सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

🕉 सत्यनारायण की कथा 🕉 डा.अजय दीक्षित

सत्यनारायण की कथा
       




भारतवर्ष में सत्यनारायणव्रत-कथा अत्यंत लोकप्रिय है और जनता-जनार्दन में इसका प्रचार-प्रसार भी सर्वाधिक है | भारतीय सनातन परम्परामें किसी भी मांगलिक कार्यका प्रारम्भ भगवान गणपति के पूजन से एवं उस कार्य की पूर्णता भगवान् सत्यनारायण की कथा श्रवण से समझी जाती है | वर्तमान समय में भगवान् सत्यनारायण की प्रचलित कथा स्कन्दपुराण के रेवाखंड के नामसे प्रसिद्ध है, जो पाँच या सात अध्यायों के रूपमें उपलब्ध है | भविष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व में भी भगवान् सत्यनारायणव्रत-कथाका उल्लेख मिलता है, जो छ: अध्यायों में प्राप्त है | कथा के माध्यम से मूल सत-तत्त्व परमात्मा का ही इसमें निरुपण हुआ है, जिसके लिये गीतामें ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ आदि शब्दों में यह स्पष्ट किया गया है की इस मायामय दुःखद संसार की वास्तविक सत्ता ही नहीं है | परमेश्वर ही त्रिकालाबाधित सत्य है और एकमात्र वही ज्ञेय, ध्येय एवं उपास्य है | ज्ञान-वैराग्य और अनन्य भक्ति के द्वारा वही साक्षात्कार करने के योग्य है | भागवत में भी कहा गया है –
सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनि निहितं च सत्ये |
सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्ना: ||
यहाँ भी सत्यव्रत और सत्यनारायणव्रत का तात्पर्य उन शुद्ध सच्चीदानंद परमात्मा से ही है | इसीप्रकार निम्नलिखित श्लोक में –
अन्तर्भवेऽनन्त भवन्तमेव ह्यतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्त: |
असन्तमप्यन्त्यहिमन्तरेण सन्तं गुणं तं किमु यन्ति सन्त : || (श्रीमदभागवत १०/१४/२८)
संसार में मनीषियोंद्वारा सत्य-तत्व की खोज की बात निर्दिष्ट है, जिसे प्राप्तकर मनुष्य सर्वथा कृतार्थ हो जाता है और सभी आराधनाएँ उसी में पर्यवसित होती है | निष्काम-उपासना से सत्यस्वरूप नारायण की प्राप्ति हो जाती है |
व्यासजी बोले – एक समय की बात है, नैमिषारण्य में ‘भगवन ! संसार के कल्याण के लिये आप वह बतलाने की कृपा करें कि चारों युगों में कौन पूजनीय और कौन सेवनीय है तथा कौन सबके अभीष्ट मनोरथों को पूर्ण करनेवाला है ? मानव अनायास ही किसकी आराधनाद्वारा अपनी मंगलमयी कामना को प्राप्त कर सकता है ? ब्रम्हन ! आप ऐसे सत्य उपाय को बतलाये जो मनुष्यों की कीर्ति को बढ़ानेवाला ही | शौनकादि ऋषियोंद्वारा इसप्रकार पूछे जानेपर श्रीसूतजी भगवान् सत्यनारायण की प्रार्थना करने लगे –
नवाम्भोजनेत्रं रमाकेलिपात्रं चतुर्बाहूचामीकरं चारुगात्रम |
जगत्त्राणहेतुं रिपौ धुम्रकेतुं सदा सत्यनारायणं स्तौमि देवम || (प्रतिसर्गपर्व २/१४/४)
श्रीसूतजी ने प्रार्थना करते हुए कहा – ‘प्रफुल्लित नवीन कमल के समान नेत्रवाले, भगवती लक्ष्मी के क्रीडापात्र, चतुर्भुज, सुवर्णकान्ति के समान सुंदर शरीरवाले, संसारकी रक्षा करने के एकमात्र मूल कारण तथा शत्रुओं के लिये धूम्रकेतुस्वरुप भगवान् सत्यनारायणदेव की मैं स्तुति करता हूँ |’
श्रीरामं सहलक्ष्मणं सकरुणं सीतान्वितं सात्त्विकं वैदेहीमुखपद्मलुब्धमधुपं पौलस्त्यसंहारकम |
वन्दे वन्द्यपदाम्बुजं सुरवरं भक्तानुकम्पाकरं शत्रुघ्नेन हनूमता च भरतेनासेवितं राघवम || (प्रतिसर्गपर्व २/१४/५)
‘जो भगवान करुणा के निधान हैं, जिनके चरणकमल वन्दनीय हैं, जो भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, जो लक्ष्मणजी के साथ रहते हैं और माता श्रीसीता से समन्वित है तथा माता वैदेही श्रीजनकनन्दिनीजी के मुख-कमल की ओर स्निग्धभाव से देखते हैं, उन शत्रुघ्न, हनुमान तथा भरत से सेवित, पुलस्त्यकुल का संहार करनेवाले, सत्स्वरूप सुरश्रेष्ठ राघवेन्द्र श्रीरामचंद्र की मैं वन्दना करता हूँ |’
सूतजी ने कहा – ऋषियों ! अब मैं आपसे श्रेष्ठ राजाओं के चरित्रों से सम्बद्ध एक इतिहास का वर्णन करता हूँ, उसे आपलोग श्रवण करें | यह पवित्र आख्यान कलियुग के सम्पूर्ण पापों का विनाश करनेवाला, कामनाओं का पूर्ण क्र्नेवालम देवताओंद्वारा, आभासित, ब्राह्मणोंद्वारा प्रकाशित, विद्वानों को आनंदित करनेवाला तथा विशेष रूपसे सत्संग की चर्चास्वरूप है |
ऋषियों ! एक समय योगी देवर्षि नारदजी सबके कल्याण के कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए इस मृत्युलोक में आये | यहाँ उन्होंने देखा कि अपने-अपने किये गये कर्मों के अनुसार संसार के प्राणी नाना प्रकार के क्लेशों एवं दु:खोंसे दु:खी है और विविध आधि एवं व्याधिसे ग्रस्त हैं | यह देखकर उन्होंने सोचा कि कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे इन प्राणियों के दुःख का नाश हो | ऐसा विचारकर वे विष्णुलोक में गये | वहां उन्होंने शंख, चक्र, गदा,पद्म और वनमाला से अलंकृत, प्रसन्नमुख, शांत, सनक-सनंदन तथा सनात्कुमारादि से संस्तुत भगवान् नारायण का दर्शन किया | उन देवाधिदेव का दर्शनकर नारदजी उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे – ‘वाणी और मनसे जिनका स्वरुप परे है और जो अनंतशक्तिसम्पन्न हैं, आदि, मध्य और अंत से रहित है, ऐसे महान आत्मा निर्गुणस्वरुप आप परमात्मा को मेरा नमस्कार है | सभी के आदिपुरुष लोकोपकारपरायण, सर्वत्र व्याप्त, तपोमूर्ति आपको मेरा बार-बार नमस्कार है |’
देवर्षि नारदकी स्तुति सुनकर भगवान् विष्णु बोले – देवर्षे ! आप किस कारण से यहाँ आये है ? आपके मन में कौन-सी चिंता है ? महाभाग ! आप सभी बातें बताये | मैं उचित उपाय कहूँगा |
नारदजी ने कहा – प्रभि ! लोकों में भ्रमण करता हुआ मैं मृत्युलोक में गया था, वहाँ मैंने देखा कि संसार के सभी प्राणी अनेक प्रकार के क्लेश-तापों से दु:खी हैं | अनेक रोगों से ग्रस्त है | उनकी वैसी दुर्दशा देखकर मेरे मनमें बड़ा कष्ट हुआ और मैं सोचने लगा कि किस उपाय से इन दु:खी प्राणियों का उद्धार होगा ? भगवन ! उनके कल्याण के लिए आप कोई श्रेष्ठ एवं सुगम उपाय बतलाने की कृपा करें | नारदजी के इन वचनों को सुनकर भगवान नारायण ने साधू-साधू शब्दों से आप कुछ पुछ रहे हैं, उसके लिये मैं आपको एक सनातन व्रत बतलाता हूँ |’
भगवान् नारायण सत्ययुग और त्रेतायुग में विष्णुस्वरूप में फल प्रदान करते हैं और द्वापर में अनेक रूप धारणकर फल देते हैं, परन्तु कलियुग में सर्वव्यापक भगवान् सत्यनारायण प्रत्यक्ष फल देते हैं, क्योंकि धर्म के चार पाद हैं – सत्य, शौच, तप और दान | इनमें सत्य ही प्रधान धर्म है | सत्यपर ही लोकका व्यवहार टिका है और सत्यमें ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है, इसलिये सत्यस्वरूप भगवान् सत्यनारायण का व्रत परम श्रेष्ठ कहा गया है |’
नारदजी ने पुन: पूछा – भगवन ! सत्यनारायण की पूजा का क्या फल है और इसकी क्या विधि है ? देव ! कृपासागर ! सभी बातें अनुग्रहपूर्वक मुझे बतायें |
श्रीभगवान बोले – नारद ! सत्यनारायण की पूजा का फल एवं विधि चतुर्मुख ब्रह्मा भी बतलाने में समर्थ नहीं हैं, किन्तु संक्षेप में मैं उसका फल तथा विधि बतला रहा हूँ, आप सुने –
सत्यनारायण के व्रत एवं पूजन से निर्धन व्यक्ति धनाढय और पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान हो जाता है | राज्यच्युत व्यक्ति राज्य प्राप्त कर लेता हैं, दृष्टिहीन व्यक्ति दृष्टिसम्पन्न हो जाता हैं, बंदी बंधनमुक्त हो जाता है और भयार्त व्यक्ति निर्भय हो जाता है | अधिक क्या ? व्यक्ति जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसे वह सब प्राप्त हो जाती है | इसलिए मुने ! मनुष्य-जन्म में भक्तिपूर्वक सत्यनारायण की अवश्य आराधना करनी चाहिये | इससे वह अपने अभिलाषित वस्तुको नि:संदेह शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है |
इस सत्यनारायण व्रत के करनेवाले व्रती को चाहिये कि वह प्रात: दंतधावनपूर्वक स्नानकर पवित्र हो जाय | हाथमे तुलसी-मंजरी को लेकर सत्य में प्रतिष्ठित भगवान् श्रीहरि का इस प्रकार ध्यान करे –
नारायणं सान्द्रधनावदातं चतुर्भुजं पीतमहार्हवाससम |
प्रसन्नवक्त्रं नवकश्वलोचनं सनन्दनाद्यैरूपसेवितं भजे ||
करोमि ते व्रतं देव सायंकाले त्वदर्चनम |
श्रुत्वा गाथां त्वदीयां हि प्रसादं ते भजाम्यहम || (प्रतिसर्गवर्ग २/२४.२६-२७)
‘सघन मेघ के समान अत्यंत निर्मल, चतुर्भुज, अति श्रेष्ठ पीले वस्त्र को धारण करनेवाले, प्रसन्नमुख, नवीन कमल के समान नेत्रवाले, सनक-सनन्दनादि से उपसेवित भगवान नारायण का मैं सतत चिंतन करता हूँ | देव ! मैं आपके सत्यस्वरूप को धारणकर सायंकाल में आपकी पूजा करूँगा | आपके रमणीय चरित्र को सुनकर आपके प्रसाद अर्थात आपकी प्रसन्नता का मैं सेवन करूँगा |’
इसप्रकार मनमें संकल्पकर सायंकाल में विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायण की पूजा करनी चाहिये | पूजा में पाँच कलश रखने चाहिये | कदली-स्तम्भ और वंदनवार लगाने चाहिये | स्वर्णमंडित भगवान् शालग्राम को पुरुषसूक्त (यजू.३१/१/१-१६) द्वारा पंचामृत आदिसे भलिभाँति स्नान कराकर चन्दन आदि अनेक उपचारों से भक्तिपूर्वक उनकी अर्चना करनी चाहिये | अनन्तर भगवान् को निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए प्रणाम करना चाहिये –
नमो भगवते नित्यं सत्यदेवाय धीमहि |
चतु:पदार्थदात्रे च नमस्तुभ्यं नमो नम: || (प्रतिसर्गपर्व २/२४/३०)
‘षडैश्वर्यरूप भगवान् सत्यदेव को नमस्कार है, मैं आपका सदा ध्यान करता हूँ | आप धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इस चतुर्विध पुरुषार्थ को प्रदान करनेवाले है, आपको बार-बार नमस्कार है |’
इस मन्त्र का यथाशक्ति जपकर १०८ बार हवन करे | उसके दशांश से तर्पण तथा उसके दशांश से मार्जन कर भगवान् की कथा को सुनना चाहिये, जो छ: अध्यायों में उपनिबद्ध है | भगवान् की इस कथा में सत्य-धर्म की ही मुख्यता है | कथा-श्रवण के अनन्तर भगवान् के प्रसाद को चार भागों में विभक्तकर उसे भलीभाँति वितरण करे | प्रथम भाग आचार्य को दे, द्वितीय भाग अपने कुटुम्ब को, तृतीय भाग श्रोताओं को और चतुर्थ भाग अपने लिये रखे | तत्पश्च्यात ब्राह्मणों को भोजन कराये एवं स्वयं भी मौन होकर भोजन करे | देवर्षे ! इस विधिसे सत्यनारायण की पूजा करनेवाला व्रती सभी अभीष्ट कामनाओं को इसी जन्म में प्राप्त इसी जन्म में प्राप्त कर लेता है | इस जन्म में किये गये पुण्यफल को दुसरे जन्म में भोगा जाता है और दुसरे जन्म में किये गये कर्मो का फल मनुष्य को यहाँ भोगना पड़ता है | श्रद्धापूर्वक किया गया सत्यनारायण का व्रत सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला होता है |
नारदजी ने कहा – भगवन ! आज ही आपकी आज्ञा से भूमंडल में इस सत्यदेव-व्रत को मैं प्रतिष्ठित करूँगा | यह कहकर नारदजी तो पृथ्वीपर व्रत का प्रचार करने चले गये और भगवान् नारायणदेव अन्तर्धान हो काशीपूरी में चले गये |
इसीप्रकार प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खंड का ‘सत्यनारायणव्रत – कथा’ का प्रथम अध्याय पूरा हुआ |
– हरि ॐ हरि ॐ –

                     द्वितीय अध्याय
                   
सत्यनारायण व्रत-कथा में शतानन्द ब्राह्मण की कथा
सूतजी बोले – ऋषियों ! भगवान् नारायण ने स्वयं कृपापूर्वक देवर्षि नारदजीद्वारा जिस प्रकार इस व्रतका प्रचार किया, अब मैं उस कथा को कहता हूँ, आप लोग सुने –
लोकप्रसिद्ध काशी नगरी में एक श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण रहते थे, जो विष्णु-व्रतपरायण थे, वे गृहस्थ थे, दीन थे तथा स्त्री-पुत्रवान थे | वे भिक्षा-वृत्तिसे अपना जीवन-यापन करते थे | उनका नाम शतानंद था | एल समय वे भिक्षा माँगने के लिए जा रहे थे | उन विनीत एवं अतिशय शांत शतानंद को मार्ग में एक वृद्ध ब्राह्मण दिखायी दिये, जो साक्षात हरि ही थे | उन वृद्ध ब्राह्मणवेषधारी श्रीहरि ने ब्राह्मण शतानंद से पूछा –‘द्विजश्रेष्ठ ! आप किस निमित्त से कहा जा रहे है ?’ शतानंद बोले –‘सौम्य ! अपने पुत्र-कलत्रादि के भरण-पोषण के लिये धन-याचना की कामना से मैं धनिकों के पास जा रहा हूँ |’
नारायण ने कहा – द्विज ! निर्धनता के कारण आपने दीर्घकाल से भिक्षा-वृत्ति अपना रखी है, इसकी निवृत्ति के लिये सत्यनारायणव्रत कलियुग में सर्वोत्तम उपाय है | इसलिए मेरे कथन के अनुसार आप कमलनेत्र भगवान् सत्यनारायण के चरणों की शरण-ग्रहण करें, इससे दारिद्र्य, शोक और सभी संतापों का विनाश होता है और मोक्ष भी प्राप्त होता है |
करुणामूर्ति भगवान् के इन वचनों को सुनकर ब्राह्मण शतानंद ने पूछा – ‘ये सत्यनारायण कौन है ?’
ब्राह्मणरूपधारी भगवान् बोले – नानारूप धारण करनेवाले, सत्यव्रत, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले तथा निरंजन वे देव इस समय विप्र का रूप धारणकर तुम्हारे सामने आये है | इस महान दुःखरूपी संसार-सागर में पड़े हुए प्राणियों को तारने के लिये भगवान् के चरण नौकारूप है | जो बुद्धिमान व्यक्ति है, वे भगवान् की शरण में जाते है, किन्तु विषयों से व्याप्त विषयबुद्धिवाले व्यक्ति भगवान की शरण में न जाकर इसी संसार-सागर में पड़े रहते हैं |
दु:खोदधिनिम्ग्राना तरणिश्वरणौ हरे: |
कुशला: शरणं यान्ति नेतरे विषयत्मिका: || (प्रतिसर्गपर्व -२/२५/१०)
इसलिये द्विज ! संसार के कल्याण के लिये विविध उपचारों से भगवान् सत्यनारायण देवकी पूजा, आराधना तथा ध्यान करते हुए तुम इस व्रत को प्रकाश में लाओ |
विप्र्रूपधारी भगवान् के ऐसा कहते ही उस ब्राह्मण शतानंद ने मेघों के समान नीलवर्ण, सुंदर चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा तथा पद्म लिये हुए और पीताम्बर धारण किये हुए, नवीन विकसित कमल के समान नेत्रवाले तथा मंद-मंद मधुर मुसकानवाले, वनमालायुक्त और भौरों के द्वारा चुम्बित चरण-कमलवाले पुरुषोत्तम भगवान् नारायण के साक्षात दर्शन किये |
भगवान् की वाणी सुनने और उनका प्रत्यक्ष दर्शन करनेसे उस विप्र के सभी अंग पुलकित हो उठे, आँखों में प्रेमाश्रु भर आये | उसने भूमिपर गिरकर भगवान को साष्टांग प्राणं किया और गदगद वाणी से वह उनकी इसप्रकार स्तुति करने लगा –
संसार के स्वामी, जगत के कारण के भी कारण, अनाथों के नाथ, कल्याण-मंगल को देनेवाले, शरण देनेवाले, पुण्यरूप, पवित्र, अव्यक्त तथा व्यक्त होनेवाले और आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार के तापों का समूल उच्छेद करनेवाले भगवान् सत्यनारायण को मैं प्रणाम करता हूँ | इस संसार के रचयिता सत्यनारायणदेव को नमस्कार है तथा विश्व का विनाश करनेवाले कराल महाकालस्वरुप को नमस्कार है | सम्पूर्ण संसार का मंगल करनेवाले आत्ममूर्तिस्वरुप हे भगवन ! आपको नमस्कार है | आज मैं धन्य हो गया, पुण्यवान हो गया, आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, जो कि मन-वाणी से अगम-अगोचर आपका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन हुआ | मैं अपने भाग्य की क्या सराहना करूँ | न जाने मेरे किस पुण्यकर्म का यह फल था, जो मुझे आपके दर्शन हुए | प्रभो ! आपने क्रियाहीन इस मंद-बुद्धि के शरीर को सफल कर दिया |
प्रणमामि जगन्नाथं जगत्कारणकारणम् | अनाथनाथं शिवदं शरण्यमनघं शुचिम ||
अव्यक्तं व्यक्ततां यातं तापत्रयाविमोचनम ||
नम: सत्यनारायणायास्य कर्त्रे नम: शुद्धसत्वाय विश्वस्य भर्त्रे |
करालाय कालाय विश्वस्व हर्त्रे नमस्ते जगन्मगंलायात्मधुर्ते ||
लोकनाथ ! रमापते ! किस विधि से भगवान् सत्यनारायण का पूजन करना चाहिये, विभो ! कृपाकर उसे भी आप बताएं | संसार को मोहित करनेवाले भगवान नारायण मधुर वाणी में बोले –‘विपेंद्र ! मेरी पूजामें बहुत अधिक धन की आवश्यकता नहीं, अनायास जो धन प्राप्त हो जाय, उसीसे श्रध्दापूर्वक मेरा यजन करना चाहिये | जिस प्रकार मेरी स्तुति से, स्मृति से ग्राह-ग्रस्त गजेन्द्र, अजामिल संकट से मुक्त हो गये, इसीप्रकार इस व्रत के आश्रय से मनुष्य तत्काल क्लेशमुक्त हो जाता है | इस व्रत की विधि को सुने –
अभीष्ट कामना की सिद्धि के लिये पूजा की सामग्री एकत्रकर विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायण की पूजा करनी चाहिये | सवा सेर के लगभग गोधूम-चूर्ण में दूध और शक्कर मिलाकर, उस चूर्ण को घृत से युक्तकर हरि को निवेदित करना चाहिये, यह भगवान् को अत्यंत प्रिय है | पंचामृत के द्वारा भगवान् शालग्राम को स्नान कराकर गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य तथा ताम्बुलादि उपचारों से मंत्रोद्वारा उनकी अर्चना करनी चाहिये | अनेक मिष्टान्न तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थो एवं ऋतुकालोभ्दुत विविध फलों तथा फूलों से भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये | फिर ब्राह्मणों तथा स्वजनों के साथ मेरी कथा, राजा (तुंगध्वज) के इतिहास, भीलों की और वणिक (साधू) की कथा को आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिये | कथा के अनन्तर भक्तिपूर्वक सत्यदेव को प्रणामकर प्रसाद का वितरण करना चाहिये | तदनंतर भोजन करना चाहिये | मेरी प्रसन्नता द्रव्यादि से नहीं, अपितु श्रद्धा-भक्ति से ही होती है |
विपेंद्र ! इस प्रकार जो विधिपूर्वक पूजा कहते है, वे पुत्र-पौत्र तथा धन-सम्पत्ति से युक्त होकर श्रेष्ठ भोगों का उपभोग करते है और अंत में मेरा सांनिध्य प्राप्त कर मेरे साथ आनंदपूर्वक रहते है | व्रती जो-जो कामना करता है, वह उसे अवश्य ही प्राप्त हो जाती है |
इतना कहकर भगवान अन्तर्धान हो गये और वे ब्राह्मण भी अत्यंत प्रसन्न हो गये | मन-ही-मन उन्हें प्रणाम कर वे भिक्षा के लिये नगर की ओर चले गये और उन्होंने मनमें यह निश्चय किया कि ‘आज भिक्षा में जो धन मुझे प्राप्त होगा, मैं उससे भगवान् सत्यनारायण की पूजा करूँगा |’
उस दिन अनायास बिना माँगे ही उन्हें प्रचुर धन प्राप्त हो गया | वे आश्चर्यचकित हो अपने घर आये | उन्होंने सारा वृतांत अपनी धर्मपत्नी को बताया | उसने भी सत्यनारायण के व्रत-पूजा का अनुमोदन किया | वह पति की आज्ञा से श्रद्धापूर्वक बाजार से पूजा की सभी सामग्रियों को ले आयी और अपने बंधू-बांधवों तथा पड़ोसियों को भगवान् सत्यनारायण की पूजा में सम्मिलित होने के लिये बुला ले आयी | अनन्तर शतानंद ने भक्तिपूर्वक भगवान् की पूजा की | कथा की समाप्तिपर प्रसन्न होकर उनकी कामनाओं को पूर्ण करने के उद्देश्य से भक्तवत्सल भगवान् सत्यनारायणदेव प्रकट हो गये | उनका दर्शनकर ब्राह्मण शतानंद ने भगवान् से इस लोक में तथा परलोक में सुख तथा पराभक्ति की याचना की और कहा – ‘हे भगवन ! आप मुझे अपना दास बना लें |’ भगवान् भी ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्धान हो गये | यह देखकर कथा में आये सभी जन अत्यंत विस्मित हो गये और ब्राह्मण भी कृतकृत्य हो गया | वे सभी भगवान् को दंडवत प्रणामकर आदरपूर्वक प्रसाद ग्रहणकर ‘यह ब्राह्मण धन्य है, धन्य है’ इसप्रकार कहते हुए अपने-अपने घर चले गये | तभीसे लोक में यह प्रचार हो गया कि भगवान सत्यनारायण का व्रत अभीष्ट कामनाओं की सिद्धि प्रदान करनेवाला, क्लेशनाशक और भोग-मोक्ष को प्रदान करनेवाला है |
इसीप्रकार प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खंड का ‘सत्यनारायणव्रत – कथा’ का द्वितीय अध्याय पूरा हुआ |
– हरि ॐ हरि ॐ –

                            तृतीय अध्याय
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सत्यनारायण व्रत – कथा में राजा चन्द्रचूड का आख्यान
सूतजी बोले – ऋषियों ! प्राचीन काल में केदारखंड के मणिपुरक नामका नगर में चन्द्रचूड नामक एक धार्मिक तथा प्रजावत्सल राजा रहते थे | वे अत्यंत शांत-स्वभाव, मृदुभाषी, धीर-प्रकृति तथा भगवान् नारायण के भक्त थे | विन्धदेश के म्लेच्छगण उनके शत्रु हो गये | उस राजा का उन म्लेच्छों से अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा भयानक युद्ध हुआ | उस युद्ध में राजा चन्द्रचूड की विशाल चतुरंगिनी सेना अधिक नष्ट हुई, किन्तु कूट-युद्ध में निपुण मेल्छों की सेना की क्षति बहुत कम हुई | युद्ध में दम्भी म्लेच्छों से परास्त होकर राजा चन्द्रचूड अपना राष्ट्र छोडकर अकेले ही वन में चले गये | तीर्थाटन के बहाने इधर-उधर घूमते हुए वे काशीपुरी में पहुंचे | वहाँ उन्होंने देखा कि घर-घर सत्यनारायण की पूजा हो रही है और यह कशी नगरी द्वारका के समान ही भव्य एवं समृद्धिशाली हो गयी है |
वहाँ की समृद्धि देखकर चन्द्रचूड विस्मित हो गये और उन्होंने सदानंद (शतानंद) ब्राह्मण के द्वारा की गयी सत्यनारायण-पूजा की प्रसिद्धि भी सुनी, जिसके अनुसरण से सभी शील एवं धर्म से समृद्ध हो गये थे | राजा चन्द्रचूड भगवान् सत्यनारायण की पूजा करनेवाले ब्राह्मण सदानंद (शतानंद) के पास गये और उनके चरणोंपर गिरकर उनसे सत्यनारायण-पूजा की विधि पूछी तथा अपने राज्यभ्रष्ट होने की कथा भी बतलायी और कहा- ‘ब्रह्मन ! लक्ष्मीपति भगवान जनार्दन जिस व्रतसे प्रसन्न होते है, पाप के नाश करनेवाले उस व्रत को बतलाकर आप मेरा उद्धार करें |’
सदानंद (शतानंद) ने कहा – राजन ! श्रीपति भगवान को प्रसन्न करनेवाला सत्यनारायण नामक एक श्रेष्ठ व्रत हैं, जो समस्त दुःख-शोकादिका शामक, धन-धान्य का प्रवर्धक, सौभाग्य और सन्तति का प्रदाता तथा सर्वत्र विजय-प्रदायक है | राजन ! जिस किसी भी दिन प्रदोषकाल में इनके पूजन आदि का आयोजन करना चाहिये | कदलीदल के स्तभों से मंडित, तोरणों से अलंकृत एक मंडप की रचनाकार उसमें पाँच कलशों की स्थापना करनी चाहिये और पाँच ध्वजाएँ भी लगानी चाहिये | व्रती को चाहिये कि उस मंडप के मध्य में ब्राह्मणों के द्वारा एक रमणीय वेदिका की रचना करवाये | उसके ऊपर स्वर्ण से मंडित शिलारूप भगवान नारायण (शालग्राम) को स्थापित कर प्रेम-भक्तिपूर्वक चन्दन, पुष्प आदि उपचारों से उनकी पूजा करे | भगवान् का ध्यान करते हुए भूमिपर शयनकर सात रात्रि व्यतीत करे |
यह सुनकर राजा चन्द्रचूडने काशीमें ही भगवान् सत्यनारायण की शीघ्र ही पूजा की | प्रसन्न होकर रात्रि में भगवान् ने राजा को एक उत्तम तलवार-प्रदान की | शत्रुओं को नष्ट करनेवाली तलवार प्राप्त कर राजा ब्राह्मणश्रेष्ठ सदानंद को प्रणाम कर अपने नगर में आ गये तथा छ: हजार म्लेच्छ दस्युओं को मारकर उनसे अपार धन प्राप्त किया और नर्मदा के मनोहर तटपर पुन: भगवान् श्रीहरि की पूजा की | वे राजा प्रत्येक मासकी पूर्णिमा को प्रेम और भक्तिपूर्वक विधि-विधान से भगवान् सत्यदेव की पूजा करने लगे | उस व्रत के प्रभाव से वे लाखों ग्रामों के अधिपति हो गये और साथ वर्षतक राज्य करते हुए अन्तमें उन्होंने विष्णुलोक को प्राप्त किया |
इसीप्रकार प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खंड का ‘सत्यनारायणव्रत – कथा’ का तृतीय अध्याय पूरा हुआ |
– हरि ॐ हरि ॐ –
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                          चतुर्थ अध्याय
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सत्यनारायण-व्रत के प्रसंग में लकड़हारों की कथा
सूतजी बोले – ऋषियों ! अब इस सम्बन्ध में सत्यनारायण-व्रत के अचारण से कृतकृत्य हुआ भिल्लों की कथा सुनें | एक समय की बात है, कुछ निषादगण वनसे लकडियाँ काटकर नगर में लाकर बेचा करते थे | उनमें से कुछ निषाद काशीपुरी में लकड़ी बेचने आये | उन्हींमें से एक बहुत प्यासा लकड़हारा विष्णुदास (शतानंद) के आश्रम में गया | वहाँ उसने जल पिया और देखा कि ब्राह्मणलोग भगवान् की पूजा कर रहे हैं | भिक्षुक शतानंद का वैभव देखकर वह चकित हो गया और सोचने लगा – ‘इतने दरिद्र ब्राह्मण के पास यह अपार वैभव कहाँ से आ गया ? इसे तो आजतक मैंने अकिंचन ही देखा था | आज यह इतना महान धनी कैसे हो गया ? इसपर उसने पूछा –‘ महाराज ! आपको यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हुआ और आपको निर्धनता से मुक्ति कैसे मिली ? यह बताने का कष्ट करें, मैं सुनना चाहता हूँ |’
शतानंद ने कहा – भाई ! यह सब सत्यनारायण की आराधना का फल है, उनकी आराधना से क्या नहीं होता | भगवान् सत्यनारायण की अनुकम्पा के बिना किंचित भी सुख प्राप्त नहीं होता |
निषाद ने उनसे पूछा – महाराज ! सत्यनारायण भगवान् का क्या माहात्म्य है ? इस व्रत की विधि क्या है ? आप उनकी पूजा के सभी उपचारों का वर्णन करें, क्योंकि उपकार-परायण संत-महात्मा अपने हृदय में सबके लिये समान भाव रखते हैं, किसीसे कोई कल्याणकारी बात नहीं छिपाते |
साधुनां समधितानामुपकारव्रतां सताम | न गोप्यं विद्यते किंचिदार्तानामार्तिनाशनम || (प्रतिसर्गवर्ग -२/२७/८)
शतानंद बोले – एक समयकी बात है, केदारक्षेत्र के मणिपुरक नगर में रहनेवाले राजा चन्द्रचूड मेरे आश्रम में आये और उन्होंने मुझसे भगवान सत्यनारायण-व्रत-कथा के विधान को पूछा | हे निषादपुत्र ! इसपर मैंने जो उन्हें बताया था, उसे तुम सुनो –
सकाम भाव से अथवा निष्कामभाव से किसी भी प्रकार भगवान् की पूजा का मन में संकल्पकर उनकी पूजा करनी चाहिये | सवा सेर गोधूम के चूर्ण को मधु तथा सुगन्धित घृत से संस्कृतकर नैवेद्य के रूप में भगवान् को अर्पण करना चाहिये | भगवान् सत्यनारायण (शालग्राम) को पंचामृत से स्नान कराकर चंदन आदि उपचारों से उनकी पूजा करनी चाहिये | पायस, अपूप, संयाव, दधि, दुग्ध, ऋतुफल, पुष्प, धुप, दीप तथा नैवेद्य आदि से भक्तिपूर्वक भगवान् की पूजा करनी चाहिये | यदि वैभव रहे तो और अधिक उत्साह एवं समारोह से पूजा करनी चाहिये | भगवान् भक्ति से जितना प्रसन्न होते है, उतना विपुल द्रव्यों से प्रसन्न नहीं होते | भगवान् सम्पूर्ण विश्व के स्वामी एवं आप्तकाम है, उन्हें किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं, केवल भक्तों के द्वारा श्रद्धा से अर्पित की हुई वस्तुको वे ग्रहण करते है | इसलिए दुर्योधन से द्वारा की जानेवाली राजपुजा को छोडकर भगवान् विदुरजी के आश्रम में आकर शाक-भाजी और पूजा को ग्रहण किया | सुदामा के तण्डुल-कण को स्वीकार कर भगवान् ने उन्हें मनुष्य के लिये सर्वथा दुर्लभ सम्पत्तियाँ प्रदान कर दीं | भगवान् केवल प्रीतिपूर्वक भक्ति की ही अपेक्षा करते है | गोप, गृध्र, वणिक, व्याध, हनुमान, विभीषण के अतिरिक्त अन्य वृत्रासुर आदि दैत्य भी नारायण के सानिध्य को प्राप्त कर उनके अनुग्रह से आज भी आनंदपूर्वक रह रहे है |
न तुष्येदद्रव्यसम्भारैर्भकत्या केवलया यथा | भगवान् परित: पूर्णो न मानं वृणुयात क्वचित ||
दुर्योधनकृतां त्वक्त्वा राजपूजां जनार्दन: | विदुरस्वाश्रमे वासमातिथ्यं जगृहे विभु: ||
सुदाम्न्स्तडुलकणा जग्ध्वा मानुष्यदुर्लभा: | सम्पदोऽदाद्धरि: प्रीत्पा भक्तिमात्रमपेक्ष्यते ||
गोपो गृधो वनिग्व्याधो हनुमान सविभीषण: | येन्ये पापात्मका दैत्या वृत्रकायाधवाद्य: ||
नारायणान्तिकं प्राप्य मोदतेदयापि यव्द्शा: | (प्रतिसर्गपर्व २/२७/१५४-१९)
निषादपुत्र ! मेरी बात सुनकर उस राजा चन्द्रचुड ने पूजा-सामग्रियों को एकत्रितकर आदरपूर्वक भगवान की पूजा की; फलस्वरूप वे अपना नष्ट हुआ द्रव्य प्राप्तकर आज भी आनंदित हो रहे है | इसलिये तुम भी भक्तिसे सत्यनारायण लो उपासना करो | इससे तुम इस लोकमें सुख को प्राप्त कर अंत में भगवान् विष्णु का सानिध्य प्राप्त करोगे |
यह सुनकर वह निषाद कृतकृत्य हो गया | विप्रश्रेष्ठ शतानंद को प्रणाम कर अपने घर जाकर उसने अपने साथियों को भी हरि-सेवा का माहात्म्य बताया | उन सबने भी प्रसन्नचित्त हो श्रद्धापूर्वक यह प्रतिज्ञा की कि आज काष्ठ को बेचकर हमलोगों को जितना धन प्राप्त होगा उससे अपने सभी बन्धु-बांधवों के साथ श्रद्धा एवं विधिपूर्वक हम सत्य-नारायण की पूजा करेंगे | उस दिन उन्हें काष्ठ बेचने से पहलेकी अपेक्षा चौगुना धन मिला | घर आकर उन सबने सारी बात स्त्रियों को बतायी और फिर सबने मिलकर आदरपूर्वक भगवान् सत्यनारायण की पूजा की और कथा का श्रवण किया तथा भक्तिपूर्वक भगवान् का प्रसाद सबको वितरितकर स्वयं भी ग्रहण किया | पूजा के प्रभाव से पुत्र, पत्नी आदिसे समन्वित निषादगणों ने पृथ्वीपर द्रव्य और श्रेष्ठ ज्ञान-दृष्टी को प्राप्त किया | द्विजश्रेष्ठ ! उन सबने यथेष्ट भोगो का उपभोग किया और अंत में वे सभी योगीजनों के लिये भी दुर्लभ वैष्णवधाम को प्राप्त हुए |
इसीप्रकार प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खंड का ‘सत्यनारायणव्रत – कथा’ का चतुर्थ अध्याय पूरा हुआ |
हरि ॐ हरि ॐ
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                        पंचम अध्याय
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सत्यनारायण-व्रत के प्रसंग में साधू वणिक एवं जामाता की कथा
सूतजी बोले – ऋषियों ! अब मैं एक साधू वणिक की कथा कहता हूँ | एक बार भगवान् सत्यनारायण का भक्त मणिपूरक नगर का स्वामी महायशस्वी राजा चन्द्रचूड अपनी प्रजाओं के साथ व्रतपूर्वक सत्यनारायण भगवान् का पूजन कर रहा था, उसीसमय रतनपुर (रत्नसारपुर) निवासी महाधनी साधू वणिक अपनी नौका को धन से परिपूर्ण कर नदी-तट से यात्रा करता हुआ वहाँ आ पहुँचा | वहाँ उसने अनेक ग्रामवासियोंसहित मणि-मुक्ता से निर्मित तथा श्रेष्ठ वितानादी से विभूषित पूजन-मंडप को देखा, गीत-वाद्य आदि की ध्वनी तथा वेदध्वनि भी वहाँ उसे सुनायी पड़ी | उस रम्य स्थान को देखकर साधू वणिकने अपने नाविक को आदेश दिया कि यहींपर नौका रोक दो | मैं यहाँ के आयोजन को देखना चाहता हूँ | इसपर नाविक ने वैसा ही किया | नावसे उतरकर उस वणिक ने लोगों से जानकारी प्राप्त की और वह सत्यनारायण भगवान् की कथा-मंडप में गया तथा वहाँ उसने उन सभीसे पूछा – ‘महाशय ! आपलोग यह कौन-सा पुण्यकार्य कर रहे हैं ?’ इसपर उन लोगों ने कहा – ‘हमलोग अपने माननीय राजाके साथ भगवान् सत्यनारायण की पूजा कथा का आयोजन कर रहे है | इसी व्रत के अनुष्ठान से इन्हें निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ है | भगवान् सत्यनारायण की पूजा से धन की कामनावाला द्रव्य-लाभ, पुत्र की कामनावाला उत्तम पुत्र, ज्ञान की कामनावाला ज्ञान-दृष्टि प्राप्त करता है और भयातुर मनुष्य सर्वथा निर्भय हो जाता है | इनकी पूजासे मनुष्य अपनी सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है |’
यह सुनकर उसने गलेमें वस्त्र को कई बार लपेटकर भगवान् सत्यनारायण को दंडवत प्रणाम कर सभासदों को भी सादर प्रणाम किया और कहा –‘ भगवान ! मैं सन्ततिहीन हूँ, अत: मेरा सारा ऐश्वर्य तथा सारा उद्यम सभी व्र्यर्थ है, हे कृपासागर ! यदि आपकी कृपा से पुत्र या कन्या मैं प्राप्त करूँगा तो स्वर्णमयी पताका बनाकर आपकी पूजा करूँगा |’ इसपर सभासदों ने कहा – ‘आपकी कामना पूर्ण हो |’ तदनन्तर उसने भगवान् सत्यनारायण एवं सभासदों को पुन: प्रणामकर प्रसाद ग्रहण किया और हृदय से भगवान् का चिन्तन करता हुआ वह साधू वणिक सबके साथ अपने घर गया | घर आनेपर मांगलिक द्रव्यों से स्त्रियों ने उसका यथोचित स्वागत किया | साधू वणिक अतिशय आश्चर्य के साथ मगंलमय अंत:पुर में गया | उसकी पतिव्रता पत्नी लीलावती ने भी उसकी स्त्रियोचित सेवा की | भगवान् सत्यनारायण की कृपा से समय आनेपर बंधू-बांधवों को आनंदित करनेवाली तथा कमल के समान नेत्रोंवाली उसे एक कन्या उत्पन्न हुई | इससे साधू वणिक अतिशय आनंदित हुआ और उस समय उसने पर्याप्त धन का दान किया | वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलाकर उसने कन्या के जातकर्म और मंगलकृत्य सम्पन्न किये | उस बालिका की जन्मकुंडली बनवाकर उसका नाम कलावती रखा | कलानिधि चन्दमा की कला के समान वह कलावती नित्य बढने लगी | आठ वर्षकी बालिका गौरी, नौ वर्षकी रोहिणी, दस वर्ष की कन्या तथा उसके आगे बारह वर्ष की बालिका प्रौढ़ा या रजस्वला कहलाती है |
अष्टवर्षा, भ्रवेदगौरी नववर्षा च रोहिणी ||
दशवर्षा भवेत कन्या तत: प्रौढ़ा रजस्वला || (प्रतिसर्गपर्व – २/२८/२१-२२)
समयानुसार कलावती भी बढ़ते-बढ़ते विवाह के योग्य हो गयी | उसका पिता कलावती को विवाह-योग्य जानकर उसके सम्बन्ध की चिंता करने लगा |
कांचनपुर नगर में एक शंखपति नामका वणिक रहता था | वह कुलीन, रूपवान, सम्पतिशाली, शील और उदारता आदि गुणों से सम्पन्न था | अपनी पुत्री के योग्य उस वर को देखकर साधू वणिक ने शंखपति का वरण कर लिया और शुभ लग्न में अनेक मांगलिक उपचारों के साथ अग्नि के सानिध्य में वेद, वाद्य आदि ध्वनियों के साथ यथाविधि कन्या उसे प्रदान कर दी, साथ ही मणि, मोती, मूँगा, वस्त्राभूषण आदि भी उस साधू वणिक ने मंगल के लिये अपनी पुत्री एवं जामाता को प्रदान किये | साधू वणिक अपने दामाद को अपने घर में रखकर उसे पुत्र के समान मानता था और वह भी पिता के समान साधू वणिक का आदर करता था | इसप्रकार बहुत समय बीत गया | साधू वणिक ने भगवान् सत्यनारायण की पूजा करनेका पहले यह संकल्प लिया था कि ‘सन्तान प्राप्त होनेपर मैं भगवान् सत्यनारायण की पूजा करूँगा’ पर वह इस बात को भूल ही गया | उसने पूजा नहीं की |
कुछ दिनों के बाद वह अपने जामाता के साथ व्यापार के निमित्त सुदूर नर्मदा के दक्षिण तटपर गया और वहाँ व्यापारनिरत होकर बहुत दिनोंतक ठहरा रहा | पर वहाँ भी उसने सत्यदेव की किसीप्रकार भी उपासना नहीं की और परिणामस्वरुप भगवान् के प्रकोप का भाजन बनकर वह अनेक संकटों से ग्रस्त हो गया | एक समय कुछ चोरों ने एक निस्तब्ध रात्रि में वहाँ के राजमहल से बहुत-सा द्रव्य तथा मोती की मालाको चुरा लिया | राजने चोरी की बात ज्ञात होनेपर अपने राजपुरुषों को बुलाकर बहुत फटकारा और कहा कि ‘यदि तुमलोगोने चोरों का पता लगाकर सारा धन यहाँ दो दिनों में उपस्थित नहीं किया तो तुम्हारी असावधानी के लिये तुम्हें मृत्यु-दंड दिया जायगा |’ इसपर राजपुरुषों ने सर्वत्र व्यापक छान-बीन की, परन्तु बहुत प्रयत्न करनेपर भी वे उन चोरोंका पता नहीं लगा सके | फिर वे सभी एकत्रित होकर विचार करने लगे –‘ अहो ! बड़े कष्ट की बात है, चोर तो मिला नहीं, धन भी नहीं मिला, अब राजा हमलोगों को परिवार को साथ मार डालेगा | मरनेपर भी हमें प्रेत-योनि प्राप्त होगी | इसलिए अब तो यही श्रेयस्कर है कि ‘हमलोग पवित्र नर्मदा नदी में डूबकर मर जाये | क्योंकि नर्मदा के प्रभाव से हमें शिवलोक की प्राप्ति होगी |’ वे सभी राजपुरुष आपसमें ऐसा निश्चयकर नर्मदा नदी के तटपर गये | वहाँ उन्होंने उस साधू वणिक को देखा और उसके कंठ में मोती की माला भी देखी | उन्होंने उस साधू वणिक को ही चोर समझ लिया और वे सभी प्रसन्न होकर उन दोनों (साधू वणिक और उसके जामाता) को धनसहित पकड़कर राजा के पास ले आये | भगवान् सत्यनारायण भी पूजा करनेमें असत्यका आश्रय लेने के कारण वणिक के प्रतिकूल हो गये थे | इसीकारण राजाने भी विचार किये बिना ही अपने सेवकों को आदेश दिया कि इनकी सारी सम्पत्ति जब्त कर खजाने में जमा कर दो और इन्हें हथकड़ी लगाकर जेल में डाल दो | सेवकों ने राजाज्ञा का पालन किया | वणिक की बातोंपर किसीने कुछ भी ध्यान नहीं दिया | अपने जामाता के साथ वह वणिक अत्यंत दु:खित हुआ और विलाप करने लगा – ‘हा पुत्र ! मेरा धन अब कहाँ चला गया, मेरी पुत्री और पत्नी कहाँ है ? विधाता की प्रतिकूलता तो देखो | हम दुःख-सागर में निमग्र हो गये | अब इस संकट से हमें कौन पार करेगा ? मैंने धर्म एवं भगवान् के विरुद्ध आचरण किया | यह उन्हीं कर्मों का प्रभाव है |’ इस प्रकार विलाप करते हुए वे ससुर और जामाता कई दिनोंतक जेल में भीषण संताप का अनुभव करते रहे |
इसीप्रकार प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खंड का ‘सत्यनारायणव्रत – कथा’ का पंचम अध्याय पूरा हुआ |
हरि ॐ हरि ॐ
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                      षष्टम अध्याय
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सत्य-धर्म के आश्रय से सबका उद्धार
(लीलावती एवं कलावती की कथा)
सूतजी ने कहा– ऋषियों ! अध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक – इन तीनों तापों को हरण करनेवाले भगवान् विष्णु के मंगलमय चरित्र को जो सुनते है, वे सदा हरि के धाम में निवास करते है, किन्तु जो भगवान् का आश्रय नहीं ग्रहण करते- उन्हें विस्मृत कर देते हैं, उन्हें कष्टमय नरक प्राप्त होता है | भगवान् विष्णु की पत्नी का नाम कमला (लक्ष्मी) है | इनके चार पुत्र है – धर्म, यज्ञ, राजा और चोर | ये सभी लक्ष्मी-प्रिय है अर्थात ये लक्ष्मी की इच्छा करते है | ब्राह्मणों और अतिथियों को जो दान दिया जाता है, वह धर्म कहा जाता है, उसके लिये धन की आवश्यकता है | स्वाहा और स्वधा के द्वारा जो देवयज्ञ और पितृयज्ञ किया जाता है, वह यज्ञ कहा जाता है, उसमें भी धन की अपेक्षा होती है | धर्म और यज्ञ की रक्षा करनेवाला राजा कहलाता है, इसलिये राजाको भी लक्ष्मी – धनकी अपेक्षा रहती है | धर्म और यज्ञ को नष्ट करनेवाला चोर कहलाता है, वह भी धन की इच्छासे चोरी करता है | इसलिए ये चारों किसी-न-किसी रूपमें लक्ष्मी के किंकर है | परन्तु जहाँ सत्य रहता है, वहीँ धर्म रहता है और वहीँ लक्ष्मी भी स्थिर-रूपमें रहती है |
वह वणिक सत्य-धर्म से च्युत हो गया था (उसने सत्यनारायण का व्रत न कर प्रतिज्ञा-भंग की थी) इसीलिये राजाने उस वणिक के घरसे भी सारा धन हरण करवा लिया और घरमें चोरी भी हो गयी | बेचारी उसकी पत्नी लीलावती एवं पुत्री कलावती के साथ अपने वस्त्र-आभूषण तथा मकान बेचकर जैसे-तैसे जीवन-यापन करने लगी |
एक दिन उसकी कन्या कलावती भूख से व्याकुल होकर किसी ब्राह्मण के घर गयी और वहाँ इसने ब्राह्मण को भगवान् सत्यनारायण की पूजा करते हुए देखा | जगन्नाथ सत्यदेव की प्रार्थना करते हुए देखकर उसने भी भगवान् से प्रार्थना की- ‘हे सत्यनारायण देव ! मेरे पिता और पति यदि घरपर आ जायेंगे तो मैं भी आपकी पूजा करुँगी |’ उसकी बात सुनकर ब्राह्मणों ने कहा – ‘ऐसा ही होगा|’ इसप्रकार सुनकर ब्राह्मणों से आश्वासनयुक्त आशीर्वाद प्राप्त कर वह अपने घर वापस आ गयी | रात्रि में देरसे लौटने के कारण माताने उससे डाँटते हुए पूछा कि ‘बेटी ! इतनी राततक तुम कहाँ रही ?’ इसपर उसने उसे प्रसाद देते हुए सत्यनारायण के पूजा-वृतांत को बताया और कहा- ‘माँ ! मेंसे वहाँ सुना कि भगवान् सत्यनारायण कलियुग में प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं, उनकी पूजा मनुष्यगण सदा करते हैं | माँ ! मैं भी उनकी पूजा करना चाहती हूँ, तुम मुझे आज्ञा प्रदान करो | मेरे पिता और स्वामी अपने घर आ जायें, यही मेरी कामना है |’
रातमें ऐसा मनमें निश्चयकर प्रात: वह कलावती शीलपाल नामक एक वणिक के घरपर धन प्राप्त करने की इच्छासे गयी और उसने कहा –‘बंधो ! थोडा धन दें, जिससे मैं भगवान् सत्यनारायण की पूजा कर सकूँ |’ यह सुनकर शीलपाल ने उसे पाँच अशर्फियाँ दीं और कहा- ‘कलावती ! तुम्हारे पिता का कूचा ऋण शेष था, मैं उन्हें ही वापस कर रहा हूँ, इसे देकर आज मैं उऋण हो गया |’ यह कहकर शीलपाल गया-तीर्थ में श्राद्ध करने चला गया | कन्याने अपनी माँ लीलावती के साथ उस द्र्व्यसे कल्यानप्रद सत्यनारायण-व्रत का श्रद्धा-भक्तिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान किया | इससे सत्यनारायण भगवान् संतुष्ट हो गये |
उधर नर्मदा-तटवासी राजा अपने राजमहल में सो रहा था | रात्रि के अंतिम प्रहर में ब्राह्मण-वेशधारी भगवान् सत्यनारायण स्वप्न में उससे कहा –‘राजन ! तुम शीघ्र उठकर उन निद्रोष वणिकों को बन्धनमुक्त कर दो | वे दोनों बिना अपराध के ही बंदी बना लिये गये हैं | यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारा कल्याण नहीं होगा |’ इतना कहकर वे अन्तर्हित हो गये | राजा निद्रा से सहसा जग उठा | वह परमात्माका स्मरण करने लगा | प्रात:काल राजा अपनी सभामें आया और उसने अपने मंत्री से देखे गये स्वप्न का फल पूछा | महामंत्री ने भी राजासे कहा –‘राजन ! बड़े आश्चर्य की बात हैं, मुझे भी आज ऐसा ही स्वप्न दिखलायी पड़ा | अत: उस वणिक और उसके जामाता को बुलाकर पूछ-ताछ कर लेनी चाहिये |’ राजाने उन दोनों को बंदी-गृह से बुलवाया और पूछा- ‘तुम दोनों कहाँ रहते हो और तुम कौन हो ?’ इसपर साधू वणिकने कहा – ‘राजन ! मैं रत्नपुर का निवासी एक वणिक हूँ | मैं व्यापार करनेके लिये यहाँ आया था | पर दैववश आपके सेवकों ने हमें चोर समझकर पकड़ लिया | साथ में यह मेरा जामाता है | बिना अपराध के ही हमें मणि-मुक्ता की चोरी लगी है | राजेन्द्र ! हम दोनों चोर नहीं है | आप भलीभाँति विचार कर लें |’ उसकी बातें सुनकर राजाको बड़ा पश्च्याताप हुआ | उन्होंने उन्हें बंधनमुक्त कराया | अनेक प्रकारसे उन्हें अलंकृत कर भोजन कराया और वस्त्र, आभूषण आदि देकर उनका सम्मान किया | साधू वणिक कहा – ‘राजन ! मैंने कारागार में अनेक कष्ट भोगे हैं, अब मैं अपने नगर जाना चाहता हूँ, आप मुझे आज्ञा दें |’ इसपर राजाने कोषाध्यक्ष के माध्यम से साधू वणिक की नौका रत्नों आदि से परिपूर्ण करवा दी | फिर वह साधू वणिक अपने जामाता के साथ राजाद्वारा सम्मानित हो द्विगुणित धन लेकर रत्नपुर की ओर चला |
साधू वणिक ने अपने नगर के लिये प्रस्थान किया, पर भगवान् सत्यनारायण का पूजन वह उससमय भी भूल गया | भगवान् सत्यदेव ने जो कलियुग में तत्काल फल देते हैं, पुन: तपस्वी का रूप धारणकर वहाँ आकर उससे पुछा- ‘साधो ! तुम्हारी इस नौका में क्या है ?’ इसपर साधू वणिक ने उत्तर दिया – ‘आपको देने के लिये कुछ भी धन मेरे पास नहीं हैं | नाव में केवल कुछ लताओं के पत्ते भरे पड़े है |’ साधू वणिक के ऐसा कह्नेपर तपस्वी ने कहा – ‘ऐसा ही होगा |’ इतना कहकर तपस्वी अन्तर्धान हो गये | उनके ऐसा कहते ही नौका में धन के बदले केवल पत्ते ही दीखने लगे | यह सब देखकर साधू अत्यंत चकित एवं चिंतित हो गया, उसे मूर्च्छा-सी आ गयी | वह अनेक प्रकार से विलाप करने लगा | वज्रपात होने के समान वह स्तब्ध होकर सोचने लगा कि मैं अब क्या करूँ ? कहाँ जाऊं ? मेरा धन कहाँ चला गया ? जामाता के समझाने बुझानेपर इसे तपस्वीका शाप समझकर वह पुन: उन्हीं तपस्वी की शरण में गया और गले ने कपड़ा लपेटकर उस तपस्वी को प्रणाम कर कहा –‘महाभाग ! आप कौन हैं ? कोई गंधर्व है या देवता है या साक्षात परमात्मा हैं ? प्रभो ! मैं आपकी महिमा को लेशमात्र भी नहीं जानता | आप मेरे अपराधों को क्षमा कर दे और मेरी नौका के धन को पुन: पूर्ववत कर दे |’ इसपर तपस्वी-रूप भगवान् सत्यनारायण ने कहा कि तुमने चन्द्रचूड राजाके सत्यनारायण के मंडप में ‘संतति के प्राप्त होनेपर भगवान् सत्यदेव की पूजा करूँगा’ – ऐसी प्रतिज्ञा की थी | तुम्हे कन्या प्राप्त हुई, उसका विवाह भी तुमने किया, व्यापार से धन भी प्राप्त किया, बंदी-गृह से तुम मुक्त भी हो गये, पर तुमने भगवान् सत्यनारायण की पूजा कभी नहीं की | इससे मिथ्थाभाषण, प्रतिज्ञालोप और देवता की अवज्ञा आदि अनेक दोष हुए, तुम भगवान् का स्मरण तक भी नहीं करते | इसीकारण हे मूढ़ ! तुम कष्ट भोग रहे हो | सत्यनारायण भगवान् सर्वव्यापी हैं, वे सभी फलों को देनेवाले हैं | उनका अनादर कर तुम कैसे सुख प्राप्त कर सकते हो | तुम भगवान् को याद करो, उनका स्मरण करो |’ इसपर साधू वणिक को भगवान् सत्यनारायण का स्मरण हो आया और वह पश्च्याताप करने लगा | उसके देखते-ही-देखते वहाँ वे तपस्वी भगवान् सत्यनारायणरूप में परिवर्तित हो गये और तब वह उनकी इसप्रकार स्तुति करने लगा –
‘सत्यस्वरुप, सत्यसंध, सत्यनारायण भगवान् हरि को नमस्कार है | जिस सत्यसे जगत की प्रतिष्ठा है, उस सत्यस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है | भगवन ! आपकी मायासे मोहित होने के कारण मनुष्य आपके स्वरुप को जान नहीं पाता और इस दुःखरूपी संसार-समुद्र को सुख मानकर उसीमें लिप्त रहता है | धन के गर्वसे मैं मूढ़ होकर मदान्धकार से कर्तव्य और अकर्तव्य की दृष्टी से शून्य हो गया | मैं अपने कल्याण को भी नहीं समझ पा रहा हूँ | मेरे दौरात्म्य-भाव के लिये आप क्षमा करें | हे  तपोनिधे ! आपको नमस्कार है | कृपासागर ! आप मुझे अपने चरणों का दास बना लें, जिससे मुझे आपके चरणकमलों का नित्य स्मरण होता रहे |’
इसप्रकार स्तुति कर उस साधू वणिक ने एक लाख मुद्रासे पुरोहित के द्वारा घर आकर सत्यनारायणकी पूजा करने के लिये प्रतिज्ञा की | इसपर भगवान् ने प्रसन्न होकर कहा- ‘वत्स ! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, तुम पुत्र-पौत्रोंसे समन्वित होकर श्रेष्ठ भोगो को भोगकर मेरे सत्यलोक को प्राप्त करोगे और मेरे साथ आनंद प्राप्त करोगे |’ यह कहकर भगवान् सत्यनारायण अन्तर्हित हो गये और साधूने पुन: अपनी यात्रा प्रारम्भ की |
सत्यदेव भगवान् से रक्षित हो वह साधू वणिक एक सप्ताह में नगर के समीप पहुँच गया और उसने अपने आगमन का समाचार देने के लिये घरपर दूत भेजा | दूत ने घर आकर साधू वणिक की स्त्री लीलावती से कहा –‘जामाता के साथ सफलमनोरथ साधू वणिक आ रहे हैं |’ वह साध्वी लीलावती कन्या के साथ सत्यनारायण भगवान् की पूजा कर रही थी | पति के आगमन को सुनकर अपनी पुत्री को सौपकर वह शीघ्रता से नौका के समीप चली आयी | इधर कलावती भी अपनी सखियों के साथ सत्यनारायण की जैसे-तैसे पूजा समाप्तकर बिना प्रसाद लिये ही अपने पति को देखने के लिये उतावली हो नौका की ओर चली गयी |
भगवान् सत्यनारायण के प्रसाद के अपमान से जामाता सहित साधू वणिक की नौका जल के मध्य अलक्षित हो गयी | यह देखकर सभी दुःख में निमग्न हो गये | साधू वणिक भी मुर्च्छित हो गया | कलावती भी यह देखकर मुर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी और उसका सारा शरीर आँसुओं से भीग गया | वह हवाके वेग से हिलते हुए केले के पत्ते के समान काँपने लगी | हा नाथ ! हा कान्त ! कहकर विलाप करने लगी और कहने लगी – ‘हे विधाता ! आपने मुझे पतिसे वियुक्त कर मेरी आशा तोड़ दी | पति के बिना स्त्री का जीवन अधूरा एवं निष्फल है |’ कलावती आर्तस्वर में भगवान् सत्यनारायण से बोली – ‘हे सत्यसिंधो ! हे भगवान् सत्यनारायण ! मैं अपने पतिके वियोग में जल में डूबनेवाली हूँ, आप मेरे अपराधों को क्षमा करे | पति को प्रकट कर मेरे प्राणों की रक्षा करें |’ इसप्रकार जब वह अपने पति के पादुकाओं को लेकर जल में प्रवेश करनेवाली ही थी उसीसमय आकाशवाणी हुई- ‘हे साधो ! तुम्हारी पुत्रीने मेरे प्रसाद का अपमान किया है | यदि वह पुन: घर जाकर श्रद्धापूर्वक प्रसाद को ग्रहण कर ले तो उसका पति नौकासहित वहाँ अवश्य दीखेगा, चिंता मत करो |’ इसपर आश्चर्यचकित हो कलावती ने वैसा ही किया और इसे उसका पति पुन: अपनी नौकासहित दीखने लगा | फिर क्या था ? सभी परस्पर आनंद से मिले और घर आकर साधू वणिक ने एक लाख मुद्राओं से बड़े समारोहपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की और आनंद से रहने लगा | पुन: कभी भगवान सत्यदेव की उपेक्षा नहीं की | उस व्रत के प्रभाव से पुत्र-पौत्रसमन्वित अनेक भोगोंका उपभोग करते हुए सभी स्वर्गलोक चले गये | इस इतिहास को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी विष्णु का अत्यंत प्रिय हो जाता है | अपनी मन:कामना की सिद्धि प्राप्त कर लेता हैं |
सूतजी बोले – ऋषिगणों ! मैंने सभी व्रतों में श्रेष्ठ इस सत्यनारायण-व्रत को कहा | ब्राह्मण के मुख से निकला हुआ यह व्रत कलिकाल में अतिशय पुण्यप्रद है |
इसीप्रकार प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खंड का ‘सत्यनारायणव्रत – कथा’ का षष्टम अध्याय पूरा हुआ |
== सत्यनारायण-व्रत कथा सम्पूर्ण ==
– हरि ॐ हरि ॐ –
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शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

देवपूजा के योग्य और अयोग्य पुष्प

देवपूजा के योग्य और अयोग्य पुष्प

अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठ ! भगवान् श्रीहरि पुष्प, गंध, धुप, दीप और नैवेद्य के समर्पण से ही प्रसन्न हो जाते है | मैं तुम्हारे सम्मुख देवताओं के योग्य एवं अयोग्य पुष्पों का वर्णन करता हूँ | पूजन में मालती-पुष्प उत्तम हैं | तमाल-पुष्प भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है | मल्लिका (मोतिया) समस्त पापोंका नाश करती है तथा यूथिका (जूही) विष्णुलोक प्रदान करनेवाली है | अतिमुक्तक (मोगरा) और लोध्रपुष्प विष्णुलोक की प्राप्ति करानेवाले हैं | करवीर-कुसुमों से पूजन करनेवाला वैकुण्ठ को प्राप्त होता है तथा जपा-पुष्पों से मनुष्य पुण्य उपलब्ध करता है | पावंती, कुब्जक और तगर-पुष्पों से पूजन करनेवाला विष्णुलोक का अधिकारी होता है | कर्णिकार (कनेर)- द्वारा पूजन करने से वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है एवं कुरुंट (पीली कटसरैया) के पुष्पोंसे किया हुआ पूजन पापोंका नाश करनेवाला होता है | कमल, कुंद एवं केतकी के पुष्पों से परमगति की प्राप्ति होती है | बाणपुष्प, बर्बर-पुष्प और कृष्ण तुलसी के पत्तों से पूजन करनेवाला श्रीहरि के लोक में जाता हैं | अशोक, तिलक तथा आटरुष (अडूसे) के फूलों का पूजन में उपयोग करनेसे मनुष्य मोक्ष का भागी होता है | बिल्वपत्रों एवं शमिपत्रों से परमगति सुलभ होती है | तमालदल तथा भृंगराज-कुसुमों से पूजन करनेवाला विष्णुलोक में निवास करता है | कृष्ण तुलसी, शुक्ल तुलसी, कल्हार, उत्पल, पद्म एवं कोकनद – ये पुष्प पुण्यप्रद माने गये हैं ||१-७||

भगवान् श्रीहरि सौ कमलों की माला समर्पण करनेसे परम प्रसन्न होते है | नीप, अर्जुन, कदम्ब, सुगन्धित बकुल (मौलसिरी), किंशुक (पलाश), मुनि (अगस्त्यपुष्प), गोकर्ण, नागकर्ण (रक्त एरण्ड), संध्यापुष्पी (चमेली), बिल्बातक, रजनी एवं केतकी तथा कुष्माण्ड, ग्रामकर्कटी, कुश, कास, सरपत, विभीतक, मरुआ तथा अन्य सुंगधित पत्रोंद्वारा भक्तिपूर्वक पूजन करनेसे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं | इनसे पूजन करनेवाले के पाप नाश होकर उसको भोग-मोक्ष की प्राप्ति होती हैं | लक्ष स्वर्णभार से पुष्प उत्तम है, पुष्पमाला उससे भी करोड़गुनी श्रेष्ठ है, अपने तथा दूसरों के उद्यान के पुष्पों की अपेक्षा वन्य पुष्पों का तिगुना फल माना गया है ||८-११||

झड़कर गिरे, अधिकांग एवं मसले हुए पुष्पों से श्रीहरि का पूजन न करे | इसीप्रकार कचनार, धत्तूर, गिरिकर्णिका (सफेद किणही), कुटज, शाल्मलि (सेमर) एवं शिरीष (सिरस) वृक्ष के पुष्पों से भी श्रीविष्णु की अर्चना न करे | इससे पूजा करनेवाले का नरक आदि में पतन न होता है | विष्णुभगवान का सुगन्धित रक्तकमल तथा नीलकमल-कुसुमों से पूजन होता है | भगवान शिवका आक, मदार, धत्तूर-पुष्पों से पूजन किया जाता है; किन्तु कुटज, कर्कटी एवं केतकी (केवड़े) के फुल शिव के ऊपर नहीं चढाने चाहिये | कुष्माण्ड एवं निम्ब के पुष्प तथा अन्य गंधहीन पुष्प ‘पैशाच’ माने गये हैं ||१२-१५||

अहिंसा, इन्द्रियसंयम, क्षमा, ज्ञान, दया एवं स्वाध्याय आदि आठ भावपुष्पों से देवताओं का यजन करके मनुष्य भोग-मोक्ष का भागी होता है | इनमें अहिंसा प्रथम पुष्प है, इन्द्रिय-निग्रह द्वितीय पुष्प है, सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंपर दया तृतीय पुष्प है, क्षमा चौथा विशिष्ट पुष्प है | इसीप्रकार क्रमश: शम, तप एवं ध्यान पाँचवे, छठे और सातवे पुष्प हैं | सत्य आठवाँ पुष्प है | इनसे पूजित होनेपर भगवान् केशव प्रसन्न हो जाते हैं | इन आठ भावपुष्पों से पूजा करनेपर ही भगवान् केशव संतुष्ट होते हैं | नरश्रेष्ठ ! अन्य पुष्प तो पूजा के बाह्य उपकरण हैं, श्रीविष्णु तो भक्ति एवं दयासे समन्वित भाव-पुश्पोद्वारा पूजित होनेपर परितुष्ट होते है ||१६-१९||

जल वारुण पुष्प है; घृत, दुग्ध, दधि सौम्य पुष्प है; अन्नादि प्राजापत्य पुष्प हैं, धुप-दीप आग्नेय पुष्प हैं, फल-पुष्पादि पंचम वानस्पत्य पुष्प हैं, कुशमुल आदि पार्थिव पुष्प हैं; गंध-चंदन वायव्य कुसुम हैं, श्रद्धादि भाव वैष्णव प्रसून हैं | ये आठ पुष्पिकाएँ हैं, जो सब कुछ देनेवाली है | आसन (योगपीठ), मूर्ति-निर्माण, पंचांगन्यास तथा अष्टपुष्पिकाए – ये विष्णुरूप हैं | भगवान् श्रीहरि पूर्वोक्त अष्टपुष्पिकाद्वारा पूजन करनेसे प्रसन्न होते है | इसके अतिरिक्त भगवान् श्रीविष्णु का ‘वासुदेव’ आदि नामों से एवं श्रीशिव का ‘ईशान’ आदि नामपुष्पों से भी पूजन किया जाता है ||२०-२३||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘पुष्पाध्याय’ नामक इक्यानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ || ९१ ||

☸ब्राह्मण-पुत्री महादेवी की कथा☸

ब्राह्मण-पुत्री महादेवी की कथा🔛डा.अजय दीक्षित

वैतालने कहा – राजन ! उज्जयिनी नाम की नगरी में चन्द्रवंशमें उत्पन्न महाबल नामसे विख्यात अत्यंत बुद्धिमान तथा वेदादि शास्त्रोंका ज्ञाता एक राजा निवास करता था | उसका स्वामिभक्त हरिदास नामका एक दूत था | हरिदास की पत्नी भ्क्तिमाला साधु पुरुषों की सेवामें तत्पर रहती थी | भक्तिमाला को सभी विद्याओं में पारंगत कमल के समान नेत्रवाली अत्यंत रूपवती एक कन्या उत्पन्न हुई, उसका नाम था महादेवी | एक दिन महादेवी ने अपने पिता हरिदास से कहा – ‘तात ! आप मुझे ऐसे योग्य पुरुषको दीजियेगा, जो गुणों में मुझसे भी अधिक हो, अन्य किसीको नहीं |’ अपनी पुत्रीकी बात सुनकर हरिदास बड़ा प्रसन्न हुआ और ‘ऐसा ही होगा’ – कहकर हरिदास राजसभा में आया और उसने राजाका अभिनन्दन किया | तदनंतर राजाने कहा – ‘हरिदास ! तुम मेरे ससुर तैलंग देश के राजा हरिश्चन्द्र के पास जाओ और उनका कुशल समाचार जानकर शीघ्र ही मुझे बताओ |’ हरिदास आज्ञा पाकर राजा हरिश्चन्द्र के पास गया और उसने उन्हें अपने स्वामी महाबलका कुशल-समाचार बतलाया | सारा कुशल-समाचार जानकार राजा हरिश्चंद्र अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने हरिदास से पूछा – ‘प्रभो ! आप विद्वान हैं, मुझे यह बतायें कि कलि का आगमन हो गया, यह कैसे मालुम होगा ?

हरिदास ने कहा – राजन ! जब वेदों की मर्यादाएँ नष्ट हो जायँ और वेदोक्त धर्म विपरीत दिखलायी देने लगे, तब कलिका आगमन समझना चाहिये, साथ ही कलि के प्रिय म्लेच्छगण कहे गये है | अधर्म ही जिसका मित्र है, ऐसे कलि के द्वारा सभी देवताओं को अपमानित किया गया हो, तब कलिका आगमन समझाना चाहिये | राजन ! पापकी स्त्रीका नाम है मृषा (असत्य), उसका पुत्र दुःख कहा गया है | दुःख की स्त्री है दुर्गति, जो कलियुग में घर-घरमें व्याप्त रहेगी | सभी राजा क्रोध के वशीभूत हो जायेंगे तथा सभी ब्राह्मण काम के दास हो जायेंगे | धनिक वर्ग लोभ के वशीभूत हो जायगा तथा शुद्र्जन महत्त्व को प्राप्त करेंगे | स्त्रियाँ लज्जा से रहित होंगी और सेवक स्वामी के ही प्राण हरण करनेवाले होंगे | पृथ्वी निष्फल (सत्त्वशून्य) हो जायगी | ऐसी स्थितिमें समझना चाहिये कि कलिका आगमन हो गया हैं, किन्तु कलियुग में जो मनुष्य भगवान् श्रीहरि की शरण में जायेंगे, वे ही आनन्द से रह पायेंगे, अन्य कोई नहीं |

यह सुनकर राजा हरिश्चन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उसे बहुत-सी दक्षिणा देकर बिदा किया तथा राजा महाबल को सम्पूर्ण समाचार देकर अपने महलमें चला आया और वह विप्र भी अपने शिबिर में आ गया | उसी समय एक बुद्धिकोविद नामक बुद्धिमान ब्राह्मण वहाँ आया और उसने अपनी विशिष्ट विद्याओं का हरिदास के सामने प्रदर्शन किया – उस ब्राह्मण ने मन्त्र जपकर देवीकी आराधना की और एक महान आश्चर्यजनक शीघ्रग नामक विमान प्रकटकर हरिदास को दिखलाया | उसकी विद्याओं से मुग्ध होकर हरिदास ने उसे अपनी कन्याके योग्य समझकर उसका वरण कर दिया |

हरिदास का पुत्र था मुकुन्द | वह विद्याध्ययन के लिये अपने गुरुके यहाँ गया था, जब वह अपने गुरुसे विद्याओं को पढ़ चूका तो गुरुदक्षिणा के लिये प्रार्थना करने लगा | गुरुने उससे कहा – ‘अरे मुकुंद ! सुनो, तुम गुरुदक्षिणा के रूपमें अपनी बहिन महादेवी मेरे दैवज्ञ पुत्र धीमान को समर्पित कर दो |’ ‘ठीक है‘ – ऐसा कहकर मुकुंद अपने घर आ गया |

इधर हरिदास की पत्नी भक्तिमाला ने द्रौणिशिष्य वामन नामक एक विप्रका जो शब्दवेधी बाण चलानेमें कुशल एवं शस्त्रविद्या का ज्ञाता था, उसकी विद्यासे प्रभावित होकर अपनी कन्याके लिये दक्षिणा, ताम्बुल आदिके द्वारा पूजित कर उसका वरण कर लिया |

समय आनेपर पिता, पुत्र तथा माताद्वारा वरण किये गये तीनों गुणवान ब्राह्मण महादेवी नामवाली उस क्न्याको प्राप्त करनेके लिये हरिदास के यहाँ आ पहुँचे | इसी बीच एक राक्षस अपनी मायासे उस कन्या महादेवी का हरण कर विन्ध्यपर्वत पर चला गया | यह समाचार जानकर ये तीनों कन्यार्थी दु:खी होकर रोने लगे | जब उनमेंसे गुरुपुत्र धीमान नामक दैवज्ञ विद्वान ब्राह्मण से कन्याका पता पूछा गया तो उसने बतलाया कि वह कन्या विन्ध्यपर्वतपर राक्षसद्वारा हरण कर ले जायी गयी है | तदनंतर उस कन्या की प्राप्ति के लिये द्वितीय बुद्धिकोविद नामक ब्राह्मण ने अपने द्वारा बनाये गये आकाशचारी विमानपर उन दोनों विप्रोंको बैठाकर विन्ध्यपर्वतपर पहुचाया | तब शब्दवेधी बाणों को चलाने में निपुण वामन नामक तीसरे ब्राह्मण ने धनुषपर बाण का संधान किया उअर बाण से उस राक्षस को मार डाला | वे तीनों कन्या महादेवी को प्राप्त कर उसी विमान में बैठकर उज्जयिनी में वापस लौट आये |

वहाँ पहुंचकर तीनों ब्राह्मण अपने-अपने कार्यका महत्त्व बताते हुए कन्याके वास्तविक अधिकारी होनेके लिये परस्परमें विवाद करने लगे, यह निर्णय नहीं हो सका कि कन्याका विवाह किसके साथ हो |

वैतालने राजा विक्रम से पूछा – राजन ! आप बतलाये कि इन तीनों में विवाह का अर्थात कन्या प्राप्त करने का अधिकारी कौन है ?

राजा विक्रमादित्य ने कहा – जिस विद्वान गुरुके पुत्र ज्योतिषी ब्राह्मण ने कन्यका यह पता बताया कि वह राक्षसद्वारा चुराकर विन्ध्यपर्वत पहुंचायी गयी है, वह ब्राह्मण कन्याके लिये पितृतुल्य है और जिस दुसरे ब्राह्मण बुद्धिकोविद ने अपने मंत्रबलद्वारा उत्पन्न विमानसे महादेवी नामकी कन्या को यहाँ पहुँचाया, वह भाईके समान हैं, किन्तु जिस वामन नामक ब्राह्मण युवक ने शब्दवेधी बाणों से राक्षस के साथ युद्ध कर उसे मार गिराया, वही वीर ब्राह्मण इस कन्या को प्राप्त करनेका योग्य अधिकारी है |

इति श्री प्रतिसर्गपर्व द्वितीयखंड का द्वितीय अध्याय पूरा हुआ |

– हरि ॐ हरि ॐ –

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

महीनों के नामकरण की विधि

महीनों के नामकरण की विधि
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कुल सताइस नक्षत्र होते हैं,
१-अश्विनी १०-मघा १९-मूल ) केतु
२-भरणी ११-पूर्वाफाल्गुनी २०-पूर्वाषाढ़ा )शुक्र
३-कृतिका १२-उत्तराफाल्गुनी २१-उत्तराषाढ़ा )सूर्य
४-रोहिणी १३-हस्त २२-श्रवण )चन्द्र
५-मृगशिरा १४-चित्रा २३-धनिष्ठा )मंगल
६-आर्द्रा १५-स्वाति २४-शतभिषा )राहू
७-पुनर्वसु १६-विशाखा २५-पूर्वाभाद्रपदा )गुरू
८-पुष्य १७-अनुराधा २६-उत्तराभाद्रपदा)शनि
९-आश्लेषा १८-ज्येष्ठा २७-रेवती )बुध
इस प्रकार उपरोक्त सताइस नक्षत्रों की नौ के क्रम में श्रृंखला है जिनके सम्मुख उनके स्वामियों के नाम अंकित हैं | यद्यपि एक अन्य नक्षत्र भी है, परन्तु वह दो नक्षत्रों के मध्य अत्यल्प होने से ज्योतिषीय गणनाओं में सम्मिलित नहीं है |
यद्यपि नक्षत्रों के स्वामियों की गणना फलित ज्योतिष का विषय है, फिर भी यहां सहजता हेतु रख दिया गया है |
अब हम माह नामकरण विषय पर आते हैं-
सभी को पता होगा कि एक सौर माह में तीस दिन होते हैं, क्योंकि सूर्य लगभग एक अंश प्रतिदिन गति करके माह भर में तीस अंश(एक राशि) आगे बढ़ जाता है, तथा चन्द्रमा उससे भी तेज चलकर लगभग सवा दो दिन में एक राशि पार कर जाता है | इस प्रकार चन्द्रमा लगभग सताइस दिन में पूरा भचक्र(राशिचक्र-मेषादि बारहों राशियों) परिभ्रमण कर लेता है | तथा सूर्य को सम्पूर्ण भचक्र का चक्कर लगाने में लगभग एक वर्ष लगता है |
परन्तु जो पञ्चांग बहुधा हम प्रयोग करते हैं, उसमें सूर्य व चन्द्रमा की सापेक्षिक गतियों को आधार बनाया जाता है | पाश्चात्य ज्योतिषि सूर्य को केन्द्र मानकर गणना करते हैं, तब ही आपने देखा होगा कि चौदह जनवरी से सोलह फरवरी तक जन्म लिये सब जातकों की वे जन्मराशि मेष ही बताते हैं, क्योंकि सूर्य उस अवधि में मेष राशि में ही रहते हैं |
उनके यहां दिनों की ही अब गणना की जाती है, जिसे वे मध्याह्न रात्रि से आगणित करते हैं |
जबकि हमारे सनातनी संस्कृति में सूर्योदय से सूर्योदय पर्यन्त एक दिवस मानते हैं, तथा उसमें भी आपने देखा होगा कि कयी बार एक दिन में दो तिथियां पड़ जाती हैं |
जानते हैं ऐसा क्यों ?
क्योंकि तिथियां सूर्य व चन्द्रमा के मध्य दूरी से निर्धारित होती हैं, जब सूर्य व चन्द्रमा के मध्य १२ अंश का अन्तर भचक्र(अन्तरिक्ष में स्पष्ट पथ) में होता है तब एक तिथि बीत जाती है | अमावस्या के दिन सूर्य व चन्द्र जब समान राशि, अंश, कला व विकला पर हों तब पूर्णरूपेण अमावस्या होती है, फिर दोनों अपनी गति से चलते हुये एक दूसरे से दूर होने लगते हैं, जब उनमें बारह अंश का अन्तर हो जाय तब प्रतिपदा तिथि बीत गयी व दूज चालू, फिर चौबीस अंश के अन्तर पर दूज बीतकर तीज चालू | ऐसे ही जब सूर्य व चन्द्रमा के मध्य १८० अंश का अन्तर हो जाता है तब वह अन्तिम(पन्द्रहवां) बारह अंश की अवधि पूर्णिमा तिथि होती है | बस ऐसे ही पुनः अन्तर बारह-बारह के क्रम में कम होते चला जाता है तथा पुनः अमावस्या आ जाती है | हम जानते हैं कि न तो सूर्य, चन्द्रमा व पृथ्वी तीनों ही पूर्णरूपेण गोल हैं और न ही इनके मार्ग पूर्णरूपेण गोल होंगे, सो इनकी गति घटती बढ़ती रहती है, जो कारण है तिथिवृद्धि अथवा तिथि क्षयों की |
अब मूल विषय- जिस माह की पूर्णिमा/अमावस्या के आसपास चन्द्रमा जिस नक्षत्र में हो उसी नक्षत्र के नामपर उस माह का नाम होता है | बहुधा इन अवसरों पर चित्रा, विशाषा, ज्येष्ठ, पूर्वा/उत्तर आषाढ़ा, श्रवण, पूर्वा/उत्तर भाद्रपदा, आश्विन, कृतिका, मार्गशीर्ष, पुष्य, मघा अथवा पूर्वा/उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र पड़ते हैं | अतः इन्हीं नक्षत्रों के नाम पर बारहों माहों के नाम क्रमशः-
१-चैत्र, २-वैसाख, ३-ज्येष्ठ(जेठ), ४-आषाढ़ (अषाढ़), ५-श्रावण (सावन), ६-भाद्रपद (भादों), ७-आश्विन (क्वार), ८-कार्तिक (कातिक), ९-मार्गशीर्ष (अगहन), १०-पौष (पूष), ११-माघ और १२-फाल्गुन (फागुन) हैं |