मंगलवार, 7 नवंबर 2017

आठ लक्ष्मी

आठ लक्ष्मी का ध्यान

आदिलक्ष्मी
सुमनस वंदित सुंदरि माधवि, चंद्र सहोदरि हेममये 
मुनिगण वंदित मोक्षप्रदायनि, मंजुल भाषिणि वेदनुते । 
पंकजवासिनि देव सुपूजित, सद्गुण वर्षिणि शांतियुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, आदिलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ १ ॥

धान्यलक्ष्मी
अयिकलि कल्मष नाशिनि कामिनि, वैदिक रूपिणि वेदमये 
क्षीर समुद्भव मंगल रूपिणि, मंत्रनिवासिनि मंत्रनुते ।
मंगलदायिनि अंबुजवासिनि, देवगणाश्रित पादयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, धान्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ २ ॥

धैर्यलक्ष्मी
जयवरवर्षिणि वैष्णवि भार्गवि, मंत्र स्वरूपिणि मंत्रमये 
सुरगण पूजित शीघ्र फलप्रद, ज्ञान विकासिनि शास्त्रनुते । 
भवभयहारिणि पापविमोचनि, साधु जनाश्रित पादयुते 
जय जयहे मधु सूधन कामिनि, धैर्यलक्ष्मी परिपालय माम् ॥ ३ ॥

गजलक्ष्मी
जय जय दुर्गति नाशिनि कामिनि, सर्वफलप्रद शास्त्रमये 
रधगज तुरगपदाति समावृत, परिजन मंडित लोकनुते । 
हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित, ताप निवारिणि पादयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, गजलक्ष्मी रूपेण पालय माम् ॥ ४ ॥

संतानलक्ष्मी
अयिखग वाहिनि मोहिनि चक्रिणि, रागविवर्धिनि ज्ञानमये 
गुणगणवारधि लोकहितैषिणि, सप्तस्वर भूषित गाननुते ।
सकल सुरासुर देव मुनीश्वर, मानव वंदित पादयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, संतानलक्ष्मी परिपालय माम् ॥ ५ ॥

विजयलक्ष्मी
जय कमलासिनि सद्गति दायिनि, ज्ञानविकासिनि गानमये 
अनुदिन मर्चित कुंकुम धूसर, भूषित वासित वाद्यनुते । 
कनकधरास्तुति वैभव वंदित, शंकरदेशिक मान्यपदे 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, विजयलक्ष्मी परिपालय माम् ॥ ६ ॥

विद्यालक्ष्मी
प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि, शोकविनाशिनि रत्नमये 
मणिमय भूषित कर्णविभूषण, शांति समावृत हास्यमुखे ।
नवनिधि दायिनि कलिमलहारिणि, कामित फलप्रद हस्तयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, विद्यालक्ष्मी सदा पालय माम् ॥ ७ ॥

धनलक्ष्मी
धिमिधिमि धिंधिमि धिंधिमि-दिंधिमि, दुंधुभि नाद सुपूर्णमये 
घुमघुम घुंघुम घुंघुम घुंघुम, शंख निनाद सुवाद्यनुते ।
वेद पूराणेतिहास सुपूजित, वैदिक मार्ग प्रदर्शयुते 
जय जयहे मधुसूदन कामिनि, धनलक्ष्मि रूपेणा पालय माम् ॥ ८ ॥

फलशृति
श्लो॥ अष्टलक्ष्मी नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि । 
विष्णुवक्षः स्थला रूढे भक्त मोक्ष प्रदायिनि ॥

श्लो॥ शंख चक्रगदाहस्ते विश्वरूपिणिते जयः ।
जगन्मात्रे च मोहिन्यै मंगलं शुभ मंगलम् ॥

जो भक्त प्रतिदिन प्रात:काल स्नानआदिसे शुद्ध हो यथाशक्ती 
महालक्ष्मी जीका पूजन करके अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करता
है भगवतिकी कृपासे समस्त सुख सौभाग्य सौर्य धैर्य विद्या कीर्ति 
सन्तान विजयश्री तथा प्रचूर  धन धान्य की प्राप्ति एवं अंत मे अना 
यास मोक्ष प्राप्त करलेताहै ।।

श्री दामोदराष्टकं

श्री श्री दामोदराष्टकं

श्री श्री दामोदराष्टकं

नमामीश्वरं सच्-चिद्-आनन्द-रूपं
लसत्-कुण्डलं गोकुले भ्राजमनम्
यशोदा-भियोलूखलाद् धावमानं
परामृष्टम् अत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या ॥ १॥

रुदन्तं मुहुर् नेत्र-युग्मं मृजन्तम्
कराम्भोज-युग्मेन सातङ्क-नेत्रम्
मुहुः श्वास-कम्प-त्रिरेखाङ्क-कण्ठ
स्थित-ग्रैवं दामोदरं भक्ति-बद्धम् ॥ २॥

इतीदृक् स्व-लीलाभिर् आनन्द-कुण्डे
स्व-घोषं निमज्जन्तम् आख्यापयन्तम्
तदीयेषित-ज्ञेषु भक्तैर् जितत्वं
पुनः प्रेमतस् तं शतावृत्ति वन्दे ॥ ३॥

वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चन्यं वृणे ‘हं वरेषाद् अपीह
इदं ते वपुर् नाथ गोपाल-बालं
सदा मे मनस्य् आविरास्तां किम् अन्यैः ॥ ४॥

इदं ते मुखाम्भोजम-नीलैर्
वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश् च गोप्या
मुहुश् चुम्बितं बिम्ब-रक्ताधरं मे
मनस्य् आविरास्ताम् अलं लक्ष-लाभैः ॥ ५॥

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो
प्रसीद प्रभो दुःख-जालाब्धि-मग्नम्
कृपा-दृष्टि-वृष्ट्याति-दीनं बतानु
गृहाणेष माम् अज्ञम् एध्य् अक्षि-दृश्यः ॥ ६॥ 
कुवेरात्मजौ बद्ध-मूर्त्यैव यद्वत्
त्वया मोचितौ भक्ति-भाजौ कृतौ च
तथा प्रेम-भक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ
न मोक्षे ग्रहो मे ‘स्ति दामोदरेह ॥ ७॥

नमस् ते ‘स्तु दाम्ने स्फुरद्-दीप्ति-धाम्ने
त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने
नमो राधिकायै त्वदीय-प्रियायै
नमो ‘नन्त-लीलाय देवाय तुभ्यम् ॥ ८॥

दामोदर अष्टकम,,

(1)मैं सच्चिदानन्द स्वरूप उन श्री दामोदर भगवान को नमस्कार करता हूँ जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर है,एवं सतचित आनन्द स्वरूप श्री विग्रह वाले है। जिनके दोनों कानो में दोनों कुण्डल शोभा पा रहे है;एवं जो स्वयं गोकुल में विशेष शोभायमान है,एवं जो यशोदा के भय से (माखन चोरी के समय)ऊखल (ओखली)के ऊपर से दौड़ रहे है;और माँ यशोदा ने भी जिनके पीछे शीघ्रता पूर्वक दौड़ कर ,जिनकी पीठ को पकड़ लिया है।

(2)मैं भक्ति रूप रज्जु में बंधने वाले उन्ही दामोदर भगवान को नमस्कार करता हूँ जो माता के हाथ में लठिया को देख कर,रोते रोते अपने दोनों कर कमलो से,अपने दोनों नेत्रो को बराबर पोंछ रहे है एवं भयभीत नेत्रो से युक्त है तथा निरन्तर लम्बे श्वासों से कांपते हुए,तीन रेखाओ से अंकित जिनके कण्ठ में स्थित मोतियो के हार भी हिल रहे है।

(3)मैं उन्ही दामोदर भगवान को फिर भी प्रेमपूर्वक सैंकड़ो बार प्रणाम करता हूँ,जो इस प्रकार की बाल लीलाओ के द्वारा अपने समस्त व्रज को,आनन्द रूप सरोवर में गोता लगवा रहे है;एवं अपने ऐश्वर्य को जाननेवाले ज्ञानियो के निकट ,भक्तो के द्वारा अपने पराजय के भाव को प्रकाशित करते है।

(4) हे देव!आप सब प्रकार के दान देने में समर्थ है;तो भी मैं आपसे मोक्ष की पराकाष्ठा स्वरूप बैकुंठ लोक,अथवा और वरणीय दूसरी किसी वस्तु की प्रार्थना नही करता हूँ। मैं तो केवल यही प्रार्थना करता हूँ कि हे नाथ!मेरे हृदय में तो आपका यह बालगोपाल रूप श्री विग्रह सदैव प्रकट होता रहे। इससे भिन्न दूसरे वरदानों से मुझे क्या प्रयोजन?

(5)और हे देव!आपका यह जो मुखारविंद अत्यंत श्यामल स्निग्ध ,एवं घुंघराले केश समूह से आवृत है;तथा बिम्बफल के समान रक्त वर्ण के अधरोष्ठ से युक्त है एवं माँ यशोदा जिसको बार बार चूमती रहती है ;व्ही मुखारविंद, मेरे मनमंदिर में सदा विराजमान होता रहे। दूसरे लाखो प्रकार के लाभों से मुझे कोई प्रयोजन नही है।

(6) हे देव!हे दामोदर!हे अनन्त!हे सर्वव्यापक प्रभो!आपके लिये मेरा नमस्कार है। आप मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाइये।मैं दुःख समूह रूपी समुद्र में डूबा जा रहा हूँ अतः हे सर्वेश्वर !अपनी कृपा दृष्टि रूप अमृत वृष्टि के द्वारा अत्यंत दीन एवं मतिहीन मुझको अनुग्रहित कर दीजिये,एवं मेरे नेत्रो के सामने साक्षात् प्रकट हो जाइये।

(7) हे दामोदर!आपने ऊखल से बंधे हुए श्री विग्रह के द्वारा ही नलकूबर एवं मणिग्रीव नामक कुबेरपुत्रो को जिस प्रकार विमुक्त कर दिया था;उसी प्रकार मेरे लिए भी ,अपनी प्रेम भक्ति दे दीजिये;क्योंकि मेरा आग्रह तो आपकी इस प्रेम भक्ति में ही है,किन्तु मोक्ष में नही है।

(8) हे देव! प्रकाशमान दीप्ति समूह के आश्रय स्वरूप आपके उदर में बन्धी हुई रज्जु के लिए;जगत के आधार  स्वरूप आपके उदर को भी मेरा बार बार प्रनाम है।और आपकी परम् प्रेयसी श्री राधिका के लिए मेरा प्रणाम है। तथा अनन्त लीला वाले देवादिदेव आपके लिए भी मेरा कोटिश प्रणाम है।

हनुमान जी को मृत्यु दण्ड

हनुमान को मृत्युदंड

हिन्दू घर्म के महान ग्रन्थ रामायण मे सब जानते है भगवान राम के सबसे बड़े भक्त हनुमान जी थे, परन्तु फिर ऐसा क्या हुआ की भगवान राम ने हनुमान जी को मृत्यु दंड दिया और जब हनुमान जी मत्यु को प्राप्त नहीं हुए तो उन पर ब्रह्मास्त्र चलाया, आइये जानते है क्या हुआ था की भगवान राम को उनके सबसे प्रिय भक्त को मृत्युदंड देना पड़ा।

श्री राम जब अयोध्या के राजा बने तो नारद मुनि ने हनुमान जी से ऋषि विश्वामित्र के सिवाय सभी साधुओं और ऋषियों से मिलने को कहा क्योंकि विश्वामित्र कभी महान राजा हुआ करते थे। हनुमान ने इसका पालन किया लेकिन इससे विश्वामित्र को कोई फर्क नहीं पड़ा। तब कपट से नारद मुनि विश्वामित्र के पास गए और उन्हें हनुमान के खिलाफ भड़काया। इसके बाद विश्वामित्र हनुमान पर बेहद गुस्सा हो गए और उन्होंने भगवान श्रीराम से हनुमान जी को मौत की सजा देने के लिए कहा। राम अपने गुरु विश्वामित्र की बात टाल नहीं सकते थे इसी कारण उन्होंने हनुमान जी को मृत्युदंड दिया…

मृत्युदंड देने के बाद भगवान राम ने हनुमान जी पर बाण चलाए लेकिन हनुमान राम का नाम जपते रहे और उनको कुछ नहीं हुआ। भगवान श्री राम को अपने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा का पालन करना ही था इसलिए श्रीराम ने हनुमान पर बह्रमास्त्र चलाया। आश्चर्यजनक रूप से राम नाम का जप कर रहे हनुमान जी का ब्रह्मास्त्र भी कुछ नहीं बिगाड़ पाया। यह सब देखकर नारद मुनि विश्वामित्र के पास गए और अपनी भूल स्वीकार की।

ऐसा कहा जाता है की एक बार जब हनुमान जी ने माता सीता को मांग मैं सिंदूर लगाते हुए देखा तो हनुमान जी ने इसका कारण पूछा। तब सीता मां ने उन्हें बताया कि इससे भगवान राम की आयु बढ़ेगी। जब हनुमान ने यह सुना तो उन्होंने सोचा कि जब मांग में सिंदूर भरने से भगवान राम की आयु बढ़ती है तो क्यों न पूरे शरीर में ही सिंदूर लगा लिया जाए। और तब से हनुमान जी पुरे शरीर पर सिंदूर लगाते है और व्ही प्रथा चली आ रही है और आज भी हनुमान जी की मूर्ति को सिंदूर लगाया जाता है।

श्री राम का अपने भक्त हनुमान से युद्ध भी हुआ था। भगवान राम के गुरु विश्वामित्र के निर्देशानुसार भगवान राम को राजा ययाति को मारना था। राजा ययाति ने हनुमान से शरण मांगी। हनुमान ने राजा ययाति को वचन दे दिया। हनुमान ने किसी तरह के अस्त्र-शस्त्र से लड़ने के बजाए भगवान राम का नाम जपना शुरू कर दिया। राम ने जितने भी बाण चलाए सब बेअसर रहे। विश्वामित्र हनुमान की श्रद्धाभक्ति देखकर हैरान रह गए और भगवान राम को इस धर्मसंकट से मुक्ति दिलाई।

सोलह कलाएं


              

सोलह कला ओ का अर्थ क्या है
श्री राम 12 कलाओं के ज्ञाता थे तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं के ज्ञाता हैं। चंद्रमा की सोलह कलाएं होती हैं। सोलह श्रृंगार के बारे में भी आपने सुना होगा। आखिर ये 16 कलाएं क्या है? उपनिषदों अनुसार 16 कलाओं से युक्त व्यक्ति ईश्‍वरतुल्य होता है।
आपने सुना होगा कुमति, सुमति, विक्षित, मूढ़, क्षित, मूर्च्छित, जाग्रत, चैतन्य, अचेत आदि ऐसे शब्दों को जिनका संबंध हमारे मन और मस्तिष्क से होता है, जो व्यक्ति मन और मस्तिष्क से अलग रहकर बोध करने लगता है वहीं 16 कलाओं में गति कर सकता है। 
*चन्द्रमा की सोलह कला : अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत। इसी को प्रतिपदा, दूज, एकादशी, पूर्णिमा आदि भी कहा जाता है।
उक्तरोक्त चंद्रमा के प्रकाश की 16 अवस्थाएं हैं उसी तरह मनुष्य के मन में भी एक प्रकाश है। मन को चंद्रमा के समान ही माना गया है। जिसकी अवस्था घटती और बढ़ती रहती है। चंद्र की इन सोलह अवस्थाओं से 16 कला का चलन हुआ। व्यक्ति का देह को छोड़कर पूर्ण प्रकाश हो जाना ही प्रथम मोक्ष है।
*मनुष्य (मन) की तीन अवस्थाएं : प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तीन अवस्थाओं का ही बोध होता है:- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। क्या आप इन तीन अवस्थाओं के अलावा कोई चौथी अवस्था जानते हैं? जगत तीन स्तरों वाला है- 1.एक स्थूल जगत, जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। 2.दूसरा सूक्ष्म जगत, जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं और 3.तीसरा कारण जगत, जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है।
तीन अवस्थाओं से आगे: सोलह कलाओं का अर्थ संपूर्ण बोधपूर्ण ज्ञान से है। मनुष्‍य ने स्वयं को तीन अवस्थाओं से आगे कुछ नहीं जाना और न समझा। प्रत्येक मनुष्य में ये 16 कलाएं सुप्त अवस्था में होती है। अर्थात इसका संबंध अनुभूत यथार्थ ज्ञान की सोलह अवस्थाओं से है। इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न मिलते है।
जानिए 16 कलाओं के नाम।
इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में अलगे अलग मिलते हैं।
*1.अन्नमया, 2.प्राणमया, 3.मनोमया, 4.विज्ञानमया, 5.आनंदमया, 6.अतिशयिनी, 7.विपरिनाभिमी, 8.संक्रमिनी, 9.प्रभवि, 10.कुंथिनी, 11.विकासिनी, 12.मर्यदिनी, 13.सन्हालादिनी, 14.आह्लादिनी, 15.परिपूर्ण और 16.स्वरुपवस्थित।
*अन्यत्र  1.श्री, 3.भू, 4.कीर्ति, 5.इला, 5.लीला, 7.कांति, 8.विद्या, 9.विमला, 10.उत्कर्शिनी, 11.ज्ञान, 12.क्रिया, 13.योग, 14.प्रहवि, 15.सत्य, 16.इसना और 17.अनुग्रह।
*कहीं पर 1.प्राण, 2.श्रधा, 3.आकाश, 4.वायु, 5.तेज, 6.जल, 7.पृथ्वी, 8.इन्द्रिय, 9.मन, 10.अन्न, 11.वीर्य, 12.तप, 13.मन्त्र, 14.कर्म, 15.लोक और 16.नाम।
16 कलाओं का रहस्य जानिए...
16 कलाएं दरअसल बोध प्राप्त योगी की भिन्न-भिन्न स्थितियां हैं। बोध की अवस्था के आधार पर आत्मा के लिए प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की 15 अवस्थाएं ली गई हैं। अमावास्या अज्ञान का प्रतीक है तो पूर्णिमा पूर्ण ज्ञान का।
19 अवस्थाएं : भगवदगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने आत्म तत्व प्राप्त योगी के बोध की उन्नीस स्थितियों को प्रकाश की भिन्न-भिन्न मात्रा से बताया है। इसमें अग्निर्ज्योतिरहः बोध की 3 प्रारंभिक स्थिति हैं और शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ की 15 कला शुक्ल पक्ष की 01..हैं। इनमें से आत्मा की 16 कलाएं हैं।
आत्मा की सबसे पहली कला ही विलक्षण है। इस पहली अवस्था या उससे पहली की तीन स्थिति होने पर भी योगी अपना जन्म और मृत्यु का दृष्टा हो जाता है और मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
अर्थात : जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।- (8-24)
भावार्थ : श्रीकृष्ण कहते हैं जो योगी अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के छह माह में देह त्यागते हैं अर्थात जिन पुरुषों और योगियों में आत्म ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, वह ज्ञान के प्रकाश से अग्निमय, ज्योर्तिमय, दिन के सामान, शुक्लपक्ष की चांदनी के समान प्रकाशमय और उत्तरायण के छह माहों के समान परम प्रकाशमय हो जाते हैं। अर्थात जिन्हें आत्मज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं को जानना या देह से अलग स्वयं की स्थिति को पहचानना।
विस्तार से...
1.अग्नि:- बुद्धि सतोगुणी हो जाती है दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव विकसित होने लगता है।
2.ज्योति:- ज्योति के सामान आत्म साक्षात्कार की प्रबल इच्छा बनी रहती है। दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव ज्योति के सामान गहरा होता जाता है।
3.अहः- दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव दिन के प्रकाश की तरह स्थित हो जाता है।
16 कला - 15कला शुक्ल पक्ष + 01 उत्तरायण कला  = 16
1.बुद्धि का निश्चयात्मक हो जाना।
2.अनेक जन्मों की सुधि आने लगती है।
3.चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है।
4.अहंकार नष्ट हो जाता है।
5.संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं। स्वयं के स्वरुप का बोध होने लगता है।
6.आकाश तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। कहा हुआ प्रत्येक शब्द सत्य होता है।
7.वायु तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। स्पर्श मात्र से रोग मुक्त कर देता है।
8.अग्नि तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। दृष्टि मात्र से कल्याण करने की शक्ति आ जाती है।
9.जल तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। जल स्थान दे देता है। नदी, समुद्र आदि कोई बाधा नहीं रहती।
10.पृथ्वी तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। हर समय देह से सुगंध आने लगती है, नींद, भूख प्यास नहीं लगती।
11.जन्म, मृत्यु, स्थिति अपने आधीन हो जाती है।
12.समस्त भूतों से एक रूपता हो जाती है और सब पर नियंत्रण हो जाता है। जड़ चेतन इच्छानुसार कार्य करते हैं।
13.समय पर नियंत्रण हो जाता है। देह वृद्धि रुक जाती है अथवा अपनी इच्छा से होती है।
14.सर्व व्यापी हो जाता है। एक साथ अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है। पूर्णता अनुभव करता है। लोक कल्याण के लिए संकल्प धारण कर सकता है।
15.कारण का भी कारण हो जाता है। यह अव्यक्त अवस्था है।
16.उत्तरायण कला- अपनी इच्छा अनुसार समस्त दिव्यता के साथ अवतार रूप में जन्म लेता है जैसे राम, कृष्ण यहां उत्तरायण के प्रकाश की तरह उसकी दिव्यता फैलती है।
सोलहवीं कला पहले और पन्द्रहवीं को बाद में स्थान दिया है। इससे निर्गुण सगुण स्थिति भी सुस्पष्ट हो जाती है। सोलह कला युक्त पुरुष में व्यक्त अव्यक्त की सभी कलाएं होती हैं। यही दिव्यता है।
                      

हनुमान जी की अलौकिक भक्ति

रावण के वध के बाद अयोध्या पति श्री राम ने राजपाट संभाल लिया था और प्रजा राम राज्य से प्रसन्न थी, एक दिन भगवान महादेव की इच्छा श्री राम से मिलने की हुई,

पार्वती जी को संग लेकर महादेव कैलाश पर्वत से अयोध्या नगरी के लिए चल पड़े, भगवान शिव और मां पार्वती को अयोध्या आया देखकर श्री सीता राम जी बहुत खुश हुए,

माता जानकी ने उनका उचित आदर सत्कार किया और स्वयं भोजन बनाने के लिए रसोई में चली गईं, भगवान शिव ने श्री राम से पूछा- हनुमान जी दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, कहां हैं ?

श्री राम बोले- वह बगीचे में होंगे, शिव जी ने श्री राम जी से बगीचे में जाने की अनुमति मांगी और पार्वती जी के साथ बगीचे में आ गए, बगीचे की खूबसूरती देखकर उनका मन मोहित हो गया,

आम के एक घने वृक्ष के नीचे हनुमान जी दीन-दुनिया से बेखबर गहरी नींद में सोए थे और एक लय में खर्राटों से राम नाम की ध्वनि उठ रही थी, चकित होकर शिव जी और माता पार्वती एक दूसरे की ओर देखने लगे,

माता पार्वती मुस्करा उठी और वृक्ष की डालियों की ओर इशारा किया, राम नाम सुनकर पेड़ की डालियां भी झूम रही थीं, उनके बीच से भी राम नाम उच्चारित हो रहा था,

शिव जी इस राम नाम की धुन में मस्त मगन होकर खुद भी राम राम कहकर नाचने लगे, माता पार्वती जी ने भी अपने पति का अनुसरण किया, भक्ति में भरकर उनके पांव भी थिरकने लगे,

शिव जी और पार्वती जी के नृत्य से ऐसी झनकार उठी कि स्वर्गलोक के देवतागण भी आकर्षित होकर बगीचे में आ गए और राम नाम की धुन में सभी मस्त हो गए,

माता जानकी भोजन तैयार करके प्रतीक्षारत थीं परंतु संध्या घिरने तक भी अतिथि नहीं पधारे तब अपने देवर लक्ष्मण जी को बगीचे में भेजा,

लक्ष्मण जी ने तो अवतार ही लिया था श्री राम की सेवा के लिए, अतः बगीचे में आकर जब उन्होंने धरती पर स्वर्ग का नजारा देखा तो खुद भी राम नाम की धुन में झूम उठे,

महल में माता जानकी परेशान हो रही थीं कि अभी तक भोजन ग्रहण करने कोई भी क्यों नहीं आया, उन्होंने श्री राम से कहा भोजन ठंडा हो रहा है चलिए हम ही जाकर बगीचे में से सभी को बुला लाएं,

जब सीता राम जी बगीचे में गए तो वहां राम नाम की धूम मची हुई थी, हुनमान जी गहरी नींद में सोए हुए थे और उनके खर्राटों से अभी तक राम नाम निकल रहा था,

श्री सिया राम भाव विह्वल हो उठे, श्री राम जी ने हनुमान जी को नींद से जगाया और प्रेम से उनकी तरफ निहारने लगे, प्रभु को आया देख हनुमान जी शीघ्रता से उठ खड़े हुए, नृत्य का माहौल भंग हो गया,

शिव जी खुले कंठ से हनुमान जी की राम भक्ति की सराहना करने लगे, हनुमान जी सकुचाए लेकिन मन ही मन खुश हो रहे थे, 
श्री सीया राम जी ने भोजन करने का आग्रह भगवान शिव से किया,

सभी लोग महल में भोजन करने के लिए चल पड़े. माता जानकी भोजन परोसने लगीं, हुनमान जी को भी श्री राम जी ने पंक्ति में बैठने का आदेश दिया,

हनुमान जी बैठ तो गए परंतु आदत ऐसी थी की श्री राम के भोजन के उपरांत ही सभी भोजन करते थे,

आज श्री राम के आदेश से पहले भोजन करना पड़ रहा था, माता जानकी हनुमान जी को भोजन परोसती जा रही थी पर हनुमान का पेट ही नहीं भर रहा था, कुछ समय तक तो उन्हें भोजन परोसती रहीं फिर समझ गईं इस तरह से हनुमान जी का पेट नहीं भरने वाला,

उन्होंने तुलसी के एक पत्ते पर राम नाम लिखा और भोजन के साथ हनुमान जी को परोस दिया. तुलसी पत्र खाते ही हनुमान जी को संतुष्टि मिली और वह भोजन पूर्ण मानकर उठ खड़े हुए,

भगवान शिव शंकर ने प्रसन्न होकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया कि आप की राम भक्ति युगों-युगों तक याद की जाएगी और आप संकट मोचन कहलाएंगे

श्री राम जय राम जय जय राम

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मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

ब्रह्मपुराण अध्याय – २ राजा पृथु का चरित्

ब्रह्मपुराण

अध्याय – २

राजा पृथु का चरित्र

मुनियों ने कहा – लोमहर्षणजी ! पृथु के जन्म की कथा विस्तारपूर्वक कहिये | उन महत्माने इस पृथ्वीका किस प्रकार दोहन किया था ?

लोमहर्षणजी बोले – द्विजवरो ! मैं वेनकुमार पृथु की कथा विस्तार के साथ सुनाता हूँ | आप लोग एकाग्रचित्त होकर सुनें | ब्राह्मणों ! जो पवित्र नहीं रहता, जिसका हृदय खोता हैं, जो अपने शासन में नहीं हैं, जो व्रत का पालन नहीं करता तथा जो कृतघ्न और अहितकारी है – ऐसे पुरुष को मैं यह कृतघ्न और अहितकारी हैं – ऐसे पुरुष को मैं यह प्रसंग नहीं सुना सकता | यह स्वर्ग देनेवाला, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला, परम धन्य, वेदों के तुल्य, माननीय तथा गूढ़ रहस्य हैं | ऋषियों ने जैसा कहा हैं, वह सब मैं ज्यों-का-त्यों सुना रहा हूँ; सुनो | जो प्रतिदिन ब्राह्मणों को नमस्कार करके वेनकुमार पृथु के चरित्र का विस्तारपूर्वक कीर्तन करता हैं, उसे ‘अमुक कर्म मैंने किया और अमुक नहीं किया’ – इस बातका शोक नहीं होता | पूर्वकाल की बात हैं, अत्रि-कुल में उत्पन्न प्रजापति अंग बड़े धर्मात्मा और धर्म के रक्षक थे | वे अत्रि के समान ही तेजस्वी थे | उनका पुत्र वेन था, जो धर्म के तत्त्व को बिलकुल नहीं समझता था | उसका जन्म मृत्युकन्या सुनीथा के गर्भ से हुआ था | अपने नाना के स्वाभावदोष के कारण वह धर्मको पीछे रखकर काम और लोभ में प्रवृत्त हो गया | उसने धर्मकी मर्यादा भंग कर दी और वैदिक धर्मोका उल्लंघन करके वह अधर्म में तत्पर हो गया | विनाशकाल उपस्थित होनेके कारण उसने यह क्रूर प्रतिज्ञा कर ली थी कि ‘किसीको यज्ञ और होम नहीं करने दिया जायेगा | यजन करने योग्य, यज्ञ करनेवाला तथा यज्ञ भी मैं ही हूँ | मेरे ही लिये यज्ञ करना चाहिये | मेरे ही उद्देश्य से हवन होना चाहिये |’ इसप्रकार मर्यादा का उल्लंघन करके सब कुछ ग्रहण करनेवाले अयोग्य वेन से मरीचि आदि सब महर्षियों ने कहा – ‘वेन ! हम अनेक वर्षों के लिए यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करनेवाले हैं | तुम अधर्म न करो | यह यज्ञ आदि कार्य सनातन धर्म हैं |’

महर्षियों को यों कहते देख खोटी बुद्धिवाले वेन ने हँसकर कहा – ‘अरे ! मेरे सिवा दूसरा कौन धर्मका स्त्रष्टा हैं | मैं किसकी बात सुनूँ | विद्या, पराक्रम, तपस्या और सत्य के द्वारा मेरी समानता करनेवाला इस भूतलपर कौन हैं ? मैं ही सम्पूर्ण प्राणियों की और विशेषत: सब धर्मो की उत्पत्तिका कारण हूँ | तुम सब लोग मुर्ख और अचेत हो, इसलिये मुझे नहीं जानते | यदि मैं चाहूँ तो इस पृथ्वीको भस्म कर दूँ, जलमें बहा दूँ या भूलोक तथा द्युलोक को भी रूँध डालूँ | इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं हैं |’ जब महर्षिगण वेन को मोह और अहंकार से किसी तरह हटा न सके, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ | उन महात्माओं ने महाबली वेन को पकड़कर बाँध लिया | उससमय वह बहुत उछल-कूद मचा रहा था | महर्षि कुपित तो थे ही, वेन की बायीं जंघा का मंथन करने लगे | इससे एक काले रंग का पुरुष उत्पन्न हुआ, जो बहुत ही नाटा था | वह भयभीत हो हाथ जोडकर खड़ा हो गया | उसे व्याकुल देख अत्रि ने कहा –‘निषीद (बैठ जा) |’ इससे वह निषादवंश का प्रवर्तक हुआ और वेन के पाप से उत्पन्न हुए धीवरों की सृष्टि करने लगा | तत्पश्च्यात महात्माओं ने पुन: अरणी की भाँती वेन की दाहिनी भुजा का मंथन किया | उससे अग्रि के समान तेजस्वी पृथुका प्रादुर्भाव हुआ | वे भयानक टंकार करनेवाले आजगव नामक धनुष, दिव्य बाण तथा रक्षार्थ कवच धारण किये प्रकट हुए थे | उनके उत्पन्न होनेपर समस्त प्राणी बड़े प्रसन्न हुए और सब ओर से वहाँ एकत्रित होने लगे | वेन स्वर्गगामी हुआ |

महात्मा पृथु-जैसे सत्पुत्र ने उत्पन्न होकर वेन को ‘पुम’ नामक नरक से छुड़ा दिया | उनका अभिषेक करने के लिये समुद्र और सभी नदियाँ रत्न एवं जल लेकर स्वयं ही उपस्थित हुई | आंगिरस देवताओं के साथ भगवान् ब्रह्माजी तथा समस्त चराचर भूतों ने वहाँ आकर राजा पृथु का राज्याभिषेक किया | उन महाराज ने सभी प्रजाका मनोरंजन किया | उनके पिताने प्रजा को बहुत दु:खी किया था, किन्तु पृथु ने उन सबको प्रसन्न कर लिया; प्रजा का मनोरंजन करने के कारण ही उनका नाम राजा हुआ | वे सब समुद्र की यात्रा करते तब उसका जल स्थिर हो जाता था | पर्वत उन्हें जाने के लिये मार्ग दे देते थे और उनके रथ की ध्वजा कभी भंग नहीं हुई | उनके राज्य में पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती थी | राजाका चिन्तन करनेमात्र से अन्न सिद्ध हो जाता था | सभी गौएँ कामधेनु बन गयी थीं और पत्तों के दोने-दोने में मधु भरा रहता था | उसीसमय पृथु ने पैतामह (ब्रह्माजी से सम्बन्ध रखनेवाला) यज्ञ किया | उसमें सोमाभिषव् के दिन सूति (सोमरस निकालने की भूमि) से परम बुद्धिमान सूत की उत्पत्ति हुई | उसी महायज्ञ में विद्वान मागध का भी प्रादुर्भाव हुआ | उन दोनों को महर्षियों ने पृथु की स्तुति करने के लिये बुलाया और कहा – ‘तुम लोग इन महाराज की स्तुति करो | यह कार्य तुम्हारे अनुरूप है और ये महाराज भी इसके योग्य पात्र हैं |’ यह सुनकर सूत और मागध ने उन महर्षियों से कहा – ‘हम अपने कर्मों से देवताओं तथा ऋषियों को प्रसन्न करते हैं | इन महाराज का नाम, कर्म, लक्षण और यश – कुछ भी हमें ज्ञात नहीं है, जिससे इन तेजस्वी नरेश की हम स्तुति कर सकें |’ तब ऋषियों ने कहा – ‘भविष्य में होनेवाले गुणों का उल्लेख करते हुए स्तुति करो |’ उन्होंने वैसा ही किया | उन्होंने जो-जो कर्म बताये, उन्हीं को महाबली पृथु ने पीछे से पूर्ण किया | तभीसे लोक में सूत, मागध और वंदीजनों के द्वारा आशीर्वाद दिलाने की परिपाटी चल पड़ी | वे दोनों जब स्तुति कर चुके, तब महाराज पृथु ने अत्यंत प्रसन्न होकर अनूप देशका राज्य सूत को और मगध का मागध को दिया | पृथु को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई प्रजा से महर्षियों ने कहा – ‘ ये महाराज तुम्हें जीविका प्रदान करनेवाले होंगे |’ यह सुनकर सारी प्रजा महात्मा राजा पृथु की ओर दौड़ी और बोली – ‘आप हमारे लिये जीविका का प्रबंध कर दें |’ जब प्रजाओं ने उन्हें इसप्रकार घेरा, तब वे उनका हित करने की इच्छासे धनुष-बाण हाथ में ले प्रथ्वी की और दौड़े | पृथ्वी उनके भय से थर्रा उठी और गौका रूप धारण करके भागी | तब पृथु ने धनुष लेकर भागती हुई पृथ्वीका पीछा किया | पृथ्वी उनके भयसे ब्रह्मलोक आदि अनेक लोकों में गयी, किन्तु सब जगह उसें धनुष लिये हुए पृथु को अपने आगे ही देखा | अग्रि के समान प्रज्वलित तीखे बाणों के कारण उनका तेज और भी उद्दीप्त दिखायी देता था | वे महान योगी महात्मा देवताओं के लिये भी दुर्धर्ष प्रतीत होते थे | जब और कहीं रक्षा न हो सकी, तब तीनों लोकों की पूजनीया पृथ्वी हाथ जोडकर फिर महाराज पृथु की ही शरण में आयी और इसप्रकार बोली – ‘राजन ! सब लोक मेरे ही ऊपर स्थित हैं | मैं ही इस जगत को धारण करती हूँ | यदि मेरा नाश हो जाय तो समस्त प्रजा नष्ट हो जायगी | इस बातको अच्छी तरह समझ लेना | भूपाल ! यदि तुम प्रजाका कल्याण चाहते हो तो मेरा वध न करो | मैं जो बात कहती हूँ, उसे सुनो; ठीक उपायसे आरम्भ किये हुए सब कार्य सिद्ध होते हैं | तुम इस उपायपर ही दृष्टीपात करो, जिससे इस प्रजाको जीवित रख सकोगे | मेरी हत्या करके भी तुम प्रजा के पालन-पोषण में समर्थ न होगे | महामते ! तुम क्रोध त्याग दो, मैं तुम्हारे अनुकूल हो जाऊँगी | तिर्यग्योनि में भी स्त्री को अवध्य बताया गया हैं; यदि यह बात सत्य है तो तुम्हें धर्म का त्याग नहीं करना चाहिये |’

पृथु ने कहा – भद्रे ! जो अपने या पराये किसी एक के लिए बहुत-से प्राणियों का वध करता हैं, उसे अनंत पातक लगता है; परन्तु जिस अशुभ व्यक्तिका वध करनेपर बहुत-से लोग सुखी हों, उसके मारने से पातक या उपपातक कुछ नहीं लगता | अत: वसुन्धरे ! मैं प्रजाका कल्याण करनेके लिये तुम्हारा वध करूँगा | यदि मेरे कहने से आज संसारका कल्याण नहीं करोगी तो अपने बाणसे तुम्हारा नाश कर दूँगा और अपनेको ही पृथ्वीरूप में प्रकट करके स्वयं ही प्रजा को धारण करूँगा; इसलिये तुम मेरी आज्ञा मानकर समस्त प्रजाकी जीवन-रक्षा करो; क्योंकि तुम सबके धारण में समर्थ हो | इस समय मेरी पुत्री बन जाओ; तभी मैं इस भयंकर बाण को, जो तुम्हारे वध के लिये उद्यत हैं, रोकूँगा |

पृथ्वी बोली – वीर ! नि:संदेह मैं यह सब कुछ करूँगी | मेरे लिये कोई बछड़ा देखो, जिसके प्रति स्नेहयुक्त होकर मैं दूध दे सकूँ | धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भूपाल ! तुम मुझे सब ओर बराबर कर दो, जिससे मेरा दूध सब ओर बह सके |

तब राजा पृथु ने अपने धनुष की नोक से लाखों पर्वतों को उखाड़ा और उन्हें एक स्थानपर एकत्रित किया | इससे पर्वत बढ़ गये | इससे पहले की सृष्टि में भूमि समतल न होने के कारण पुरों अथवा ग्रामों का कोई सीमाबद्ध विभाग नहीं हो सका था | उससमय अन्न, गोरक्षा, खेती और व्यापार भी नहीं होते थे | यह सब तो वेन-कुमार पृथु के समय से ही आरम्भ हुआ है | भूमिका जो-जो भाग समतल था, वहीँ-वहीपर समस्त प्रजाने निवास करना पसंद किया | उस समयतक प्रजाका आहार केवल फल-मूल ही था और वह भी बड़ी कठिनाई से मिलता था | राजा पृथुने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बनाकर अपने हाथ में ही पृथ्वी को दुहा | उन प्रतापी नरेश ने पृथ्वी से सब प्रकार के अन्नों का दोहन किया | उसी अन्नसे आज भी सब प्रजा जीवन धारण करती है | उससमय ऋषि, देवता, पितर, नाग, दैत्य, यक्ष, पुण्यजन, गंधर्व, पर्वत और वृक्ष – सबने पृथ्वी को दुहा | उनके दूध, बछड़ा, पात्र और दुह्नेवाला- ये सभी पृथक-पृथक थे | ऋषियों के चन्द्रमा बछड़ा बने, बृहस्पति ने दुहने का काम किया, तपोमय ब्रह्म उनका दूध था और वेद ही उनके पात्र थे | देवताओं ने सुवर्णमय पात्र लेकर पुष्टिकारक दूध दुहा | उनके लिए इंद्र बछड़ा बने और भगवान् सूर्य ने दुहनेका काम किया | पितरों का चाँदी का पात्र था | प्रतापी यम बछड़ा बने, अन्तक ने दूध दुहा | उनके दूध को ‘स्वधा’ नाम दिया गया हैं | नागों ने तक्षक को बछड़ा बनाया | तुम्बीका पात्र रखा | ऐरावत नागसे दुहने का काम लिया और विषरूपी दुग्ध का दोहन किया | असुरों में मधु दुहनेवाला बना | उसने मायामय दूध दुहा | उससमय विरोचन बछड़ा बना था और लोहे के पात्र में दूध दुहा गया था | यक्षों का कच्चा पात्र था | कुबेर बछड़ा बने थे | रजतनाभ यक्ष दुहनेवाला था और अन्तर्धान होने की विद्या ही उनका दूध था | राक्षसेन्द्रों में सुमाली नामका राक्षस बछड़ा बना | रजतनाम दुह्नेवाला था | उसने कपालरूपी पात्र में शोणितरूपी दूध का दोहन किया | गन्धर्वों में चित्ररथ ने बछड़े का काम पूरा किया | कमल ही उनका पात्र था | सुरुचि दुह्नेवाला था और पवित्र सुगंध ही उनका दूध था | पर्वतों में म्हागिरि मेरु ने हिमवान को बछड़ा बनाया और स्वयं दुह्नेवाला बनकर शिलामय पात्र में रत्नों एवं ओषधियों को दूध के रूप में दुहा | वृक्षों में प्लक्ष (पाकड़) बछड़ा था | खिले हुए शाल के वृक्ष ने दुहने का काम किया | पलाश का पात्र था और जल ने तथा कटनेपर पुन: अंकुरित हो जाना ही उनका दूध था |

इसप्रकार सबका धारण-पोषण करनेवाली यह पावन वसुंधरा समस्त चराचर जगत की आधारभूता तथा उत्पत्तिस्थान हैं | यह सब कामनाओं को देनेवाली तथा सब प्रकार के अन्नों को अंकुरित करनेवाली है | गोरुपा पृथ्वी मेदिनी के नामसे विख्यात हैं | यह समुद्रतक पृथु के ही अधिकार में थी | मधु और कैटभ के मेद से व्याप्त होने के कारण यह मेदिनी कहलाती है | फिर राजा पृथु की आज्ञा के अनुसार भूदेवी उनकी पुत्री बन गयी, इसलिये इसे पृथ्वी भी कहते हैं | पृथु ने इस पृथ्वीका विभाग और शोधन किया, जिससे यह अन्न की खान और समृद्धिशालिनी बन गयी | गाँवों और नगरों के कारण इसकी बड़ी शोभा होने लगी | वेन-कुमार महाराज पृथुका ऐसा ही प्रभाव था | इसमें संदेह नहीं कि वे समस्त प्राणियों के पूजनीय और वन्दनीय हैं | वेद-वेदांगों के पारंगत विद्वान ब्राह्मणों को भी महाराज पृथु की ही वंदना करनी चाहिये, क्योंकि वे सनातन ब्रह्मयोनि हैं | राज्य की इच्छा रखनेवाले राजाओं के लिये भी परम प्रतापी महाराज पृथु ही वन्दनीय हैं | युद्ध में विजय की कामना करनेवाले पराक्रमी योद्धाओं को भी उन्हें मस्तक झुकाना चाहिये | क्योंकि योद्धाओं में वे अग्रगण्य थे | जो सैनिक राजा पृथु का नाम लेकर संग्राम में जाता हैं, वह भयंकर संग्राम से भी सकुशल लौटता है और यशस्वी होता है | वैश्यवृत्ति करनेवाले धनि वैश्यों को भी चाहिये कि वे महाराज पृथु को नमस्कार करें, क्योंकि राजा पृथु सबके वृत्तिदाता और परम यशस्वी थे | इस संसार में परमकल्याण की इच्छा रखनेवाले तथा तीनों वर्णों की सेवामें लगे रहनेवाले पवित्र शुदों के लिये भी राजा पृथु ही वन्दनीय हैं | इसप्रकार जहाँ पृथ्वी को दुहने के लिये जो विशेष-विशेष बछड़े, दुहनेवाले, दूध तथा पात्र कल्पित किये गये थे , उन सबका मैंने वर्णन किया |

– नारायण नारायण –