीच राशि के मध्य स्थित है तब इसकी दशा में सुखों का नाश होता है और तुरंत सारे सुख नष्ट हो जाते हैं. इस दशा में अचानकपन जीवन में बहुत रहता है जैसे अभी कुछ सुख मिला और कुछ देर में ही वह सुख नष्ट भी हो गया. अचानक व्यक्ति कीर्ति पाता है और तत्काल वह कीर्ति नष्ट हो जाती है. इसलिए इस दशा को मिश्रित फल देने वाली भी कहा जा सकता है. 

 

शत्रु राशिगत गुरु दशा का फल 

शत्रु राशि में स्थित गुरु की दशा यदि जीवन में आ जाती है तब व्यक्ति को चीजों के होते हुए भी उसके सुख में कमी लगती है अथवा सुखों का उपभोग वह कर नहीं पाता है. वैसे तो इस दशा में व्यक्ति को भूमि व व्यवसाय से लाभ होता है. व्यक्ति सुख की नींद सोता है और सरकार की ओर से सम्मानित होता है लेकिन अपनी स्त्री, संतान, नौकर तथा चचेरे भाईयों को कष्ट में देखता है. 

 

अतिशत्रु राशि में गुरु का दशाफल 

जन्म कुंडली में गुरु अगर अतिशत्रु राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति को शोक प्राप्त होता है, व्यक्ति को विष का भय रहता है. जमीन-जायदाद का नाश होता है तथा धनादि दिन-ब-दिन घटता रहता है. घर में पत्नी से कलह-क्लेश रहता है. सरकार से कष्ट अथवा सरकारी अधिकारियों से कष्ट मिलता है. अग्नि व चोर से भी भय तथा कष्ट रहता है. 

 

उच्च ग्रह से युक्त गुरु का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु किसी उच्च ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में यह महान सुखों को पाता है, कई भवनों का निर्माण करता है तथा सरकार द्वारा पूजनीय होता है. 

 

नीच ग्रह से युक्त गुरु का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु अपनी नीच राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति को मानसिक कष्ट मिलते हैं जिनसे मानसिक रोग भी हो जाते हैं. इस दशा में व्यक्ति दूत (संदेश लाना और पहुंचाना) का काम करता है. इस दशा में व्यक्ति का अपनी संतान से ही विरोध हो जाता है. 

 

शुभ ग्रह से युक्त गुरु का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु शुभ ग्रहों के साथ है तब इसकी दशा में उच्चाधिकारी से वाहन की प्राप्ति होती है. अच्छे, कोमल व सुन्दर वस्त्रों की प्राप्ति होती है. दान आदि से धनागमन होता है. सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों से सम्मान मिलता है. यज्ञादि संपन्न कराकर सन्मार्ग पर चलने वाला होता है जिससे पुण्यलाभ होता है. 

 

अशुभ ग्रह से युक्त गुरु का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु पाप अथवा अशुभ ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति पाप कर्म करने वाला ही होता है. इसका अपना विवेक काम नहीं करता है. धर्म विरुद्ध आचरण व्यक्ति का रहता है. मन तो कलुषित रहता है लेकिन बाहर से पुण्य का दिखावा करने वाला होता है लेकिन अर्थ, भूमि, स्त्री व संतान की ओर से सुखी होता है.  

 

शुभ ग्रह से दृष्ट गुरु का दशाफल 

यदि जन्म कुंडली में गुरु शुभ ग्रह से दृष्ट है अर्थात गुरु को कोई शुभ ग्रह देख रहा है तब व्यक्ति विदेश में सरकार से धन का लाभ पाता है. देवादि की अर्चना करने वाला होता है तथा तीर्थ आदि के दर्शन करता है. व्यक्ति अपने गुरुजनों का सम्मान करने वाला होता है. 

 

अशुभ ग्रह से दृष्ट गुरु का दशाफल 

जन्म कुंडली में गुरु यदि किसी पाप अथवा अशुभ ग्रह से दृष्ट है तब इसकी दशा में व्यक्ति सुखी होता है, व्यक्ति धैर्यवान व शीलवान भी होता है, यश भी पाता है, धनी व सुखी भी होता है लेकिन जब यह दशा समाप्त होने वाली होती है तब सब कुछ नष्ट भी कर जाती है.  




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राहु दशा का फल

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राहु जन्म कुंडली में कितना ही शुभ क्यूँ ना हो तब भी शुभफल देने में बहुत ज्यदा सक्षम नहीं कहा जा सकता. इसकी दशा में व्यक्ति मानसिक रुप से भ्रम में बना रहता है, उसे पता ही नहीं चल पाता कि क्या अच्छा तो क्या बुरा है! इसकी दशा में व्यक्ति के सुख का तथा धन का नाश होता है. कई प्रकार के रोग व व्याधियाँ मनुष्य को जकड़ लेती है. यदि शारीरिक कष्ट नहीं भी हों लेकिन मानसिक कष्टों से नहीं बचा जा सकता है. इस दशा में मनुष्य प्रवासी हो जाता है. 

राहु की दशा में पिता को कष्ट होता है, पिता से वियोग भी हो सकता है तथा परिवार के कुछ लोग विरोधी हो सकते हैं और उनके द्वारा कष्टों की प्राप्ति हो सकती है. अपने घर-परिवार के प्रति आसक्ति रहती है लेकिन घर का वाताचरण सुखमय नहीं कहा जा सकता. मानसिक सुख का अभाव सदैव रहता है. असंतोष, सन्ताप, बुद्धिहीनता आदि इस दशा में देखने को मिलता है. विषम परिस्थितियों से सामना होता है जो कई बार मृत्युतुल्य कष्ट देने वाली साबित होती हैं. इस दशा में विष का भय भी बना रहता है क्योंकि राहु स्वयं विष है. व्यक्ति का जीवन संशयपूर्ण स्थिति में रहता है. 

 

उच्च राशि में स्थित राहु दशा फल

वृष राशि में राहु को उच्च का माना जाता है तो कुछ अन्य मत से मिथुन में राहु को उच्च का माना गया है. यदि जन्म कुंडली में राहु अपनी उच्च राशि में अच्छे भाव में स्थित है तब इसकी दशा में सुखों की प्राप्ति होती है. मित्रों का सुख अथवा उनसे लाभ होता है. जातक के धन-धान्यादि में बढ़ोतरी होती है. 

 

मूलत्रिकोण राशि में स्थित राहु दशा फल

मूलत्रिकोण राशि तय नहीं है कि कौन सी मानी जाएंगी लेकिन मेष व कर्क राशि के राहु को भी अच्छा माना गया है इसलिए इन दोनों को मूलत्रिकोण जैसी राशियाँ राहु की मान सकते हैं क्योंकि इनमें स्थित राहु की दशा में धन का लाभ होता है, विद्या से लाभ अथवा विद्या का लाभ होता है. सरकार से सम्मान, स्त्री-पुत्र का सुख तथा दासादि का सुख भी मिलता है. 

 

कन्या, धनु और मीन राशि में राहु का फल 

अगर इनमें से किसी भी एक राशि में राहु स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति को स्त्री-पुत्र का लाभ व सुख मिलता है. किसी स्थान का स्वामित्व भी व्यक्ति को मिलता है. वाहन आदि का सुख भी व्यक्ति पाता है लेकिन इन राशियों में स्थित राहु की दशा जब समाप्त होने लगती है तब जो कुछ इस दशा ने दिया है वह जाते-जाते वापिस ले भी जाती है अर्थात जो उपलब्धियाँ व्यक्ति पाता है वह नष्ट हो जाती हैं. 

कुछ अन्य विद्वानों के मत से सिंह, वृष, कन्या और कर्क राशि में जब राहु स्थित होता है तब अपनी दशा में व्यक्ति को जीवन की सभी सफलताएँ प्रदान कराता है. हर प्रकार की सुख-सुविधाएँ, सभी ऎश्वर्य, धन-धान्य आदि व्यक्ति को मिलते हैं. व्यक्ति परोपकार करने वाला होता है तथा वाहनादि के सुखों का भी भोग करता है. 

 

पाप राशि में राहु का फल 

यदि जन्म कुंडली में राहु किसी पाप ग्रह की राशि में स्थित है तब देह की दुर्बलता होती है. कुल का विनाश इस दशा में कहा गया है. सरकार से भय होता है, शत्रु का भय भी बना रहता है और अकसर व्यक्ति को धोखे मिलते हैं. मूत्र संबंधी व्याधियाँ होने की संभावना बनी रहती है. 

 

शुभ-अशुभ से दृष्ट राहु का फल 

यदि जन्म कुंडली में राहु किसी शुभ ग्रह से दृष्ट है तब इसकी दशा में कार्य सिद्ध होते हैं. सरकार की ओर से अथवा उच्चाधिकारियों के द्वारा व्यक्ति सम्मानित होता है. धन का आगमन भी इस दशा में रहता है लेकिन किसी स्वजन का निधन भी इस दशा में होने की संभावना बनती है. 

यदि राहु किसी पाप अथवा अशुभ ग्रह से दृष्ट है तब इसकी दशा में कार्य असफल रहते हैं. जो अपना उद्योग चलाते हैं उनमें बाधा आती है. मानसिक व शारीरिक कष्ट बना रहता है. परिवार वाले ही परेशानियाँ व कष्ट उत्पन्न करने वाले बन जाते हैं. चोर व अग्नि का भय भी इस दशा में बना रहता है. सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों से उत्पीड़न मिल सकता है जिससे कष्ट में वृद्धि ही होती है. 

 

उच्च ग्रह से युक्त राहु दशा फल 

यदि जन्म कुंडली में राहु उच्च के ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में सरकार की ओर से लाभ होता है, स्त्री-पुत्र की ओर से सुख की अनुभूति होती है. धन-संपदा, वस्त्र तथा आभूषण आदि का सुख भी इस दशा में मिलता है. इस दशा में व्यक्ति मालिश का सुख काफी उठाता है. 

 

नीच ग्रह से युक्त राहु दशा फल 

यदि जन्म कुंडली में राहु नीच के ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति नीच कार्यों को करके अपना जीवनयापन करता है. ऎसे कार्य जिन्हें नीच वृत्ति का समझा जाता है वह जातक करता है. किसी दुष्ट स्त्री से संबंध रख सकता है जिससे कष्ट की प्राप्ति होती है अथवा अपनी स्त्री भी दुष्टा हो सकती है और पुत्र भी कुपुत्र हो जाता है. 

 

नीच राशि में स्थित राहु दशा फल 

कुछ विद्वानों के मत से राहु वृश्चिक राशि में नीच का कहा जाता है तो कुछ अन्य के मत से राहु को धनु राशि में नीच का माना गया है. यदि जन्म कुंडली में राहु अपनी नीच राशि में स्थित है तब अग्नि व चोर का भय रहता है. सरकार, सरकारी व्यक्ति अथवा उच्चाधिकारियों की ओर से भी कष्ट की प्राप्ति होती है. व्यक्ति विदेश गमन करता है और कई विद्वान तो इस दशा में वनवास की बात भी करते हैं. विष तथा फाँसी का भय भी इस दशा में बना रह सकता है. 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

         

मंगल दशा का फल

मंगल दशा/अन्तर्दशा के सामान्य फल

जब किसी जन्म कुंडली में मंगल ग्रह की दशा चलती है तब इसकी दशा में शस्त्र, भूमि, वाहन और अग्नि से, औषधि से, राजा अथवा सरकार के साथ धोखाधड़ी से और अनेक प्रकार की क्रूरता से धन की प्राप्ति होती है. जातक पित्त, ज्वर, रक्त से कष्ट पाता है. नीच स्त्री का भोग और पुत्र, स्त्री और गुरु से विद्वेषण तथा कुत्सित अन्नादि का भोजन करता है.

मंगल की दशा/अन्तर्दशा में अग्नि और विष से भय तथा शस्त्र से आघात हो सकता है. जातक को शत्रु, नृपति, चोर, सर्प आदि से भय रहता है. वमनादि व्याधियों से कष्ट तथा उसके धन का क्षय होता है. ग्रहदोष से कष्ट, रक्तविकार तथा स्वजनों से विरोध होता है. मूर्छा आदि भी मंगल की दशा में प्राप्त होती है. इस दशा में कार्यों में विघ्न और जातक दीनहीन हो जाता है.

अगर भौम अर्थात मंगल ग्रह जन्म कुंडली में शुभ स्थान में स्थित है तो शस्त्रादि से, राजा से, औषधि, चतुष्पद और अनेक उद्यमों से धन की प्राप्ति होती है. इस दशा में साहस तथा अनेक उद्योग द्वारा, विवाद द्वारा चतुष्पादादि के व्यापार से धन की प्राप्ति होती है.

 

परमोच्च मंगल दशा के फल 

अगर जन्म कुंडली में मंगल अपने परमोच्च अंशों पर स्थित है तब इसकी दशा में खेत और धन का लाभ, युद्ध में विजय, अधिक सम्मान, सहोदर, स्त्री और पुत्र का लाभ और वाणी का सुख मनुष्य को प्राप्त होता है.  

 

उच्चस्थ मंगल दशा के फल

अगर जन्म कुंडली में मंगल अपनी उच्च राशि में स्थित है तब इसकी दशा में राज्य अथवा राजा द्वारा धन की प्राप्ति होती है. भूमि, पुत्र, बन्धुसमागम, विशिष्ट वाहनादि का सुख और विदेश यात्रा होती है.

 

मूल त्रिकोणस्थ मंगल का दशाफल

मंगल अपनी स्वराशि मेष में अगर शून्य से बारह डिग्री के मध्य स्थित हो तब यह मूल त्रिकोण राशि में कहलाता है. मूल त्रिकोण राशि में स्थित होने पर मंगल की दशा में व्यक्ति को मीठे पकवान खाने को मिलते हैं, पेय पदार्थों की तरफ ज्यादा रुझान रह सकता है, वस्त्राभूषण का शौक भी व्यक्ति को इसकी दशा में हो सकता है. इस दशा में व्यक्ति अगर प्राचीन धार्मिक ग्रंथों को सुनता है अथवा स्वयं उनका पाठ करता है तब इसे किसी ना किसी रुप में लाभ मिलता है.

व्यक्ति को इस दशा में अपने भाई-बहनों की ओर से भी सुख की अनुभूति होती है. उन्हें सुखी देखकर सुख का अनुभव करता है. भाई-बहनों जैसे व्यक्तियों से लाभ होता है और अपने कार्य स्थल पर भी अपने सहयोगियों से सुख पाता है. जो खेती-बाड़ी करने वाले लोग हैं उन्हें इस दशा में कृषि से संबंधित चीजों से लाभ मिलता है.

इस दशा में पुत्र व स्त्री संबंधी सुख की प्राप्ति होती है. व्यक्ति अपने पराक्रम व साहस के द्वारा धन की वृद्धि करता है. यदि व्यक्ति योद्धा है तब जीत पाने के लिए विशेष प्रयत्न करके यश पाता है.

 

स्वक्षेत्री मंगल दशा का फल

अगर जन्म कुंडली में मंगल अपनी राशि मेष या वृश्चिक में स्थित है तब व्यक्ति को इसकी दशा में जमीन संबंधित लाभ होता है, धन लाभ अथवा धन की प्राप्ति होती है. वाहन का सुख होता है तथा किसी विशेष स्थान का अधिकार अथवा उस पर आधिपत्य स्थापित हो सकता है. भाईयों से सुख की प्राप्ति होती है. व्यक्ति दो प्रकार से नाम कमाता है.

 

अतिमित्र राशि में स्थित मंगल का फल

अगर जन्म कुंडली में मंगल अपनी अतिमित्र राशि में स्थित है तब इसकी दशा आने पर व्यक्ति को सरकार की ओर से कृपा प्राप्त हो सकती है और यह कृपा धन अथवा भूमि लाभ के रुप में प्राप्त हो सकती है. व्यक्ति शुभ कर्मों के लिए यज्ञ आदि करवा सकता है. परिवार में विवाह आदि कर्म भी संपन्न हो सकते हैं. यज्ञोपवीत जैसे कर्म भी इस दशा में संपन्न हो सकते हैं. इस दशा की एक खासियत यह भी है कि इस समय अपने स्थान से दूर जाकर भाग्योदय होता है.

 

मित्र राशि में स्थित मंगल का फल

जन्म कुंडली में मंगल अगर अपनी मित्र राशि में स्थित है तब व्यक्ति के जो भी शत्रु हैं वह सभी मित्र बन जाते हैं. व्यक्ति के क्रोध करने के कारण विवाद व क्लेश उत्पन्न होता है जिससे जातक स्वयं भी कष्ट पाता है. यदि व्यक्ति खेती-बाड़ी करने वाला है तब इसका नाश हो सकता है. कोई जमीन आदि का काम करता है तब उसमें भी परेशानी हो सकती है. आँखों की रोशनी कमजोर हो सकती है. चोरी व अग्नि का भय बना रह सकता है. इस दशा में जातक को विशेष रुप से सतर्क रहना चाहिए.

 

समराशि में स्थित मंगल का फल

जन्म कुंडली में मंगल अगर अपनी सम राशि में स्थित है तब इसकी दशा में व्यक्ति अपने स्वप्रयास से धनार्जन करता है और उसी धन से वह अपने लिए सुख संसाधन जुटाता है लेकिन इस समय में जातक का अपने आसपास के लोगों से वैर-विरोध बना रहता है, चाहे वह स्त्री हो, पुत्र हो, भाई हो, बंधु-बांधव ही क्यूँ ना हो, सभी से विरोध-सा बना रहता है. अग्नि भय तथा सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों से कष्ट मिलता है.

 

आरोहिणी मंगल दशा का फल

यदि जन्म कुंडली में मंगल आरोहिणी स्थिति ( अपनी नीच और उच्च राशि के मध्य स्थित होने पर) में है तब यह अपनी दशा में सुख, राजा का सान्निध्य, स्वजनों में प्रधानता, धैर्य, मन की प्रसन्नता, भाग्योदय, गौ, हाथी, अश्वादि का लाभ होता है.  

 

अवरोहिणी मंगल दशा का फल

जन्म कुंडली में मंगल अवरोहिणी स्थिति (मंगल अपनी उच्च राशि और नीच राशि के मध्य स्थित होने पर) में होने पर अपनी दशा में स्थान तथा धन का नाश कराता है, साथ ही अनेक प्रकार से दुख भी होते हैं. व्यक्ति प्रवासी हो जाता है और स्वजनों से विरोध बना रहता है. चोर, अग्नि तथा राजा से भय रहता है.

 

शत्रु राशि में मंगल दशा का फल

यदि जन्म कुंडली में मंगल अपनी शत्रु राशि में स्थित हो तब जिस भाव में यह स्थित है उसके फल शुभ मिलते हुए भी जातक उसका लाभ नहीं उठा पाएगा अथवा उस भाव से संबंधित चीजों के होते हुए भी उसके सुख से वंचित रह सकता है. इस दशा में युद्ध में कष्ट होना, किसी बात का शोक होना, प्रमाद की स्थिति बने रहना, गुदा रोग हो सकता है अथवा नेत्र रोग से भी जातक कष्ट पा सकता है.

 

अतिशत्रु राशि में मंगल का फल

जन्म कुंडली में मंगल अगर अति शत्रु राशि में स्थित है और इसकी दशा आ जाती है तब कलह-क्लेश बने रहते हैं जिनसे दुख की अनुभूति होती है. सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों से कष्ट होता है. खुद के परिवार वाले तथा भाई-बांधवों से वैर रहता है. स्त्री व पुत्र से परेशानी अथवा हानि हो सकती है और जातक के मित्रों को कष्ट व रोग से परेशानी होती है.

 

नीच राशि में स्थित मंगल दशाफल

अगर जन्म कुंडली में मंगल अपनी नीच राशि कर्क में स्थित है तो इसकी दशा में हीन वृत्ति द्वारा स्वजनादि का भरण-पोषण, कुभोजन, हाथी, घोड़ा, स्वबन्धुजनों का राजा, चोर या अग्नि द्वारा विनाश हो सकता है. इस दशा में किसी प्रकार का मनोविकार भी हो सकता है. दासवृत्ति तथा पर अन्न पर आश्रित रहने से धीरे-धीरे स्त्री व पुत्रों का विनाश होता है.

 

शुभ ग्रह से युक्त मंगल दशा का फल

यदि जन्म कुंडली में मंगल शुभ ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में थोड़ा-सा सुख कुछ ही समय के लिए मिल सकता है. रोग के कारण शरीर कमजोर हो सकता है. सरकार अथवा उसके अधिकारियों से विवाद की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. विद्या आदि में भी विवाद उत्पन्न हो जाता है तथा व्यक्ति स्थान परिवर्तन कर प्रवासी हो जाता है.

 

पाप ग्रह से युक्त मंगल दशा का फल

यदि जन्म कुंडली में मंगल पाप ग्रह के साथ स्थित है तब इसकी दशा में जातक की प्रवृत्ति प्रतिदिन पाप कर्मों में लिप्त रहने की हो जाती है. भगवान में अनास्था रहती है, सभी के प्रति क्रूरता का भाव व्यक्ति के दिल में व्याप्त रहता है. भले वह देवता अथवा पशु ही क्यूँ ना हो किसी के लिए उसके मन में दया भाव नहीं होता है.

 

शुभ ग्रहों से दृष्ट मंगल का फल

जन्म कुंडली में मंगल यदि शुभ ग्रहों से दृष्ट है तब भूमि तथा धन का विनाश होता है. मंगल की दशा आने पर यदि गोचर में भी यह शुभ ग्रहों से दृष्ट होता है तब जातक को उतनी अवधि में शुभ फलों की प्राप्ति होती है.

 

पाप ग्रहों से दृष्ट मंगल का फल

मंगल ग्रह स्वयं ही सबसे क्रूर व पापी ग्रह माना जाता है और यदि इसे कोई अन्य पापी ग्रह देख रहा हो तब इसकी दशा में जातक को अनेकों प्रकार के दुख तथा कष्ट उठाने पड़ सकते हैं. सरकार अथवा सरकारी अधिकारियों की नाराजगी के कारण व्यक्ति अपनी पत्नी तथा मित्रों से दूर चला जाता है और विदेश में रहता है.  




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श्रीललितासहस्त्रनाम स्तोत्रम्

     

  श्रीललितासहस्त्रनाम स्तोत्रम्

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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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।।न्यास:।।

ऊँ अस्य श्री ललितासहस्त्रनामस्तोत्रमालामहामन्त्रस्य वशिन्यादिवाग्देवता ऋषय: । अनुष्टुप् छन्द: । श्रीललितापरमेश्वरी देवता । श्रीमद्भाग्भवकूटेति बीजम् । मध्यकूटेति शक्ति: । शक्तिकूटेति कीलकम् । मूलप्रकृतिरिति ध्यानम् ।

 

करन्यास –

ऊँ ऎं अंगुष्ठाभ्यां नम: । ऊँ क्लीं तर्जनीभ्यां नम: । ऊँ सौ: मध्यमाभ्यां नम: । ऊँ सौ: अनामिकाभ्यां नम: । ऊँ क्लीं कनिष्ठिकभ्यां नम: । ऊँ ऎं करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: ।

 

अंगन्यास: –

ऊँ ऎं हृदयाय नम: । ऊँ क्लीं शिरसे स्वाहा । ऊँ सौ: शिखायै वषट् । ऊँ सौ: कवचाय हुम् । ऊँ क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट् । ऊँ ऎँ अस्त्राय फट् । ऊँ भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्ध: ।

 

ऊँ मम श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरीप्रसादसिद्धिद्वारा

चिन्तितफलावात्यर्थे जपे विनियोग: ।।

 

ध्यानम् –

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्तारानायकशेखरां स्मित्मुखीमापीनवक्षोरुहाम् । पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषंक रक्तोत्पलं बिभ्रतीं सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्पराम्बिकाम् ।।

अरुणां करुणातरंगिताक्षीं धृतपाशांकुशपुष्पबाणचापाम् ।

अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम् ।।

ध्यायेत्पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वरांगीम् ।

सर्वालंकारयुक्तां सततभयदां भक्तनम्रां भवानीं श्रीविद्यां शान्तमूर्ति सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम् ।।

सकुंकुमविलेपनामलिकचुम्बिकस्तूरिकां समन्दहसितेक्षणां सशरचापाशांकुशाम् ।

अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्यभूषाम्बरां जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्मरेदम्बिकाम् ।।

 

लमित्यादिपंचपूजा

“लं” पृथिवीतत्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै गन्धं परिकल्पयामि

“हं” आकाशतत्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै पुष्पं परिकल्पयामि

“यं” वायुतत्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै धूपं परिकल्पयामि

“रं” वह्नितत्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै दीपं परिकल्पयामि

“वं” अमृततत्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै अमृतनैवेद्यं परिकल्पयामि

“सं” सर्वतत्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै ताम्बूलादि सर्वोपचारान् परिकल्पयामि

 

तत: पारायणं कुर्यात् –

ऊँ ऎं हृीं श्रीं श्रीमात्रे नम

श्रीललितासहस्त्रनाम स्तोत्रम्

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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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अगस्त्य उवाच

अश्वानन महाबुद्धे सर्वशास्त्रविशारद ।

कथितं ललितादेव्या: चरितं परमाद्भुतम् ।।1।।

पूर्वं प्रादुर्भवो मातु: तत: पट्टाभिषेचनम् ।

भण्डासुरवधश्चैव विस्तरेण त्वयोदित: ।।2।।

वर्णितं श्रीपुरं चापि महाविभवविस्तरम् ।

श्रीमत्पंचदशाक्षर्या: महिमा वर्णितस्तथा ।।3।।

षोढा न्यासादयो देव्या: न्यासखण्डे प्रकीर्तिता: ।

अन्तर्यागक्रमश्चैव बहिर्यागक्रमस्तथा ।।4।।

महायागक्रमश्चापि पूजाखण्डे समीरिता: ।

पुरश्चरणखण्डे तु जपलक्षणमीरितम् ।।5।।

होमखण्डे त्वया प्रोक्तो होमद्रव्यविधिक्रम: ।

चक्रराजस्य विद्याया: श्रीदेव्या देशिकान्मनो: ।।6।।

रहस्यखण्डे तादात्म्यं परस्परमुदीरितम् ।

स्तोत्रखण्डे बहुविधा: स्तुतय: परिकीर्तिता: ।।7।।

मन्त्रिणीदण्डिनीदेव्यो: प्रोक्ते नामसहस्त्रके ।

न तु श्रीललितादेव्या: प्रोक्तं नामसहस्त्रकम् ।।8।।

तत्र मे संशयो जातो हयग्रीव दयानिधे ।

किं वा त्वया विस्मृतं तज्ज्ञात्वा वा समुपेक्षितम् ।।9।।

मम वा योग्यता नास्ति श्रोतुं नामसहस्त्रकम् ।

किमर्थं भवता नोक्तं तत्र मे कारणं वद ।।10।।

 

सूत उवाच

इति पृष्टो हयग्रीवो मुनिना कुम्भजन्मना ।

प्रहृष्टो वचनं प्राह तापसं कुम्भसम्भवम् ।।11।।

 

श्रीहयग्रीव उवाच

लोपामुद्रापतेsगस्त्य सावधानमना: श्रृणु ।

नाम्नां सहस्त्रं यन्नोक्तं कारणं तद्वदामि ते ।।12।।

रहस्यमिति मत्वाहं नोक्तवांस्ते न चान्यथा ।

पुनश्च पृच्छते भक्त्या तस्मात्तत्ते वदाम्यहम् ।।13।।

ब्रूयाच्छिष्याय भक्ताय रहस्यमपि देशिक: ।

भवता न प्रदेयं स्यादभक्ताय कदाचन ।।14।।

न शठाय न दुष्टाय नाविश्वासाय कर्हिचित् ।

श्रीमातृभक्तियुक्ताय श्रीविद्याराजवेदिने ।।15।।

उपासकाय शुद्धाय देयं नामसहस्त्रकम् ।
यानि नामसहस्त्राणि सद्य: सिद्धिप्रदानि वै ।।16।।

तन्त्रेषु ललितादेव्यास्तेषु मुख्यमिदं मुने ।

श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तत्र कादिर्यथा परा ।।17।।

पुराणां श्रीपुरमिव शक्तीनां ललिता यथा ।

श्रीविद्योपासकानां च यथा देवो पर: शिव: ।।18।।

तथा नामसहस्त्रेषु वरमेतत्प्रकीर्तितम् ।

यथास्य पठनाद्देवी प्रीयते ललिताम्बिका ।।19।।

अन्यनामसहस्त्रस्य पाठान्न प्रीयते तथा ।

श्रीमातु: प्रीतये तस्मादनिशं कीर्तयेदिदम् ।।20।।

बिल्वपत्रैश्चक्रराजे योsर्चयेल्ललिताम्बिकाम् ।

पद्मैर्वा तुलसीपुष्पैरेभिर्नामसहस्त्रकै: ।।21।।

सद्य: प्रसादं कुरुते तस्य सिंहासनेश्वरी ।

चक्राधिराजमभ्यर्च्य जप्त्वा पंचदशाक्षरीम् ।।22।।

जपान्ते कीर्तयेन्नित्यमिदं नामसहस्त्रकम् ।

जपपूजाद्यशक्तश्चेत्पठेन्नामसहस्त्रकम् ।।23।।

सांगार्चने सांगजपे यत्फलं तदवाप्नुयात् ।

उापसने स्तुतीरन्या: पठेदभ्युदयो हि स: ।।24।।

इदं नामसहस्त्रं तु कीर्तयेन्नित्यकर्मवत् ।

चक्रराजार्चनं देव्या जपो नाम्नां च कीर्तनम् ।।25।।

भक्तस्य कृत्यमेतावदन्यदभ्युदयं विदु: ।

भक्तस्यावश्यकमिदं नामसाहस्त्रकीर्तनम् ।।26।।

तत्र हेतुं प्रवक्ष्यामि श्रृणु त्वं कुम्भसम्भव ।

पुरा श्रीललितादेवी भक्तानां हितकाम्यया ।।27।।

वाग्देवीवशिनीमुख्या: समाहूयेदमब्रवीत् ।

देव्युवाच

वाग्देवता वशिन्याद्या: श्रृणुध्वं वचनं मम ।।28।।

भवत्यो मत्प्रसादेन प्रोल्लसद्वाग्विभूतय: ।

मद्भक्तानां वाग्विभूतिप्रदाने विनियोजिता: ।।29।।

मच्चक्रस्य रहस्यज्ञा मम नामपरायणा: ।

मम स्तोत्रविधानाय तस्मादाज्ञापयामि व: ।।30।।

कुरुध्वमंकितं स्तोत्रं मम नामसहस्त्रकम् ।

येन भक्त्यै: स्तुताया मे सद्य: प्रीति: परा भवेत् ।।31।।

 

श्रीहयग्रीव उवाच

इत्याज्ञप्ता: वचो देव्य: श्रीदेव्या ललिताम्बया ।

रहस्यैर्नामभिर्दिव्यैश्चक्रु: स्तोत्रमनुत्तमम् ।।32।।

रहस्यं नामसाहस्त्रमिति तद्विश्रुतं परम् ।

तत: कदाचित्सदसि स्थित्वा सिंहासनेsम्बिका ।।33।।

स्वसेवावसरं प्रादात् सर्वेषां कुम्भसम्भव ।

सेवार्थमागतास्तत्र ब्रह्माणी ब्रह्मकोटय: ।।34।।

लक्ष्मीनारायणानां च कोटय: समुपागता: ।

गौरीकोटिसमेतानां रुद्राणामपि कोटय: ।।35।।

मन्त्रिणीदण्डिनीमुख्या: सेवार्थं यास्समागता: ।

शक्तयो विविधाकारास्तासां संख्या न विद्यते ।।36।।

दिव्यौघा मानवौघाश्च सिद्धौघाश्च समागता: ।

तत्र श्रीललितादेवी सर्वेषां दर्शनं ददौ ।।37।।

तेषु दृष्टोपविष्टेषु स्वे स्वे स्थाने यथाक्रमम् ।

तत: श्रीललितादेवीकटाक्षाक्षेपचोदिता: ।।38।।

उत्थाय वशिनीमुख्या बद्धांजलिपुटास्तदा ।

अस्तुवन्नामसाहस्त्रै: स्वकृतैर्ललिताम्बिकाम् ।।39।।

श्रुत्वा स्तवं प्रसन्नाभूल्ललिता परमेश्वरी ।

ते सर्वे विस्मयं जग्मुर्ये तत्र सदसि स्थिता: ।।40।।

तत: प्रोवाच ललिता सदस्यान् देवतागणान् ।

 

देव्युवाच

ममाज्ञयैव वाग्देव्यश्चक्रु: स्तोत्रमनुत्तमम् ।।41।।

अंकितं नामभिर्दिव्यैर्मम प्रीतिविधायकै: ।

तत्पठध्वं सदा यूयं स्तोत्रं मत्प्रीतिवृद्धये ।।42।।

प्रवर्तयध्वं भक्तेषु मम नामसहस्त्रकम् ।

इदं नामसहस्त्रं मे यो भक्त: पठते सकृत् ।।43।।

स मे प्रियतमो ज्ञेयस्तस्मै कामान् ददाम्यहम् ।

श्रीचक्रे मां समभ्यर्च्य जप्त्वा पंचदशाक्षरीम् ।।44।।

पंचान्नामसहस्त्रं मे कीर्तयेन्मम तुष्टये ।

मामर्चयतु वा मा वा विद्यां जपतु वा न वा ।।45।।

कीर्तयेन्नामसाहस्त्रमिदं मत्प्रीतये सदा ।

मत्प्रीत्या सकलान् कामांल्लभते नात्र संशय: ।।46।।

तस्मान्नामसहस्त्रं मे कीर्तयध्वं सदाssदरात् ।

 

श्रीहयग्रीव उवाच

इति श्रीललितेशानी शास्ति देवान्सहानुगान् ।।47।।

सदाज्ञया तदारभ्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा: ।

शक्तयो मन्त्रिणीमुख्या इदं नामसहस्त्रकम् ।।48।।

पठन्ति भक्त्या सततं ललितापरितुष्टये ।

तस्मादवश्यं भक्तेन कीर्तनीयमिदं मुने ।।49।।

आवश्यकत्वे हेतुस्ते मया प्रोक्तो मुनीश्वर ।

इदानीं नामसाहस्त्रं वक्ष्यामि श्रद्धया श्रृणु ।।50।।

 

इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे श्रीहयग्रीवागस्त्यसंवादे श्रीललितासहस्त्रनामस्तोत्रपूर्वभागो नाम प्रथमोsध्याय: ।।

 

रविवार, 7 जुलाई 2019

महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद की 14 रोमांचक घटनाएं!!

महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद की 14 रोमांचक घटनाएं!!!!!!!!
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁।     आचार्य डा.अजय दीक्षित


महाभारत युद्ध के बाद का इतिहास सभी जानना चाहते हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडव, कृष्ण और बचे हुए योद्धाओं का क्या हुआ? धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर, संजय, युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, भीम और भगवान कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई? भारत का इतिहास और समाज उस काल में किस हाल में था। क्या यदुवंश का नाश हो गया था? तो आओ इसी संबंध में जानते हैं 14 प्रमुख रोमांचक घटनाएं।


1) युद्ध के 18वें अर्थात अंतिम दिन दुर्योधन ने रात्रि में उल्लू और कौवे की सलाह पर अश्वत्थामा को सेनापति बनाया था। उस एक रात्रि में ही अश्वत्थामा ने पांडवों की बची लाखों सेनाओं, पुत्रों और गर्भ में पल रहे पांडवों के पुत्रों तक को मौत के घाट उतार दिया था। द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्‍थामा के द्वारा किए गए नरसंहार के बाद युद्ध समाप्त हो गया था।


2) युद्ध के बाद दुर्योधन कहीं जाकर छुप गया था। पांडवों ने उसे खोज लिया तब भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध हुआ। इस युद्ध को देखने के लिए बलराम भी उपस्थित थे। भीम कई प्रकार के यत्न करने पर भी दुर्योधन का वध नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि दुर्योधन का शरीर वज्र के समान कठोर था। ऐसे समय श्रीकृष्ण ने अपनी जंघा ठोककर भीम को संकेत दिया जिसे भीम ने समझ लिया। तब भीम ने दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया और अंत में उसकी जंघा उखाड़कर फेंक दी। बाद में दुर्योधन की मृत्यु हो गई।


3) अश्‍वत्थामा ने जब द्रौपदी के पुत्रों का उनकी निद्रावस्था में वध कर दिया तो द्रौपदी खूब विलाप करने लगी। यह देख भीम से रहा नहीं गया और वे अश्‍वत्‍थामा को पकड़ने के लिए रथ पर सवार होकर चल देते हैं। भीम के पीछे श्रीकृष्ण भी अर्जुन के साथ अपने रथ पर सवार होकर चल पड़े। सभी ने गंगा के तट पर अश्वत्‍थामा को ढूंढ लिया। द्रोणपुत्र अश्वत्‍थामा यह देखकर डर गया और उसने तुरंत ही अपने दिव्य अस्त्र ब्रह्मास्त्र का संकल्प किया और उस प्रचंड अस्त्र को पांडवों की वध की इच्‍छा से छोड़ दिया। यह देख अर्जुन ने भी संकल्प लिया कि इस ब्रह्मास्त्र से शत्रु का ब्रह्मास्त्र शांत हो जाए, ऐसा कहकर अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। दोनों के अस्त्रों से प्रचंड अग्नि का जन्म हुआ। यह देख वहां वेद व्यास और देवर्षि नारद प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि इन दोनों अस्त्रों से धरती का विनाश हो जाएगा। आप इन्हें वापस ले लें। ऐसे में अर्जुन ने तो अपना अस्त्र वापस ले लिया लेकिन अश्‍वत्थामा इसे वापस लेने में सक्षम नहीं था। ऐसे में वह उस अस्त्र को उत्तरा के गर्भ पर उतार देता है।


4) अश्वत्थामा द्वारा उत्तरा के गर्भ पर अस्त्र छोड़ देने के बाद श्रीकृष्ण उत्तरा के बच्चे को बाद में पुन: जीवित कर देते हैं। इस बीच अश्‍वत्थामा के इस अपराध के लिए श्रीकृष्ण उसे 3,000 वर्षों तक कोढ़ी के रूप में रहकर भटकने का शाप दे देते हैं। उनके इस शाप का वेद व्यासजी ने अनुमोदन किया था। शिव महापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां है, यह नहीं बताया गया है। तब अश्वत्‍थामा पांडवों को अपनी मणि देकर वन में चला जाता है। वह मणि भीमसेना युधिष्ठिर की आज्ञा से द्रौपदी को दे देते हैं। द्रौपदी वह मणि युधिष्ठिर को देकर अश्‍वत्‍थामा को क्षमा कर देती है।

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5) युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने युद्धभूमि पर ही सभी मृत योद्धाओं का विधिवत रूप से दाह-संस्कार किया। महाभारत के स्त्री पर्व के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर के कहने पर पांडवों ने ही दोनों पक्षों के मरे हुए योद्धाओं का अंतिम संस्कार किया था।


6) भीष्म यद्यपि शरशैया पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। प्रतिदिन दिए गए इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है।


7) बाद में सूर्य के उत्तरायण होने पर युधिष्ठिर आदि सगे-संबंधी, पुरोहित और अन्यान्य लोग भीष्म के पास पहुंचते हैं। उन सबसे भीष्म पितामह ने कहा कि इस शरशैया पर मुझे 58 दिन हो गए हैं। मेरे भाग्य से माघ महीने का शुक्ल पक्ष आ गया। अब मैं शरीर त्यागना चाहता हूं। इसके पश्चात उन्होंने सब लोगों से प्रेमपूर्वक विदा मांगकर शरीर त्याग दिया। सभी लोग भीष्म को याद कर रोने लगे। युधिष्ठिर तथा पांडवों ने पितामह के शरबिद्ध शव को चंदन की चिता पर रखा तथा दाह-संस्कार किया।


8) भीष्म पितामह के अंतिम संस्कार के बाद युधिष्ठिर के राज्याभिषेक की तैयारी होती है। महाभारत शांति पर्व के ‘राजधर्मानुशासन पर्व’ में इस राज्याभिषेक का वर्णन मिलता है। इस राज्याभिषेक में पांडु पुत्र भीम, अर्जुन, नकुल सहदेव के अलावा श्री‍कृष्ण, विदुर, धृतराष्ट्र, गांधारी, द्रौपदी, कुंती आदि सभी सम्मिलित होते हैं। इस राज्याभिषेक में देश और विदेश के कई राजाओं को आमंत्रित किया जाता है और भव्य आयोजन के बीच युधिष्ठिर का राज्याभिषेक होता है।


9) युद्ध के 15 वर्ष बाद धृतराष्ट्र, गांधारी, संजय और कुंती वन में चले जाते हैं। एक दिन धृतराष्ट्र गंगा में स्नान करने के लिए जाते हैं और उनके जाते ही जंगल में आग लग जाती है। वे सभी धृतराष्ट्र के पास आते हैं। संजय उन सभी को जंगल से चलने के लिए कहते हैं, लेकिन धृतराष्ट्र वहां से नहीं जाते हैं, गांधारी और कुंती भी नहीं जाती है। जब संजय अकेले ही उन्हें जंगल में छोड़ चले जाते हैं, तब तीनों लोग आग में झुलसकर मर जाते हैं। संजय उन्हें छोड़कर हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं, जहां वे एक संन्यासी की तरह रहते हैं। एक साल बार नारद मुनि युधिष्ठिर को यह दुखद समाचार देते हैं। युधिष्ठिर वहां जाकर उनकी आत्मशांति के लिए धार्मिक कार्य करते हैं।उ


10) एक दिन पांचों पांडव विदुर से मिलने आए। विदुर ने युधिष्ठिर को देखते ही अपने प्राण छोड़ दिए और वे युधिष्ठिर में समा गए। यह देखकर युधिष्ठिर को समझ में नहीं आया कि यह क्या हुआ? ऐसे में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया। श्रीकृष्ण प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि विदुर भी धर्मराज के अंश थे अत: वे तुम में समा गए, लेकिन अब मैं विदुर की इच्‍छानुसार दिया गया अपना वचन पूरा करूंगा। यह कहकर श्रीकृष्ण ने विदुर की इच्छानुसार उनके शरीर को सुदर्शन चक्र में बदलकर उस सुदर्शन चक्र को वहीं स्थापित कर दिया।


11) महाभारत युद्ध के बाद जब 36वां वर्ष प्रारंभ हुआ तो श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के कारण मोसुल का युद्ध हुआ जिसमें सभी यदुवंशी आपस में ही लड़कर मारे गए। साम्‍ब, चारुदेष्‍ण, प्रद्युम्‍न और अनिरुद्ध की मृत्‍यु हो गई। बस श्रीकृष्ण का एक पौत्र बचा था जिसका नाम वज्र था। बलराम ने द्वारिका के समुद्र के किनारे जाकर समाधि ले ली थी।


12) मोसुल के युद्ध के बाद प्रभाष क्षेत्र में एक वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण लेटे हुए थे तभी एक भील ने उन्हें हिरण समझकर बाण मार दिया। यह बाण उनके पैरों में आकर लगा। इस बाण से उनकी मृत्यु हो गई। अर्जुन को जब यह समाचार मिला तो वे द्वारिका पहुंचे और शोक व्यक्त किया।


13) श्रीकृष्ण के स्वर्गवास के बाद द्वारिका नगरी समुद्र में डूबने लगी। यह देख अर्जुन ने सभी यदुवंशी नारियों और कृष्ण के पौत्र को लेकर हस्तिनापुर के लिए कूच कर दिया। हजारों महिलाओं और द्वारिकावासियों के साथ उन्होंने पंचनद देश में पड़ाव डाला, जहां लुटेरों ने खूब लूटपाट की और सुंदर महिलाओं का अपहरण कर लिया। बहुत मुश्किल से अर्जुन, व्रज और कुछ नगरवासी इन्द्रप्रस्थ पहुंचे। अर्जुन ने व्रज को इन्द्रप्रस्थ का राजा बना दिया।


14) अर्जुन हस्तिनापुर जाकर महाराज युधिष्ठिर को सारा वृत्तांत सुनाते हैं। बाद में पांचों पांडव सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा से परीक्षित को राजपाट सौंपकर द्रौपदी के साथ स्वर्ग की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। यात्रा के कठिन मार्ग में सबसे पहले द्रौपदी की, फिर नकुल और सहदेव की मृत्यु हो जाती है। बाद में अर्जुन भी गिर पड़ते हैं। अर्जुन के बाद भीम भी साथ छोड़ देते हैं। मार्ग में एक जगह इन्द्र खुद युधिष्ठिर को स्वर्ग ले जाने के लिए उपस्थित होते हैं। इन्द्र युधिष्ठिर को लेकर स्वर्ग चले जाते हैं।