गुरुवार, 19 मार्च 2026

श्री मद् देवी भागवत महापुराण :----प्रथम अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

।। ओम् ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमः ।।
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श्री मद् देवी भागवत महापुराण :------ प्रथम अध्याय
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             ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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                   ओम् गं गणपतये नमः
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श्रीगणेश जी के चरण कमल के परागकण, जो देवेन्द्र के मस्तक पर विराजमान मन्दार-पुष्प के परागकणों के समान अरुणवर्ण के हैं, वे विघ्नों का नाश करें ।।1।। 

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नारायण, नरश्रेष्ठ श्रीनर, भगवती सरस्वती और व्यास जी को नमस्कार करके जय (पुराण एवं इतिहास आदि ग्रन्थों) का पाठ करना चाहिए ।।2।। 

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जिनकी आराधना करके स्वयं ब्रह्माजी इस जगत के सृजनकर्ता हुए, भगवान विष्णु पालनकर्त्ता हुए तथा भगवान शिव संहार करने वाले हुए, योगिजन जिनका ध्यान करते हैं और तत्त्वार्थ जानने वाले मुनिगण जिन्हें परा मूलप्रकृति कहते हैं – स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली उन जगज्जननी भगवती को मैं प्रणाम करता हूँ ।।3।। 

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जिन्होंने स्वेच्छा से इस जगत की सृष्टि करके तथा स्वयं जन्म लेकर भगवान शिव को पतिरूप में प्राप्त किया और शम्भु ने कठोर तपस्या से जिन्हें पत्नी रूप में प्राप्त कर जिनका चरण अपने हृदय पर धारण किया, वे भगवती आप सबकी रक्षा करें ।।4।। 

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एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि महर्षियों ने वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ मुनिवर सूत जी से पूछा – महामते ! अब आप स्वर्ग तथा मोक्ष का सुख प्रदान करने वाले उस पुराण का वर्णन कीजिए, जिसमें भगवती की उत्तम महिमा का अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया गया है और जिसके यथाविधि श्रवण करने से दिव्य ज्ञान से रहित मनुष्यों में भी नवधा भक्ति उत्पन्न हो जाती है ।।5-7।।

सूतजी बोले – महाभागवत नामक इस अत्यन्त गोपनीय पुराण का वर्णन सर्वप्रथम भगवान शिव ने महात्मा नारद के लिए किया था ।।8।। पूर्वकाल में उसे फिर स्वयं भगवान व्यास ने भक्तिनिष्ठ महर्षि जैमिनि के लिए श्रद्धापूर्वक कहा था और फिर उसी को मैं आप लोगों से कह रहा हूँ. इसे प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए तथा कभी भी प्रकट नहीं करना चाहिए. इसके श्रवण करने तथा पाठ करने में द्विज को जो पुण्य प्राप्त होता है, भगवान शिव भी सौ वर्षों में उस पुण्य का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं तो फिर मैं उसका वर्णन कैसे कर पाऊँगा? क्योंकि वह पुण्य़ असीम है ।।9-11।।

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 यह सुनकर सभी ऋषिगण विस्मित एवं अत्यन्त हर्षित हुए. उन श्रेष्ठ मुनियों ने वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ सूत जी से पुन: कहा – ।।12।।

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ऋषिगण बोले – मुनिवर ! जिस तरह से वह श्रेष्ठ पुराण इस पृथ्वी लोक में प्रकाशित हुआ, आप कृपा करके इसका यथार्थ रूप में वर्णन कीजिए.।।13।।

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सूतजी बोले – समस्त धर्मशास्त्रों के वक्ता, सभी वेदविदों में श्रेष्ठ, धर्मज्ञ, ज्ञानसंपन्न, महान बुद्धि वाले, महामुनि भगवान महर्षि व्यास जी अठारह पुराणों की रचना करने पर भी किसी प्रकार से संतुष्ट नहीं हुए ।।14-15।। 

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उन्हें चिन्ता हुई कि “यह महापुराण परम श्रेष्ठ है, जिससे बढ़कर दूसरा कुछ भी इस पृथ्वीतल पर नहीं है. भगवती का परम तत्त्व तथा विस्तृत माहात्म्य इसमें विद्यमान है, देवी तत्त्व से अनभिज्ञ मैं इसका वर्णन कैसे कर सकूँगा” – ऎसा सोचकर उनके मन में बड़ा क्षोभ हुआ. महाज्ञानी महेश्वर शिव जिनके तत्त्व को भली भाँति नहीं जानते हैं, जिनके परम तत्त्व को जान पाना अत्यन्त कठिन है – ऎसा विचारकर परम बुद्धिमान तथा दुर्गाभक्तिपरायण व्यासजी ने हिमालय पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या की ।।16-19।।

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उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तों से स्नेह रखने वाली भगवती शर्वाणी ने अदृश्य रूप से आकाश में स्थित होकर उनसे यह वचन कहा -।।20।। 

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महामुने ! जहाँ ब्रह्मलोक में समस्त श्रुतियाँ विद्यमान थीं, आप वहाँ पर जाइए. वहाँ आप मेरे सम्पूर्ण परम तत्त्व को जान लेगें. वहाँ श्रुतियों के द्वारा मेरी स्तुति किए जाने पर मैं प्रकट होऊँगी और आपकी जो भी अभिलाषा होगी, उसे पूर्ण करूँगी।।21-22।।

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 तदनन्तर भगवती की आकाशवाणी सुनकर महर्षि व्यास जी ब्रह्मलोक गये. वहाँ उन्होंने वेदों को प्रणाम करके पूछा – अविनाशी ब्रह्मपद क्या है? विनय से नम्र महर्षि का यह वचन सुनकर एक-एक करके सभी वेदों ने तत्काल मुनिश्रेष्ठ व्यास जी से कहा – ।।23-24।।

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ऋग्वेद ने कहा – सभी प्राणी जिनके भीतर स्थित हैं और जिनसे सम्पूर्ण जगत प्रकट होता है तथा जिन्हें परम तत्त्व कहा गया है, वे साक्षात स्वयं भगवती ही हैं ।।25।।

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यजुर्वेद ने कहा – सभी प्रकार के यज्ञों से जिनकी आराधना की जाती है, जिसके साक्षात हम प्रमाण हैं, वे एकमात्र भगवती ही हैं ।।26।।

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सामवेद ने कहा – जो इस समग्र जगत को धारण करती हैं तथा योगिजन जिनका चिन्तन करते हैं और जिनसे यह विश्व प्रकाशित है, वे एकमात्र भगवती दुर्गा ही इस जगत में व्याप्त हैं ।।27।।

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अथर्ववेद ने कहा – भगवती के कृपापात्र लोग भक्तिपूर्वक जिन देवेश्वरी का दर्शन करते हैं, उन्हीं भगवती दुर्गा को लोग परम ब्रह्म कहते हैं ।।28।।

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सूतजी बोले – वेदों का यह कथन सुनकर सत्यवती पुत्र व्यास जी ने निश्चित रूप से मान लिया कि भगवती दुर्गा ही परम ब्रह्म है ।।29।। 

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ऎसा कहकर उन वेदों ने महामुनि व्यास जी से पुन: कहा – जैसा हम लोगों ने कहा है, वैसा हम प्रत्यक्ष दिखाएँगे ।।30।। ऎसा कहकर सभी श्रुतियाँ सच्चिदानन्द विग्रहवाली, शुद्धस्वरूपा तथा सर्वदेवमयी परमेश्वरी का स्तवन करने लगीँ ।।31।।

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वेदों ने कहा – दुर्गे ! आप सम्पूर्ण जगत पर कृपा कीजिए. परमे ! आपने ही अपने गुणों के द्वारा स्वेच्छानुसार सृष्टि आदि तीनों कार्यों के निमित्त ब्रह्मा आदि तीनों देवों की रचना की है, इसलिए इस जगत में आपको रचने वाला कोई भी नहीं है. माता ! आपके दुर्गम गुणों का वर्णन करने में इस लोक में भला कौन समर्थ हो सकता है ।।32।। 

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भगवान विष्णु आपकी आराधना के प्रभाव से ही दुर्जय दैत्यों को युद्ध स्थल में मारकर तीनों लोकों की रक्षा करते हैं. भगवान शिव ने भी अपने हृदय पर आपका चरण धारण कर तीनों लोकों का विनाश करने वाले कालकूट विष का पान कर लिया था. तीनों लोकों की रक्षा करने वाली अम्बिके ! हम आपके चरित्र का वर्णन कैसे कर सकते हैं ।।33।। 

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जो अपने गुणों से माया के द्वारा इस लोक में साकार परम पुरुष के देहस्वरूप को धारण करती हैं और जो पराशक्ति ज्ञान तथा क्रियाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं, आपकी उस माया से विमोहित शरीरधारी प्राणी भेदज्ञान के कारण सर्वान्तरात्मा के रूप में विराजमान आपको ही पुरुष कह देते हैं, अम्बिके ! उन आप महादेवी को नमस्कार है।।34।। 

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स्त्री-पुरुष रूप प्रमुख उपाधि समूहों से रहित जो परब्रह्म है, उसमें जगत सृष्टि के निमित्त सर्वप्रथम सृजन की जो इच्छा हुई, वह स्वयं आपकी ही शक्ति से हुई और वह पराशक्ति भी स्त्री-पुरुष रूप दो मूर्त्तियों में आपकी शक्ति से ही विभक्त हुई है. इस कारण वह परब्रह्म भी मायामय शक्तिस्वरुप ही है. जिस प्रकार जल से उत्पन्न ओले आदि को देखकर मान्यजनों को यह जल ही है – ऎसा ध्रुव निश्चय होता है, उसी प्रकार ब्रह्म से ही उत्पन्न इस समस्त जगत को देखकर यह शक्त्यात्मक ब्रह्म ही है – ऎसा मन में विचार होता है और पुन: परात्पर परब्रह्म में जो पुरुषबुद्धि है, वह भी शक्ति स्वरुप ही है – ऎसा निश्चित होता है. 

जगदम्बिके ! देहधारियों के शरीर में स्थित षट्चक्रों (मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धाख्य चक्र तथा आज्ञाचक्र) में ब्रह्मादि जो छ्: विभूतियाँ सुशोभित होती हैं, वे प्रलयान्त में आपके आश्रय से ही परमेशपद को प्राप्त होती है. इसलिए शिवे ! शिवादि देवों में स्वयं की ईश्वरता नहीं है, अपितु वह तो आप में ही है. देवि ! एकमात्र आपके चरणकमल ही देवताओं के द्वारा वन्दित हैं. दुर्गे ! आप हम पर प्रसन्न हों ।।35-37।।

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सूतजी बोले – इस प्रकार श्रुतियों के द्वारा वेदवचनों से स्तुत की गई सनातनी जगदम्बा सती ने अपना स्वरुप दिखाया ।।38।। 

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सभी प्राणियों के भीतर स्थित रहने वाली उन ज्योति स्वरुपिणी भगवती ने व्यास जी के संशय का नाश करने के लिए इच्छारूप धारण किया. उनकी आकृति हजारों सूर्यों की प्रभा से युक्त थी, करोड़ों चन्द्रमाओं की कान्ति से सुशोभित हो रही थी, हजारों भुजाओं से सम्पन्न थी, दिव्य शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित थी, दिव्य अलंकारों से शोभायमान थी एवं उनके शरीर पर दिव्य गन्धों का लेप लगा हुआ था, वे सिंह की पीठ पर विराजमान थीं और कभी-कभी शव पर सवार भी दिखाई पड़ती थी. ।।39-41।।

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वे भगवती चार भुजाओं से सुशोभित थीं, उनके शरीर की प्रभा नवीन मेघ के समान थी, वे क्षण-क्षण में कभी दो, कभी चार, कभी दस, कभी अठारह, कभी सौ तथा कभी अनन्त भुजाओं से युक्त होकर दिव्य रूप धारण कर लेती थी ।।42-43।।

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 वे कभी विष्णुरूप में होकर उनके वाम भाग में लक्ष्मी का रूप धारण करके विराजमान दिखाई पड़ती थीं, कभी राधासहित कृष्ण के रूप में हो जाती थीं, कभी स्वयं ब्रह्मा का रूप धारण करके उनके वाम भाग में सरस्वती के रूप में दृष्टिगत होती थीं और कभी शिव का रूप धारण कर उनके वाम भाग में गौरीरूप में स्थित हो जाती थीं. इस प्रकार उन सर्वव्यापिनी ब्रह्मस्वरुपिणी भगवती ने अनेक प्रकार के रूप धारण कर व्यास जी का संशय दूर कर दिया ।।44-46।।

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सूत जी बोले – इस प्रकार पराशर पुत्र व्यासजी भगवती का दर्शन करके उन्हें परम ब्रह्म के रूप में जानकर जीवन्मुक्त हो गए ।।47।।

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 तदनन्तर भगवती ने उनकी अभिलाषा जानकर उन्हें अपने चरणतल में स्थित कमल के दर्शन कराए. मुनि व्यास जी ने उस कमल के हजार दलों में परमाक्षरस्वरूप महाभागवत नामक पुराण को देखा. द्विजों ! तब सिर झुकाकर स्तुति करते हुए देवी को सादर प्रणाम करके कृतकृत्य होकर वे महर्षि व्यास जी अपने आश्रम चले गए ।।48-50।।  

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उन्होंने भगवती के चरणों में स्थित कमल में परमाक्षर स्वरुप पवित्र महाभागवत पुराण का जिस रूप में दर्शन किया था, उसी रूप में उसे प्रकाशित किया. उन्होंने अत्यन्त स्नेहपूर्वक मुझे वह पुराण सुनाया और मैंने उसे सुना तथा सम्यक रूप से हृदय में धारण किया. अब मैं स्नेह के कारण आप लोगों से उस पुराण का वर्णन करूँगा, आप लोग प्रयत्नपूर्वक इसे गुप्त रखियेगा ।।51-52।। 

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हजारों अश्वमेधयज्ञ तथा सैकड़ों वाजपेययज्ञ इस महाभागवत पुराण की सोलहवीं कला के भी तुल्य नहीं हैं. इस प्रकार महापात की प्राणियों की भी रक्षा के लिए इस भूलोक में महाभागवतपुराण प्रकाशित हुआ ।।53-54।।

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।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीसूत-शौनक-वाक्य में “महाभागवत” नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ।।

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जय सियाराम जय जय हनुमान

शनिवार, 7 मार्च 2026

नक्षत्रों का वर्गीकरण:----🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁आचार्य डा.अजय दीक्षित

नक्षत्रों का वर्गीकरण:----

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आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

अभिजित समेत कुल 28  नक्षत्रों का वर्गीकरण सात भागों में किया गया है. जिन सात भागों में इन नक्षत्रों को बांटा गया है उस हरेक वर्ग को भी एक नाम दिया गया है जिसका वर्णन इस लेख में किया जा रहा है.

1) ध्रुव-स्थिर नक्षत्र | Dhruv-Sthir Nakshatra

इन नक्षत्रों की श्रेणी में उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद, रोहिणी नक्षत्र के साथ रविवार को रखा गया है. इन नक्षत्रों में स्थिर स्वभाव के कार्य जैसे मकान की नींव रखना, कुंआ खोदना, भवन निर्माण, उपनयन संस्कार, कृषि से जुड़े कार्य, नौकरी आरम्भ करना आदि आते हैं.

महर्षि वशिष्ठ के अनुसार जो कार्य मृदु नक्षत्रों में किए जाते हैं उन कार्यों को इन नक्षत्रों में भी किया जा सकता है.

2) चर अथवा चल नक्षत्र | Char Or Chal Nakshatra

इसमें स्वाति नक्षत्र, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और सोमवार को लिया गया है. सभी चर अथवा चल स्वभाव के कार्य जैसे वाहन चलाना अथवा वाहन की सवारी करना, घुड़सवारी, हाथी की सवारी करना, यात्रा करना आदि ऐसे कार्य किए जाते हैं जिनमें गतिशीलता रहती है.

महर्षि वशिष्ठ के अनुसार जो कार्य क्षिप्र-लघु नक्षत्रों में किए जाते हैं उन कार्यों को भी इन नक्षत्रों में किया जा सकता है.  

3) उग्र-क्रूर नक्षत्र | Ugra Or Krur Nakshatra

इसमें पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, भरणी, मघा और मंगलवार का दिन शामिल किया गया है. आक्रामक स्वभाव के कार्य इन नक्षत्रों में किए जाते हैं. ह्त्या, विश्वासघात, अग्नि से संबंधित अशुभ कार्य, चोरी, विष देना, विष संबंधित दवाईयों पर खोज, शल्य चिकित्सा, हथियारों का क्रय-विक्रय, अथवा प्रयोग आदि सभी क्रूर प्रवृत्ति के कार्यों के लिए ये अनुकूल नक्षत्र माने गए हैं.

महर्षि वशिष्ठ के अनुसार जो कार्य दारुण-तीक्ष्ण नक्षत्रों में किए जा सकते हैं उन्हें इन नक्षत्रों में भी किया जा सकता है. ये नक्षत्र शुभ कार्यों के लिए सामान्यतः वर्जित माने जाते हैं.

4) मिश्र-साधारण नक्षत्र | Mishra-Sadharan Nakshatra

इस श्रेणी में विशाखा तथा कृत्तिका नक्षत्र और बुधवार का दिन लिया गया है. इसमें अग्नि संबंधित कार्य, धातुओं को गरम करके अथवा उन्हें गलाकर ढालने का काम, गैस संबंधित कार्य, सजाने-संवारने के कार्य, दवा निर्माण आदि के कार्य किए जाते हैं.

5) क्षिप्र-लघु नक्षत्र | Kshipra-Laghu Nakshatra

इसमें हस्त नक्षत्र, अश्विनी, पुष्य, अभिजित और बृहस्पतिवार का दिन लेते हैं. इन नक्षत्रों में दुकान का प्रारम्भ तथा निर्माण किया जाता है, विक्रय करने, शिक्षा का प्रारम्भ, गहने अथवा जवाहरात बनाने अथवा पहनने, मैत्री अथवा किसी से साझेदारी का काम, कला सीखना या दिखाने का काम, किसी नए काम को सीखने का काम इन नक्षत्रों में करना उपयुक्त माना गया है.

जो कार्य चल अथवा चर नक्षत्रों में किए जाते हैं उन्हें भी इन नक्षत्रों में किया जा सकता है.

6)  मृदु-मैत्र नक्षत्र | Mridu-Maitra Nakshatra

इसमें मृगशिरा नक्षत्र, रेवती, चित्रा, अनुराधा और शुक्रवार का दिन शामिल किया गया है. गायन सीखना आरम्भ करना, संगीत सीखना, वस्त्र सिलवाने अथवा पहनने का काम, क्रीड़ा, खेल की बारीकियों को सीखने का काम, मित्र बनाने, गहने बनाने अथवा पहनने आदि का काम इन नक्षत्रों में किया जाता है.

जिन कार्यों को ध्रुव-स्थिर नक्षत्रों में किया जाता है उन सभी कार्यों को भी इन नक्षत्रों में किया जा सकता है.

7) तीक्ष्ण-दारुण नक्षत्र | Teekshna-Darun Nakshatra

इनमें मूल नक्षत्र, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा और शनिवार का दिन शामिल किया गया है. इन तीक्ष्ण-दारुण नक्षत्र में तांत्रिक क्रियाएं, ह्त्या, काला जादू, आक्रामक व मृत्यु तुल्य कृत्यों को करना, जानवरों को प्रशिक्षण देना तथा उन्हें वश में करना, साधना जैसे हठ योग आदि कार्य किए जाते हैं.

 

नक्षत्रों को उनकी दृष्टि के अनुसार भी बांटा गया है और उनका यह वर्गीकरण इस प्रकार से है :-

1) उर्ध्वमुखी नक्षत्र | Urdhvamukhi Nakshatra 

इसमें आर्द्रा, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र आते हैं. इन नक्षत्रों में बहुमंजिले भवन बनाना, घर बनाना, मंदिर निर्माण करना, उद्यान आदि बनाने का काम आरम्भ किया जाता है. इसके अतिरिक्त यह नक्षत्र उन सभी कार्यों के लिए अनुकूल होते हैं जिनमें ऊपर की ओर देखना पड़ता है.

2) अधोमुखी नक्षत्र | Adhomukhi Nakshatra

इसमें मूल नक्षत्र, आश्लेषा, विशाखा, कृत्तिका, तीनों पूर्वा नक्षत्र, भरणी और मघा को लिया गया है. इन नक्षत्रों में भूमि से जुड़े कार्य जैसे कुँए बनाना, तालाब के लिए जमीन खोदना, नींव रखने के लिए जमीन की खुदाई करना, भूमि के नीचे के निर्माण कार्य, खदान का काम, जमीन के अंदर गंदे पानी की निकासी की खुदाई का काम आदि करना अनुकूल माना गया है. जैसा कि नाम से स्पष्ट है ये नक्षत्र उन कार्यों के लिए अनुकूल है जिनमें नीचे की ओर देखा जाता है.

3) तिर्यङ्कमुखी नक्षत्र | Tiryakmukhi Nakshatra

इसमें मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, स्वाति, पुनर्वसु, अश्विनी और ज्येष्ठा नक्षत्र शामिल किए गए हैं. इन नक्षत्रों का मुख सीधा होता है जिस से इनकी दृष्टि सामने की ओर होती है. इन नक्षत्रों को यात्रा अथवा यात्रा संबंधित कार्यों के लिए शुभ माना जाता है. वाहन चलाना, वाहन में चढ़ना, सड़क निर्माण आदि ऐसे कार्यों के लिए ये नक्षत्र उपयुक्त माने गए हैं. वो सभी कार्य जिनमे सामने की ओर देखने की आवश्यकता होती है, इस नक्षत्र के अंतर्गत आते हैं.

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प्रधान संपादक- आचार्य डॉ अजय दीक्षित
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चमत्कारी औषधि---------------- 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 आचार्य डा.अजय दीक्षित

चमत्कारी औषधि----------------
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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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लोग जो अन्जाने में ही किन्हीं व्यसनों से ग्रस्त हो गए हैं उनके लिए अपने वर्षों के श्रम ,शोध एवं अनुभव के आधार पर एक रामबाण तरीका बता रहा हूं । मुझे पूर्ण विश्वास है कि इसे आप धन कमाने के स्थान पर लोकहित में ही प्रयोग करेंगे । इसका उपयोग किसी एक विशेष नशे की आदत से छुटकारा पाने के लिए नहीं बल्कि कई तरह के नशों की आदत से छुटकारे के लिए मैंने प्रयोग कराया है और सफलता पाई है ।

इससे आप यदि इन नशीले पदार्थों के आदी हैं तो फिर देर किस बात की है बस अपने गुरू या इष्ट का स्मरण करके एक बार मन में यह विचार तो लाइए कि आपको उक्त नशा छोड़ना है फिर शेष काम तो यह चमत्कारी औषधि करेगी और कुछ ही दिनों में आप पाएंगे कि जादू हो रहा है कि जिस पदार्थ की आपको जानलेवा तलब होती थी वह पता नहीं कहां विलीन हो गई है ।

मैंने जिन पदार्थों पर इस श्रेष्ठ औषधि का प्रयोग किया है वे हैं : -
बीड़ी
सिगरेट
चिलम
चबाने वाली तम्बाकू
चाय
काफ़ी
अफ़ीम

अगर मौका लगेगा तो इसे नींद की गोलियां खाने वाले मरीजों के लिए भी अनुभव करूंगा ताकि उनकी इस नामुराद दवा (या जहर) से पीछा छूट जाए ।
पारस पीपल (यह एक बड़ा पेड़ होता है इसके पत्ते अचानक देखने में प्रसिद्ध पेड़ पीपल के पत्तों की तरह होते है तथा भिंडी के फूलों की तरह पीले फूल आते हैं तथा कुछ दिनों में ये फूल गाढ़े गुलाबी होकर मुर्झा जाते हैं ,इस पेड़ को मराठी में "भेंडी " ही कहा जाता है ) के पुराने पेड़ की छाल जो स्वतः ही पेड़ से अलग हो जाती है ,उसको लेकर खूब बारीक पीस कर मैदे की तरह बना लें व शीशी में भर लें । यह बारीक चूर्ण बारह ग्राम लेकर २५० मि.ली. पानी में हलकी आंच पर जैसे चाय बनाते हैं वैसे ही पकाएं और १०० मि.ली. पक कर रह जाने पर छान कर चाय की तरह ही हलका गर्म सा पी लीजिए ।

सुबह शाम नियमित रूप से पंद्रह दिनों तक सेवन कराने से मैंने पाया है कि मादक द्रव्यों की आदत छूट जाती है तथा नफ़रत सी होने लगती है । एकबार व्यसन छूट जाए तो पुनः इन दुर्व्यसनों को प्रयोग नहीं करना चाहिए फिर व्यसन से मुक्त होने के बाद मैं आदी व्यक्ति को दो माह तक बैद्यनाथ कंपनी का "दिमाग दोष हरी" नामक दवा का सेवन कराता हूं ।

अगर आपके क्षेत्र में पारस पीपल नहीं पाया जाता है तो किसी महाराष्ट्र में रहने वाले मित्र से मंगवाने में देर न करिए और लाभान्वित होइए । ईश्वर को धन्यवाद दीजिये कि उसने साधारण सी दिखने वाली चीज़ों में कैसे दिव्य गुण भर रखे हैं.......!!

टोने टोटके का प्रभाव खत्म करने के उपाय 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ १.👉 पीली सरसों, गुग्गल, लोबान व गौघृत इन सबको मिलाकर इनकी धूप बना लें व सूर्यास्त के १ घंटे भीतर उपले जलाकर उसमें डाल दें। ऐसा २१ दिन तक करें व इसका धुआं पूरे घर में करें। इससे नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं। २.👉 जावित्री, गायत्री व केसर लाकर उनको कूटकर गुग्गल मिलाकर धूप बनाकर सुबह शाम २१ दिन तक घर में जलाएं। धीरे-धीरे तांत्रिक अभिकर्म समाप्त होगा। ३.👉 गऊ, लोचन व तगर थोड़ी सी मात्रा में लाकर लाल कपड़े में बांधकर अपने घर में पूजा स्थान में रख दें। शिव कृपा से तमाम टोने-टोटके का असर समाप्त हो जाएगा। ४.👉 घर में साफ सफाई रखें व पीपल के पत्ते से ७ दिन तक घर में गौमूत्र के छींटे मारें व तत्पश्चात् शुद्ध गुग्गल का धूप जला दें। ५.👉 कई बार ऐसा होता है कि शत्रु आपकी सफलता व तरक्की से चिढ़कर तांत्रिकों द्वारा अभिचार कर्म करा देता है। इससे व्यवसाय बाधा एवं गृह क्लेश होता है अतः इसके दुष्प्रभाव से बचने हेतु सवा १ किलो काले उड़द, सवा १ किलो कोयला को सवा १ मीटर काले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से २१ बार घुमाकर शनिवार के दिन बहते जल में विसर्जित करें व मन में हनुमान जी का ध्यान करें। ऐसा लगातार ७ शनिवार करें। तांत्रिक अभिकर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा। ६.👉 यदि आपको ऐसा लग रहा हो कि कोई आपको मारना चाहता है तो पपीते के २१ बीज लेकर शिव मंदिर जाएं व शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाकर धूप बत्ती करें तथा शिवलिंग के निकट बैठकर पपीते के बीज अपने सामने रखें। अपना नाम, गौत्र उच्चारित करके भगवान् शिव से अपनी रक्षा की गुहार करें व एक माला महामृत्युंजय मंत्र की जपें तथा बीजों को एकत्रित कर तांबे के ताबीज में भरकर गले में धारण कर लें। ७.👉 शत्रु अनावश्यक परेशान कर रहा हो तो नींबू को ४ भागों में काटकर चौराहे पर खड़े होकर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए चारों दिशाओं में एक-एक भाग को फेंक दें व घर आकर अपने हाथ-पांव धो लें। तांत्रिक अभिकर्म से छुटकारा मिलेगा। ८.👉 शुक्ल पक्ष के बुधवार को ४ गोमती चक्र अपने सिर से घुमाकर चारों दिशाओं में फेंक दें तो व्यक्ति पर किए गए तांत्रिक अभिकर्म का प्रभाव खत्म हो जाता है। ✏️✏️✏️ 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

टोने टोटके का प्रभाव खत्म करने के उपाय
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१.👉 पीली सरसों, गुग्गल, लोबान व गौघृत इन सबको मिलाकर इनकी धूप बना लें व सूर्यास्त के १ घंटे भीतर उपले जलाकर उसमें डाल दें। ऐसा २१ दिन तक करें व इसका धुआं पूरे घर में करें। इससे नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं।

२.👉 जावित्री, गायत्री व केसर लाकर उनको कूटकर गुग्गल मिलाकर धूप बनाकर सुबह शाम २१ दिन तक घर में जलाएं। धीरे-धीरे तांत्रिक अभिकर्म समाप्त होगा।

३.👉 गऊ, लोचन व तगर थोड़ी सी मात्रा में लाकर लाल कपड़े में बांधकर अपने घर में पूजा स्थान में रख दें। शिव कृपा से तमाम टोने-टोटके का असर समाप्त हो जाएगा।

४.👉 घर में साफ सफाई रखें व पीपल के पत्ते से ७ दिन तक घर में गौमूत्र के छींटे मारें व तत्पश्चात् शुद्ध गुग्गल का धूप जला दें।

५.👉 कई बार ऐसा होता है कि शत्रु आपकी सफलता व तरक्की से चिढ़कर तांत्रिकों द्वारा अभिचार कर्म करा देता है। इससे व्यवसाय बाधा एवं गृह क्लेश होता है अतः इसके दुष्प्रभाव से बचने हेतु सवा १ किलो काले उड़द, सवा १ किलो कोयला को सवा १ मीटर काले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से २१ बार घुमाकर शनिवार के दिन बहते जल में विसर्जित करें व मन में हनुमान जी का ध्यान करें। ऐसा लगातार ७ शनिवार करें। तांत्रिक अभिकर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा।

६.👉 यदि आपको ऐसा लग रहा हो कि कोई आपको मारना चाहता है तो पपीते के २१ बीज लेकर शिव मंदिर जाएं व शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाकर धूप बत्ती करें तथा शिवलिंग के निकट बैठकर पपीते के बीज अपने सामने रखें। अपना नाम, गौत्र उच्चारित करके भगवान् शिव से अपनी रक्षा की गुहार करें व एक माला महामृत्युंजय मंत्र की जपें तथा बीजों को एकत्रित कर तांबे के ताबीज में भरकर गले में धारण कर लें।

७.👉 शत्रु अनावश्यक परेशान कर रहा हो तो नींबू को ४ भागों में काटकर चौराहे पर खड़े होकर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए चारों दिशाओं में एक-एक भाग को फेंक दें व घर आकर अपने हाथ-पांव धो लें। तांत्रिक अभिकर्म से छुटकारा मिलेगा।

८.👉 शुक्ल पक्ष के बुधवार को ४ गोमती चक्र अपने सिर से घुमाकर चारों दिशाओं में फेंक दें तो व्यक्ति पर किए गए तांत्रिक अभिकर्म का प्रभाव खत्म हो जाता है।

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