शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

हनुमान साबर मंत्र

हनुमान जी की किसी भी मंत्र जाप से पहले निचे दिए कवच को सिद्ध कर ले ! उनके किसी भी मंत्र जाप से पूर्व स्वयं की रक्षा के लिए इस कवच को पड़कर अपने छाती पर फूक मरे ! फिर आप उनके किसी भी मंत्र का अनुष्ठान कर सकते है !  हनुमान लाला के किसी भी मंत्र की साधना के पहले हनुमान जी को चोला चड़वाए !
आसान लाल
ब्रम्हचर्य का पालन करे
मासाहार न करे
माला मूंगे की रुद्राक्ष की या चन्दन की प्रयोग में ले
साधना के पूर्ण होते ही नारियल फूल प्रसाद भेट चढ़ाये

रक्षा-विधानः 
 रक्षा-कारक  शाबर मन्त्र
“श्रीरामचन्द्र-दूत हनुमान ! तेरी चोकी – लोहे का खीला, भूत का मारूँ पूत । डाकिन का करु दाण्डीया । हम हनुमान साध्या । मुडदां बाँधु । मसाण बाँधु । बाँधु नगर की नाई । भूत बाँधु । पलित बाँधु । उघ मतवा ताव से तप । घाट पन्थ की रक्षा – राजा रामचन्द्र जी करे ।
बावन वीर, चोसठ जोगणी बाँधु । हमारा बाँधा पाछा फिरे, तो वीर की आज्ञा फिरे । नूरी चमार की कुण्ड मां पड़े । तू ही पीछा फिरे, तो माता अञ्जनी का दूध पीया हराम करे । स्फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा ।”

विधिः- उक्त मन्त्र का प्रयोग कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ही करें । प्रयोग हनुमान् जी के मन्दिर में करें । पहले धूप-दीप-अगरबत्ती-फल-फूल इत्यादि से पूजन करें । सिन्दूर लगाएँ, फिर गेहूँ के आटे का एक बड़ा रोट बनाए । उसमें गुड़ व घृत मिलाए । साथ ही इलायची-जायफल-बादाम-पिस्ते इत्यादि भी डाले तथा इसका भोग लगाए । भोग लगाने के बाद मन्दिर में ही हनुमान् जी के समक्ष बैठकर उक्त मन्त्र का १२५ बार जप करें । जप के अन्त में हनुमान् जी के पैर के नीचे जो तेल होता है, उसे साधक अँगुली से लेकर स्वयं अपने मस्तक पर लगाए । इसके बाद फिर किसी दूसरे दिन उसी समय उपरोक्तानुसार पूजा कर, काले डोरे में २१ मन्त्र और पढ़कर गाँठ लगाए तथा डोरे को गले में धारण करे । मांस-मदिरा का सेवन न करे । इससे सभी प्रकार के वाद-विवाद में जीत होती है । मनोवाञ्छित कार्य पूरे होते हैं तथा शरीर की सुरक्षा होती है ।



हनुमत् ‘साबर’ मन्त्र प्रयोग


।। श्री पार्वत्युवाच ।।

हनुमच्छावरं मन्त्रं, नित्य-नाथोदितं तथा ।
वद मे करुणा-सिन्धो ! सर्व-कर्म-फल-प्रदम् ।।

।। श्रीईश्वर उवाच ।।


आञ्जनेयाख्यं मन्त्रं च, ह्यादि-नाथोदितं तथा ।
सर्व-प्रयोग-सिद्धिं च, तथाप्यत्यन्त-पावनम् ।।

।। मन्त्र ।।

“ॐ ह्रीं यं ह्रीं राम-दूताय, रिपु-पुरी-दाहनाय अक्ष-कुक्षि-विदारणाय, अपरिमित-बल-पराक्रमाय, रावण-गिरि-वज्रायुधाय ह्रीं स्वाहा ।।”

विधिः- ‘आञ्जनेय’ नामक उक्त मन्त्र का प्रयोग गुरुवार के दिन प्रारम्भ करना चाहिए। श्री हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख बैठकर दस सहस्त्र जप करे। इस प्रयोग से सभी कामनाएँ पूर्ण होती है। मनोनुकूल विवाह-सम्बन्ध होता है। अभिमन्त्रित काजल रविवार के दिन लगाना चाहिए। अभिमन्त्रित जल नित्य पीने से सभी रोगों से मुक्त होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है। इसी प्रकार आकर्षण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण आदि सभी प्रयोग उक्त मन्त्र से किए जा सकते हैं।
 



।। मन्त्र ।।


“ॐ नमो भगवते हनुमते, जगत्प्राण-नन्दनाय, ज्वलित-पिंगल-लोचनाय, सर्वाकर्षण-कारणाय ! आकर्षय आकर्षय, आनय आनय, अमुकं दर्शय दर्शय, राम-दूताय आनय आनय, राम आज्ञापयति स्वाहा।”


विधिः- उक्त ‘केरल′- मन्त्र का जप रविवार की रात्रि से प्रारम्भ करे। प्रतिदिन दो हजार जप करे। बारह दिनों तक जप करने पर मन्त्र सिद्धि होती है। उसके बाद पाँच बालकों की पूजा कर उन्हें भोजनादि से सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा कर चुकने पर साधक को रात्रि में श्री हनुमान जी स्वप्न में दर्शन देंगे और अभीष्ट कामना को पूर्ण करेंगे। इस मन्त्र से ‘आकर्षण’ भी होता है। यथा-

।। मन्त्र ।।



“ॐ यं ह्रीं वायु-पुत्राय ! एहि एहि, आगच्छ आगच्छ, आवेशय आवेशय, रामचन्द्र आज्ञापयति स्वाहा ।”

विधिः- ‘कर्णाटक’ नामक उक्त मन्त्र को, पूर्ववत् पुरश्चरण कर, सिद्ध कर लेना चाहिए। फिर यथोक्त-विधि से ‘आकर्षण’ प्रयोग करे। यथा-

।। मन्त्र ।।


ॐ नमो भगवते ! असहाय-सूर ! सूर्य-मण्डल-कवलीकृत ! काल-कालान्तक ! एहि एहि, आवेशय आवेशय, वीर-राघव आज्ञापयति स्वाहा।”
विधिः- उक्त ‘आन्ध्र’ मन्त्र के पुरश्चरण की भी वही विधि है। सिद्ध-मन्त्र द्वारा सौ बार अभिमन्त्रित भस्म को शरीर में लगाने से सर्वत्र विजय मिलती है। 


।। मन्त्र ।।


“ॐ नमो भगवते अञ्जन-पुत्राय, उज्जयिनी-निवासिने, गुरुतर-पराक्रमाय, श्रीराम-दूताय लंकापुरी-दहनाय, यक्ष-राक्षस-संहार-कारिणे हुं फट्।”


विधिः- उक्त ‘गुर्जर’ मन्त्र का दस हजार जप रात्रि में भगवती दुर्गा के मन्दिर में करना चाहिए। तदन्तर केवल एक हजार जप से कार्य-सिद्धि होगी। इस मन्त्र से अभिमन्त्रित तिल का लड्डू खाने से और भस्म द्वारा मार्जन करने से भविष्य-कथन करने की शक्ति मिलती है। तीन दिनों तक अभिमन्त्रित शर्करा को जल में पीने से श्रीहनुमानजी स्वप्न में आकर सभी बातें बताते हैं, इसमें सन्देह नहीं यथा-


संकट से रक्षा के लिए कुछ विशिष्ट प्रयोग

भयंकर,आपति आने पर हनुमान जी का ध्यान करके रूद्राक्ष माला पर १०८ बार जप करने से कुछ ही दिनों में सब कुछ सामान्य हो जाता है।
मंत्र:-त्वमस्मिन् कार्य निर्वाहे प्रमाणं हरि सतम।
तस्य चिन्तयतो यत्नों दुःख क्षय करो भवेत्॥

शत्रु,रोग हो या दरिद्रता,बंधन हो या भय निम्न मंत्र का जप बेजोड़ है,इनसे छुटकारा दिलाने में यह प्रयोग अनूभुत है।नित्य पाँच लौंग,सिनदुर,तुलसी पत्र के साथ अर्पण कर सामान्य मे एक माला,विशेष में पाँच या ग्यारह माला का जप करें।कार्य पूर्ण होने पर १०८बार,गूगूल,तिल धूप,गुड़ का हवन कर लें।आपद काल में मानसिक जप से भी संकट का निवारण होता है।
मंत्र:-मर्कटेश महोत्साह सर्व शोक विनाशनं,शत्रु संहार माम रक्ष श्रियम दापय में प्रभो॥
अनेकानेक रोग से भी लोग परेशान रहते है,इस कारण श्री हनुमान जी का तीव्र रोग हर मंत्र का जप करनें,जल,दवा अभिमंत्रित कर पीने से असाध्य रोग भी दूर होता है। तांबा के पात्र में जल भरकर सामने रख श्री हनुमान जी का ध्यान कर मंत्र जप कर जलपान करने से शीघ्र रोग दूर होता है।श्री हनुमान जी का सप्तमुखी ध्यान कर मंत्र जप करें।
मंत्र:- नमो भगवते सप्त वदनाय षष्ट गोमुखाय,सूर्य रुपाय सर्व रोग हराय मुक्तिदात्रे


“को नहीं जानत जग में कपि सकंट मोचन नाम तिहारो ....”

कलियुग की शुरुआत होते ही सारे देवता इस भू लोक को छोड़ कर चले गए थे सिर्फ भैरव और हनुमान ही ऐसे देवता है जिन्होंने कलयुग में भू लोक पर निवास किआ ! इसलिए हनुमान लाला और भैरव महाराज दोनों की उपासना  कलयुग में उत्तम फल प्रदान करती है

जब भी ऐसी कोई समस्या हो आप किसी भी पात्र में जल ले ले और निम्न मंत्र से उसे अभिमंत्रित कर ले मतलब इसके दो तरीके हैं एक तो मंत्र जप करते समय अपने सीधे हाथ की एक अंगुली इस जल से स्पर्श कराये रखे या जितना आप को मंत्र जप करना हैं उतना कर ले और फिर पूरे श्रद्धा विस्वास से इस जल में एक फूंक मार दे ..

यह मन में भावना रखते हुए की इस मंत्र की परम शक्ति अब जल में निहित हैं .. और यह सब मानने की बात नहीं हैं अनेको वैज्ञानिक परीक्षणों से यह सिद्ध भी हुआ हैं की निश्चय ही कुछ तो परिवर्तन उच्च उर्जा का जल में समावेश होता ही हैं .
मंत्र :
ॐ नमो हनुमते पवन पुत्राय ,वैश्वानर मुखाय पाप दृष्टी ,घोर दृष्टी , हनुमदाज्ञा स्फुरेत स्वाहा ||

कम से कम १०८ बार मंत्र जप तो करे ही  और इस अभिमंत्रित जल को जो भी पीड़ित हैं उ स पर छिडके .. उसे भगवान् हुनमान की कृपा से निश्चय ही लाभ होना शुरू हो जायेगा और जो भी   इसे रोज करना चाहे उनके जीवन कि अनेको कठिनाई तो स्वत ही दूर होती जाएगी .. तो आवश्यक सावधानी जो की हनुमान साधना में होती हैं वह करते हुए कर सकते हैं .. 



हनुमान जी के संकट-नाशक अनुष्ठान

१॰  विनियोगः अस्य श्री हनुमन्महामन्त्रस्य ईश्वर ऋषिःगायत्री छन्दःहनुमान देवताहं बीजंनमः शक्तिःआञ्जनेयाय कीलकम् मम सर्व-प्रतिबन्धक-निवृत्ति-पूर्वकं हनुमत्प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः 
ऋष्यादिन्यासःईश्वर ऋषये नमः शिरसिगायत्री छन्दसे नमः मुखेहनुमान देवतायै नमः हृदिहं बीजाय नमः नाभौनमः शक्तये नमः गुह्येआञ्जनेयाय कीलकाय नमः पादयो मम सर्व-प्रतिबन्धक-निवृत्ति-पूर्वकं हनुमत्प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे 
करन्यासः ह्रां आञ्जनेयाय अंगुष्ठाभ्यां नमः ह्रीं महाबलाय तर्जनीभ्यां नमः ह्रूं शरणागत-रक्षकाय मध्यमाभ्यां नमः ह्रैं श्री-राम-दूताय अनामिकाभ्यां नमः ह्रौं हरिमर्कटाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ह्रः सीता-शोक-विनाशकाय करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः 
हृदयादिन्यासः ह्रां आञ्जनेयाय हृदयाय नमः ह्रीं महाबलाय शिरसे स्वाहा ह्रूं शरणागत-रक्षकाय शिखायै वषट् ह्रैं श्री-राम-दूताय कवचाय हुम् ह्रौं हरिमर्कटाय नेत्र-त्रयाय वोषट् ह्रः सीता-शोक-विनाशकाय अस्त्राय फट् 
ध्यानः-
 उद्यद्बालदिवाकरद्युतितनु पीताम्बरालंकृतं 
देवेन्द्र-प्रमुख-प्रशस्त-यशसं श्रीराम-भूप-प्रियम् ।।
सीता-शोक-विनाशिनं पटुतरं भक्तेष्ट-सिद्धि-प्रदं 
ध्यायेद्वानर-पुंगवं हरिवरं श्रीमारुति सिद्धिदम् ।।

निम्नलिखित मन्त्रों में से किसी एक मन्त्र का जप  मास तक नित्य-प्रति ३००० करना चाहिए -

१॰ “ हं हनुमते आञ्जनेयाय महाबलाय नमः 
२॰ “ आञ्जनेयाय महाबलाय हुं फट् 

२॰  “ नमो भगवते पञ्चवदनाय महाभीमपराक्रमाय सकलशत्रुसंहारणाय स्वाहा।
 नमो भगवते पञ्चवदनाय महाबलप्रचण्डाय सकलब्रह्माण्डनायकाय सकलभूत-प्रेत-पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षिणी-पूतना-महामारी-सकलविघ्ननिवारणाय स्वाहा।
 आञ्जनेयाय विद्महे महाबलाय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् (गायत्री)
 नमो हनुमते महाबलप्रचण्डाय महाभीम पराक्रमाय गजक्रान्तदिङ्मण्डलयशोवितानधवलीकृतमहाचलपराक्रमाय पञ्चवदनाय नृसिंहाय वज्रदेहाय ज्वलदग्नितनूरुहाय रुद्रावताराय महाभीमायमम मनोरथपरकायसिद्धिं देहि देहि स्वाहा।
 नमो भगवते पञ्चवदनाय महाभीमपराक्रमाय सकलसिद्धिदाय वाञ्छितपूरकाय सर्वविघ्ननिवारणाय मनो वाञ्छितफलप्रदाय सर्वजीववशीकराय दारिद्रयविध्वंसनाय परममंगलाय सर्वदुःखनिवारणाय अञ्जनीपुत्राय सकलसम्पत्तिकराय जयप्रदाय  ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रूं फट् स्वाहा।
विधिः-
सर्वकामना सिद्धि का संकल्प करके उपर्युक्त पूरे मन्त्र का १३ दिनों में ब्राह्मणों द्वारा ३३००० जप पूर्ण कराये। तेरहवें दिन १३ पान के पत्तों पर १३ सुपारी रखकर शुद्ध रोली अथवा पीसी हुई हल्दी रखकर स्वयं १०८ बार उक्त मन्त्र का जाप करके एक पान को उठाकर अलग रख दे। तदन्तर पञ्चोपचार से पूजन करके गाय का घृतसफेद दूर्वा तथा सफेद कमल का भाग मिलाकर उसके साथ उस पान का अग्नि में हवन कर दे। इसी प्रकार १३ पानों का हवन करे।
तदन्तर ब्राह्मणों द्वारा उक्त मन्त्र से ३२००० आहुतियाँ दिलाकर हवन करायें। तथा ब्राह्मणों को भोजन कराये।

३॰  “ ऐं ह्रीं श्रीं नमो भगवते हनुमते मम कार्येषु ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल असाध्यं साधय साधय मां रक्ष रक्ष सर्वदुष्टेभ्यो हुं फट् स्वाहा।
विधिः-मंगलवार से प्रारम्भ करके इस मन्त्र का प्रतिदिन १०८ बार जप करता रहे और कम-से-कम सात मंगलवार तक तो अवश्य करे। इससे इसके फलस्वरुप घर का पारस्परिक विग्रह मिटता हैदुष्टों का निवारण होता है और बड़ा कठिन कार्य भी आसानी से सफल हो जाता है।

४॰  “हनुमन् सर्वधर्मज्ञ सर्वकार्यविधायक।
अकस्मादागतोत्पातं नाशयाशु नमोऽस्तु ते।।
या  “हनूमन्नञ्जनीसूनो वायुपुत्र महाबल।
अकस्मादागतोत्पातं नाशयाशु नमोऽस्तु ते।।
विधिःप्रतिदिन तीन हजार के हिसाब से ११ दिनों में ३३ हजार जप जोफिर ३३०० दशांश हवन या जप करके ३३ ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाये। इससे अकस्मात् आयी हुई विपत्ति सहज ही टल जाती है।

 हनुमान जी की साधना में ब्रम्हचर्य अनिवार्य है ! भोजन याम नियम की सावधानी बरते ! दशांश हवन करने से हनुमान जी सब कष्टो से मुक्ति देते है ! सारे ही मंत्र विलक्षण है बस नियमित जाप और हवन की आवश्यकता है



पीलिया रोग को झाड़ा मंत्र
- “ यो यो हनुमन्त फलफलित धग्धगिति आयुराष परुडाह 
प्रत्येक मंगलवार को व्रत रखकर इस मंत्र का २५ माला जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है  इस मंत्र के द्वारा पीलिया रोग को झाड़ा जा सकता है 


विष निवारण मंत्र
 पश्चिम-मुखाय-गरुडासनाय पंचमुखहनुमते नमः मं मं मं मं मंसकल विषहराय स्वाहा 
इस मन्त्र की जप संख्या १० हजार हैइसकी साधना दीपावली की अर्द्ध-रात्रि पर करनी चाहिए  यह मन्त्र विष निवारण में अत्यधिक सहायक है 



ग्रह-दोष निवारण मंत्र
 उत्तरमुखाय आदि वराहाय लं लं लं लं लं सी हं सी हं नील-कण्ठ-मूर्तये लक्ष्मणप्राणदात्रे वीरहनुमते लंकोपदहनाय सकल सम्पत्ति-कराय पुत्र-पौत्रद्यभीष्ट-कराय  नमः स्वाहा 
इस मन्त्र का उपयोग महामारीअमंगल एवं ग्रह-दोष निवारण के लिए है 


वशीकरण  मंत्र
 नमो पंचवदनाय हनुमते ऊर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुं रुं रुं रुं रुं रुद्रमूर्तये सकललोक वशकराय वेदविद्या-स्वरुपिणे  नमः स्वाहा 
यह वशीकरण के लिए उपयोगी मन्त्र है 



भूत-प्रेत दोष निवारण मंत्र

 श्री महाञ्जनाय पवन-पुत्र-वेशयावेशय  श्रीहनुमते फट् 
यह २५ अक्षरों का मन्त्र है इसके ऋषि ब्रह्माछन्द गायत्रीदेवता हनुमानजीबीज श्री और शक्ति फट् बताई गई है  छः दीर्घ स्वरों से युक्त बीज से षडङ्गन्यास करने का विधान है  इस मन्त्र का ध्यान इस प्रकार है -
आञ्जनेयं पाटलास्यं स्वर्णाद्रिसमविग्रहम् 
परिजातद्रुमूलस्थं चिन्तयेत् साधकोत्तम् ।। (नारद पुराण ७५-१०२)
इस प्रकार ध्यान करते हुए साधक को एक लाख जप करना चाहिए  तिलशक्कर और घी से दशांश हवन करें और श्री हनुमान जी का पूजन करें  यह मंत्र ग्रह-दोष निवारणभूत-प्रेत दोष निवारण में अत्यधिक उपयोगी है 


उदररोग नाशक मंत्र

 यो यो हनुमंत फलफलित धग्धगित आयुराषः परुडाह 
उक्त मन्त्र को प्रतिदिन ११ बार पढ़ने से सब तरह के पेट के रोग शांत हो जाते हैं

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

श्री मद् देवी भागवत महापुराण :-- ग्यारहवां अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

।।जय हो माता वैष्णोदेवी की ।।
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श्री मद् देवी भागवत महापुराण :-- ग्यारहवां अध्याय
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                  ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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                         ओम् गं गणपतये नमः

इस अध्याय में त्रिदेवों द्वारा जगदम्बिका की स्तुति करना, देवी का भगवान शंकर को पार्वती रूप में पुन: प्राप्त होने का आश्वासन देना, छाया सती की देह लेकर शिव का प्रलयंकारी नृत्य करना, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को काटना और उनसे इक्यावन शक्तिपीठों का प्रदुर्भाव होना बताया गया है ।

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श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर सती के वियोग से दु:खी शिव साधारण मनुष्यों के समान बार-बार रुदन करने लगे।।1।। 

तब ब्रह्मा और विष्णु ने उन भगवान से कहा – महाज्ञानी ! आप अज्ञानी के समान मोहग्रस्त होकर क्यों रुदन कर रहे हैं?।।2।। 

वे देवी जगदम्बा तो सनातन पूर्णब्रह्मस्वरुपा हैं. वे ही महाविद्या हैं, समस्त विश्व की सृष्टि करने वाली हैं और सर्वचैतन्यस्वरूपिणी हैं. जिनकी माया के प्रभाव से सम्पूर्ण संसार तथा हम सभी विमोहित हैं, उनके द्वारा शरीर छोड़ने की बात तो भ्रान्तिपूर्ण विडम्बना ही है।।3-4।। 

प्रभो! महेश्वर! जिनकी कृपा से आप मृत्युंजय हैं, उनकी मृत्यु तो वास्तविक नहीं है. यह भ्रममात्र ही है।।5।। 

हम तीनों पुरुष (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) भी उन्हीं के स्वरुप हैं. इस बात से (अर्थात भगवती को मृत मानकर प्राकृत पुरुष की भाँति विलाप करने से) आप ही की निन्दा ध्वनित होती है, उनकी नहीं।।6।। 

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परमेश्वर ! उन पार्वती की निन्दा घोर पाप को उत्पन्न करने वाली है, जिसके द्वारा इस प्रकार का पाप होता है, उसका वे निश्चय ही त्याग कर देती हैं।।7।। 

वे महादेवी धर्मशील पुरुष का कभी त्याग नहीं करती. अधर्मी का त्याग करने में वे पिता आदि संबंधों का भी विचार नहीं करती।।8।। 

उनका संबंध तो मात्र धर्म से ही रहता है न कि लौकिक कारणों से. जो धर्माचरण करता है, वही उनका पिता, माता और बान्धव है।।9।। 

जो अधर्म करने वाला है, वह उनका बान्धव नहीं परम शत्रु है. इसी कारण भगवान शिव की निन्दारूपी पाप में रत देखकर दक्षप्रजापति का उन महेश्वरी ने त्याग कर दिया. यदि वे पराम्बा दक्ष की पुत्री के भाव में स्थित होती तो दुर्दान्त दक्षप्रजापति का दमन कैसे होता? इसलिए धर्म-कर्म के फल को प्रदान करने वाली वे महादेवी उस महापापी का त्याग करके स्वयं अपने धाम में चली आईं।।1011।। 

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क्या वे क्षण मात्र में ही प्रजापति का संहार करने में असमर्थ थीं? फिर भी उन्होंने इसकी जो उपेक्षा की वह लोकशिक्षण के लिए था. धर्म का उपदेश करने वाली वे भगवती यदि ऎसा आचरण नहीं करती तो लोग पिता के प्रति सहिष्णु कैसे हो पाते? इसलिए वे नित्या परमा शक्ति प्रजापति दक्ष को अपनी माया से मोहित करते हुए और स्वयं अपनी मायाशक्ति से अन्तर्धान होकर गगन-मण्डल में स्थित हो गईं. महादेव ! आप शोक का त्याग करें, क्योंकि अग्नि में तो सती की छाया ने ही प्रवेश किया है।।13-16।।

शिवजी बोले – आप लोगों ने जो कुछ कहा वह सत्य ही है. सती मेरी परा प्रकृति हैं. वे नित्या, ब्रह्ममयी और सूक्ष्मरूपा हैं. उन्होंने स्वयं अपनी देह का त्याग नहीं किया है. किंतु वे मेरे प्राणों की एकमात्र प्रियतमा सती कहाँ चली गयीं? (इस भाव से मुझे व्याकुलता होती है) पुन: जब मैं शान्तचित्त होता हूँ तो उन्हें परमेश्वरी के रूप में देखता हूँ।।17-18।। 

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र बोले – उन सर्वलोक की एकमात्र वन्दिता जगज्जननी की हम लोग स्तुति करते हैं, तभी प्रसन्न होकर वे पुन: दर्शन देंगी।।19।। 

श्रीमहादेव जी बोले – नारद ! भगवान शिव के साथ वे देवगण ऎसा निश्चय करके साक्षात् ब्रह्मस्वरूपिणी महादेवी की स्तुति करने लगे।।20।।

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ब्रह्मा, विष्णु और शिव बोले – आप नित्या, परमा विद्या, जगत में चैतन्यरूप से व्याप्त और पूर्ण-ब्रह्मस्वरूपा देवी हैं. आप स्वेच्छा से शरीर धारण करती हैं. आपका वह परम रूप वेद और आगम से सुनिश्चित अद्वैत ब्रह्म ही है. अपरोक्षानुभूति से जानने योग्य तथा परम गोपनीय आपको हम नमस्कार करते हैं।।21-22।। 

आप सृष्टि के निमित्त प्रकृति और पुरुष के रुप में स्वयं ही शरीर धारण करती हैं, इसलिए वेदों के द्वारा आपको कल्पित द्वैतरूपा कहा गया है. उस सृष्टि प्रक्रिया में भी आपके बिना पुरुष अपूर्ण और शव के समान ही है. अत: सभी देवताओं में आपकी प्रधानता कही जाती है।।23-24।। 

शिवे ! इस प्रकार की अचिन्त्य रूप और लीला वाली आपकी स्तुति करने में हम अल्पबुद्धिवाले कैसे सक्षम हो सकते हैं. आप स्वयं स्वेच्छा से हमारी सृष्टि और संहार करती हैं. इसलिए इस त्रिलोकी में आपकी स्तुति करने में कौन समर्थ है! ।।25-26।। 

सभी ज्ञानीजन भी सामान्य मनुष्यों की भाँति आपकी माया से मोहित हैं तो हम आप परमेश्वरी की वन्दना करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं? आप ही हमारी चेतना, बुद्धि और शक्ति हैं, आपके बिना हम सभी शव की तरह हैं. अत: हम आपकी स्तुति कैसे करें! आप त्रिगुणात्मक बन्धन से बाँधकर अपनी माया से अज्ञानियों की भाँति हमें भी भ्रान्त कर रही हैं, अत: आपके यथार्थ स्वरुप को कौन जान सकता है! ।।27-29।।

 परमेश्वरी ! दक्ष प्रजापति के घर में हम लोगों ने आपके उस रूप के दर्शन किए थे, कृपापूर्वक उसी प्रकार हमें पुन: दर्शन दें. जगत को धारण करने वाली आप महेश्वरी को न देखकर हम कान्तिहीन हो गए हैं. इस कारण शव के समान हम आपको अपनी आत्मा तथा प्राण के रूप में देखते हैं।।30-31।।

श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार स्तुति करने पर महादेवी ने देवताओं के विषाद और शिव की विकलता देखकर आकाश में उन्हें दर्शन दिया।।32।। 

भगवती काली जिस रूप में दक्ष के यज्ञ में आयी थीं और अपनी माया के द्वारा उनकी छाया जिस प्रकार अग्नि में प्रविष्ट हुई थी, उस मूल प्रकृति को उन्होंने निर्निमेष दृष्टि से देखा. उन महादेवी ने शिव से कहा – महादेव ! आप स्थिरचित्त हों, मैं स्वयं हिमालय की पुत्री बनकर तथा मेना के गर्भ से जन्म लेकर पुन: आपको प्राप्त करूँगी. यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ।।33-35।। म

हेश्वर ! मैंने आपका परित्याग कभी नहीं किया, आप ही मुझ महाकाली के हृदयस्थान और परम आश्रय हैं, इसी से आप जगत्संहारक महाकाल कहे जाते हैं।।36½।। 

आपने प्रभुता के अभिमान से मुझे कुछ कहा था, उसी अपराध के कारण मैं आपकी साक्षात् पत्नी के रूप में कुछ समय तक नहीं रह सकूँगी. शिव ! आप शान्तचित्त हो जाएँ।।37-38।। 

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शम्भो ! मैं आपको एक उपाय बताती हूँ, उसे ही आप संपन्न करें. तब निश्चय ही आप मुझे पहले से भी अधिक सुन्दर स्वरुप में पुन: प्राप्त करेंगे।।39।।

 महेश्वर ! शिव ! दक्ष की यज्ञाग्नि में मेरे जिस छाया शरीर ने प्रवेश किया था, उसे सिर पर लेकर मेरी प्रार्थना करके, आप इस पृथ्वी पर भ्रमण करें।।40।।

 वह मेरा छाया शरीर अनेक खण्डों में होकर पृथ्वी पर गिरेगा और उस-उस स्थान पर पापों का नाश करने वाला महान शक्तिपीठ उदित होगा।।41।। जहाँ योनि भाग गिरेगा, वह सर्वोत्तम शक्तिपीठ होगा. वहाँ रहकर तपस्या करके आप मुझे पुन: प्राप्त करेंगे।।42।। 

मुनिश्रेष्ठ ! ऎसा कहकर और महादेव को बार-बार आश्वासन देकर वे देवी अन्तर्धान हो गईं।।43।। 

मुने! ब्रह्मादि श्रेष्ठ देवगण अपने-अपने लोकों को चले गए और शिवजी पुन: दक्ष के घर में आकर प्रिये ! सती ! सती ! ऎसा कहते हुए सामान्य जन के समान रुदन करने लगे।।44½।।

 यज्ञशाला में प्रवेश करके उन्होंने सती के छाया शरीर को देदीप्यमान देखा. वह शरीर भूमि पर स्थित था, नेत्र मुँदे हुए थे एवं सभी अंगों से परिपूर्ण था. सती की उस छाया को सहज भाव में सोयी हुई-सी देखकर शोक से व्याकुल हृदय होकर शिवजी ने इस प्रकार कहा – ।।45-46½।। 

सती ! मैं तुम्हारा पति तुम्हारे पास आया हूँ, तुम उठो, पहले की भाँति मुझसे वार्तालाप क्यों नहीं कर रही हो? अपराधी मुझे एवं दक्ष को शोक के महासमुद्र में गिराकर अपनी माया से हमें मोहित करती हुई तुम स्वयं अन्तर्धान हो गई हो. अब मैं अपनी एकमात्र तुझ प्राणप्रिया का त्याग कभी नहीं करुँगा. प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें लेकर मैं कितने दिन घूमता रहूँगा? ।।47-49½।। 

मुने ! इस प्रकार साधारण मनुष्यों की भाँति बहुधा विलाप करते हुए शिवजी ने अपनी भुजाओं से सती के छाया शरीर का आलिंगन करते हुए उसे सिर पर उठा लिया।।50½।। 

शंकर जी सती के उस छाया शरीर को सिर पर रखकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक धरती पर नाचने लगे। ब्रह्मा आदि सुरश्रेष्ठ तथा इन्द्र के नेतृत्व में अन्य देवगण इस अपूर्व दृश्य को देखने अपने-अपने रथों में बैठकर आकाश में आ गये. दसों दिशाओं में सम्यक् पुष्पवृष्टि होने लगी. तदनन्तर सुशोभित जटाओं वाले प्रमथगण मुखवाद्य बजाने लगे और नाचने लगे।।51-53½।।

 चारों ओर नाचते हुए शिवजी सती के छाया शरीर को कभी सिर पर, कभी दाएँ हाथ में, कभी बाएँ हाथ में तो कभी कन्धे पर और कभी प्रेमपूर्वक वक्ष:स्थल पर धारण कर अपने चरण-प्रहार से पृथ्वी को कम्पित करते हुए नृत्य करने लगे।।54-55½।।

 चन्द्रलोक में स्थित चन्द्रमा उनके ललाट पर तिलक के समान सुशोभित होने लगा, नक्षत्रमण्डल देदीप्यमान जटाओं में गुँथ गया और सूर्यलोक में स्थित भगवान भास्कर उनके कण्ठाभरण बन गये।।56-57।।

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महामुने! कच्छप और शेषनाग उनके चरणाघातों से पीड़ित होकर धरती छोड़ने को उद्यत हो गये. अत्यन्त वेगपूर्वक नृत्य करने से प्रचण्ड वायु बहने लगी, जिसके कारण सुमेरु आदि बड़े-बड़े पर्वत वृक्षों के समान कांपने लगे. इस प्रकार चराचर जगत् को क्षुब्ध करते हुए और सती के छाया शरीर को सिर पर धारण किये हुए नटराज शिव सम्पूर्ण पृथ्वी पर घूमते रहे और वे प्रसन्नतापूर्वक मन में ऎसा सोचने लगे – ।।58-60।।

 सती ! तुम मेरी पत्नी हो, इसलिए मैं लोकलाज छोड़कर तुम्हारी छाया को सिर पर ढो रहा हूँ, यह मेरा अहोभाग्य है. इस प्रकार अपने भाग्य की सराहना करते हुए शिवजी आनन्दमग्न होकर पुन:-पुन: नृत्य करने लगे।।61-62।। 

इससे सारा संसार अत्यन्त क्षुब्ध होने गया, पक्षीगण मृतक के समान हो गये और लोग अकाल प्रलय की कल्पना करने लगे।।63।। 

ब्रह्माजी की आज्ञा से ऋषिगण महान् स्वस्तिवाचन करने लगे. देवताओं को चिन्ता हुई कि यह कैसी विपत्ति आ गयी. वे सोचने लगे कि अब संसार की रक्षा का कोई उपाय नहीं दिखता. इस दक्ष ने शिवजी से द्वेष करने के कारण ऎसा कुयज्ञ प्रारम्भ किया, जिससे इस संसार सहित हम सबका नाश हो जाएगा. विघूर्णित नेत्र वाले, सर्वसमर्थ शिवजी तो आनन्द से मतवले होकर सृष्टि पर आयी इस विपत्ति का विचार नहीं कर रहे हैं, वे जगत्संहारक रुद्र कैसे शान्त होंगे? ।।64-67।।

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भगवान विष्णु बोले – देवगणों ! मैं उपाय बताता हूँ, आप लोग उसका प्रयत्न करें. महादेवी ने पहले ऎसा कहा था कि सती का छाया शरीर भूतल पर अनेक खण्डों में निश्चय ही गिरेगा और जहाँ-जहाँ इस देह के खण्ड गिरेंगे, उन-उन स्थानों पर शक्तिपीठ रूप पुण्यतीर्थ का उदय होगा. उन देवी ने जो कुछ भी कहा है, वह कभी असत्य नहीं होगा।।67-71।। 

सती का छाया शरीर भूतल पर अवश्य गिरेगा. अत: सृष्टि की रक्षा के लिए मैं महान् साहस करके परमानन्दमग्न शिव के सिर पर स्थित सती के छाया शरीर को समर्थ सदाशिव के अनजाने में सुदर्शन चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर गिराऊँगा. मेरे द्वारा ऎसा करने पर शिवजी के कोप से निश्चय ही वे ब्रह्ममयी जगत्पालनकारिणी महादेवी मेरी रक्षा करेंगी।।72-74½।।

देवी बोलीं – प्रभु विष्णु ! जगन्नाथ ! आप ऎसा यदि करें, तभी जगत् की रक्षा होगी नहीं तो प्रलय हो जाएगा।।75½।। 

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁जय सियाराम जय जय हनुमान

कलम लिखै तौ यहै लिखै 🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑 आचार्य डा.अजय दीक्षित

                 कलम लिखै तौ यहै लिखै
                 🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑
                 आचार्य डा.अजय दीक्षित
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जब कलम चलै तौ गुनियन कै अभिमान रहित सम्मान लिखै।

सिय राम लखन शत्रुहन भरत कै त्याग तपस्या आन लिखै।।

श्री कृष्ण जइस रथवान अउर पारथ सा रथी महान लिखै।

ध्वज मा बइठे हनुमान लिखै कुछ कर्णवीर कै दान लिखै।।

पोरुष पृथ्वी कै तेज लिखै शुभ शिवा केरि किरपान लिखै।

राणा लक्ष्मी झलकारी औ बलभद्र सिंह चौहान लिखै।।

जीजा दुर्गा औ कर्मा कै जौहर वाला उपमान लिखै।

मीरा तुलसी कबिरा रहीम रसलीन सूर रसखान लिखै।।

जौ कलम उठै तौ पन्ना के सुत चन्दन का बलिदान लिखै।

आजाद भगत बिस्मिल सुभाष ऊधम बाघा शैतान लिखै।।

ख्यातन मा जुटा किसान लिखै सीमा पर डटा जवान लिखै।

और "अजय" के शोणित से धरती पर नित प्रति हिन्दुस्थान लिखै।।

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सोमवार, 30 मार्च 2026

श्री मद् देवी भागवत महापुराण :--दसवां अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

🍁 जगत जननी नमस्तुभ्यं 🍁
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         श्री मद् देवी भागवत महापुराण:---दसवां अध्याय
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                    ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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                          ओम् गं गणपतये नमः

इस अध्याय में सती के यज्ञकुण्ड में प्रवेश का समाचार सुनकर भगवान शंकर का शोक से विह्वल होना, उनके तृतीय नेत्र की अग्नि से वीरभद्र का प्राकट्य, वीरभद्र द्वारा दक्ष का यज्ञ-विध्वंस कर उनका सिर काटना, ब्रह्माजी का भगवान शंकर से यज्ञ पूर्ण करने की प्रार्थना करना, भगवान शंकर की कृपा से दक्ष का जीवित होना, है ।

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श्रीमहादेव जी बोले – इसके बाद ब्रह्माजी के पुत्र मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने वहाँ (कैलास पर) आकर देवाधिदेव त्रिलोचन शिवजी से अश्रुपूरित नेत्रों से कहा – देवदेव! आपको नमस्कार है. महेश्वर ! मैं नारद दक्षप्रजापति के घर से आया हूँ. आपने यह समाचार सुना है या नहीं कि आपकी प्राणप्रिया सती दक्षप्रजापति के यज्ञ में गयी हुई थीं. वहाँ आपकी निन्दा सुनकर उन्होंने क्रोधित होकर अपना देह त्याग दिया. दक्ष “सती”, “सती” ऎसा बार-बार आक्षेप करके पुन: करके पुन: यज्ञ करने में लग गए और देवगण आहुति ग्रहण करने लगे।।1-4।।

नारद के मुख से यह महान कष्टकारी बात सुनकर तीन नेत्रों वाले देवाधिदेव शिव ने शोकाकुल होकर बहुत तरह से विलाप किया. हा सती ! मुझे शोकसागर में छोड़कर तुम कहाँ चली गई हो? अब मैं तुम्हारे बिना कैसे जीवित रहूँगा? पिता के घर जाने के लिए मैंने तुम्हें अनेक तरह से रोका था, शिवे! क्या उसी से रुष्ट होकर तुम मेरा परित्याग करके चली गई! ।।5-7।।

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 महामुने ! इस प्रकार बहुत तरह से विलाप कर लाल-लाल नेत्रों तथा मुखवाले त्रिलोचन महादेव अत्यन्त कुपित हो उठे।।8।। भगवान रुद्र को कोपाविष्ट देखकर सभी प्राणी भयभीत हो गए, सारा जगत अत्यधिक विक्षुब्ध हो उठा और पृथ्वी डोलने लगी।।9।। 

उनके ऊर्ध्व नेत्र से अत्यन्त तेजस्वी अग्नि प्रादुर्भूत हुई और उस अग्नि से एक परम पुरुष उत्पन्न हुआ. विशाल विग्रह धारण करते हुए वह कालान्तक यमराज के समान प्रतीत हो रहा था और प्रज्वलित अग्नि के स्फुलिंगों की आभावाले तीन भयानक नेत्रों से युक्त था. वह अपने समस्त अंगों में विभूति धारण किए हुए था, अपने ललाट पर उसने अर्धचन्द्रमा को मुकुट की भाँति धारण कर रखा था और मध्यान्हकालीन करोड़ों सूर्यों की आभा तथा जटाजूट से उसका मस्तक सुशोभित हो रहा था।।10-12।।

देवाधिदेव महेश्वर महादेव को प्रणाम करके तथा तीन बार उनकी प्रदक्षिणा कर उसने दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा – पिताजी ! मैं क्या करूँ? यदि आप मुझे आज्ञा प्रदान करें तो अभी आधे क्षण में इस चराचर ब्रह्माण्ड को नष्ट कर डालूँ. क्या इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओं को उनके बाल पकड़कर आपके सामने ला दूँ? विभो ! यदि आप कहें तो यमराज को भी मार डालूँ. महेशान! यह मेरी प्रतिज्ञा है मैं आपसे यह सच-सच कह रहा हूँ. जिसके शमन के लिए आप मुझसे इस समय कहेंगे मैं उसका शमन कर दूँगा. चाहे वह सुरश्रेष्ठ इन्द्र ही क्यों ना हो. यदि वैकुण्ठनाथ विष्णु भी उसकी सहायता करने लगेंगे तो मैं आपकी आज्ञा से उन्हें भी कुण्ठित अस्त्रवाला कर दूँगा।।13-17½।।

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शिवजी बोले – तुम्हारा नाम वीरभद्र है और तुम प्रमथगणों के अधिपति हो. मेरी आज्ञा से दक्ष के नगर में जाकर तुम शीघ्र ही उनके यज्ञ को नष्ट कर डालो. वत्स ! मेरा परित्याग करके जो देवतागण वहाँ गए हैं और उस दक्ष की सहायता कर रहे हैं, मेरी आज्ञा से तुम उनका भी निग्रह करो. मेरी निन्दा करने में संलग्न दक्षप्रजापति का भी मुख काट डालो. पुत्र ! वहाँ शीघ्र जाओ, विलम्ब मत करो।।18-20½।।

वीरभद्र से ऎसा कहकर त्रिनेत्रधारी महादेव शिव ने लम्बी साँसें छोड़ी, उनसे हजारों शिवगण उत्पन्न हो गए. वे सब के सब भयंकर कर्म करने वाले तथा युद्धविद्या में पूर्ण पारंगत थे. वे अपने हाथों में गदा, खड्ग, मूसल, प्रास, त्रिशूल तथा पाषाण आदि अस्त्र लिए हुए थे।।21-22½।। 

उन गणों से घिरे हुए महामति वीरभद्र परमेश्वर शिव को प्रणाम कर तथा तीन बार उनकी प्रदक्षिणा करके वहाँ से चल पड़े।।23½।। 

तत्पश्चात वे सभी प्रमथगण सिंहनाद करते हुए क्षणभर में ही दक्षपुरी पहुँच गए, जहाँ उसका यज्ञ चल रहा था।।24½।।

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 इसके बाद क्रोधयुक्त वीरभद्र ने कोपाविष्ट प्रमथगणों से कहा – शीघ्र ही यज्ञ का नाश कर दो और देवताओं को भगा दो।।25½।।

 उसके बाद उन प्रमथगणों ने उस महायज्ञ का विध्वंस कर डाला. कुछ गणों ने यज्ञ के खम्भे उखाड़कर उन्हें दसों दिशाओं में फेंक दिया, किसी ने यज्ञकुण्ड की अग्नि बुझा दी तथा अन्य गण हव्य खाने लगे और क्रोध से लाल-लाल आँखों वाले कुछ गण देवताओं को खदेड़ने लगे।।26-27½।। 

इस प्रकार उन भयानक रूपवाले प्रमथगणों के द्वारा ध्वस्त किये गये यज्ञ को देखकर विष्णु ने वहाँ आकर प्रमथगणों से यह वचन कहा – तुम लोगों ने यज्ञ को क्यों नष्ट किया और देवताओं को क्यों भगा दिया? तुम लोग कौन हो? इन सभी बातों को बताओं, देर मत करो।।28-29½।। 

प्रमथों ने कहा – प्रभो! हम लोग देवाधिदेव शिव के द्वारा भेजे गए प्रमथगण हैं. हम शिव को अपमानित करने वाले इस महायज्ञ को नष्ट कर रहे हैं।।30½।।

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 इसी बीच प्रतापशाली वीरभद्र ने क्रोध में आकर प्रमथगणों से कहा – शिव के प्रति द्वेषभाव रखने वाला वह दुराचारी दक्ष कहाँ है? इन सभी को पकड़कर मेरे सामने ले आओ।।31-32।।

 इस प्रकार आदेश पाकर प्रमथगण क्रोधित होकर दसों दिशाओं में दौड़ पड़े. वे क्रोधाभिभूत होकर सभी देवताओं को पकड़-पकड़कर रौंदने लगे. कुछ गणों ने सूर्य को पकड़कर उनके दाँतों को चूर-चूर कर दिया और किसी गण ने अग्निदेव को बलपूर्वक पकड़कर उनकी जीभ काट ली. किसी ने भय के मारे भागते हुए मृगरूपधारी यज्ञपुरुष का सिर काट लिया और किसी ने देवी सरस्वती की नाक काट ली ।

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किसी गण ने अर्यमा की दोनों भुजाएँ काट डालीं तो दूसरे गण ने अंगिरा ऋषि का ओष्ठ ही काट लिया. किसी गण ने यम, नैऋत तथा वरुणदेव को बाँध लिया।।33-36।। 

ब्राह्मणों को देखकर उन्हें विनयपूर्वक प्रणाम करके प्रमथगणों ने कहा – विप्रगण! आप लोग भय का त्याग कर दीजिए और यहाँ से चले जाइए. उसे सुनते ही सभी ब्राह्मण यज्ञ में प्राप्त वस्त्र, अलंकार आदि लेकर अपने-अपने घर चले गए।।37-38।। 

परम बुद्धिमान इन्द्र ने मोर का रूप धारण कर लिया और उड़कर पर्वत पर जा करके वे छिपकर यह सब कौतुक देखने लगे।।39।। 

इस प्रकार प्रमथगणों के द्वारा भगा दिए गए, श्रेष्ठ देवताओं को देखकर नारायण विष्णु मौन होकर मन-ही-मन सोचने लगे – यह मूर्खबुद्धि दक्ष शिव से विद्वेष करते हुए यज्ञ कर रहा है. तब यदि उसे वैसा फल नहीं मिलता तो वेदवचन ही निरर्थक हो जाता. शिव के प्रति दक्ष का विद्वेष होने से नि:संदेह मेरे प्रति भी उसका द्वेषभाव ही हुआ, क्योंकि मैं ही शिव हूँ और शिव ही विष्णु हैं. इस प्रकार हम दोनों में कोई भेद नहीं है।।40-42।। 

मैं दक्ष के द्वारा इस विष्णुरूप से विशेषरूप से प्रार्थित हुआ और महादेव के रूप में निन्दित भी मैं ही हुआ हूँ. इसका भी दो प्रकार का भाव है. यह कर्म तथा मन से दो तरह का भाव रखता है. अत: मैं भी अब वही करूँगा. मैं विष्णुरूप से रक्षक और शिवरूप से संहारक बनूँगा. इस प्रकार स्नेहमिश्रित युद्ध करके और फिर उसमें पराजित होकर स्वयं रूद्ररूप से उस दक्ष का शमन भी करूँगा, इसमें संदेह नहीं है. इसके बाद मैं देवताओं को साथ लेकर यज्ञ पूर्ण करूँगा, यही विष्णु की आराधना का फल कहा गया है।।43-46½।। 

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इस प्रकार मन में निश्चय करके शंख, चक्र तथा गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु ने प्रमथगणों को रोक दिया और वे सिंहनाद करने लगे।।47½।।

 इसके बाद वीरभद्र ने क्रोधित होकर सनातन विष्णु से कहा – विष्णो! आप ही यज्ञापति हैं – ऎसा श्रुतियाँ कहती हैं. इस महायज्ञ में शिव की निन्दा करने वाला वह दुराचारी दक्ष कहाँ है? उसे आप स्वयं लाकर मेरे हवाले कर दीजिए, नहीं तो आप मेरे साथ युद्ध कीजिए. प्राय: विशिष्ट शिवभक्तों में आप अग्रणी हैं और आप ही शिव के प्रति द्वेषभाव रखनेवालों के हित के लिए तत्पर भी दिखाई दे रहे हैं।।48-50½।।

तत्पश्चात विष्णु ने मुस्कुराकर कहा – मैं तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा. मुझे युद्ध में पराजित कर दक्ष को ले जाओ, मैं भी तुम्हारा पराक्रम देखता हूँ।।51½।। 

इतना कहकर विष्णु ने धनुष उठाया और चारों ओर बाणों का जाल-सा फैला दिया. उन बाणों से क्षणभर में ही प्रमथगणों के सभी अंग क्षत-विक्षत हो गए. सैकड़ों गण रक्त का वमन करने लगे और हजारों बेहोश हो गए।।52-53।। 

उसके बाद उस वीरभद्र ने भी विष्णु को लक्ष्य करके गदा चलायी. उनके शरीर का स्पर्श करते ही उस गदा के सैकड़ों खण्ड हो गए. तब विष्णु ने भी रोष में आकर वीरभद्र की ओर गदा चलायी. महामुने ! वह गदा भी उसके पास आते ही उसी तरह सौ टुकड़ों में हो गयी. तदनन्तर क्रोध से दीप्त नेत्रों वाले अनन्तात्मा विष्णु ने क्षण भर में ही लौहमयी एक दूसरी गदा उठा ली. तत्पश्चात खट्वांग लेकर वीरभद्र ने उन गदाधर विष्णु के बाहुदण्ड पर प्रहार करके उनकी गदा भूमि पर गिरा दी. 

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इससे अत्यन्त कुपित विष्णु ने अपने तेज से प्रज्वलित महाभयंकर सुदर्शन चक्र को उस वीरभद्र के ऊपर चला दिया. मुने! उसे देखकर वीरभद्र ने भी मन में भगवान शिव का स्मरण किया. उससे वीरभद्र के कण्ठ तक पहुँचा हुआ वह चक्र माला की भाँति सुशोभित होने लगा।।54-59।। 

तत्पश्चात युद्ध में भगवान विष्णु ने क्रुद्ध होकर सैकड़ों सूर्यों की भाँति कान्तिवाला खड्ग ले लिया और वे वीरभद्र को मारने के लिए दौड़े. तब विशाल भुजाओं वाले प्रतापी वीरभद्र ने उसी क्षण अपने हुंकार मात्र से खड्ग तथा उन विष्णु – दोनों को स्तम्भित कर दिया. उसके बाद क्रोधोन्मत्त वह वीरभद्र स्तंभित हुए उन विष्णु को मारने के लिए शूल तथा मुद्गर उठाकर उनकी ओर झपटा।।60-62।।

 उसी बीच यह आकाशवाणी हुई – “वीरभद्र! रुक जाओ! युद्ध में इस तरह से क्रोध को प्राप्त होकर क्या तुम अपने को भूल गये हो. जो विष्णु हैं, वे ही महादेव हैं और जो शिव हैं वे ही स्वयं विष्णु हैं. इन दोनों में कभी कहीं कोई भी अन्तर नहीं है”।।63-64।। 

यह सुनकर महामति वीरभद्र ने शिवस्वरुप विष्णु को नमस्कार कर “दक्ष के केश पकड़कर” यह वचन कहा – प्रजापते! तुमने जिस मुख से परम पुरुष देवेश्वर शिव की निन्दा की है, अब मैं उसी मुख पर प्रहार करता हूँ।।65-66।।

 ऎसा कहकर क्रोध से अत्यन्त लाल नेत्रों वाले वीरभद्र ने दक्ष के मुख पर बार-बार प्रहार करके अपने नख के अग्रभाग से उसे काट डाला. साथ ही जो लोग महादेव जी की निन्दा सुनकर हर्षित हुए थे, प्रमथाधिपति वीरभद्र ने उनकी भी जीभ तथा कान काट डाले।।67-68।। 

इस प्रकार यज्ञ के विनष्ट हो जाने पर ब्रह्माजी कैलास पर्वत पर गये और भगवान शिव को प्रणाम करके यज्ञविधान के लोप की बात कहने लगे।।69।। 

ब्रह्माजी ने महादेव जी से कहा – आप ऎसा क्यों कर रहे हैं? जगन्माता ब्रह्मस्वरूपिणी सती तो सनातन हैं. उनका देहग्रहण और जन्म लेना तो भ्रान्तिपूर्ण और विडम्बना मात्र है. वे तो जगद्व्यापिनी महामाया हैं. उन्होंने ही दक्ष को मोहित करने के लिए यज्ञकुण्ड के पास छायासती को स्थापित कर दिया था. दक्षप्रजापति को मोहित करने के उद्देश्य से वही छाया यज्ञाग्नि में प्रवेश कर गयी और परा प्रकृति भगवती स्वयं आकाश में विराजमान हो गयीं. क्या उस रहस्य को आप नहीं जानते हैं? फिर ऎसा क्यों कर रहे हैं?।।70-73।।

देवदेवेश ! आइये और अपने शरणागतों पर कृपा कीजिए. आप तो विधि का संरक्षण करने वाले हैं, अत: विधि का लोप मत कीजिए. हम लोगों के साथ वहाँ यज्ञ सम्पन्न करने के पश्चात परमेशानी सती की विधिवत प्रार्थना करके आप उन्हें पुन: अवश्य ही देखेंगे. महादेव ! अब आप दक्षप्रजापति के घर चलिए. भगवन् ! मुझ पर अनुग्रह कीजिए, आपको अन्यथा नहीं करना चाहिए।।74-76।। 

उनकी यह बात सुनकर शिवजी दक्षप्रजापति के घर गये. वहाँ शिव को आया देखकर वीरभद्र ने उन्हें प्रणाम किया।।77।। उसके बाद भगवान शिव की प्रार्थना कर के ब्रह्माजी ने उनसे पुन: आदरपूर्वक कहा – महेशान! अब आप आज्ञा दीजिए, जिससे यज्ञ पुन: आरंभ हो सके।।78।।

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तब शिवजी ने उत्सुक वीरभद्र को आज्ञा दी – वीरभद्र ! क्रोध छोड़ो और यज्ञ की सारी व्यवस्था फिर से कर दो।।79।।

 महादेव से आज्ञा प्राप्त करके वीरभद्र ने उसी क्षण पूर्व की भाँति यज्ञ को व्यवस्थित कर दिया और सभी देवताओं को बन्धनमुक्त कर दिया।।80।। 

उसके बाद ब्रह्माजी ने देवाधिदेव त्रिलोचन शिव से फिर कहा – परमेश्वर ! अब दक्ष को जीवित करने के लिए आज्ञा प्रदान कीजिए।।81।। 

उन ब्रह्मा की वह बात सुनते ही भगवान शंकर ने कहा – वीरभद्र ! महाबाहु ! दक्ष को अब अवश्य ही जीवित कर दो।।82।। 

देवाधिदेव शंकर का वचन सुनकर बुद्धिमान उस वीरभद्र ने एक बकरे का सिर जोड़कर दक्षप्रजापति को जीवित कर दिया।।83।।

 जो लोग ईश्वर की निन्दा करते हैं, वे निश्चय ही गूँगे पशु हैं. मुने ! ऎसा विचार करके वीरभद्र ने दक्ष को बकरे का सिर जोड़ा था।।84।।

 ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर सभी देवादि भयमुक्त होकर पुन: आ गये. दक्षप्रजापति ने महेश्वर को आहुति देकर यज्ञ का समापन किया।।85।।

 उसके बाद ब्रह्मा तथा विष्णु ने दक्षप्रजापति से कहा – अनेक स्तुतियों के द्वारा आदरपूर्वक शिव की आराधना कीजिए. बहुत दिनों तक देवेश्वर शिव की निन्दा करके आपने जो पाप अर्जित किया है, उससे मुक्ति की इच्छा रखते हुए आप सनातन भगवान शिव की स्तुति कीजिए. ये भगवान शिव स्वभाव से ही आशुतोष हैं और शिव नाम लेने मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं. आपके प्रति इनकी अप्रसन्नता तब नहीं रहेगी।।86-88।।

 उन दोनों की यह बात सुनकर दक्ष ने शाश्वत परमेश्वर महादेव को प्रणाम किया और उनका स्तवन करना आरम्भ किया।।89।।

दक्ष बोले – आपको तत्त्वत: न तो विष्णु, न ब्रह्मा और न मुख्य योगीगण ही जान पाते हैं. अत: दुर्बुद्धि मैं आपके उस दुर्गम्य स्वरूप को जानने में कैसे समर्थ होता? आप ही सबके बुद्धितत्व हैं. आपकी इच्छा के अधीन ही ये सभी लोक हैं. तब आपकी इच्छा के वशीभूत मेरे द्वारा आपकी निन्दा करने से मेरा कैसा अपराध हुआ?।।90।। 

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आप शुद्ध परम परात्पर तत्त्व हैं तथा ब्रह्मा आदि देवताओं के द्वारा पूजित हैं. मैं आपके महान चरित्र तथा स्वरुप का वर्णन कैसे करूँ? मैं आपकी शरण में आया हुआ दास हूँ. आपका चरणयुगल छोड़कर मेरे लिए दूसरा अवलम्ब ही क्या है? शम्भो ! आप मेरे उस अपराध को क्षमा कीजिए और अपने कृपागुणों से पापरूपी सागर से मेरा उद्धार कीजिए।।91।।

 पशुपते ! आप भगवान परमेश्वर हैं. इस जगत में जो भी निर्बल अथवा महान लोग हैं, वे सब आपके ही रूप हैं, क्योंकि आप विश्वरुप हैं. उस आप परमेश्वर के विद्यमान रहते मेरे द्वारा की गयी निन्दा से उत्पन्न पाप भला कैसे रह सकता है? विश्वेश्वर ! कृपापूर्वक मुझ शरणागत तथा दीन की रक्षा कीजिए।।92।।

आपके चरण कमल पराग को अपने सिर पर धारण करके ही ब्रह्मा तथा विष्णु समस्त देवताओं के द्वारा वन्दित चरण वाले हो पाए हैं. इस सभा में आये हुए आप सुरेश्वर को जो मैं अपने नेत्र से देख पा रहा हूँ, वह तो मेरे पूर्वजों का अतुलनीय भाग्य है।।93।। 

इस जगत में सभी देहधारियों में कुबुद्धि तथा सुबुद्धि के रूप में आप ही हैं. आप ही सबकी निन्दा तथा वन्दन के पात्र हैं, अत: मेरा कोई अपराध नहीं है।।94।। 

दक्ष के इस प्रकार प्रार्थना करने पर आशुतोष दयासिन्धु भगवान शिव ने अपने दोनों हाथों से उन्हें खींचकर उठा लिया।।95।।

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शिव के अंग के स्पर्शमात्र से ही दक्षप्रजापति कृतकृत्य हो गये और अपने को जीवन्मुक्त के समान तथा महान भाग्यशाली समझने लगे।।96।।

 मन, वाणी तथा शरीर से परम भक्ति से संपन्न होकर दक्षप्रजापति ने अनेकविध उपहारों द्वारा शंकर का अभुत सत्कार किया।।97।। 

उसके बाद ब्रह्माजी ने महादेव जी से पुन: भक्तिपूर्वक कहा – परमेश्वर ! एकमात्र आप भगवान सदाशिव ही भक्तों पर अनुकम्पा करने वाले हैं, क्योंकि आपने अनुग्रहपूर्वक मेरी प्रार्थना सुनकर दक्षप्रजापति की रक्षा की. आपको छोड़कर यदि देवतागण कहीं भी यज्ञ में जाएँगे तो वे उसी क्षण निश्चय ही पूर्वोक्त दशा को प्राप्त होंगे. जो नराधम यज्ञ में आपके बिना अन्य देवताओं का यजन करेंगे, उनका यज्ञकार्य नष्ट हो जाएगा और वे महापाप के भागी होंगे।।98-101।।

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।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “दक्षयज्ञविध्वंसवर्णन” नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।  

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁जय सियाराम जय जय हनुमान

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आचार्य डा.अजय दीक्षित

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