गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

वैशाख-स्नान से पाँच प्रेतों का उद्धार :---आचार्य डा.अजय दीक्षित

वैशाख-स्नान से पाँच प्रेतों का उद्धार :---आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया ।

अम्बरीष ने कहा – मुने ! जिसके चिन्तन मात्र से पाप राशि का लय हो जाता है, उस पाप प्रशमन नामक स्तोत्र को मैं भी सुनना चाहता हूँ। आज मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, आपने मुझे उस शुभ विधि का श्रवण कराया, जिसके सुनने मात्र से पापों का क्षय हो जाता है। वैशाख मास में जो भगवान केशव के कल्याणमय नामों का कीर्तन किया जाता है, उसी को मैं संसार में सबसे बड़ा पुण्य, पवित्र, मनोरम तथा एकमात्र सुकृत से ही सुलभ होने वाला शुभ कर्म मानता हूँ।। अहो ! जो लोग माधव मास में भगवान मधुसूदन के नामों का स्मरण करते हैं वे धन्य हैं। अत: यदि आप उचित समझें तो मुझे पुन: माधवमास की ही पवित्र कथा सुनाएँ।

सूतजी कहते हैं – राजाओं में श्रेष्ठ हरिभक्त अम्बरीष का वचन सुनकर नारद मुनि को बड़ी प्रसन्नता हुई। यद्यपि वे वैशाख स्नान के लिये जाने को उत्कंठित थे, तथापि सत्संग में आनन्द आने के कारण रुक गये और राजा से बोले।

नारद जीने कहा – महीपाल ! मुझे ऎसा जान पड़ता है कि यदि दो व्यक्तियों में परस्पर भगवत्कथा-संबंधी सरस वार्तापाल छिड़ जाए तो वह अत्यन्त विशुद्ध – अन्त:करण को शुद्ध करने वाला होता है। आज तुम्हारे साथ जो माधवमास के माहात्म्य की चर्चा चल रही है, यह वैशाख-स्नान की अपेक्षा अधिक पुण्य प्रदान करने वाली है क्योंकि माधवमास के देवता भगवान श्रीविष्णु हैं (अत: उनका कीर्तन भगवान का ही कीर्तन है)। जिसका जीवन धर्म के लिए और धर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए है तथा जो रातों-दिन पुण्योपार्जन में ही लगा रहता है, उसी को इस पृथ्वी पर मैं वैष्णव मानता हूँ। राजन् ! अब मैं वैशाख स्नान से होने वाले पुण्य फल का संक्षेप में वर्णन करता हूँ। विस्तार के साथ सारा वर्णन तो मेरे पिता – ब्रह्माजी भी नहीं कर सकते। वैशाख में डुबकी लगाने मात्र से समस्त पाप छूट जाते हैं।

पूर्वकाल की बात है कोई मुनीश्वर तीर्थयात्रा के प्रसंग से सर्वत्र घूम रहे थे। उनका नाम था मुनिशर्मा। वे बड़े धर्मात्मा, सत्यवादी, पवित्र तथा शम, दम एवं शान्तिधर्म से युक्त थे। वे प्रतिदिन पितरों का तर्पण और श्राद्ध करते थे। उन्हें वेदों और स्मृतियों के विधानों का सम्यक् ज्ञान था। वे मधुर वाणी बोलते और भगवान का पूजन करते रहते थे। वैष्णवों के संसर्ग में ही उनका समय व्यतीत होता था। वे तीनों कालों के ज्ञाता, मुनि, दयालु, अत्यन्त तेजस्वी, तत्वज्ञानी और ब्राह्मणभक्त थे। वैशाख का महीना था, मुनिशर्मा स्नान के लिए नर्मदा के किनारे जा रहे थे। उसी समय उन्होंने अपने सामने पाँच पुरुषों को देखा, जो भारी दुर्गति में फँसे हुए थे। वे अभी-अभी एक-दूसरे से मिले थे। उनके शरीर का रंग काला था। वे एक बरगद की छाया में बैठे थे और पापों के कारण उद्विग्न होकर चारों ओर दृष्टिपात कर रहे थे।

उन्हें देखकर द्विजवर मुनिशर्मा बड़े विस्मय में पड़े और सोचने लगे – इस भयानक वन में मनुष्य कहाँ से आए? इनकी चेष्टा बड़ी दयनीय है किन्तु इनका आकार बड़ा भयंकर दिखाई देता है। ये पापभागी चोर तो नहीं हैं? विप्रवर मुनिशर्मा की बुद्धि बड़ी स्थिर थी, वे ज्यों ही इस प्रकार विचार करने लगे, उसी समय उपर्युक्त पाँचों पुरुष उनके पास आये और हाथ जोड़कर मुनिशर्मा से बोले।

उन पुरुषों ने कहा – विप्रवर ! हमें आप कल्याणमय पुरुषोत्तम जान पड़ते हैं, हम दु:खी जीव हैं। अपना दु:ख विचारकर आपको बताना चाहते हैं। द्विजराज ! आप कृपा करके हमारी कष्ट कथा सुनें। दैववश जिनके पाप प्रकट हो गए हैं, उन दीन दु:खी प्राणियों के आधार आप जेसे संत महात्मा ही हैं। साधु पुरुष अपनी दृष्टिमात्र से पीड़ितों की पीड़ाएँ हर लेते हैं, अब उनमें से एक ने सबका परिचय देना आरंभ किया – मैं पंचाल देश का क्षत्रिय हूँ, मेरा नाम नरवाहन है।

मैंने मार्ग में मोहवश बाण द्वारा एक ब्राह्मण की हत्या कर डाली। मुझसे ब्रह्म हत्या का पाप हो गया इसलिए शिखा, सूत्र और तिलक से रहित होकर इस पृथ्वी पर घूमता हूँ और सबसे कहता फिरता हूँ कि “मैं ब्रह्महत्यारा हूँ।” मुझ महापापी ब्रह्मघाती को आप कृपा की भिक्षा दें। इस दशा में पड़े-पड़े मुझे एक वर्ष बीत गया। मैं पाप से जल रहा हूँ, मेरा चित्त शोक से व्याकुल है तथा ये जो सामने दिखाई देते हैं, इनका नाम चन्द्रशर्मा है। ये जाति के ब्राह्मण है, इन्होंने मोह से मलिन होकर गुरु का वध किया है और ये मगध देश के निवासी हैं। इनके स्वजनों ने इनका परित्याग कर दिया है। ये भी घूमते-घामते दैवात् यहाँ आ पहुँचे हैं। इनके भी न शिखा है न सूत्र। ब्राह्मण का कोई भी चिह्न इनके शरीर में नहीं रह गया है।

इनके सिवा जो ये तीसरे व्यक्ति हैं, इनका नाम देवशर्मा है। स्वामिन् ! ये भी बड़े कष्ट में है। ये भी जाति के ब्राह्मण हैं, किन्तु मोहवश वेश्या की आसक्ति में फँसकर शराबी हो गए थे। इन्होंने भी पूछने पर अपना सारा हाल सच-सच कह सुनाया है। अपने प्रथम पापाचार को याद करके इनके हृदय में बड़ा संताप होता है। ये सदा मनस्ताप से पीड़ित रहते हैं। इनको इनकी स्त्री ने, बन्धु-बान्धवों ने तथा गाँव के सब लोगों ने वहाँ से निकाल दिया है। ये अपने उसी पाप के साथ भ्रमण करते हुए यहाँ आए हैं।

ये चौथे महाशय जाति के वैश्य हैं। इनका नाम विधुर है। ये गुरुपत्नी के साथ समागम करने वाले हैं। इनकी माता मिथिला में जाकर वेश्या हो गई थी। इन्होंने मोहवश तीन महीनों तक उसी का उपभोग किया है परन्तु जब असली बात का पता लगा है तो बहुत दु:खी होकर पृथ्वी पर विचरते हुए ये भी यहाँ आ पहुँचे हैं। हम में से ये जो पाँचवें दिखाई दे रहे हैं, ये भी वैश्य ही हैं, इनका नाम नन्द है। ये पापियों का संसर्ग करने वाले महापापी हैं। इन्होंने प्रतिदिन धन के लालच में पड़कर बहुत चोरी की है। पातकों से आक्रान्त हो जाने पर इन्हें स्वजनों ने त्याग दिया है तब ये स्वयं भी खिन्न होकर दैवात् यहाँ आ पहुँचे हैं।

इस प्रकार हम पाँचों महापापी एक स्थान पर जुट गए हैं। हम सब के सब दु:खों से घिरे हुए हैं। अनेकों तीर्थों में घूम आए मगर हमारा घोर पातक नहीं मिटता। आपको तेज से उद्दीप्त देखकर हम लोगों का मन प्रसन्न हो गया है। आप जैसे साधु पुरुष के पुण्यमय दर्शन से हमारे पातकों के अन्त होने की सूचना मिल रही है। स्वामिन् ! कोई ऎसा उपाय बताइए, जिससे हम लोगों के पापों का नाश हो जाए। प्रभो ! आप वेदार्थ के ज्ञाता और परम दयालु जान पड़ते हैं, आपसे हमें अपने उद्धार की बड़ी आशा है।

मुनिशर्मा ने कहा – तुम लोगों ने अज्ञानवश पाप किया, किन्तु इसके लिए तुम्हारे हृदय में अनुताप है तथा तुम सब के सब सत्य बोल रहे हो, इस कारण तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करना मेरा कर्तव्य है। मैं अपनी भुजा उठाकर कहता हूँ, मेरी सत्य बातें सुनो। पूर्वकाल में जब मुनियों का समुदाय एकत्रित हुआ था, उस समय मैंने महर्षि अंगिरा के मुख से जो कुछ सुना था वही वेद शास्त्रों में भी देखा। वह सबके लिए विश्वास करने योग्य है। मेरी आराधना से संतुष्ट हुए स्वयं भगवान विष्णु ने भी पहले ऎसी ही बात बताई थी, वह इस प्रकार है।

भोजन से बढ़कर दूसरा कोई तृप्ति का साधन नहीं है। पिता से बढ़कर कोई गुरु नहीं है। ब्राह्मणों से उत्तम दूसरा कोई पात्र नहीं है तथा भगवान विष्णु से श्रेष्ठ दूसरा कोई देवता नहीं है। गंगा की समानता करने वाला कोई तीर्थ, गोदान की तुलना करने वाला कोई दान, गायत्री के समान जप, एकादशी के तुल्य व्रत, भार्या के सदृश मित्र, दया के समान धर्म तथा स्वतंत्रता के समान सुख नहीं है। गार्हस्थ्य से बढ़कर आश्रम और सत्य से बढ़कर सदाचार नहीं है। इसी प्रकार संतोष के समान सुख तथा वैशाख माह के समान महान् पापों का अपहरण करने वाला दूसरा कोई मास नहीं है।

वैशाख मास भगवान मधुसूदन को बहुत ही प्रिय है। गंगा आदि तीर्थों में तो वैशाख स्नान का सुयोग अत्यन्त दुर्लभ है। उस समय गंगा, जमुना तथा नर्मदा की प्राप्ति कठिन होती है। जो शुद्ध हृदय वाला मनुष्य भगवान के भजन में तत्पर हो पूरे वैशाख भर प्रात:काल गंगा स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है। इसलिए पुण्य के सारभूत इस वैशाख मास में तुम सभी पातकी मेरे साथ नर्मदा तट पर चलो और उसमें गोते लगाओ। नर्मदा के जल का मुनि लोग भी सेवन करते हैं, वह समस्त पापों के भय का नाश करने वाला है। मुनि के यों कहने पर वे सब पापी उनके साथ अद्भुत पुण्य प्रदान करने वाली नर्मदा की प्रशंसा करते हुए उसके तट पर गए।

किनारे पहुँचकर ब्राह्मण श्रेष्ठ मुनिशर्मा का चित्त परसन्न हो गया। उन्होंने वेदोक्त विधि के अनुसार नर्मदा के जल में प्रात: स्नान किया। उपर्युक्त पाँचों पापियों ने भी ब्राह्मण के कहने से ज्यों ही नर्मदा में डुबकी लगाई त्यों ही उनके शरीर का रंग बदल गया। वे तत्काल सुवर्ण के समान कान्तिमान हो गए फिर मुनिशर्मा ने सब लोगों के सामने उन्हें पाप-प्रशमन नामक स्तोत्र सुनाया।

भूपाल ! अब तुम पाप-प्रशमन नामक स्तोत्र सुनो। इसका भक्तिपूर्वक श्रवण करके भी मनुष्य पाप राशि से मुक्त हो जाता है। इसके चिन्तन मात्र से बहुतेरे पापी शुद्ध हो चुके हैं। इसके सिवा और भी बहुत-से मनुष्य इस स्तोत्र का सहारा लेकर अज्ञानजनित पाप से मुक्त हो गए हैं। जब मनुष्यों का चित्त परायी स्त्री, पराए धन तथा जीव-हिंसा आदि की ओर जाए तो इस प्रायश्चित्तरुपा स्तुति की शरण लेनी चाहिए, यह स्तुति इस प्रकार है –

 

विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नम:।

नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतं हरिम्।।

चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम्।

विष्णुमीड्यमशेषाणामनादिनिधनं हरिम्।।

अर्थ – संपूर्ण विश्व में व्यापक भगवान श्रीविष्णु को सर्वदा नमस्कार है। विष्णु को बारम्बार प्रणाम है। मैं अपने चित्त में विराजमान विष्णु को नमस्कार करता हूँ। अपने अहंकार में व्याप्त श्रीहरि को मस्तक झुकाता हूँ। श्रीविष्णु चित्त में विराजमान ईश्वर (मन और इन्द्रियों के शासक), अव्यक्त, अनन्त, अपराजित, सबके द्वारा स्तवन करने योग्य तथा आदि-अन्त से रहित है, ऎसे श्रीहरि को मैं नित्य-निरन्तर प्रणाम करता हूँ।

 

विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्।

योsहंकारगतो विष्णुर्यो विष्णुर्मयि संस्थित:।।

करोति कर्तृभूतोsसौ स्थावरस्य चरस्य च।

तत्पापं नाशमायाति तस्मिन् विष्णौ विचिन्तिते।।

अर्थ – जो विष्णु मेरे चित्त में विराजमान हैं, जो विष्णु मेरी बुद्धि में स्थित हैं, जो विष्णु मेरे अहंकार में व्याप्त हैं तथा जो विष्णु सदा मेरे स्वरुप में स्थित हैं, वे ही कर्ता होकर सब कुछ करते हैं। उन विष्णु भगवान का चिन्तन करने पर चराचर प्राणियों का सारा पाप नष्ट हो जाता है।

 

ध्यातो हरति य: पापं स्वप्ने दृष्टश्च पापिनाम्।

तमुपेन्द्रमहं विष्णुं नमामि प्रणतप्रियम्।।

अर्थ – जो ध्यान करने और स्वप्न में दिख जाने पर भी पापियों के पाप हर लेते हैं तथा चरणों में पड़े हुए शरणागत भक्त जिन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, उन वामनरूपधारी भगवान श्रीविष्णु को नमस्कार करता/करती हूँ।

 

जगत्यस्मिन्निरालम्बे ह्यजमक्षरमव्ययम्।

हस्तावलम्बनं स्तोत्रं विष्णुं वन्दे सनातनम्।।

अर्थ – जो अजन्मा, अक्षर और अविनाशी हैं तथा इस अवलम्बशून्य संसार में हाथ का सहारा देने वाले हैं, स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति की जाती है, उन सनातन श्रीविष्णु को मैं सदा प्रणाम करता/करती हूँ।

 

सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज।

हृ्षीकेश हृ्षीकेश हृ्षीकेश नमोsस्तु ते।।

अर्थ – हे सर्वेश्वर ! हे ईश्वर ! हे व्यापक परमात्मन् ! हे अधोक्षज ! हे इन्द्रियों का शासन करने वाले अन्तर्यामी हृषीकेश ! आपको बारम्बार नमस्कार है।

 

नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव।

दुरुक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाशु जनार्दन।।

अर्थ – हे नृसिंह ! हे अनन्त ! हे गोविन्द ! हे भूतभावन ! हे केशव ! हे जनार्दन ! मेरे दुर्वचन, दुष्कर्म और दुश्चिन्तन को शीघ्र नष्ट कीजिए।

 

यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना।

आकर्णय महाबाहो तच्छमं नय केशव।।

अर्थ – महाबाहो ! मेरी प्रार्थना सुनिए – अपने चित्त के वश में होकर मैंने जो कुछ बुरा चिन्तन किया हो, उसको शान्त कर दीजिए।

 

ब्रह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण।

जगन्नाथ जगद्धात: पापं शमय मेsच्युत।।

अर्थ – ब्राह्मणों का हित साधन करने वाले देवता गोविन्द ! परमार्थ में तत्पर रहने वाले जगन्नाथ ! जगत को धारण करने वाले अच्युत ! मेरे पापों का नाश कीजिए।

 

यच्चापराह्णे सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि।

कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता।।

जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।

नामत्रयोच्चारणत: सर्वं यातु मम क्षयम्।।

अर्थ – मैंने पूर्वाह्न, सायाह्न, मध्याह्न तथा रात्रि के समय शरीर, मन और वाणी के द्वारा, जानकर या अनजान में जो कुछ पाप किया हो, वह सब “हृषीकेश, पुण्डरीकाक्ष और माधव” – इन तीन नामों के उच्चारण से नष्ट हो जाए।

 

शारीरं मे हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष मानसम्।

पापं प्रशममायातु वाक्कृतं मम माधव।।

अर्थ – हृषीकेश ! आपके नामोच्चारण से मेरा शारीरिक पाप नष्ट हो जाए, पुण्डरीकाक्ष ! आपके स्मरण से मेरा मानस पाप शान्त हो जाए तथा माधव ! आपके नाम-कीर्तन से मेरे वाचिक पाप का नाश हो जाए।

 

यद् भुज्जान: पिबंस्तिष्ठन् स्वपण्जाग्रद् यदा स्थित:।

अकार्षं पापमर्थार्थं कायेन मनसा गिरा।।

महदल्पं च यत्पापं दुर्योनिनरकावहम्।

तत्सर्वं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात् ।।

अर्थ – मैंने खाते, पीते, खड़े होते, सोते, जागते तथा ठहरते समय मन, वाणी और शरीर से, स्वार्थ या धन के लिए जो कुत्सित योनियों और नरकों की प्राप्ति कराने वाला महान या थोड़ा पाप किया है, वह सब भगवान वासुदेव का नामोच्चारण करने से नष्ट हो जाए।

 

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्।

अस्मिन् संकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु।।

अर्थ – जिसे परब्रह्म, परम धाम और परम पपवित्र कहते हैं, वह तत्त्व भगवान विष्णु ही है, इन श्रीविष्णु भगवान का कीर्तन करने से मेरे जो भी पाप हों, वे नष्ट हो जाएँ।

 

यत्प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शविवर्जितम्।

सूरयस्तत्पदं विष्णोस्तत्सर्वं मे भवत्वलम्।।

अर्थ – जो गन्ध और स्पर्श से रहित हैं, ज्ञानी पुरुष जिसे पाकर पुन: इस संसार में नहीं लौटते, वह श्रीविष्णु का ही परम पद है। वह सब मुझे पूर्णरूप से प्राप्त हो जाए।

 

पापप्रशमनं स्तोत्रं य: पठेच्छृृणुयान्नर:।

शारीरैर्मानसैर्वाचा कृतै: पापै: प्रमुच्यते।।

मुक्त: पापग्रहादिभ्यो याति विष्णो:परं पदम्।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रं  सर्वाघनाशनम्।।

प्रायश्चित्तमघौघानां पठितव्यं नरोत्तमै: (अध्याय 88, श्लोक 72 से 91 तक)

अर्थ – यह “पाप-प्रशमन” नामक स्तोत्र है. जो मनुष्य इसे पढ़ता और सुनता है वह शरीर, मन और वाणी द्वारा किए हुए पापों से मुक्त हो जाता है. इतना ही नहीं वह पाप ग्रह आदि के भय से भी मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है. यह स्तोत्र सब पापों का नाश करने वाला तथा पाप राशि का प्रायश्चित है. इसलिए श्रेष्ठ मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न कर के इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए.

राजन् ! इस स्तोत्र के श्रवण मात्र से पूर्वजन्म तथा इस जन्म के किये हुए पाप भी तत्काल नष्ट हो जाते हैं। यह स्तोत्र पापरूपी वृक्ष के लिए कुठार और पापमय ईंधन के लिए दावानल है। पापराशिरूपी अन्धकार-समूह का नाश करने के लिए यह स्तोत्र सूर्य के समान है। मैंने सम्पूर्ण जगत पर अनुग्रह करने के लिए इसे तुम्हारे सामने प्रकाशित किया है। इसके पुण्यमय माहात्म्य का वर्णन करने में स्वयं श्रीहरि भी समर्थ नहीं हैं

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

सर्वार्थ सिद्धि योग – 2020आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

सर्वार्थ सिद्धि योग – 2020

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

कुछ विशेष कार्य जैसे – कोई व्यापार या बिजनेस शुरु करना हो, कोई सरकारी अथवा राजकीय कॉन्ट्रैक्ट करना हो, परीक्षा देनी हो, नौकरी पर जाना हो, चुनाव के लिए आवेदन पत्र देना हो, भूमि से संबंधित कोई कार्य हो, यात्रा पर जाना हो, वस्त्र या आभूषण आदि लेने हो या फिर मुकदमा आरंभ करना हो लेकिन कोई शुभ मूहुर्त ना मिल रहा हो तब सर्वार्थ सिद्धि योग में ये सभी काम शुरु किए जा सकते हैं. कई बार शुक्र या गुरु अस्त होता है या अधिकमास पड़ जाता है या फिर वेध आदि की वजह से भी नया काम प्रारंभ करने की मनाही होती हैं लेकिन इन सब के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग उस दिन बन रहा हो तब उपरोक्त काम शुरु किए जा सकते हैं. 

 

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सर्वार्थ सिद्धि योग – मई 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                             समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
3 मई 21:434 मई सूर्योदय 
8 मई 08:38 9 मई सूर्योदय 
10 मई सूर्योदय 11 मई 04:13 
17 मई 13:59 18 मई सूर्योदय 
19 मई 19:53 20 मई सूर्योदय 
23 मई सूर्योदय 24 मई 04:52 
25 मई सूर्योदय 25 मई 06:10 
28 मई सूर्योदय 28 मई 07:27 
31 मई सूर्योदय 1 जून सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – जून 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                             समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
1 जून सूर्योदय तक 
4 जून 18:37 5 जून 16:44
7 जून सूर्योदय 7 जून 14:11 
14 जून सूर्योदय 14 जून 24:22
16 जून सूर्योदय 17 जून सूर्योदय 
20 जून सूर्योदय 20 जून 12:02
26 जून 11:26 27 जून सूर्योदय 
28 जून सूर्योदय 29 जून सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – जुलाई 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                        समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 जुलाई 02:343 जुलाई 01:14
5 जुलाई 23:026 जुलाई सूर्योदय 
6 जुलाई 23:12 7 जुलाई सूर्योदय 
12 जुलाई सूर्योदय 12 जुलाई 08:18 
14 जुलाई सूर्योदय 14 जुलाई 14:07
15 जुलाई 16:4316 जुलाई सूर्योदय 
20 जुलाई 21:2121 जुलाई सूर्योदय 
24 जुलाई सूर्योदय 24 जुलाई 16:03
26 जुलाई सूर्योदय 26 जुलाई 12:37
29 जुलाई 08:3330 जुलाई 07:41


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – अगस्त 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                      समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 अगस्त 06:523 अगस्त सूर्योदय 
3 अगस्त 07:194 अगस्त सूर्योदय 
7 अगस्त सूर्योदय 7 अगस्त 13:33
9 अगस्त 19:0610 अगस्त सूर्योदय 
11 अगस्त 24:5713 अगस्त 03:26
17 अगस्त 06:4418 अगस्त 05:43 
18 अगस्त सूर्योदय 19 अगस्त 04:08 
26 अगस्त सूर्योदय 26 अगस्त 13:04
30 अगस्त सूर्योदय 30 अगस्त 13:52 
31 अगस्त सूर्योदय 31 अगस्त 15:04


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – सितंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                      समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
4 सितंबर 23:285 सितंबर सूर्योदय 
6 सितंबर सूर्योदय 7 सितंबर 05:24
8 सितंबर 08:2610 सितंबर सूर्योदय 
13 सितंबर 16:3414 सितंबर 15:52
15 सितंबर सूर्योदय 15 सितंबर 14:25
21 सितंबर 20:4922 सितंबर सूर्योदय 
26 सितंबर 19:2627 सितंबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – अक्तूबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                   समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 अक्तूबर 05:573 अक्तूबर सूर्योदय 
4 अक्तूबर सूर्योदय 4 अक्तूबर 11:52
6 अक्तूबर सूर्योदय 6 अक्तूबर 17:54
7 अक्तूबर सूर्योदय 8 अक्तूबर सूर्योदय 
9 अक्तूबर 24:27 10 अक्तूबर सूर्योदय 
11 अक्तूबर सूर्योदय 11 अक्तूबर 25:19 (रात्रि 01:19)
17 अक्तूबर 11:5218 अक्तूबर सूर्योदय 
19 अक्तूबर सूर्योदय 20 अक्तूबर 03:53
23 अक्तूबर 25:28 (रात्रि 01:28)24 अक्तूबर 26:38 (रात्रि 02:38) 
29 अक्तूबर 12:0031 अक्तूबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – नवंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                    समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 नवंबर 23:503 नवंबर सूर्योदय 
4 नवंबर सूर्योदय 5 नवंबर 04:51
6 नवंबर 06:457 नवंबर सूर्योदय 
8 नवंबर सूर्योदय 8 नवंबर 08:45
12 नवंबर 04:2512 नवंबर सूर्योदय 
14 नवंबर सूर्योदय 14 नवंबर 20:09
16 नवंबर सूर्योदय 16 नवंबर 14:37
20 नवंबर 09:2221 नवंबर 09:53
24 नवंबर 15:3225 नवंबर सूर्योदय 
26 नवंबर सूर्योदय 27 नवंबर 24:23
30 नवंबर सूर्योदय 1 दिसंबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – दिसंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                        समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
1 दिसंबर सूर्योदय तक 
2 दिसंबर सूर्योदय 2 दिसंबर 10:38 
3 दिसंबर 12:21 4 दिसंबर 13:39 
9 दिसंबर 12:3310 दिसंबर सूर्योदय 
18 दिसंबर सूर्योदय 18 दिसंबर 19:04
22 दिसंबर सूर्योदय 22 दिसंबर 25:37 (रात्रि 01:37) 
24 दिसंबर सूर्योदय 25 दिसंबर 07:36 
28 दिसंबर सूर्योदय 29 दिसंबर सूर्योदय 
31 दिसंबर सूर्योदय 1 जनवरी (2021) सूर्योदय 

अथ कीलकम् :------आचार्य डा.अजय दीक्षित

अथ कीलकम् :------

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आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

ऊँ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य शिव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्रीमहासरस्वती देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोग: ।

 

ऊँ नमश्चण्डिकायै ।।

 

मार्कण्डेय उवाच 

ऊँ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।

श्रेय:प्राप्तिनिमित्ताय नम: सोमार्धधारिणे ।।1।।

सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् ।

सोsपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्पर: ।।2।।

सिद्धय्न्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि ।

एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति ।।3।।

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किंचिदपि विद्यते ।

विना जाप्येन सिद्धयेत सर्वमुच्चाटनादिकम् ।।4।।

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशंकामिमां हर: ।

कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ।।5।।

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार स: ।

समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ।।6।।

सोsपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशय: ।

कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहित: ।।7।।

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति ।

इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ।।8।।

यो निष्कीलां विधायैना नित्यं जपति संस्फुटम् ।

स सिद्ध: स गण: सोsपि गन्धर्वो जायते नर: ।।9।।

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते ।

नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।।10।।

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति ।

ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधै: ।।11।।

सौभाग्यादि च यत्किंचिद् दृश्यते ललनाजने ।

तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ।।12।।

शनैस्तु जप्यमानेsस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकै: ।

भवत्येव समग्रापि तत: प्रारभ्यमेव तत् ।।13।।

ऎश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पद: ।

शत्रुहानि: परो मोक्ष: स्तूयते सा न किं जनै: ।।14।।

 

।। इति देव्या: कीलकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

अथ देव्या कवचम :---आचार्य डा.अजय दीक्षित

अथ देव्या कवचम🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया:--
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महर्षि मार्कण्डेयजी बोले – हे पितामह! संसार में जो गुप्त हो और जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करता हो और जो आपने आज तक किसी को बताया ना हो, वह कवच मुझे बताइए। श्री ब्रह्माजी कहने लगे – अत्यन्त गुप्त व सब प्राणियों की भलाई करने वाला कवच मुझसे सुनो, प्रथम शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघंटा, चौथी कूष्माण्डा, पाँचवीं स्कन्दमाता। छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्री, आठवीं महा गौरी, नवीं सिद्धि दात्री यह देवी की नौ मूर्त्तियाँ, “नवदुर्गा” कहलाती हैं। आग में जलता हुआ, रण में शत्रु से घिरा हुआ, विषम संकट में फँसा हुआ मनुष्य यदि दुर्गा के नाम का स्मरण करे तो उसको कभी भी हानि नहीं होती। रण में उसके लिए कुछ भी आपत्ति नहीं और ना उसे किसी प्रकार का दुख या डर ही होता है।

हे देवी! जिसने श्रद्धा पूर्वक तुम्हारा स्मरण किया है उसकी वृद्धि होती है। और जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करने वाली हो। चामुण्डा प्रेत पर, वाराही भैंसे पर, रौद्री हाथी पर, वैष्णवी गरुड़ पर अपना आसन जमाती है। माहेश्वरी बैल पर, कौमारी मोर पर, और हाथ में कमल लिए हुए विष्णु प्रिया लक्ष्मी जी कमल के आसन पर विराजती है। बैल पर बैठी हुई ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित ब्राह्मी देवी हंस पर बैठती है और इस प्रकार यह सब देवियाँ सब प्रकार के योगों से युक्त और अनेक प्रकार के रत्न धारण किये हुए है।

भक्तों की रक्षा के लिए संपूर्ण देवियाँ रथ मेंबैठी तथा क्रोध में भरी हुई दिखाई देती हैं तथा चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, भाला और त्रिशूल एवं उत्तम शारंग आदि शस्त्रों को दैत्यों के नाश के लिए और भक्तों की रक्षा करने के लिए और देवताओं के कल्याण के लिए धारण किया है। हे महारौद्रे! अत्यन्त घोर पराक्रम, महान बल और महान उत्साह वाली देवी! तुमको मैं नमस्कार करता हूँ। हे देवि! तुम्हारा दर्शन दुर्लभ है तथा आप शत्रुओं के भय को बढ़ाने वाली हैं।

हे जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऎंन्द्री मेरी रक्षा करें, अग्निकोण में शक्ति, दक्षिण कोण में वाराही देवी, नैऋत्यकोण में खड्ग धारिणी देवी मेरी रक्षा करें। वारुणी पश्चिम दिशा में, वायुकोण में मृगवाहिनी, उत्तर में कौमारी और ईशान में शूलधारिणी देवी मेरी रक्षा करें, ब्राह्मणी ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करें और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करें और इसी प्रकार शव पर बैठ  चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें।

जया देवी आगे, विजया पीछे की ओर, अजिता बायीं ओर, अपराजिता दाहिनी ओर मेरी रक्षा करें, उद्योतिनी देवी शिखा की रक्षा करें तथा उमा शिर में स्थित होकर मेरी करें, इसी प्रकार मस्तक में मालाधारी देवी रक्षा करें और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करें। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा, नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे, नेत्रों के मध्य में शंखिनी देवी और द्वारवासिनी देवी कानों की रक्षा करें, सुगंधा नासिका में और चर्चिका ऊपर के होंठ में, अमृतकला नीचे के होंठ की, सरस्वती देवी जीभ की रक्षा करे, कौमारी देवी दाँतों की और चण्डिका कण्ठ प्रदेश की रक्षा करे, चित्रघण्टा गले की घण्टी की और महामाया तालु की रक्षा करे, कामाक्षी ठोढ़ी की, सर्वमंगला वाणी की रक्षा करे।

भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी पीठ के मेरुदण्ड की रक्षा करें, कण्ठ के बाहरी भाग की नील ग्रीवा और कण्ठ की नली की नलकूबरी रक्षा करे, दोनो कन्धों की खड्गिनी और वज्रधारिणी मेरी दोनों बाहों की रक्षा करे, दण्डिनी दोनों हाथों की और अम्बिकादेवी समस्त अंगुलियों की रक्षा करे, शूलेश्वरी देवी संपूर्ण नखोंकी, कुलेश्वरी देवी मेरी कुक्षि की रक्षा करे, महादेवी दोनों स्तनों की, शोक विनाशिनी मन की रक्षा करे, ललितादेवी ह्रदय की, शूलधारिणी उदर की रक्षा करे।

कामिनी देवी नाभि की गुह्येश्वरी गुह्य स्थान की, पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे, सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने वाली महाबलादेवी दोनों जंघाओं की रक्षा करे, विन्ध्यावासिनी दोनों घुटनों की और तैजसी देवी दोनों पाँवों के पृष्ठ भग की, श्रीधरी पाँवों की अंगुलियों की, स्थलवासिनी तलुओं की, दंष्ट्रा करालिनीदेवी नखों की, ऊर्ध्वकेशिनी केशों की, बागेश्वरी वाणी की रक्षा करे, रोमाबलियों के छिद्रों की कौबेरी और त्वचा की बागेश्वरी देवी रक्षा करे। पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी की रक्षा करे।

कालरात्री आँतों की रक्षा करें, मुकुटेश्वरी देवी पित्त की, पद्मावती कमलकोष की, चूड़ामणि कफ की रक्षा करें, ज्वालामुखी नसों के जल की रक्षा करें, अभेद्यादेवी शरीर के सब जोड़ो की रक्षा करें, बह्माणी मेरे वीर्य की, छत्रेश्वरी छाया की और धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन तथा बुद्धि की रक्षा करें। प्राण अपान, समान, उदान और व्यान की वज्रहस्ता देवी रक्षा करें, कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे, रस, रूप, गन्ध शब्द और स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी मेरी रक्षा करें तथा मेरे सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें।

आयु की रक्षा बाराही देवी करे, वैष्णवी धर्म की तथा चक्रिणी देवी मेरी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन, विद्या की रक्षा करे, इन्द्राणी मेरे शरीर की रक्षा करे और हे चण्डिके! आप मेरे पशुओं की रक्षा करिये। महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करे, मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षमाकरी देवी रक्षा करे, राजा के दरबार में महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी चारों ओर से मेरी रक्षा करे।

जो स्थान रक्षा से रहित हो और कवच में रह गया हो उसकी पापों का नाश करने वाली जयन्ती देवी रक्षा करे। अपना शुभ चाहने वाले मनुष्य को बिना कवच के एक पग भी कहीं नहीं जाना चाहिए क्योंकि कवच रखने वाला मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता हैं, वहाँ-वहाँ उसे अवश्य धन लाभ होता है तथा विजय प्राप्त करता है। वह जिस अभीष्ट वस्तु की इच्छा करता है वह उसको इस कवच के प्रभाव से अवश्य मिलती हैऔर वह इसी संसार में महा ऎश्वर्य को प्राप्त होता है, कवचधारी मनुष्य निर्भय होता है, और वह तीनों लोकों में माननीय होता है, देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी कठिन है।

जो नित्य प्रति नियम पूर्वक तीनों संध्याओं को श्रद्धा के साथ इसका पठन-पाठन करता है उसे देव-शक्ति प्राप्त होती है, वह तीनों लोकों को जीत सकता है तथा अकाल मृत्यु से रहित होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है, उसकी लूता, चर्मरोग, विस्फोटक आदि समस्त व्याधियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं और स्थावर, जंगम तथा कृत्रिम विष दूर होकर उनका कोई असर नहीं होता है तथा समस्त अभिचारक प्रयोग और इस तरह के जितने यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र इत्यादि होते हैं इस कवच के हृदय में धारण कर लेने पर नष्ट हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त पृथ्वी पर विचरने वाले भूचर, नभचर, जलचर प्राणी उपदेश मात्र से, सिद्ध होने वाले निम्न कोटि के देवता, जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुल देवता, कण्ठमाला आदि डाँकिनी शाँकिनी अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाँकिनियाँ, गृह, भूत, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस वैताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी उस मनुष्य को जिसने कि अपने हृदय में यह कवच धारण किया हुआ है, देखते ही भाग जाते हैं। इस कवच के धारण करने से मान और तेज बढ़ता है।

जो मनुष्य इस कवच का पाठ करके उसके पश्चात सप्तशती चंडीका का पाठ करता है उसका यश जगत में विख्यात होता है, और जब तक वन पर्वत और काननादि इस भूमण्डल पर स्थित हैं, तब तक यहाँ पुत्र पौत्र आदि सन्तान परम्परा बनी रहती है, फिर देहान्त होने पर मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है जो देवताओं के लिए भी कठिन है और अन्त में सुन्दर रूप को धारण करके भगवान शंकर के साथ आनन्द करता हुआ परम मोक्ष को प्राप्त होता है।

 

संतान गोपाल स्तोत्र :----आचार्य डा.अजय दीक्षित

संतान गोपाल स्तोत्र :-----🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् ।

सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ।।1।।

नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम् ।

यशोदांकगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम् ।।2।।

अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।

नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा ।।3।।

गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम् ।

पुत्रसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुंगवम् ।।4।।

पुत्रकामेष्टिफलदं कंजाक्षं कमलापतिम् ।
देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम ।।5।।

पद्मापते पद्मनेत्र पद्मनाभ जनार्दन ।

देहि में तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते ।।6।।

यशोदांकगतं बालं गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।

अस्माकं पुत्रलाभाय नमामि श्रीशमच्युतम् ।।7।।

श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिहरणाच्युत ।

गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन ।।8।।

भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।।9।।

रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा ।

भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गत: ।।10।।

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।11।।

वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।12।।

कंजाक्ष कमलानाथ परकारुरुणिकोत्तम ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।13।।

लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।14।।

कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।

नमामि पुत्रलाभार्थं सुखदाय बुधाय ते ।।15।।

राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे कवे ।

तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ।।16।।

अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ।।17।।

श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।।18।।

अस्माकं पुत्रसम्प्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।

रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।।19।।

वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।

पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ।।20।।

डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।

भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ।।21।।

नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।

कमलानाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ।।22।।

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ।।23।।

यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनम् ।

वन्देsहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ।।24।।

नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।

रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ।।25।।

पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।

अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ।।26।।

गोपालडिम्भ गोविन्द वासुदेव रमापते ।

अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ।।27।।

मद्वांछितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।

मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ।।28।।

याचेsहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसम्पदम् ।

भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ।।29।।

आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।

अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ।।30।।

वन्दे सन्तानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।

अस्माकं पुत्रसम्प्राप्त्यै सदा गोविन्दच्युतम् ।।31।।

ऊँकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।

कलींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ।।32।।

वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।

देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ।।33।।

राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।

समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ।।34।।

अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।

देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ।।35।।

नन्दपाल धरापाल गोविन्द यदुनन्दन ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।।36।।

दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।

गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ।।37।।

यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।

देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ।।38।।

अस्माकं वांछितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।

भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ।।39।।

रमाहृदयसम्भार सत्यभामामन:प्रिय ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।।40।।

चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।

अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ।।41।।

कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।

देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ।।42।।

देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।

समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ।।43।।

भक्तमन्दार गम्भीर शंकराच्युत माधव ।

देहि मे तनयं गोपबालवत्सल श्रीपते ।।44।।

श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।

भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ।।45।।

जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।

वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ।।46।।

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।47।।

दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।48।।

गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।49।।

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।

मत्पुत्रफलसिद्धयर्थं भजामि त्वां जनार्दन ।।50।।

स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखाम्बुजं 

विलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलांगम् ।

स्पृशन्तमन्यस्तनमंगुलीभि-

र्वन्दे यशोदांकगतं मुकुन्दम् ।।51।।

याचेsहं पुत्रसन्तानं भवन्तं पद्मलोचन ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।52।।

अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।

शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ।।53।।

वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।

कुरु मां पुत्रदत्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ।।54।।

कुरु मां पुत्रदत्तं च यशोदाप्रियनन्दन ।

मह्यं च पुत्रसंतानं दातव्यं भवता हरे ।।55।।

वासुदेव जगन्नाथ गोविन्द देवकीसुत ।

देहि मे तनयं राम कौसल्याप्रियनन्दन ।।56।।

पद्मपत्राक्ष गोविन्द विष्णो वामन माधव ।

देहि मे तनयं सीताप्राणनायक राघव ।।57।।

कंजाक्ष कृष्ण देवेन्द्रमण्डित मुनिवन्दित ।

लक्ष्मणाग्रज श्रीराम देहि मे तनयं सदा ।।58।।

देहि मे तनयं राम दशरथप्रियनन्दन ।

सीतानायक कंजाक्ष मुचुकुन्दवरप्रद ।।59।।

विभीषणस्य या लंका प्रदत्ता भवता पुरा ।

अस्माकं तत्प्रकारेण तनयं देहि माधव ।।60।।

भवदीयपदाम्भोजे चिन्तयामि निरन्तरम् ।

देहि मे तनयं सीताप्राणवल्लभ राघव ।।61।।

राम मत्काम्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद ।

देहि मे तनयं श्रीश कमलासनवन्दित ।।62।।

राम राघव सीतेश लक्ष्मणानुज देहि मे ।

भाग्यवत्पुत्रसंतानं दशरथात्मज श्रीपते ।।63।।

देवकीगर्भसंजात यशोदाप्रियनन्दन ।

देहि मे तनयं राम कृष्ण गोपाल माधव ।।64।।

कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शंकर ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।65।।

गोपबालमहाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।।66।।

दिशतु दिशतु पुत्रं देवकीनन्दनोsयं 

दिशतु दिशतु शीघ्रं भाग्यवत्पुत्रलाभम् ।

दिशति दिशतु श्रीशो राघवो रामचन्द्रो 

दिशतु दिशतु पुत्रं वंशविस्तारहेतो: ।।67।।

दीयतां वासुदेवेन तनयो मत्प्रिय: सुत: ।

कुमारो नन्दन: सीतानायकेन सदा मम ।।68।।

राम राघव गोविन्द देवकीसुत माधव ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।69।।

वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।70।।

ममाभीष्टसुतं देहि कंसारे माधवाच्युत ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।71।।

चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।72।।

विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।

देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ।।73।।

नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।

मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ।।74।।

भगवन कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।

देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गत: ।।75।।

स्वामिंस्त्वं भगवन् राम कृष्ण माधव कामद ।

देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गत: ।।76।।

तनयं देहि गोविन्द कंजाक्ष कमलापते ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।77।।

पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्नजनक प्रभो ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।78।।

शंखचक्रगदाखड्गशांर्गपाणे रमापते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।79।।

नारायण रमानाथ राजीवपत्रलोचन ।

सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ।।80।।

राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।

रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ।।81।।

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।82।।

मुनिवन्दित गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।83।।

गोपिकार्जितपंकेजमरन्दासक्तमानस ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।84।।

रमाहृदयपंकेजलोल माधव कामद ।

ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।85।।

वासुदेव रमानाथ दासानां मंगलप्रद ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।86।।

कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।87।।

पुत्रप्रद मुकुन्देश रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।88।।

पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।89।।

दयानिधे वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।90।।

पुत्रसम्पत्प्रदातारं गोविन्दं देवपूजितम् ।

वन्दामहे सदा कृष्णं पुत्रलाभप्रदायिनम् ।।91।।

कारुण्यनिधये गोपीवल्लभाय मुरारये ।

नमस्ते पुत्रलाभार्थं देहि मे तनयं विभो ।।92।।

नमस्तस्मै रमेशाय रुक्मिणीवल्लभाय ते ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।93।।

नमस्ते वासुदेवाय नित्यश्रीकामुकाय च ।

पुत्रदाय च सर्पेन्द्रशायिने रंगशायिने ।।94।।

रंगशायिन् रमानाथ मंगलप्रद माधव ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।95।।

दासस्य मे सुतं देहि दीनमन्दार राघव ।

सुतं देहि सुतं देहि पुत्रं देहि रमापते ।।96।।

यशोदातनयाभीष्टपुत्रदानरत: सदा ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।97।।

मदिष्टदेव गोविन्द वासुदेव जनार्दन ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।98।।

नीतिमान् धनवान् पुत्रो विद्यावांश्च प्रजायते ।

भगवंस्त्वत्कृपायाश्च वासुदेवेन्द्रपूजित ।।99।।

य: पठेत् पुत्रशतकं सोsपि सत्पुत्रवान् भवेत् ।

श्रीवासुदेवकथितं स्तोत्ररत्नं सुखाय च ।।100।।

जपकाले पठेन्नित्यं पुत्रलाभं धनं श्रियम् ।

ऎश्वर्यं राजसम्मानं सद्यो याति न संशय: ।।101।।

।।इति सन्तानगोपालस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

श्री मद् देवी भागवत महापुराण :--तेरहवां अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

इस अध्याय में मेनका के गर्भ के अर्धांश से गंगा के प्राकट्य का आख्यान, देवर्षि नारद द्वारा हिमालय को गंगा का माहात्म्य सुनाना, ब्रह्मादि देवताओं द्वारा हिमालय से भगवती गंगा को ब्रह्मलोक ले जाने की याचना करना आदि है. 

श्रीमहादेवजी बोले – वत्स ! मैं वह कथा सुना रहा हूँ, जिस प्रकार सती ने दो रूप धारण कर मेनका के गर्भ से हिमवान के घर पुत्री रूप में जन्म लिया।।1।। मुने ! पहले वे अपने अंश से धवल कान्तियुक्त गंगा के रूप में प्रकट हुईं. भगवान शंकर के सिर पर स्थान पाने के लिये उन्होंने जलरूप धारण किया. उसके बाद गौरी के रूप में वे शंकरप्रिया पूर्णावतार धारण कर अतिशय प्रेम के कारण शिव के शरीरार्ध में स्थित होकर उनकी अर्धांगिनी बनी।।2-3।। 

महामते ! वे गंगा रूप में कैसे प्रकट हुईं, उस प्रकरण को सुनो, जिसका श्रवण करने से ब्रह्म-हत्या के पाप से लिप्त मनुष्य भी तत्क्षण मुक्त हो जाता है।।4।। सुमेरु की पुत्री मेना गिरिराज हिमवान की पत्नी थीं. जगदम्बा ने अपने अंशरूप से उनके यहाँ पुत्रीरूप में जन्म लिया।।5।। सती गंगा रूप से मेना के गर्भ में आयीं और गिरिश्रेष्ठ हिमवान की पत्नी ने एक सुमुखी सर्वांगसुन्दरी कन्या को जन्म दिया।।6।। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया (अक्षयतृतीया) के दिन मध्यान्ह में गौरवर्णा सुन्दर मुख कमल वाली गंगा प्रकट हुईं।।7।।

वे कृष्णकटाक्षयुक्त, तीन नेत्रों और चार भुजाओं से सुशोभित थीं. कन्या जन्म की बात सुनकर पर्वतराज बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर उन्हें प्रचुर दान-दक्षिणा दी. शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला तथा वर्षाकाल में नदी के जल के समान वह कन्या पिता के घर में बड़ी होने लगी।।8-9½।। एक दिन पर्वतराज हिमालय जब उस कन्या को गोद में लेकर अन्त:पुर में बैठे थे, उसी समय साक्षात् भगवती के अंश से गंगा को उत्पन्न हुआ जानकर ब्रह्मापुत्र देवर्षि नारद उनके दर्शनहेतु वहाँ पधारे, जिन परा प्रकृति की आराधना करके भगवान शंकर कामरूप क्षेत्र में स्थित रहते हैं।।10-11½।।

नारदजी बोले – प्रभो ! ब्रह्मन् ! सुनिए, मैं वह उपाय बताता हूँ, जिससे भगवान शिव का रोष हम लोगों के प्रति प्रसन्नता में बदल जाएगा. ऎश्वर्याशाली गिरिराज हिमालय धर्मज्ञ हैं और उदार भी हैं. इन्द्रादि देवताओं को साथ लेकर आप उनके पास जाकर गंगा को माँग लें. आपके अनुरोध से वे अवश्य भगवती गंगा को आपको प्रदान कर देंगे।।37-39।। तब उन्हें स्वर्ग में लाकर एक बड़े उत्सव का आयोजन करके भगवान शिव को उसमें आमन्त्रित कर आग्रहपूर्वक गंगा को उन्हें प्रदान कर दीजिए।।40।। जैसे छायासती उनके सिर पर स्थित रहीं वैसे ही ये जलरूप में उनके सिर पर निश्चित ही सुशोभित रहेंगी. इससे भगवान शंकर प्रसन्न हो जाएँगे।।41½।। 

ब्रह्माजी बोले – पुत्र ! तुम चिरंजीवी होओ. जैसा तुमने कहा वैसा करने से भगवान शंकर अवश्य प्रसन्न हो जाएँगे. अत: पुत्र ! तुम शीघ्रतापूर्वक इन्द्रादि देवों के पास जाकर उन्हें सारी बात बताकर मेरे पास आने का संदेश दे दो।।42-43½।। 

श्रीमहादेव जी बोले – महामते ! ब्रह्माजी के ऎसा कहने पर नारद मुनि प्रसन्न होकर वहाँ गये, जहाँ महामना इन्द्रादि देवगण विराजमान थे।।44½।। 

नारदजी बोले – प्रभो देवराज ! मैं ब्रह्मलोक से महात्मा पिताजी की आज्ञा से आपके पास आया हूँ. मृत्युलोक में हिमवान के गृह में साक्षात् देवी सती ने पुत्रीरूप से जन्म लिया है. अपने अर्धांश से महादेवी त्रैलोक्यपावनी गंगा के रूप में आयी हैं. उन्हें स्वर्ग में लाने के लिए ब्रह्माजी पृथ्वीतल पर जाएँगे. देवश्रेष्ठों ! आप लोग शीघ्र ही मृत्युलोक चलने के लिए ब्रह्मलोक आएँ।।45-47½।।       

देवगण बोले – मुनिवर ! आप क्या कह रहे हैं? क्या स्वयं सती ने मृत्युलोक में जन्म लिया है? मुने ! क्या भगवान शंकर को यह बात बता दी गयी है?।।48½।।

नारदजी बोले – उन गंगा को स्वर्गलोक में लाने के बाद मैं शिवजी के पास जाऊँगा, देवगणों ! आप लोग शीघ्र ब्रह्माजी के निकट पहुँचें।।49½।।

श्रीमहादेवजी बोले – तब देवगण “तथास्तु” कहकर ब्रह्मलोक पहुँचे. हर्ष से विकसित मुखकमल वाले उन इन्द्रादि देवगणों ने जगत्पति महात्मा ब्रह्माजी को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पूछा – प्रभो ! हमारे लिए क्या आज्ञा है?।।50-51½।। 

ब्रह्माजी बोले – महादेवी सती हिमवान के घर में अपने अर्धांश से गंगारूप से जन्मी हैं. इसी प्रकार उमा भी वहाँ अवतार लेंगी. उन ज्येष्ठपुत्री गंगा को स्वर्ग में लाने के लिए हम लोग वहाँ चलेंगे।।52-53।। इन्द्र, कुबेर, वरुण, चन्द्र, सूर्य, अग्नि, वायु और बुद्धिमान नारद – आप सब लोग अपने-अपने स्थानों से मेरे साथ चलने को शीघ्र तैयार हो जाएँ।।54½।।    

श्रीमहादेवजी बोले – मुनिपुंगव ! इन्द्रादि देवगण “ऎसा ही हो” कहकर गंगा को माँगने का विचार कर महर्षि नारद तथा ब्रह्माजी के साथ हिमालय के पास शीघ्र पहुँच गये।।55-56।। देवताओं की चेष्टा जानकर महादेवी गंगा ने उससे पिछली रात्रि को ही गिरिराज को स्वप्न में श्वेतवर्ण, त्रिनयना, मकरवाहना एक देवी दिखायी दीं. वे सामने आकर बोलीं – पिताजी ! मैं आपकी पुत्री हूँ. एकमात्र मैं ही आद्या प्रकृति हूँ, और मैं वही हूँ जिसका दक्षप्रजापति की पुत्री सती रूप से पिता के यज्ञ में शरीर त्यागकर अपने पति शिव से वियोग हो गया था. शिवजी भी मेरे वियोग में व्यथित होकर कामरूपक्षेत्र में रहने लगे. वे मुझे पत्नीरूप से पुन: प्राप्त करने के लिए तप कर रहे हैं. आपने भी पुत्रीरूप से मुझे पाने के लिए भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है. इसलिए मैं अपने अर्धांश से इस समय आपके घर में आयी हूँ. अपने दूसरे अर्धांश से भी मैं आपकी ही पुत्री बनूँगी।।58-62।। 

मुझे ले जाने के लिए ब्रह्मादि देवगण आपके पास प्रार्थना करने आएँगे. मैं उन देवताओं के साथ स्वर्ग चली जाऊँगी और उन महान देवताओं के द्वारा भगवान शंकर को दी जाने पर मैं पुन: उन्हें पतिरूप से प्राप्त कर लूँगी. पिताजी ! मेरे लिए आप मोहासक्त होकर कभी भी शोक न करें।।63-64।। 

पिताजी ! आपको ये बातें पहले ही इसलिए बता दी हैं, जिससे आप ऎसा होने पर दु:खी न हों. मुने ! गिरिराज से स्वप्न में ऎसा कह करके वे गंगाजी अन्तर्धान हो गयीं और तब हिमवान जग गये. उन्होंने गंगाजी की कही हुई सारी बातों पर विचार किया।।65-66।। गिरिराज को इस विषय में पहले जो मोह था, वह दूर हो गया. मुनिश्रेष्ठ ! तब महान तेजस्वी ब्रह्मादि देवगण हिमालय के यहाँ गंगा को ले जाने की इच्छा से आये. उन बुद्धिमान गिरिराज ने उन्हें प्रणाम करके कहा – देवगणों ! आप यहाँ कैसे आये? जो उचित हो, वैसा आप मुझे कहिए।।67-68½।।

देवगण बोले – पर्वतराज ! सभी लोकों में दानी के रूप में आपकी कीर्ति गायी जाती है. गिरे ! आज हम सभी आपके पास भिक्षा माँगने आये हैं।।69½।। उनका ऐसा वचन सुनकर गिरिरज को स्वप्न में देखा सारा वृत्तान्त याद आ गया कि नारदजी ने भी पूर्व में ऎसा ही कहा था, तब हिमालय ने कोई उत्तर नहीं दिया था. तदनन्तर मन में विचारकर गिरिराज ने देवताओं से यह कहा – ।।70-71।। देवगणों ! आप लोग तो त्रिलोक के स्वामी हैं. आप देवों को भिक्षा माँगने की क्या आवश्यकता हो गयी? आप बतायें कि मैं आपको क्या प्रदान करूँ?।।72।। 

ब्रह्माजी बोले – वत्स ! सुनो, मैं बताता हूँ जिस कारण सभी प्रकार के रत्नों से सुशोभित ये देवगण तुम्हारे पास आये हैं।।73।। परा प्रकृति ही स्वयं दक्षप्रजापति की कन्या सती बनकर जन्मी थीं. उन साध्वी ने त्रिभुवनपति भगवान शंकर का वरण किया था. गिरिश्रेष्ठ ! दक्षप्रजापति ने कुबुद्धि के कारण भगवान शंकर की निन्दा में लीन रहते हुए द्वेष-बुद्धि से एक महायज्ञ का आयोजन किया. उसने इन्द्र प्रभृति सभी देवताओं को आमन्त्रित किया. मुझे और विष्णु को भी बुलाया, किंतु महान मूर्खतावश सती और शिव को नहीं बुलाया।।74-76।।

गिरे ! इस कारण महादेवी सती कुपित होकर स्वयं दक्ष के नगर को जाने के लिए उद्यत हुईं, यद्यपि शिवजी ने उन्हें अनेक प्रकार से रोकना चाहा।।77।। अपने प्रभुत्व के अभिमान से शिवजी ने ऎसा किया है – यह सोचकर सती ने भगवान शिव को अपराधी समझा और क्रुद्ध होकर वे उन्हें छोड़कर दक्ष के घर को चली गयीं।।78।।  दक्षप्रजापति ने भी माया के वशीभूत होकर शिव की निन्दा की. इसलिए सती ने अपराधी दक्ष और शिव दोनों को विमोहित कर और छोड़कर अपनी माया से मृत छायाशरीर धारण कर लिया. स्वयं वे पूर्णा नित्या ब्रह्मस्वरुपा अन्तर्धान हो गयीं।।79-80।। त्रिभुवनपति भगवान शिव दु:ख से व्याकुल होकर उस छायासती को सिर पर लिए धरातल पर नृत्य करने लगे. उस ताण्डव से त्रिभुवन रसातल को जाने लगा. ऎसा देखकर देवताओं ने विष्णु से त्रिभुवन की रक्षा करने की प्रार्थना की।।81-82।। 

पर्वतराज ! परमपुरुष भगवान विष्णु ने चक्र से छायासती के उस शरीर को धीरे-धीरे काट दिया. परमेश्वर शिव उस देह के वियोग से दु:खी होकर आज भी हमसे रुष्ट हैं।।83-84।। वे ही भगवती दाक्षायणी सती अब तुम्हारे घर में अपने अंशभाग से त्रिलोकेश्वरी गंगा के रुप में आयी हैं. ये भगवान शिव की पूर्वपत्नी हैं और उन्हें ही पुन: प्राप्त करेंगी, परंतु भगवान शंकर हम लोगों से रुष्ट ही रह जाएँगे. अत: यदि आप इस कन्या को हमें दे दें और हम इसे स्वर्गलोक में ले जाकर एक महोत्सव का आयोजन कर भगवान शंकर को समर्पित कर दें तो इससे हमें परम आनन्द प्राप्त होगा।।85-87½।।

जो जगदम्बा अपने पूर्णांश से आपकी दूसरी पुत्री के रूप में जन्मेगी उन्हें आप स्वयं ही परमेश्वर सदाशिव को सादर समर्पित करेंगे. गिरे ! इस कन्या को हमें दे दीजिए. हम इसे ले जाकर भगवान शम्भु को समर्पित क देंगे।।88-89।।

हिमालय बोले – कन्या अपने पिता के घर में हमेशा के लिए तो रहती नहीं. वह तो दूसरे को देने के लिये ही होती है, अपनी नहीं होती. इस बात को मैं अच्छी तरह समझता हूँ, फिर भी गंगा के जाने का मेरे मन में असहनीय दु:ख होगा।।90-91।।

श्रीमहादेवजी बोले – ऎसा कहकर महामति गिरिराज हिमालय गंगा को गोद में बिठाकर अश्रु भरे नेत्रों से बहुविध रुदन करने लगे. तब गंगाजी बोलीं – पिताजी ! आप मेरे लिये दु:खी न हों. मुझे ब्रह्माजी को दे दें. अब मैं स्वर्ग जाऊँगी।।92-93।। मैं आपसे दूर नहीं हूँ और न आप ही मुझसे दूर हैं. आप भक्त हैं और मैं भक्ति से प्राप्य हूँ. अत: आप मुझे सदा अपने निकट ही पाएँगे।।94।। पिता से ऎसा कहकर तथा उन्हें प्रणाम करके गिरिसुता गंगा भूतपति सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी के पास चली गयीं।।95।। 

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “गंगागमन” नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।    

🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️जय सियाराम जय जय हनुमान

श्री मद् देवी भागवत महापुराण :-- बारहवां अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

।। ओम् कामाख्या देव्यै नमः ।।
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श्री मद् देवी भागवत महापुराण :---- बारहवां अध्याय
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                ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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                       ओम् गं गणपतये नमः

इस अध्याय में शंकर जी का योनिपीठ कामरूप (कामाख्या) में जाकर तपस्या करना है, जगदम्बा द्वारा प्रकट होकर शीघ्र ही गंगा तथा हिमालय पुत्री पार्वती के रूप में आविर्भूत होने का उन्हें वर प्रदान करना है, भगवान शंकर द्वारा इक्यावन शक्तिपीठों में प्रधान कामरूप पीठ के माहात्म्य का प्रतिपादन है ।

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श्रीमहादेवजी बोले – तब नारदजी ने विष्णु भगवान के पास जाकर घटित घटनाओं और देवाधिदेव के सारे व्यवहार का यथावत वर्णन किया।।1।।

 शिवजी के व्याकुलचित्त होकर शापित करने की बात सुनकर ब्रह्मा सहित भगवान विष्णु कामरूपप्रदेश में गये।।2।।

 वे वहाँ शोक से व्याकुलचित्त हुए भगवान महेश को, जिनका सारा शरीर आँसुओं से भीग-सा गया था, देखने और सान्त्वना देने गये थे. उन दोनों को आया देखकर भगवान शिव अपनी पत्नी सती को अनेक प्रकार से याद करते हुए सामान्य जन की तरह मुक्तकण्ठ से रुदन करने लगे।।3-4।।

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ब्रह्मा और विष्णु बोले – देवदेवेश शंकर ! आप इस प्रकार व्यर्थ ही क्यों रो रहे हैं? आप जानते हैं कि सती विद्यमान हैं, अत: सारी बात जानने वाले आपका मूढ़वत शोक करना उचित नहीं है।।5।।

शिवजी बोले – आप लोग ठीक कहते हैं. मैं जानता हूँ कि सती प्रकृतिरूपा हैं, वे शुद्धा, नित्या, ब्रह्ममयी और सृष्टि, स्थिति तथा संहार करने वाली हैं।।6।। 

दक्षयज्ञ के नष्ट होने के बाद मैंने उन्हें अपनी आँख से उसी रूप में देखा भी है, लेकिन पहले की तरह पत्नी भाव से अपने घर में उन महेश्वरी को न पाकर इस समय मेरा मन अत्यन्त व्याकुल हो रहा है. इसलिए ब्रह्मन् विष्णो ! मैं पूर्ववत् उन्हें कैसे प्राप्त करूँगा? आप मुझे अब इसका उपाय बताएँ।।7-8½।।        

ब्रह्मा और विष्णु बोले – देव ! आप शान्तचित्त होकर इस कामरूपपीठ में रहकर मन में महादेवी का ध्यान करते हुए समाहित चित्त से तपस्या करें. यह महापीठ है, यहाँ ही परमेश्वरी साक्षात् विराजमान होकर अपने साधकों को प्रत्यक्ष फल प्रदान करती हैं. इसमें संशय नहीं है. इस सिद्धपीठ का माहात्म्य कौन बता सकता है! आप तो परमेश्वर हैं, सर्वज्ञ हैं, सब कुछ जानते हैं, हम लोग आपको क्या बतायें? शिव ! अब आप शान्तचित्त हो जाएँ।।9-12।।

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शिवजी बोले – मैं अब यहीं रहकर स्थिरचित्त हो उग्र तपस्या करूँगा, जैसा कि आप दोनों ने अभी कहा है।।13।।

श्रीमहादेवजी बोले – इतना कहकर शिवजी ने कामरूप सिद्धपीठ पर उन परमेश्वरी जगदम्बा का ध्यान करते हुए शान्त एवं समाहितचित्त होकर तप किया. ब्रह्मा और विष्णु भी उसी महापीठ पर रहते हुए समाहितचित्त होकर कठोर और परम तप करने लगे।।14-15।।

 बहुत समय बीतने पर जगदम्बा प्रसन्न हुईं और उन जगन्माता ने त्रैलोक्य मोहिनी रूप में उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया. महादेवी ने पूछा कि आपकी क्या अभिलाषा है, बताएँ।।16½।।

शिवजी बोले – परमेश्वरी ! जिस प्रकार आप पहले मेरी गृहिणी बनकर रहती थीं, वैसे ही कृपापूर्वक पुन: रहें।।17½।।

देवीजी बोलीं – महेश्वर ! शीघ्र ही मैं हिमालाय की पुत्री बनकर स्वयं अवतार लूँगी और निश्चय ही मैं दो रूपों में सामने आऊँगी. चूँकि आपने सती के शरीर को सिर पर उठाकर हर्षपूर्वक नृत्य किया था, अत: मैं उनके अंश से जलमयी गंगा का रूप धारन करके आपको ही पतिरूप में प्राप्त कर आपके सिर पर विराजमान रहूँगी. दूसरे रूप से मैं पार्वती होकर आपके घर में पत्नीभाव से रहूँगी. शंकर ! महामति ! मेरा यह रूप पूर्णावतार होगा।।18-21।।

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श्रीमहादेवजी बोले – तब ब्रह्मा और विष्णु को भी उनका अभिलषित वर प्रदान करके भगवती जगदम्बा स्वयं अन्तर्धान हो गयीं।।22।। 

इसके अनन्तर महादेवी दुर्गा ने हिमालय के यहाँ मेनका के गर्भ में दो रूपों में अवतार लिया. भगवती ने ज्येष्ठा-रूप से गंगा और कनिष्ठा-रूप से शुभ लक्षणों वाली पार्वती बनकर जन्म लिया. महामति शिव भी प्रसन्नचित्त होकर कामरूप पर्वत पर कामाख्यापीठ के निकट पुन: कठोर तपस्या करने लगे. उस महापीठ के माहात्म्य से भगवती ने स्वयं प्रसन्न होकर शिव को अभीष्ट वर प्रदान किया. इसी प्रकार जब भी अन्य कोई उस सिद्धपीठ में भगवती की आराधना करता है तो उसे वे देवी मनिवाँछित फल प्रदान करती हैं।।23-26½।। 

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श्रीनारदजी बोले – महेश्वर ! मुझे कामरूप का माहात्म्य बतायें, जहाँ साक्षात् प्रकट होकर भगवती प्रत्यक्ष फल देती हैं. परमेश्वर ! चूँकि सभी पीठों की क्रमिक गणना में वह श्रेष्ठ पीठ है इसीलिए आपने भी वहीं तपस्या करके जगदम्बा की आराधना की थी।।27-28½।।

श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! धरातल पर छाया सती के अंग-प्रत्यंग गिरने से इक्यावन शक्तिपीठ बन गये. महामते ! उनमें कामरूप श्रेष्ठतम शक्तिपीठ है।।29-30।। 

जहाँ भगवती साक्षात् निवास करती हैं, उस सिद्धपीठ में जाकर ब्रह्मपुत्र नद के लिए लालिमा लिए जल में स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से भी सद्य: संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है. ब्रह्मपुत्र नद भगवान विष्णु का साक्षात् जलरूप है, उसमें स्नान करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।।31-32½।।

वहाँ विधिपूर्वक स्नान एवं पितरों का तर्पण करके साधक को भक्तिपूर्वक भगवती कामेश्वरी को इस मन्त्र से नमस्कार करना चाहिए – “मैं कामरूप में निवास करने वाली उन भगवती कामाख्या कामेश्वरी को नमस्कार करता हूँ, जिन सुरेश्वरी का स्वरुप तपे हुए स्वर्ण की कान्ति के समान सुशोभित है.” तत्पश्चात मानस-कुण्डादि तीर्थों में जाकर विधिपूर्वक स्नान करके यथाविधि कामरूपक्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए. सिद्धपीठ कामाख्या के दर्शन करके मनुष्य सद्य: मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, अन्य कोई उपाय नहीं है।।33-36।।

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वहाँ तन्त्रोक्त विधि से परमेश्वरी का पूजन करके जप-होमादि करने से जैसा फल प्राप्त होता है, करोड़ों मुखों से भी मैं उसका वर्णन करने में समर्थ नहीं हूँ।।37½।।

 महामुने ! उस पवित्र क्षेत्र में जिसकी मृत्यु हो जाती है, उसे सद्य: मुक्ति निश्चित ही प्राप्त हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है. महामुने ! अधिक क्या कहूँ, मनुष्यों की तो बात छोड़िए, देवता भी उस पुण्यक्षेत्र में मृत्यु की कामना करते हैं. वत्स ! मैंने आपको संक्षेप में कामरूपक्षेत्र का माहात्म्य बताया, जो सभी पापों का नाश करने वाला है।।38-40½।। 

उस पवित्र क्षेत्र में महादेवी की स्तुति करके भगवान शिव तपस्या करने लगे. सती ने हिमवान के घर में दो रूपों में जन्म लिया. इस प्रकार जिन परा प्रकृति भगवती ने दक्ष के घर में जन्म लिया था, उन्होंने परमकीर्ति स्थापित करके लोकरक्षण के लिए भगवान महेश्वर को पुन: प्राप्त करने हेतु मेनका के गर्भ में प्रवेश किया।।41-43।। 

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महापातकों का नाश करने वाले जगदम्बा के इस चरित्र का जो परम भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह शिवत्व को प्राप्त करता है।।44।। 

सभी देवता, मनुष्य, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और चारणादि उस पुण्यात्मा मनुष्य के इसी जन्म में आज्ञा के वशवर्ती हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं. इस पुण्य-चरित्र का श्रवण करने वाले मनुष्य की आज्ञा का उल्लंघन करने में कहीं कोई समर्थ नहीं होता. उसके दुर्गम और अति दुष्कर कार्य भी क्षण मात्र में ही अवश्य सिद्ध हो जाते हैं।।45-46।।

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इस पुण्य चरित्र के श्रवण से जन्म-जन्मार्जित पाप नष्ट हो जाए हैं, शत्रुओं का नाश होता है और वंश की वृद्धि होती है।।47।।

 महामते ! सत्य तो यह है कि जिन्होंने संसार में जन्म लेकर इस पुण्यचरित्र का श्रवण नहीं किया, उनका इस मृत्युलोक में जन्म लेना ही व्यर्थ है. संसाररूपी रोग के परमौषधरूप देवी के इस पवित्र आख्यान को सुनकर महान् पातकी मनुष्य भी सद्य: जीवन्मुक्त हो जाता है।।48-49।।

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।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “कामरूपादिमाहात्म्यवर्णन” नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।      

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁😞🍁जय सियाराम जय जय हनुमान

श्री मद् देवी भागवत महापुराण :-- ग्यारहवां अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

।।जय हो माता वैष्णोदेवी की ।।
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श्री मद् देवी भागवत महापुराण :-- ग्यारहवां अध्याय
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                  ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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                         ओम् गं गणपतये नमः

इस अध्याय में त्रिदेवों द्वारा जगदम्बिका की स्तुति करना, देवी का भगवान शंकर को पार्वती रूप में पुन: प्राप्त होने का आश्वासन देना, छाया सती की देह लेकर शिव का प्रलयंकारी नृत्य करना, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को काटना और उनसे इक्यावन शक्तिपीठों का प्रदुर्भाव होना बताया गया है ।

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श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर सती के वियोग से दु:खी शिव साधारण मनुष्यों के समान बार-बार रुदन करने लगे।।1।। 

तब ब्रह्मा और विष्णु ने उन भगवान से कहा – महाज्ञानी ! आप अज्ञानी के समान मोहग्रस्त होकर क्यों रुदन कर रहे हैं?।।2।। 

वे देवी जगदम्बा तो सनातन पूर्णब्रह्मस्वरुपा हैं. वे ही महाविद्या हैं, समस्त विश्व की सृष्टि करने वाली हैं और सर्वचैतन्यस्वरूपिणी हैं. जिनकी माया के प्रभाव से सम्पूर्ण संसार तथा हम सभी विमोहित हैं, उनके द्वारा शरीर छोड़ने की बात तो भ्रान्तिपूर्ण विडम्बना ही है।।3-4।। 

प्रभो! महेश्वर! जिनकी कृपा से आप मृत्युंजय हैं, उनकी मृत्यु तो वास्तविक नहीं है. यह भ्रममात्र ही है।।5।। 

हम तीनों पुरुष (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) भी उन्हीं के स्वरुप हैं. इस बात से (अर्थात भगवती को मृत मानकर प्राकृत पुरुष की भाँति विलाप करने से) आप ही की निन्दा ध्वनित होती है, उनकी नहीं।।6।। 

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परमेश्वर ! उन पार्वती की निन्दा घोर पाप को उत्पन्न करने वाली है, जिसके द्वारा इस प्रकार का पाप होता है, उसका वे निश्चय ही त्याग कर देती हैं।।7।। 

वे महादेवी धर्मशील पुरुष का कभी त्याग नहीं करती. अधर्मी का त्याग करने में वे पिता आदि संबंधों का भी विचार नहीं करती।।8।। 

उनका संबंध तो मात्र धर्म से ही रहता है न कि लौकिक कारणों से. जो धर्माचरण करता है, वही उनका पिता, माता और बान्धव है।।9।। 

जो अधर्म करने वाला है, वह उनका बान्धव नहीं परम शत्रु है. इसी कारण भगवान शिव की निन्दारूपी पाप में रत देखकर दक्षप्रजापति का उन महेश्वरी ने त्याग कर दिया. यदि वे पराम्बा दक्ष की पुत्री के भाव में स्थित होती तो दुर्दान्त दक्षप्रजापति का दमन कैसे होता? इसलिए धर्म-कर्म के फल को प्रदान करने वाली वे महादेवी उस महापापी का त्याग करके स्वयं अपने धाम में चली आईं।।1011।। 

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क्या वे क्षण मात्र में ही प्रजापति का संहार करने में असमर्थ थीं? फिर भी उन्होंने इसकी जो उपेक्षा की वह लोकशिक्षण के लिए था. धर्म का उपदेश करने वाली वे भगवती यदि ऎसा आचरण नहीं करती तो लोग पिता के प्रति सहिष्णु कैसे हो पाते? इसलिए वे नित्या परमा शक्ति प्रजापति दक्ष को अपनी माया से मोहित करते हुए और स्वयं अपनी मायाशक्ति से अन्तर्धान होकर गगन-मण्डल में स्थित हो गईं. महादेव ! आप शोक का त्याग करें, क्योंकि अग्नि में तो सती की छाया ने ही प्रवेश किया है।।13-16।।

शिवजी बोले – आप लोगों ने जो कुछ कहा वह सत्य ही है. सती मेरी परा प्रकृति हैं. वे नित्या, ब्रह्ममयी और सूक्ष्मरूपा हैं. उन्होंने स्वयं अपनी देह का त्याग नहीं किया है. किंतु वे मेरे प्राणों की एकमात्र प्रियतमा सती कहाँ चली गयीं? (इस भाव से मुझे व्याकुलता होती है) पुन: जब मैं शान्तचित्त होता हूँ तो उन्हें परमेश्वरी के रूप में देखता हूँ।।17-18।। 

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र बोले – उन सर्वलोक की एकमात्र वन्दिता जगज्जननी की हम लोग स्तुति करते हैं, तभी प्रसन्न होकर वे पुन: दर्शन देंगी।।19।। 

श्रीमहादेव जी बोले – नारद ! भगवान शिव के साथ वे देवगण ऎसा निश्चय करके साक्षात् ब्रह्मस्वरूपिणी महादेवी की स्तुति करने लगे।।20।।

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ब्रह्मा, विष्णु और शिव बोले – आप नित्या, परमा विद्या, जगत में चैतन्यरूप से व्याप्त और पूर्ण-ब्रह्मस्वरूपा देवी हैं. आप स्वेच्छा से शरीर धारण करती हैं. आपका वह परम रूप वेद और आगम से सुनिश्चित अद्वैत ब्रह्म ही है. अपरोक्षानुभूति से जानने योग्य तथा परम गोपनीय आपको हम नमस्कार करते हैं।।21-22।। 

आप सृष्टि के निमित्त प्रकृति और पुरुष के रुप में स्वयं ही शरीर धारण करती हैं, इसलिए वेदों के द्वारा आपको कल्पित द्वैतरूपा कहा गया है. उस सृष्टि प्रक्रिया में भी आपके बिना पुरुष अपूर्ण और शव के समान ही है. अत: सभी देवताओं में आपकी प्रधानता कही जाती है।।23-24।। 

शिवे ! इस प्रकार की अचिन्त्य रूप और लीला वाली आपकी स्तुति करने में हम अल्पबुद्धिवाले कैसे सक्षम हो सकते हैं. आप स्वयं स्वेच्छा से हमारी सृष्टि और संहार करती हैं. इसलिए इस त्रिलोकी में आपकी स्तुति करने में कौन समर्थ है! ।।25-26।। 

सभी ज्ञानीजन भी सामान्य मनुष्यों की भाँति आपकी माया से मोहित हैं तो हम आप परमेश्वरी की वन्दना करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं? आप ही हमारी चेतना, बुद्धि और शक्ति हैं, आपके बिना हम सभी शव की तरह हैं. अत: हम आपकी स्तुति कैसे करें! आप त्रिगुणात्मक बन्धन से बाँधकर अपनी माया से अज्ञानियों की भाँति हमें भी भ्रान्त कर रही हैं, अत: आपके यथार्थ स्वरुप को कौन जान सकता है! ।।27-29।।

 परमेश्वरी ! दक्ष प्रजापति के घर में हम लोगों ने आपके उस रूप के दर्शन किए थे, कृपापूर्वक उसी प्रकार हमें पुन: दर्शन दें. जगत को धारण करने वाली आप महेश्वरी को न देखकर हम कान्तिहीन हो गए हैं. इस कारण शव के समान हम आपको अपनी आत्मा तथा प्राण के रूप में देखते हैं।।30-31।।

श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार स्तुति करने पर महादेवी ने देवताओं के विषाद और शिव की विकलता देखकर आकाश में उन्हें दर्शन दिया।।32।। 

भगवती काली जिस रूप में दक्ष के यज्ञ में आयी थीं और अपनी माया के द्वारा उनकी छाया जिस प्रकार अग्नि में प्रविष्ट हुई थी, उस मूल प्रकृति को उन्होंने निर्निमेष दृष्टि से देखा. उन महादेवी ने शिव से कहा – महादेव ! आप स्थिरचित्त हों, मैं स्वयं हिमालय की पुत्री बनकर तथा मेना के गर्भ से जन्म लेकर पुन: आपको प्राप्त करूँगी. यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ।।33-35।। म

हेश्वर ! मैंने आपका परित्याग कभी नहीं किया, आप ही मुझ महाकाली के हृदयस्थान और परम आश्रय हैं, इसी से आप जगत्संहारक महाकाल कहे जाते हैं।।36½।। 

आपने प्रभुता के अभिमान से मुझे कुछ कहा था, उसी अपराध के कारण मैं आपकी साक्षात् पत्नी के रूप में कुछ समय तक नहीं रह सकूँगी. शिव ! आप शान्तचित्त हो जाएँ।।37-38।। 

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शम्भो ! मैं आपको एक उपाय बताती हूँ, उसे ही आप संपन्न करें. तब निश्चय ही आप मुझे पहले से भी अधिक सुन्दर स्वरुप में पुन: प्राप्त करेंगे।।39।।

 महेश्वर ! शिव ! दक्ष की यज्ञाग्नि में मेरे जिस छाया शरीर ने प्रवेश किया था, उसे सिर पर लेकर मेरी प्रार्थना करके, आप इस पृथ्वी पर भ्रमण करें।।40।।

 वह मेरा छाया शरीर अनेक खण्डों में होकर पृथ्वी पर गिरेगा और उस-उस स्थान पर पापों का नाश करने वाला महान शक्तिपीठ उदित होगा।।41।। जहाँ योनि भाग गिरेगा, वह सर्वोत्तम शक्तिपीठ होगा. वहाँ रहकर तपस्या करके आप मुझे पुन: प्राप्त करेंगे।।42।। 

मुनिश्रेष्ठ ! ऎसा कहकर और महादेव को बार-बार आश्वासन देकर वे देवी अन्तर्धान हो गईं।।43।। 

मुने! ब्रह्मादि श्रेष्ठ देवगण अपने-अपने लोकों को चले गए और शिवजी पुन: दक्ष के घर में आकर प्रिये ! सती ! सती ! ऎसा कहते हुए सामान्य जन के समान रुदन करने लगे।।44½।।

 यज्ञशाला में प्रवेश करके उन्होंने सती के छाया शरीर को देदीप्यमान देखा. वह शरीर भूमि पर स्थित था, नेत्र मुँदे हुए थे एवं सभी अंगों से परिपूर्ण था. सती की उस छाया को सहज भाव में सोयी हुई-सी देखकर शोक से व्याकुल हृदय होकर शिवजी ने इस प्रकार कहा – ।।45-46½।। 

सती ! मैं तुम्हारा पति तुम्हारे पास आया हूँ, तुम उठो, पहले की भाँति मुझसे वार्तालाप क्यों नहीं कर रही हो? अपराधी मुझे एवं दक्ष को शोक के महासमुद्र में गिराकर अपनी माया से हमें मोहित करती हुई तुम स्वयं अन्तर्धान हो गई हो. अब मैं अपनी एकमात्र तुझ प्राणप्रिया का त्याग कभी नहीं करुँगा. प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें लेकर मैं कितने दिन घूमता रहूँगा? ।।47-49½।। 

मुने ! इस प्रकार साधारण मनुष्यों की भाँति बहुधा विलाप करते हुए शिवजी ने अपनी भुजाओं से सती के छाया शरीर का आलिंगन करते हुए उसे सिर पर उठा लिया।।50½।। 

शंकर जी सती के उस छाया शरीर को सिर पर रखकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक धरती पर नाचने लगे। ब्रह्मा आदि सुरश्रेष्ठ तथा इन्द्र के नेतृत्व में अन्य देवगण इस अपूर्व दृश्य को देखने अपने-अपने रथों में बैठकर आकाश में आ गये. दसों दिशाओं में सम्यक् पुष्पवृष्टि होने लगी. तदनन्तर सुशोभित जटाओं वाले प्रमथगण मुखवाद्य बजाने लगे और नाचने लगे।।51-53½।।

 चारों ओर नाचते हुए शिवजी सती के छाया शरीर को कभी सिर पर, कभी दाएँ हाथ में, कभी बाएँ हाथ में तो कभी कन्धे पर और कभी प्रेमपूर्वक वक्ष:स्थल पर धारण कर अपने चरण-प्रहार से पृथ्वी को कम्पित करते हुए नृत्य करने लगे।।54-55½।।

 चन्द्रलोक में स्थित चन्द्रमा उनके ललाट पर तिलक के समान सुशोभित होने लगा, नक्षत्रमण्डल देदीप्यमान जटाओं में गुँथ गया और सूर्यलोक में स्थित भगवान भास्कर उनके कण्ठाभरण बन गये।।56-57।।

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महामुने! कच्छप और शेषनाग उनके चरणाघातों से पीड़ित होकर धरती छोड़ने को उद्यत हो गये. अत्यन्त वेगपूर्वक नृत्य करने से प्रचण्ड वायु बहने लगी, जिसके कारण सुमेरु आदि बड़े-बड़े पर्वत वृक्षों के समान कांपने लगे. इस प्रकार चराचर जगत् को क्षुब्ध करते हुए और सती के छाया शरीर को सिर पर धारण किये हुए नटराज शिव सम्पूर्ण पृथ्वी पर घूमते रहे और वे प्रसन्नतापूर्वक मन में ऎसा सोचने लगे – ।।58-60।।

 सती ! तुम मेरी पत्नी हो, इसलिए मैं लोकलाज छोड़कर तुम्हारी छाया को सिर पर ढो रहा हूँ, यह मेरा अहोभाग्य है. इस प्रकार अपने भाग्य की सराहना करते हुए शिवजी आनन्दमग्न होकर पुन:-पुन: नृत्य करने लगे।।61-62।। 

इससे सारा संसार अत्यन्त क्षुब्ध होने गया, पक्षीगण मृतक के समान हो गये और लोग अकाल प्रलय की कल्पना करने लगे।।63।। 

ब्रह्माजी की आज्ञा से ऋषिगण महान् स्वस्तिवाचन करने लगे. देवताओं को चिन्ता हुई कि यह कैसी विपत्ति आ गयी. वे सोचने लगे कि अब संसार की रक्षा का कोई उपाय नहीं दिखता. इस दक्ष ने शिवजी से द्वेष करने के कारण ऎसा कुयज्ञ प्रारम्भ किया, जिससे इस संसार सहित हम सबका नाश हो जाएगा. विघूर्णित नेत्र वाले, सर्वसमर्थ शिवजी तो आनन्द से मतवले होकर सृष्टि पर आयी इस विपत्ति का विचार नहीं कर रहे हैं, वे जगत्संहारक रुद्र कैसे शान्त होंगे? ।।64-67।।

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भगवान विष्णु बोले – देवगणों ! मैं उपाय बताता हूँ, आप लोग उसका प्रयत्न करें. महादेवी ने पहले ऎसा कहा था कि सती का छाया शरीर भूतल पर अनेक खण्डों में निश्चय ही गिरेगा और जहाँ-जहाँ इस देह के खण्ड गिरेंगे, उन-उन स्थानों पर शक्तिपीठ रूप पुण्यतीर्थ का उदय होगा. उन देवी ने जो कुछ भी कहा है, वह कभी असत्य नहीं होगा।।67-71।। 

सती का छाया शरीर भूतल पर अवश्य गिरेगा. अत: सृष्टि की रक्षा के लिए मैं महान् साहस करके परमानन्दमग्न शिव के सिर पर स्थित सती के छाया शरीर को समर्थ सदाशिव के अनजाने में सुदर्शन चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर गिराऊँगा. मेरे द्वारा ऎसा करने पर शिवजी के कोप से निश्चय ही वे ब्रह्ममयी जगत्पालनकारिणी महादेवी मेरी रक्षा करेंगी।।72-74½।।

देवी बोलीं – प्रभु विष्णु ! जगन्नाथ ! आप ऎसा यदि करें, तभी जगत् की रक्षा होगी नहीं तो प्रलय हो जाएगा।।75½।। 

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁जय सियाराम जय जय हनुमान

श्री मद् देवी भागवत महापुराण :--दसवां अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

🍁 जगत जननी नमस्तुभ्यं 🍁
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         श्री मद् देवी भागवत महापुराण:---दसवां अध्याय
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                    ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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                          ओम् गं गणपतये नमः

इस अध्याय में सती के यज्ञकुण्ड में प्रवेश का समाचार सुनकर भगवान शंकर का शोक से विह्वल होना, उनके तृतीय नेत्र की अग्नि से वीरभद्र का प्राकट्य, वीरभद्र द्वारा दक्ष का यज्ञ-विध्वंस कर उनका सिर काटना, ब्रह्माजी का भगवान शंकर से यज्ञ पूर्ण करने की प्रार्थना करना, भगवान शंकर की कृपा से दक्ष का जीवित होना, है ।

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श्रीमहादेव जी बोले – इसके बाद ब्रह्माजी के पुत्र मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने वहाँ (कैलास पर) आकर देवाधिदेव त्रिलोचन शिवजी से अश्रुपूरित नेत्रों से कहा – देवदेव! आपको नमस्कार है. महेश्वर ! मैं नारद दक्षप्रजापति के घर से आया हूँ. आपने यह समाचार सुना है या नहीं कि आपकी प्राणप्रिया सती दक्षप्रजापति के यज्ञ में गयी हुई थीं. वहाँ आपकी निन्दा सुनकर उन्होंने क्रोधित होकर अपना देह त्याग दिया. दक्ष “सती”, “सती” ऎसा बार-बार आक्षेप करके पुन: करके पुन: यज्ञ करने में लग गए और देवगण आहुति ग्रहण करने लगे।।1-4।।

नारद के मुख से यह महान कष्टकारी बात सुनकर तीन नेत्रों वाले देवाधिदेव शिव ने शोकाकुल होकर बहुत तरह से विलाप किया. हा सती ! मुझे शोकसागर में छोड़कर तुम कहाँ चली गई हो? अब मैं तुम्हारे बिना कैसे जीवित रहूँगा? पिता के घर जाने के लिए मैंने तुम्हें अनेक तरह से रोका था, शिवे! क्या उसी से रुष्ट होकर तुम मेरा परित्याग करके चली गई! ।।5-7।।

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 महामुने ! इस प्रकार बहुत तरह से विलाप कर लाल-लाल नेत्रों तथा मुखवाले त्रिलोचन महादेव अत्यन्त कुपित हो उठे।।8।। भगवान रुद्र को कोपाविष्ट देखकर सभी प्राणी भयभीत हो गए, सारा जगत अत्यधिक विक्षुब्ध हो उठा और पृथ्वी डोलने लगी।।9।। 

उनके ऊर्ध्व नेत्र से अत्यन्त तेजस्वी अग्नि प्रादुर्भूत हुई और उस अग्नि से एक परम पुरुष उत्पन्न हुआ. विशाल विग्रह धारण करते हुए वह कालान्तक यमराज के समान प्रतीत हो रहा था और प्रज्वलित अग्नि के स्फुलिंगों की आभावाले तीन भयानक नेत्रों से युक्त था. वह अपने समस्त अंगों में विभूति धारण किए हुए था, अपने ललाट पर उसने अर्धचन्द्रमा को मुकुट की भाँति धारण कर रखा था और मध्यान्हकालीन करोड़ों सूर्यों की आभा तथा जटाजूट से उसका मस्तक सुशोभित हो रहा था।।10-12।।

देवाधिदेव महेश्वर महादेव को प्रणाम करके तथा तीन बार उनकी प्रदक्षिणा कर उसने दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा – पिताजी ! मैं क्या करूँ? यदि आप मुझे आज्ञा प्रदान करें तो अभी आधे क्षण में इस चराचर ब्रह्माण्ड को नष्ट कर डालूँ. क्या इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओं को उनके बाल पकड़कर आपके सामने ला दूँ? विभो ! यदि आप कहें तो यमराज को भी मार डालूँ. महेशान! यह मेरी प्रतिज्ञा है मैं आपसे यह सच-सच कह रहा हूँ. जिसके शमन के लिए आप मुझसे इस समय कहेंगे मैं उसका शमन कर दूँगा. चाहे वह सुरश्रेष्ठ इन्द्र ही क्यों ना हो. यदि वैकुण्ठनाथ विष्णु भी उसकी सहायता करने लगेंगे तो मैं आपकी आज्ञा से उन्हें भी कुण्ठित अस्त्रवाला कर दूँगा।।13-17½।।

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शिवजी बोले – तुम्हारा नाम वीरभद्र है और तुम प्रमथगणों के अधिपति हो. मेरी आज्ञा से दक्ष के नगर में जाकर तुम शीघ्र ही उनके यज्ञ को नष्ट कर डालो. वत्स ! मेरा परित्याग करके जो देवतागण वहाँ गए हैं और उस दक्ष की सहायता कर रहे हैं, मेरी आज्ञा से तुम उनका भी निग्रह करो. मेरी निन्दा करने में संलग्न दक्षप्रजापति का भी मुख काट डालो. पुत्र ! वहाँ शीघ्र जाओ, विलम्ब मत करो।।18-20½।।

वीरभद्र से ऎसा कहकर त्रिनेत्रधारी महादेव शिव ने लम्बी साँसें छोड़ी, उनसे हजारों शिवगण उत्पन्न हो गए. वे सब के सब भयंकर कर्म करने वाले तथा युद्धविद्या में पूर्ण पारंगत थे. वे अपने हाथों में गदा, खड्ग, मूसल, प्रास, त्रिशूल तथा पाषाण आदि अस्त्र लिए हुए थे।।21-22½।। 

उन गणों से घिरे हुए महामति वीरभद्र परमेश्वर शिव को प्रणाम कर तथा तीन बार उनकी प्रदक्षिणा करके वहाँ से चल पड़े।।23½।। 

तत्पश्चात वे सभी प्रमथगण सिंहनाद करते हुए क्षणभर में ही दक्षपुरी पहुँच गए, जहाँ उसका यज्ञ चल रहा था।।24½।।

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 इसके बाद क्रोधयुक्त वीरभद्र ने कोपाविष्ट प्रमथगणों से कहा – शीघ्र ही यज्ञ का नाश कर दो और देवताओं को भगा दो।।25½।।

 उसके बाद उन प्रमथगणों ने उस महायज्ञ का विध्वंस कर डाला. कुछ गणों ने यज्ञ के खम्भे उखाड़कर उन्हें दसों दिशाओं में फेंक दिया, किसी ने यज्ञकुण्ड की अग्नि बुझा दी तथा अन्य गण हव्य खाने लगे और क्रोध से लाल-लाल आँखों वाले कुछ गण देवताओं को खदेड़ने लगे।।26-27½।। 

इस प्रकार उन भयानक रूपवाले प्रमथगणों के द्वारा ध्वस्त किये गये यज्ञ को देखकर विष्णु ने वहाँ आकर प्रमथगणों से यह वचन कहा – तुम लोगों ने यज्ञ को क्यों नष्ट किया और देवताओं को क्यों भगा दिया? तुम लोग कौन हो? इन सभी बातों को बताओं, देर मत करो।।28-29½।। 

प्रमथों ने कहा – प्रभो! हम लोग देवाधिदेव शिव के द्वारा भेजे गए प्रमथगण हैं. हम शिव को अपमानित करने वाले इस महायज्ञ को नष्ट कर रहे हैं।।30½।।

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 इसी बीच प्रतापशाली वीरभद्र ने क्रोध में आकर प्रमथगणों से कहा – शिव के प्रति द्वेषभाव रखने वाला वह दुराचारी दक्ष कहाँ है? इन सभी को पकड़कर मेरे सामने ले आओ।।31-32।।

 इस प्रकार आदेश पाकर प्रमथगण क्रोधित होकर दसों दिशाओं में दौड़ पड़े. वे क्रोधाभिभूत होकर सभी देवताओं को पकड़-पकड़कर रौंदने लगे. कुछ गणों ने सूर्य को पकड़कर उनके दाँतों को चूर-चूर कर दिया और किसी गण ने अग्निदेव को बलपूर्वक पकड़कर उनकी जीभ काट ली. किसी ने भय के मारे भागते हुए मृगरूपधारी यज्ञपुरुष का सिर काट लिया और किसी ने देवी सरस्वती की नाक काट ली ।

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किसी गण ने अर्यमा की दोनों भुजाएँ काट डालीं तो दूसरे गण ने अंगिरा ऋषि का ओष्ठ ही काट लिया. किसी गण ने यम, नैऋत तथा वरुणदेव को बाँध लिया।।33-36।। 

ब्राह्मणों को देखकर उन्हें विनयपूर्वक प्रणाम करके प्रमथगणों ने कहा – विप्रगण! आप लोग भय का त्याग कर दीजिए और यहाँ से चले जाइए. उसे सुनते ही सभी ब्राह्मण यज्ञ में प्राप्त वस्त्र, अलंकार आदि लेकर अपने-अपने घर चले गए।।37-38।। 

परम बुद्धिमान इन्द्र ने मोर का रूप धारण कर लिया और उड़कर पर्वत पर जा करके वे छिपकर यह सब कौतुक देखने लगे।।39।। 

इस प्रकार प्रमथगणों के द्वारा भगा दिए गए, श्रेष्ठ देवताओं को देखकर नारायण विष्णु मौन होकर मन-ही-मन सोचने लगे – यह मूर्खबुद्धि दक्ष शिव से विद्वेष करते हुए यज्ञ कर रहा है. तब यदि उसे वैसा फल नहीं मिलता तो वेदवचन ही निरर्थक हो जाता. शिव के प्रति दक्ष का विद्वेष होने से नि:संदेह मेरे प्रति भी उसका द्वेषभाव ही हुआ, क्योंकि मैं ही शिव हूँ और शिव ही विष्णु हैं. इस प्रकार हम दोनों में कोई भेद नहीं है।।40-42।। 

मैं दक्ष के द्वारा इस विष्णुरूप से विशेषरूप से प्रार्थित हुआ और महादेव के रूप में निन्दित भी मैं ही हुआ हूँ. इसका भी दो प्रकार का भाव है. यह कर्म तथा मन से दो तरह का भाव रखता है. अत: मैं भी अब वही करूँगा. मैं विष्णुरूप से रक्षक और शिवरूप से संहारक बनूँगा. इस प्रकार स्नेहमिश्रित युद्ध करके और फिर उसमें पराजित होकर स्वयं रूद्ररूप से उस दक्ष का शमन भी करूँगा, इसमें संदेह नहीं है. इसके बाद मैं देवताओं को साथ लेकर यज्ञ पूर्ण करूँगा, यही विष्णु की आराधना का फल कहा गया है।।43-46½।। 

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इस प्रकार मन में निश्चय करके शंख, चक्र तथा गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु ने प्रमथगणों को रोक दिया और वे सिंहनाद करने लगे।।47½।।

 इसके बाद वीरभद्र ने क्रोधित होकर सनातन विष्णु से कहा – विष्णो! आप ही यज्ञापति हैं – ऎसा श्रुतियाँ कहती हैं. इस महायज्ञ में शिव की निन्दा करने वाला वह दुराचारी दक्ष कहाँ है? उसे आप स्वयं लाकर मेरे हवाले कर दीजिए, नहीं तो आप मेरे साथ युद्ध कीजिए. प्राय: विशिष्ट शिवभक्तों में आप अग्रणी हैं और आप ही शिव के प्रति द्वेषभाव रखनेवालों के हित के लिए तत्पर भी दिखाई दे रहे हैं।।48-50½।।

तत्पश्चात विष्णु ने मुस्कुराकर कहा – मैं तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा. मुझे युद्ध में पराजित कर दक्ष को ले जाओ, मैं भी तुम्हारा पराक्रम देखता हूँ।।51½।। 

इतना कहकर विष्णु ने धनुष उठाया और चारों ओर बाणों का जाल-सा फैला दिया. उन बाणों से क्षणभर में ही प्रमथगणों के सभी अंग क्षत-विक्षत हो गए. सैकड़ों गण रक्त का वमन करने लगे और हजारों बेहोश हो गए।।52-53।। 

उसके बाद उस वीरभद्र ने भी विष्णु को लक्ष्य करके गदा चलायी. उनके शरीर का स्पर्श करते ही उस गदा के सैकड़ों खण्ड हो गए. तब विष्णु ने भी रोष में आकर वीरभद्र की ओर गदा चलायी. महामुने ! वह गदा भी उसके पास आते ही उसी तरह सौ टुकड़ों में हो गयी. तदनन्तर क्रोध से दीप्त नेत्रों वाले अनन्तात्मा विष्णु ने क्षण भर में ही लौहमयी एक दूसरी गदा उठा ली. तत्पश्चात खट्वांग लेकर वीरभद्र ने उन गदाधर विष्णु के बाहुदण्ड पर प्रहार करके उनकी गदा भूमि पर गिरा दी. 

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इससे अत्यन्त कुपित विष्णु ने अपने तेज से प्रज्वलित महाभयंकर सुदर्शन चक्र को उस वीरभद्र के ऊपर चला दिया. मुने! उसे देखकर वीरभद्र ने भी मन में भगवान शिव का स्मरण किया. उससे वीरभद्र के कण्ठ तक पहुँचा हुआ वह चक्र माला की भाँति सुशोभित होने लगा।।54-59।। 

तत्पश्चात युद्ध में भगवान विष्णु ने क्रुद्ध होकर सैकड़ों सूर्यों की भाँति कान्तिवाला खड्ग ले लिया और वे वीरभद्र को मारने के लिए दौड़े. तब विशाल भुजाओं वाले प्रतापी वीरभद्र ने उसी क्षण अपने हुंकार मात्र से खड्ग तथा उन विष्णु – दोनों को स्तम्भित कर दिया. उसके बाद क्रोधोन्मत्त वह वीरभद्र स्तंभित हुए उन विष्णु को मारने के लिए शूल तथा मुद्गर उठाकर उनकी ओर झपटा।।60-62।।

 उसी बीच यह आकाशवाणी हुई – “वीरभद्र! रुक जाओ! युद्ध में इस तरह से क्रोध को प्राप्त होकर क्या तुम अपने को भूल गये हो. जो विष्णु हैं, वे ही महादेव हैं और जो शिव हैं वे ही स्वयं विष्णु हैं. इन दोनों में कभी कहीं कोई भी अन्तर नहीं है”।।63-64।। 

यह सुनकर महामति वीरभद्र ने शिवस्वरुप विष्णु को नमस्कार कर “दक्ष के केश पकड़कर” यह वचन कहा – प्रजापते! तुमने जिस मुख से परम पुरुष देवेश्वर शिव की निन्दा की है, अब मैं उसी मुख पर प्रहार करता हूँ।।65-66।।

 ऎसा कहकर क्रोध से अत्यन्त लाल नेत्रों वाले वीरभद्र ने दक्ष के मुख पर बार-बार प्रहार करके अपने नख के अग्रभाग से उसे काट डाला. साथ ही जो लोग महादेव जी की निन्दा सुनकर हर्षित हुए थे, प्रमथाधिपति वीरभद्र ने उनकी भी जीभ तथा कान काट डाले।।67-68।। 

इस प्रकार यज्ञ के विनष्ट हो जाने पर ब्रह्माजी कैलास पर्वत पर गये और भगवान शिव को प्रणाम करके यज्ञविधान के लोप की बात कहने लगे।।69।। 

ब्रह्माजी ने महादेव जी से कहा – आप ऎसा क्यों कर रहे हैं? जगन्माता ब्रह्मस्वरूपिणी सती तो सनातन हैं. उनका देहग्रहण और जन्म लेना तो भ्रान्तिपूर्ण और विडम्बना मात्र है. वे तो जगद्व्यापिनी महामाया हैं. उन्होंने ही दक्ष को मोहित करने के लिए यज्ञकुण्ड के पास छायासती को स्थापित कर दिया था. दक्षप्रजापति को मोहित करने के उद्देश्य से वही छाया यज्ञाग्नि में प्रवेश कर गयी और परा प्रकृति भगवती स्वयं आकाश में विराजमान हो गयीं. क्या उस रहस्य को आप नहीं जानते हैं? फिर ऎसा क्यों कर रहे हैं?।।70-73।।

देवदेवेश ! आइये और अपने शरणागतों पर कृपा कीजिए. आप तो विधि का संरक्षण करने वाले हैं, अत: विधि का लोप मत कीजिए. हम लोगों के साथ वहाँ यज्ञ सम्पन्न करने के पश्चात परमेशानी सती की विधिवत प्रार्थना करके आप उन्हें पुन: अवश्य ही देखेंगे. महादेव ! अब आप दक्षप्रजापति के घर चलिए. भगवन् ! मुझ पर अनुग्रह कीजिए, आपको अन्यथा नहीं करना चाहिए।।74-76।। 

उनकी यह बात सुनकर शिवजी दक्षप्रजापति के घर गये. वहाँ शिव को आया देखकर वीरभद्र ने उन्हें प्रणाम किया।।77।। उसके बाद भगवान शिव की प्रार्थना कर के ब्रह्माजी ने उनसे पुन: आदरपूर्वक कहा – महेशान! अब आप आज्ञा दीजिए, जिससे यज्ञ पुन: आरंभ हो सके।।78।।

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तब शिवजी ने उत्सुक वीरभद्र को आज्ञा दी – वीरभद्र ! क्रोध छोड़ो और यज्ञ की सारी व्यवस्था फिर से कर दो।।79।।

 महादेव से आज्ञा प्राप्त करके वीरभद्र ने उसी क्षण पूर्व की भाँति यज्ञ को व्यवस्थित कर दिया और सभी देवताओं को बन्धनमुक्त कर दिया।।80।। 

उसके बाद ब्रह्माजी ने देवाधिदेव त्रिलोचन शिव से फिर कहा – परमेश्वर ! अब दक्ष को जीवित करने के लिए आज्ञा प्रदान कीजिए।।81।। 

उन ब्रह्मा की वह बात सुनते ही भगवान शंकर ने कहा – वीरभद्र ! महाबाहु ! दक्ष को अब अवश्य ही जीवित कर दो।।82।। 

देवाधिदेव शंकर का वचन सुनकर बुद्धिमान उस वीरभद्र ने एक बकरे का सिर जोड़कर दक्षप्रजापति को जीवित कर दिया।।83।।

 जो लोग ईश्वर की निन्दा करते हैं, वे निश्चय ही गूँगे पशु हैं. मुने ! ऎसा विचार करके वीरभद्र ने दक्ष को बकरे का सिर जोड़ा था।।84।।

 ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर सभी देवादि भयमुक्त होकर पुन: आ गये. दक्षप्रजापति ने महेश्वर को आहुति देकर यज्ञ का समापन किया।।85।।

 उसके बाद ब्रह्मा तथा विष्णु ने दक्षप्रजापति से कहा – अनेक स्तुतियों के द्वारा आदरपूर्वक शिव की आराधना कीजिए. बहुत दिनों तक देवेश्वर शिव की निन्दा करके आपने जो पाप अर्जित किया है, उससे मुक्ति की इच्छा रखते हुए आप सनातन भगवान शिव की स्तुति कीजिए. ये भगवान शिव स्वभाव से ही आशुतोष हैं और शिव नाम लेने मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं. आपके प्रति इनकी अप्रसन्नता तब नहीं रहेगी।।86-88।।

 उन दोनों की यह बात सुनकर दक्ष ने शाश्वत परमेश्वर महादेव को प्रणाम किया और उनका स्तवन करना आरम्भ किया।।89।।

दक्ष बोले – आपको तत्त्वत: न तो विष्णु, न ब्रह्मा और न मुख्य योगीगण ही जान पाते हैं. अत: दुर्बुद्धि मैं आपके उस दुर्गम्य स्वरूप को जानने में कैसे समर्थ होता? आप ही सबके बुद्धितत्व हैं. आपकी इच्छा के अधीन ही ये सभी लोक हैं. तब आपकी इच्छा के वशीभूत मेरे द्वारा आपकी निन्दा करने से मेरा कैसा अपराध हुआ?।।90।। 

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आप शुद्ध परम परात्पर तत्त्व हैं तथा ब्रह्मा आदि देवताओं के द्वारा पूजित हैं. मैं आपके महान चरित्र तथा स्वरुप का वर्णन कैसे करूँ? मैं आपकी शरण में आया हुआ दास हूँ. आपका चरणयुगल छोड़कर मेरे लिए दूसरा अवलम्ब ही क्या है? शम्भो ! आप मेरे उस अपराध को क्षमा कीजिए और अपने कृपागुणों से पापरूपी सागर से मेरा उद्धार कीजिए।।91।।

 पशुपते ! आप भगवान परमेश्वर हैं. इस जगत में जो भी निर्बल अथवा महान लोग हैं, वे सब आपके ही रूप हैं, क्योंकि आप विश्वरुप हैं. उस आप परमेश्वर के विद्यमान रहते मेरे द्वारा की गयी निन्दा से उत्पन्न पाप भला कैसे रह सकता है? विश्वेश्वर ! कृपापूर्वक मुझ शरणागत तथा दीन की रक्षा कीजिए।।92।।

आपके चरण कमल पराग को अपने सिर पर धारण करके ही ब्रह्मा तथा विष्णु समस्त देवताओं के द्वारा वन्दित चरण वाले हो पाए हैं. इस सभा में आये हुए आप सुरेश्वर को जो मैं अपने नेत्र से देख पा रहा हूँ, वह तो मेरे पूर्वजों का अतुलनीय भाग्य है।।93।। 

इस जगत में सभी देहधारियों में कुबुद्धि तथा सुबुद्धि के रूप में आप ही हैं. आप ही सबकी निन्दा तथा वन्दन के पात्र हैं, अत: मेरा कोई अपराध नहीं है।।94।। 

दक्ष के इस प्रकार प्रार्थना करने पर आशुतोष दयासिन्धु भगवान शिव ने अपने दोनों हाथों से उन्हें खींचकर उठा लिया।।95।।

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शिव के अंग के स्पर्शमात्र से ही दक्षप्रजापति कृतकृत्य हो गये और अपने को जीवन्मुक्त के समान तथा महान भाग्यशाली समझने लगे।।96।।

 मन, वाणी तथा शरीर से परम भक्ति से संपन्न होकर दक्षप्रजापति ने अनेकविध उपहारों द्वारा शंकर का अभुत सत्कार किया।।97।। 

उसके बाद ब्रह्माजी ने महादेव जी से पुन: भक्तिपूर्वक कहा – परमेश्वर ! एकमात्र आप भगवान सदाशिव ही भक्तों पर अनुकम्पा करने वाले हैं, क्योंकि आपने अनुग्रहपूर्वक मेरी प्रार्थना सुनकर दक्षप्रजापति की रक्षा की. आपको छोड़कर यदि देवतागण कहीं भी यज्ञ में जाएँगे तो वे उसी क्षण निश्चय ही पूर्वोक्त दशा को प्राप्त होंगे. जो नराधम यज्ञ में आपके बिना अन्य देवताओं का यजन करेंगे, उनका यज्ञकार्य नष्ट हो जाएगा और वे महापाप के भागी होंगे।।98-101।।

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।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “दक्षयज्ञविध्वंसवर्णन” नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।  

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁जय सियाराम जय जय हनुमान

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आचार्य डा.अजय दीक्षित

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श्री मद् देवी भागवत महापुराण :--द्वितीय अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

।। ओम् ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमः ।।
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श्री मद् देवी भागवत महापुराण :---द्वितीय अध्याय
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             ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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                  ओम् गं गणपतये नमः
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इस अध्याय में महामुनि जैमिनि द्वारा श्रीवेदव्यास जी से शिव-नारद-संवाद के रूप में वर्णित देवी के माहात्म्य वाले महाभागवत को सुनाने की प्रार्थना करना है ।

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सूतजी बोले – बहुत से पौराणिक आख्यानों का श्रवण (सुनना) कर लेने के बाद मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ने भूमि पर दण्ड की भाँति गिरकर व्यास जी को प्रणाम करके उनसे आदरपूर्वक पूछा !!1।।

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जैमिनि बोले – समस्त वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ मुनिवर ! आपको नमस्कार है. महामते ! इस लोक में आपसे बढ़कर वक्ता और कोई नहीं है।।2।। 

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मुने ! आपके मुखारविन्द से पुण्यमयी कथा सुनकर मैं कृतार्थ हो गया हूँ, कृतार्थ हो गया हूँ, कृतार्थ हो गया हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं है।।3।। 

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अब एक दूसरी बात जो मेरे मन में चिरकाल से स्थित है, उसके विषय में सुनना चाहता हूँ. जगत के आदि में उत्पन्न, भक्तों के दुर्गम कष्टों को दूर करने वाली, तीनों लोकों की माता, नित्यस्वरुपा, सच्चिदानन्दस्वरुपिणी जो भगवती दुर्गा हैं, ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए भी दुर्लभ जिनके दोनों चरणाविन्दों को अपने हृदय कमल पर धारण करते हुए विश्वेश्वर शिव शवरूप से स्थित हैं, उनके अनुपम माहात्म्य का आपने जो संक्षेप में वर्णन किया है, उससे मेरी तृप्ति नहीं हुई है. अत: महाभाग ! अब आप उसका विस्तार से वर्णन करने की कृपा कीजिए. मुनिश्रेष्ठ ! आपको नमस्कार है ।।4-7।।

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यह मनुष्य शरीर अत्यन्त दुर्लभ है. अनेक सैकड़ों जन्मों के बाद इसे प्राप्त कर जिसने उस भगवाती माहात्म्य का श्रवण नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है।।8।। उनका वह वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासजी ने मुनिवर जैमिनि की प्रशंसा करके उनसे कहा ।।9।।

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व्यासजी बोले – महामति ! जैमिनि ! आप परम भक्ति तथा ज्ञान से युक्त हैं. वत्स ! आपने इस समय बड़ी ही कल्याणप्रद बात पूछी है, इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं।।10।। 

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जिनका श्रवण करके भक्ति और धर्म से शून्य महान पापी मनुष्यों का भी इस लोक में पुनर्जन्म नहीं होता और जिसे सुनकर पापी मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पातकों से भी छूट जाता है, उस कथा को आप सुनना चाहते हैं, अत: आप परम भाग्यशाली हैं ।।11-12।।

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मुने ! ब्रह्महत्या अदि समस्त पाप भी तभी तक मनुष्य को ग्रस्त किए रहते हैं, जब तक भगवती का चरित्र उसके कान में पड़ नहीं जाता है. यदि सैकड़ों पाप किया हुआ मनुष्य भी इस दुर्गा चरित्र का श्रवण करता है तो उसे देखकर यमराज भी अपना दण्ड छोड़कर उसके चरणों पर गिर पड़ते हैं।।13-14

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मुने ! उन भगवती के अतुलनीय माहात्म्य को बता सकने में भला कौन समर्थ है? जिस माहात्म्य का अपने पाँच मुखों से भगवान शंकर भी वर्णन नहीं कर सके हैं।।15।। 

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वाराणसी क्षेत्र में भगवान शिव स्वयं उन भगवती का ही ब्रह्मसंज्ञक तारक महामन्त्र जो गुरुकृपा से मुझे प्राप्त हुआ, उसे तत्परतापूर्वक आकर मुमुक्षुजनों के कान में कहते हुए उन्हें निर्वाण नामक महामोक्षपद प्रदान करते हैं. ब्रह्मर्षि जैमिनि ! मोक्ष तथा निर्वाणपद प्रदान करने वाली वे भगवती सभी मन्त्रों की एकमात्र बीजस्वरुपिणी हैं. महामते ! सभी वेद मोक्ष प्रदान करने वाली उन भगवती को वहाँ के समस्त मन्त्रों की अधिष्ठात्री देवता कहते हैं ।।16-19।।

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शशक (खरगोश), मशक (मच्छर) आदि तथा और भी जो अन्य प्राणी इस पृथ्वी पर हैं, उन्हें मोक्ष देने के लिए भगवान शिव वाराणसीपुरी में “दुर्गा” – यह तारक मन्त्र कान में स्वयं प्रदान करते हैं. मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ! एकाग्रचित्त होकर आप उसे सुनिए।।20-21।

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मैं शिव-नारद-संवादरूप महान पापों का नाश करने वाले अतुलनीय दुर्गामाहात्म्य का विशेष विस्तार के साथ वर्णन करूँगा ।।22।। 

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एक समय की बात है – सभी देवतागण मन्दर पर्वत पर एकत्र हुए थे. वहाँ पर गन्धर्वों सहित सभी ऋषिगण भी आये हुए थे. अनेक प्रकार के वृक्षों से व्याप्त, सुगन्धित और विकसित पुष्पों की गन्ध से दिशाओं को सुरभित करने वाले और सुमेरु शिखर के समान प्रतीत होने वाले उस रमणीक गिरिश्रेष्ठ मन्दराचल के पृष्ठ पर बैठे हुए भगवान कृष्ण और भगवान शिव को देखकर महर्षि नारद मुनि ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक भगवान शिव से पूछा ।।23-25½।।  

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नारदजी बोले – भक्तों पर कृपा करने वाले तथा तीनों लोकों में वन्दनीय देवेश ! ज्ञानियों में श्रेष्ठ और विशुद्ध आत्मा वाले आप ही ब्रह्म नाम से जाने जाते हैं. परमेश्वर ! केवल आप ही वास्तविक तत्त्व को जानते हैं. आप तीनों लोकों को पवित्र करने वाली गंगा जी को आदरपूर्वक अपने सिर पर धारण करते हैं और चन्द्रमा को अत्यन्त सुन्दर देखकर आपने उन्हें अपने सिर का आभूषण बनाया है. सर्वज्ञ ! इस समय मैं आपसे जो पूछ रहा हूँ, उसे आप मुझे बताने की कृपा करें।।26-29।। 

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महेश्वर ! स्वयं आप, भगवान विष्णु और जगत्पति ब्रह्मा – इन देवताओं की भक्तिपूर्वक उपासना करने से परम पद प्राप्त होता है तो फिर तप के द्वारा आप लोगों का उपास्य देवता कौन है? आपके समान इस बात को वाणी से बताने में इस भूमण्डल में और कोई भी समर्थ नहीं है. कृपामूर्ति महेश्वर ! इस प्रकार के प्रभाव वाले आप लोगों के जो उपास्य देवता हैं, उनके विषय में मुझे भी अवश्य जान लेना चाहिए. अत: कृपापूर्वक मुझे बताइए।।30-32।।

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व्यासजी बोले – मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ! इस प्रकार उन देवर्षि नारद का वचन सुनकर और उस पर बार-बार विचार करके महादेवजी ने उनसे यह कहा ।।33।।

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श्रीमहादेवजी बोले – तात ! आपने जो बात पूछी है, वह तो परम गोपनीय है. वत्स ! ऎसी बात भला आपको बताने योग्य क्यों नहीं है? मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपको बताऊँगा।।34।।

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व्यासजी बोले – देवाधिदेव शिव के ऎसा कहने पर देवर्षि नारदजी दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गए और सर्वव्यापी जगन्नाथ नारायण से कहने लगे – भक्तों पर कृपा करने वाले देवाधिदेव भगवान महेश्वर अपने उपास्य इष्टदेव के विषय में बताने में कृपणता कर रहे हैं, अत: शरणागतों पर कृपा करने वाले देवेश ! आप उनसे कहने की कृपा करें।।35-36½ ।।

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श्रीनारायण बोले – तात ! उस देवता से आपका क्या प्रयोजन? आप सबके देवता तो हम हैं ही. हमारी ही आराधना करके आप परम पद प्राप्त कर लेगें, अत: हम सबके देवता से आपका क्या प्रयोजन?।।37-38।।

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व्यासजी बोले – इस प्रकार उन नारायण का भी वह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद हाथ जोड़कर स्तुति वचनों से शिव तथा विष्णु का स्तवन करने लगे ।।39।।

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नारदजी बोले – विश्वेश्वर ! देवदेव ! प्रसन होइए. नारायण ! वासुदेव ! प्रसन्न होइए. अपने शुभ्र शरीर के अंगों में सर्वरूपी आभूषण धारण करने वाले शिव ! प्रसन्न होइए. कौस्तुभमणि से विभूषित शरीर वाले नारायण ! मुझ पर प्रसन होइए।।40।। शरण देने वाले गंगाधर ! मुझ पर प्रसन्न होइए. सुदर्शन चक्र को धारण करने वाले पूजनीय विष्णो ! मुझ पर प्रसन्न होइए. दिगम्बररूप विश्वेश्वर ! मुझ पर प्रसन्न होइए. गदा धारण करने वाले विश्वेश्वर ! मुझ पर प्रसन्न होइए।।41।।

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त्रिपुर का वध करने वाले शिव को नमस्कार है. असुर कंस का वध करने वाले (कृष्णरूप) विष्णु को नमस्कार है. अन्धकासुर का विनाश करने वाले शिव को नमस्कार है और तृणावर्त का संहार करने वाले विष्णु को नमस्कार है. विष्णु को बार-बार नमस्कार है. गरुड आसन पर विराजमान आप विष्णु को तथा नन्दी पर आरुढ़ आप शिव को नमस्कार है।।42-43।। 

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व्यासजी बोले – परमपूज्य उन देवर्षि नारद को इस प्रकार स्तुति करते हुए देखकर महादेव जी की ओर दृष्टि करके भगवान विष्णु ने कहा ।।44।।

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विष्णु जी बोले – देव ! ये ब्रह्मापुत्र देवर्षि नारद परम भक्त, ज्ञानी एवं विनम्र स्वभाव वाले हैं. आप भक्तवत्सल हैं, इसलिए आपको इन पर अवश्य ही कृपा करनी चाहिए।।45।। 

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व्यासजी बोले – भगवान शिव ने भी भगवान विष्णु द्वारा कही हुई बात को सुनकर कहा – आप शरणागतों पर कृपा करने वाले हैं और आपने मेरे लिए अत्यन्त कल्याणकारी बात कही है।।46।। तत्पश्चात महान ज्ञानी और बुद्धिमान नारद ने कृपासिन्धु देवाधिदेव महादेव से पुन: पूछा।।47।।

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नारदजी बोले – इन्द्र आदि समस्त लोकपालों ने आप (शिव), विष्णु तथा जगत्पति ब्रह्मा की उपासना करके श्रेष्ठ पद प्राप्त किया है. देवेश ! यदि मेरे ऊपर आपका अनुग्रह हो तो आप लोग जिस पूर्ण तथा अविनाशी देवता की आराधना करते हैं, उसके विषय में मुझे बताइए. देव ! जिसकी कृपा से आपने ऎसा महान ऎश्वर्य प्राप्त किया है, उस देवता के विषय में यदि आप मुझे बताते हैं तो मेरे ऊपर यह आपका अनुग्रह होगा।।48-50।।

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व्यासजी बोले – योगीश्वर मुनिवर नारदजी द्वारा इस प्रकार प्रार्थना करने पर निर्मलपति भगवान शंकर पहले तो सतत समाधिस्थ हो गये. पुन: भगवती श्रीदुर्गा के चरण कमल का अपने हृदय में ध्यान करते हुए और उन्हें ही एकमात्र पूर्णब्रह्म जानकर उन्होंने आदरपूर्वक कहना प्रारम्भ किया।।51।।

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।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीव्यास-जैमिनि-संवाद में “व्रतोपासनावर्णन” नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ।।

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जय सियाराम जय जय हनुमान