शनिवार, 24 अप्रैल 2021

ये हैं 6 पेंड जिनसे बनती है सबसे ज्यादा आक्सीजन_ जो रखते हैं पर्यावरण को शुद्ध

 ये हैं 6 पेंड जिनसे बनती है सबसे ज्यादा आक्सीजन_ जो रखते हैं पर्यावरण को शुद्ध

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ये हैं 6 पेंड जिनसे बनती है सबसे ज्यादा आक्सीजन_ जो रखते हैं पर्यावरण को शुद्ध



भारत में इस समय कोविड-19 का कहर जारी है. ऑक्‍सीजन की कमी कई मरीजों की मौत की वजह बन रही है. इन सबके बीच ही जर्मनी से मोबाइल ऑक्‍सीजन प्‍लांट्स को एयरलिफ्ट करने और फाइटर जेट की टेक्‍नोलॉजी की मदद से ऑक्‍सीजन बनाने की खबरें आ रही हैं. लेकिन इन दोनों ही विकल्‍पों में यह बात सबसे अहम है कि आपके वातावरण में कितनी ऑक्‍सीजन है. आइए आपको आज उन पेड़ों के बारे में बताते हैं जो सबसे ज्‍यादा ऑक्‍सीजन जनरेट करते हैं।



पर्यावरण के लिए वरदान हैं ये 6 पेड़

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आपके बगीचे में अगर ये पेड़ नहीं हैं तो तुरंत इन्‍हें लगाएं।ये आपको भी स्‍वस्‍थ रखेंगे और आपके वातावरण को भी।


पीपल का पेड़

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हिंदु धर्म में पीपल तो बौद्ध धर्म में इसे बोधी ट्री के नाम से जानते हैं. कहते हैं कि इसी पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्‍त हुआ था. पीपल का पेड़ 60 से 80 फीट तक लंबा हो सकता है। यह पेड़ सबसे ज्‍यादा ऑक्‍सीजन देता है।इसलिए पर्यावरणविद पीपल का पेड़ लगाने के लिए बार-बार कहते हैं।


बरगद का पेड़

                         



इस पेड़ को भारत का राष्‍ट्रीय वृक्ष भी कहते हैं. इसे हिंदू धर्म में बहुत पवित्र भी माना जाता है. बरगद का पेड़ बहुत लंबा हो सकता है और यह पेड़ कितनी ऑक्‍सीजन उत्‍पादित करता है ये उसकी छाया कितनी है, इस पर निर्भर करता है।


नीम का पेड़

                        


इस पेड़ को एक एवरग्रीन पेड़ कहा जाता है और पर्यावरणविदों की मानें तो यह एक नैचुरल एयर प्‍यूरीफायर है. ये पेड़ प्रदूषित गैसों जैसे कार्बन डाई ऑक्‍साइड, सल्‍फर और नाइट्रोजन को हवा से ग्रहण करके पर्यावरण में ऑक्‍सीजन को छोड़ता है। इसकी पत्तियों की संरचना ऐसी होती है कि ये बड़ी मात्रा में ऑक्‍सीजन उत्‍पादित कर सकता है। ऐसे में हमेशा ज्‍यादा से ज्‍यादा नीम के पेड़ लगाने की सलाह दी जाती है। इससे आसपास की हवा हमेशा शुद्ध रहती है।


अशोक का पेड़

                         


अशोक का पेड़ न सिर्फ ऑक्‍सीजन उत्‍पादित करता है बल्कि इसके फूल पर्यावरण को सुंगधित रखते हैं और उसकी खूबसूरती को बढ़ाते हैं। यह एक छोटा सा पेड़ होता है जिसकी जड़ एकदम सीधी होती है।पर्यावरणविदों की मानें तो अशोक के पेड़ को लगाने से न केवल वातावरण शुद्ध रहता है बल्कि उसकी शोभा भी बढ़ती है।घर में अशोक का पेड़ हर बीमारी को दूर रखता है। ये पेड़ जहरीली गैसों के अलावा हवा के दूसरे दूषित कणों को भी सोख लेता है।


अर्जुन का पेड़

                          


अर्जुन के पेड़ के बारे में कहते हैं कि यह हमेशा हरा-भरा रहता है। इसके बहुत से आर्युवेदिक फायदे हैं। इस पेड़ का धार्मिक महत्‍व भी बहुत है और कहते हैं कि ये माता सीता का पसंदीदा पेड़ था। हवा से कार्बन डाई ऑक्‍साइड और दूषित गैसों को सोख कर ये उन्‍हें ऑक्‍सीजन में बदल देता है।


जामुन का पेड़

                       


भारतीय अध्‍यात्मिक कथाओं में भारत को जंबूद्वीप यानी जामुन की धरती के तौर पर भी कहा गया है। जामुन का पेड़ 50 से 100 फीट तक लंबा हो सकता है। इसके फल के अलावा यह पेड़ सल्‍फर ऑक्‍साइड और नाइट्रोजन जैसी जहरीली गैसों को हवा से सोख लेता है। इसके अलावा कई दूषित कणों को भी जामुन का पेड़ ग्रहण करता है।

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बुधवार, 31 मार्च 2021

. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली श्री सनातन को शास्त्रीय शिक्षा अथ स्वस्थाय देवाय नित्याय हतपाप्मने। त्यक्तक्रमविभागाय चैतन्यज्योतिषे नमः॥ महाप्रभु की असीम कृपा प्राप्त हो जाने पर श्री सनातन जी को कुछ शास्त्रीय प्रश्न पूछने की जिज्ञासा हुई। उन्होंने दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए कहा-'प्रभो! मैं साधनविहीन, परमार्थ-पथ से अनभिज्ञ और संसारी विषयी लोगों का संसर्ग करने वाला परमार्थ सम्बन्धी प्रश्न करना भी नहीं जानता। अतः जिस प्रकार आपने ही दया करके विषयों में आसक्त हुए हम पशुओं को घर जाकर सोते-से जगा दिया, उसी प्रकार अब हमारे इस पशुपने को मेटकर मनुष्यता प्रदान कीजिये, हमारे योग्य जो शिक्षा उचित समझें वही मुझे दीजिये। हम कौन हैं? हमारा क्या कर्तव्य है? भगवान के साथ हमारा क्या सम्बन्ध है? भगवान का क्या स्वरूप है आदि सभी बातों को मुझे संक्षेप में समझा दीजिये।' प्रभु ने कहा- 'सनातन! तुम पर भगवत-कृपा है। तुम्हें शंका ही क्या हो सकती है? तुम जानते हुए भी लोक कल्याण के निमित्त ये प्रश्न कर रहे हो। अस्तु, साधु पुरुषों का यह स्वभाव ही होता है। उनकी सभी चेष्टाएं जगत-हित के ही निमित्त होती हैं, पूछो, तुम क्या पूछना चाहते हो?' 'प्रभो! मैं यह जानना चाहता हूँ कि जीवों में यह विभिन्नता प्रतीत होती है, वह क्यों होती है।' प्रभु ने कहा- 'सनातन! शास्त्रों में मुक्त, नित्य, मुमुक्षु और बद्ध- ये चार प्रकार के जीव बताये हैं। सनक-सनन्दनादि ये मुक्त जीव हैं, इन्हें संसार में रहते हुए भी संसार-बन्धन कभी व्याप नहीं सकता। ये अहर्निश श्रीकृष्ण-संकीर्तन में ही संलग्न रहते हैं। मनु, प्रजापति, इन्द्र और सप्तर्षि आदि सभी नित्य जीव हैं, सृष्टि के निमित्त ये सदा क्रियाशील बने रहते हैं। जो इस अनित्य संसार के नश्वर और क्षणभंगुर भोगों को छोड़ कर प्रभुपादपद्मों का आश्रय ग्रहण करना चाहते हैं वे मुमुक्षु जीव हैं। उनमें प्रायः सभी परमार्थ-पथ के पथियों की गणना हो सकती है। इनके अतिरिक्त जो स्वभाव के ही अनुसार जन्मते और मरते रहते हैं, जिन्हें कर्तव्या कर्तव्य का विवेक नहीं, वे बद्ध जीव कहाते हैं। विषयों में फंसे हुए अज्ञानी पुरुष, पशु, पक्षी आदि सभी जीव इसी श्रेणी में हैं, ये साधन-भजन नहीं कर सकते। उन्हीं के लिये कहा है- पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्। शास्त्रों में जीवों की चौरासी लाख योनियाँ बतायी गयी हैं। भगवत-पादपद्मों से पृथक होकर प्राणी इन नाना योनियों में परिभ्रमण करता रहता है। चिरकाल से भगवत-विच्छेद होने के कारण इसकी वृत्ति बहिर्मुख हो गयी है, यह माया पति को भूलकर माया के बन्धन में पड़ गया है और भगवान की अत्यन्त ही दुरूह गुणमयी दैवी माया उसे नाना योनियों में घुमाती रहती है।' सनातन जी ने पूछा- 'प्रभो! इसे माया से छूटकारा कैसे हो? जब जीव माया के अधीन ही होकर घूमता है, तब तो उसके निस्तार का कोई उपाय ही नहीं।' प्रभु ने कहा- 'हाँ, उपाय है और एक ही उपाय है। जो माया को छोड़कर मायापति की शरण में चला जाय उसकी माया छूट जाती है।' सनातन- 'प्रभो! मैं यही तो पूछ रहा हूँ, मायापति की शरण में कैसे जाया जाय?' प्रभु ने कहा- 'भाई! इसमें तो कृपा ही मुख्य मानी गयी है- (1) शास्त्रकृपा, (2) गुरुकृपा और (3) परमात्माकृपा- ये तीन ही मुख्य कृपा हैं। इन तीनों में से किसी की भी कृपा होने से मनुष्य के संसारी बन्धन ढीले हो सकते हैं और वह प्रभु की ओर अग्रसर हो सकता है।' सनातन- 'प्रभो! मैं यह जानना चाहता हूँ, यह जीव प्रभु से विमुख होकर क्यों नाना योनियों में भटकता फिरता है? पृथ्वी पर तो दुःख-ही-दुःख है। स्वर्गादि लोको में तो सुख भी होगा, किन्तु वहाँ भी जीव को शान्ति नहीं, इसकी अन्तिम शान्ति कहाँ जाकर होती हैं?' प्रभु ने कहा- 'सनातन! चींटी के लेकर ब्रह्मापर्यन्त सभी जीव माया के गुणों से आबद्ध हैं। स्वर्ग क्या, ब्रह्मलोक तक शान्ति नहीं, परम शान्ति तो प्रभु के पादपद्मों में पहुँचने पर ही प्राप्त हो सकती है।' सनातन- 'प्रभो! ब्रह्मा जी को तो शान्ति होगी, वे तो चराचर जगत के ईश्वर हैं, उनके लिये क्या दुःख! ये तो सम्पूर्ण जगत को उत्पन्न करते हैं।' प्रभु ने हंसकर कहा- 'सनातन! ईश्वर तो वे ही एक श्रीकृष्ण हैं। न जाने कितने असंख्य ब्रह्मा इस विश्व में प्रतिक्षण उत्पन्न होते हैं और नष्ट हो जाते हैं।' आश्चर्य के साथ सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! यह आपने कैसी बात कही? सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ईश्वर ब्रह्मा जी तो अकेले ही हैं। ब्रह्मा असंख्यों हैं, यह बात मेरी समझ में नहीं आयी इसे समझने की मेरी इच्छा है।' प्रभु ने बड़े ही स्नेह से कहा- 'अच्छा, तुम यों समझो। जिस काशीपुरी में तुम बैठे हो ऐसी पुण्य और पानाशिनी सात पुरी इस भारत वर्ष में हैं। और लाखों नगर हैं, ऐसे-ऐसे नौ खण्डों वाला यह जम्बूद्वीप' है; उन खण्डों के नाम-(1) भारतवर्ष, (2) किन्नरवर्ष, (3) हरिवर्ष, (4) कुरुवर्ष, (5) हिरण्मयवर्ष, (6) रम्यकवर्ष, (7) इलावृतवर्ष, (8) भद्राश्ववर्ष और (9) केतुमालवर्ष- ये हैं। इन खण्डों वाले द्वीप को ही जम्बूद्वीप कहते हैं। जम्बूद्वीप से दुगुना प्लक्षद्वीप है, प्लक्षद्वीप से दुगुना शाल्मलीद्वीप और उसे दुगुना कुशद्वीप है, कुशद्वीप से दुगुना क्रौंचद्वीप, क्रौंचद्वीप से दुगुना शाकद्वीप और शाकद्वीप से दुगुना पुष्करद्वीप है। इस प्रकार पृथ्वी पर सात द्वीप और सात समुद्र हैं। कलियुग वाले पुरुष पूरे जम्बूद्वीप को ही समझने में समर्थ नहीं हो सकते। वे क्षीरसागर का ही पार नहीं पाते फिर दधि, घृत, मधु सागर को तो समझ ही क्या सकते हैं। एक-एक द्वीप के बाद एक-एक समुद्र है। जम्बूद्वीप सबसे छोटा द्वीप है। पृथ्वी पर ये सात द्वीप हैं, इसीलिये पृथ्वी सप्तद्वीपा कही जाती है। इसे भूलोक भी कहते हैं। इसी प्रकार भूसे भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, और सत्यम- ये छः लोक ऊपर हैं और तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, पाताल और रसातल- ये सात लोक नीचे हैं। इन प्रत्येक लोकों में अनेक छोटे-छोटे लोक हैं। स्वर्ग ही देख लो, असंख्यों लोक हैं। रात्रि में जो असंख्य तारे चमकते हैं, ये सब स्वर्ग के पृथक-पृथक लोक हैं। इनमें भी पृथ्वी की तरह असंख्यों जीव हैं। चन्द्रलोक, भौमलोक, ध्रुवलोक, सूर्यलोक- जैसे असंख्यों लोक स्वर्ग में हैं। उन्हें सूर्य के प्रकाश की भी अपेक्षा नहीं रहती। ये सब अपने-अपने प्रकाशों से प्रकाशित होते हैं। लाखों, करोड़ों नहीं, असंख्यों लोक इतने बड़े हैं कि जिनके सामने सूर्य का प्रकाश जुगनू (पटबीजने)-की भाँति प्रतीत होता है। ये सभी लोक स्वर्ग में ही बोले जाते हैं। स्वर्गलोक से ऊपर महर्लोक है; उसमे भी असंख्यों जीव हैं। इसी प्रकार जन, तप और सत्यलोक में असंख्यों छोटे-छोटे स्वतंत्र लोक हैं। नीचे के सात लोकों में भी स्वर्ग के समान सुख है। नरक के लोक भी वहीं है। और नरक भी लाखों प्रकार के हैं। इन चौदह लोकों के स्वामी ब्रह्मा जी हैं, ब्रह्मालोक सबसे श्रेष्ठ है। यह चौदह लोकों वाला ब्रह्मा जी का अण्ड है, इसीलिये ब्रह्माण्ड कहते हैं। इस ब्रह्माण्ड के स्वामी सदा एक ही ब्रह्मा नहीं होते। सौ वर्ष के पश्चात् वे बदल जाते हैं। वे सौ वर्ष भी हमारे नहीं, ब्रह्मा जी के अपने सौ वर्ष।' सनातन- 'प्रभो! मैं ब्रह्मा जी के वर्ष का परिणाम जानना चाहता हूँ। ब्रह्मा जी का एक वर्ष हमारे वर्षों से कितने दिन का होता है?' प्रभु ने कहा- 'अच्छा तुम हिसाब लगाओ। जो किसी प्रकार भी न दीखे और जिसके किसी तरह भी विभाग न हो सकें, उसे 'परम अणु' कहते हैं। दो परमाणुओं को एक अणु होता है, तीन अणुओं का एक 'त्रिसरेणु' होता है। हां, 'त्रिसरेणु' दीखता है। झरोखे में से सूर्य के प्रकाश के साथ जो छोटे-छोटे कण उड़ते-से दीखते हैं, वे ही त्रसरेणु हैं। वह इतना हल्का होता है कि उसका पृथ्वी पर गिरना असम्भव है, वह आकाश में ही घूमा करता है और सूर्य के प्रकाश के साथ झरोखे में से दीखता है। जितनी देर में तीन 'त्रसरेणु' को उल्लंघन करके सूर्य आगे बढ़े उस कालको 'त्रुटि' कहते हैं। ऐसी-ऐसी तीन सौ त्रुटियों का एक 'बोध' होता है तीन बोध का एक 'लव' और तीन लवका एक 'निमेष' माना जाता है। तीन निमेष का एक क्षण और पांच क्षण के काल को 'काष्ठा' कहते हैं। पंद्रह काष्ठा का एक 'लघु' और पंद्रह लघु की एक 'घड़ी' होती है। दो घड़ी कर एक मुहूर्त और छः या सात (दिन के घटने-बढ़ने के कारण) घड़ी होने पर मनुष्यों का एक 'पहर' होता है। चार पहर का 'दिन' और चार पहर की 'रात्रि' होती है, इसलिये आठ पहर की एक दिन-रात्रि मानी गयी है। ऐसे सात दिन-रात्रि का एक 'सप्ताह' और पंद्रह दिनों का एक पक्ष होता है। शुक्ल और कृष्ण-भेद से 'पक्ष' दो हैं। दो पक्ष का एक 'मास' होता है। दो मास की एक 'ऋतु' और तीन ऋतुओं का एक 'अयन' होता है। उत्तरायण और दक्षिणायन के भेद से अयन दो हैं, इसलिये दो अयनों का मनुष्यों का एक वर्ष होता है। उत्तरायण को 'देवताओं का दिन' और दक्षिणायन को 'देवताओं की रात्रि' समझनी चाहिये। अर्थात जिसे हम वर्ष कहते हैं, वह 'देवताओं का एक दिन' ही होता है। देवताओं के तीन सौ साठ दिनों का एक देव वर्ष होता है, जिसे 'दिव्य वर्ष' कहते हैं। देवताओं के वर्षों से चार हजार वर्ष का सत्ययुग, तीन हजार वर्ष का त्रेता, दो हजार वर्ष का द्वापर और एक हजार वर्ष का कलियुग होता है। एक युग बीतने के पश्चात् फौरन ही दूसरा युग नहीं लग जाता, इसलिये उसके आगे-पीछे के समय को सन्धि और सन्ध्यांश कहते हैं। दिव्य वर्षों से सत्ययुग का आठ सौ वर्ष, त्रेता का छः सौ वर्ष, द्वापर का चार सौ वर्ष और कलियुग का दो सौ वर्ष सन्धि-सन्ध्यांश काल माना गया है। चार युगों को मिलाकर 'चौकड़ी' कहते हैं। देवताओं के बारह हजार वर्षों (अर्थात मनुष्यों के तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष)- की एक 'चौकड़ी' होती है। ऐसी चौकड़ी जब 71 बीत जाती है, तब एक 'मन्वन्तर' होता है। एक मन्वन्तर के समाप्त होते ही पिछले इन्द्र, मनु, सप्तर्षि आदि बदल जाते हैं और नये बनाये जाते हैं। ऐसे चौदह मन्वन्तर बीत जाते हैं, तब 'ब्रह्मा जी का एक दिन' होता है और इतनी ही बड़ी उनकी रात्रि। उनके एक दिन में चौदह इन्द्र और चौदह मनु बदल जाते हैं। ब्रह्मा जी के एक दिन को 'कल्प' कहते हैं। दिन में वे सृष्टि का काम करते रहते हैं, रात्रि में सब सृष्टि का संहार करके उसे अपने में लीन करके सो जाते हैं, दिन होते ही फिर काम में लग जाते हैं। जिस प्रकार दुकानदार दिन में तो बाहर भाँति-भाँति की वस्तुएँ फैलाकर बैठता है और रात्रि में सबको समेट करके दुकान में बंद कर देता है, प्रातःकाल फिर ज्यों-का-त्यों पसारा फैला देता है, इसी प्रकार ब्रह्मा जी रोज व्यापार करते रहते हैं। ब्रह्मा जी के तीन सौ साठ दिनों का 'ब्रह्मवर्ष' होता है। ऐसे वर्षों से एक ब्रह्मा की आयु सौ वर्ष की होती है। कल्प में तो तीन ही लोकों को नाश होता है। ब्रह्मा जी की आयु के बाद इस चौदह भुवन वाले ब्रह्माण्ड का ही नाश हो जाता है, उसे 'महाप्रलय' कहते हैं। तब ब्रह्मा जी ब्रह्मलोक के मुक्त पुरुषों के साथ भगवान के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, फिर नये ब्रह्मा होते हैं।' प्रभु के मुख से ब्रह्मा जी की आयु सुनकर परम विस्मित हुए सनातन जी ने पूछा- 'प्रभो! यह तो महान आश्चर्य की बात है। इसे सुनकर तो बड़ा भारी वैराग्य होता है। इस हिसाब से तो हमारी आयु कुछ भी नहीं, जिसे हम सौ वर्ष की परमायु मानते हैं, वह ब्रह्मा जी के एक क्षण क्या 'लव' के भी करोड़ वें अंश के बराबर नहीं। इसी पर यह मूर्ख प्राणी इतना गर्व करता है।' प्रभु ने उत्तेजित भाव से उल्लास के साथ उत्तर दिया। उस समय सनातन को बताते-बताते उनका चेहरा चमक रहा था, आँखों से प्रसन्नता की किरणें जोरों से निकल-निकलकर सनातन जी के शरीर में प्रवेश कर रही थीं। प्रभु ने कहा- 'सनातन! यह प्राणी जब समझता नहीं, तभी तो माया में फँसकर अपनी क्षुद्र परिधि को ही सब कुछ समझता है। कूप का मेंढक समुद्र का क्या अनुमान लगा सकता है? उसके लिये तो कुएँ से बढ़कर दूसरा कोई समुद्र ही नहीं। तुम प्रत्यक्ष देखते हो। जिसे तुम अपना एक दिन कहते हो, उसी में लाखों ऐसे जीव हैं जो अनेक बार मर जाते हैं और अनेकों बार नया जन्म धारण कर लेते हैं। तुम्हारा एक दिन ही हुआ, उनके अनेक जन्म बीत गये। देवता और ब्रह्मा जी के सामने हमारी आयु तो भुनगों के समान है। इस विषयों में सभी पुराणों में बड़ा ही सुन्दर विस्तार के साथ वर्णन किया गया है। पुराणों में इसी के समझाने के लिये एक अत्यन्त ही मनोहर कथा आती है। सत्ययुग में रैवत नाम के एक बड़े ही पराक्रमी और सर्वशक्तिमान राजा थे। ब्रह्मा जी के वरदान से वे सभी लोकों में जा-आ सकते थे। सत्ययुग के मनुष्य आज कल से चौगुने लम्बे होते हैं। उनके एक रेवती नाम की कन्या थी, वह साधारण लड़कियों की अपेक्षा कुछ अधिक लम्बी थी। बहुत खोजने पर भी महाराज को उसके योग्य कोई वर नहीं मिला। तब उन्होंने सोचा-चलो, ब्रह्मा जी से ही कुछ पूछ आवें कि हम इस लड़की का विवाह किसके साथ करें। दो-चार राजकुमार अच्छे तो हैं, उनमें से कौन-सा सर्वश्रेष्ठ होगा, इस बात का निर्णय ब्रह्मा जी से ही करा लावें। यह सोचकर वे अपनी लड़की को साथ लेकर ब्रह्मलोक में पहुँचे। उस समय ब्रह्मा जी अनेक देवता, ऋषि और अन्य लोंको के देवों से घिरे हुए- 'हाहा, हूहू' का गान सुन रहे थे। महाराज रैवत भी प्रणाम करके चुपचाप एक ओर बैठ गये। आधी घड़ी के पश्चात् गायन समाप्त हो गया, तब पितामह ब्रह्मा जी ने हंसते हुए राजा रैवत से पूछा- 'कहो, भाई! कैसे आना हुआ?' हाथ जोड़े हुए दीन भाव से महाराज ने कहा- 'भगवन! आपके श्रीचरणों के दर्शनों के निमित्त चला आया।' सोचा था, इस लड़की के पति के सम्बन्ध में आप से पूछूंगा। आप जिनके लिये आज्ञा करेंगे, उसे ही दे दूंगा।' मुसकराकर भगवान ब्रह्मादेव जी ने कहा- 'तुम्हीं बताओ, तुम्हें कौन-सा राजकुमार बहुत पसंद है?' कुछ सोचकर महाराज ने कहा- 'प्रभो! अमुक राजकुमार मुझे सबसे अधिक अच्छा लगता है, फिर आप जिसके लिये आज्ञा करेंगे उसे ही इसे दूँगा। आपकी आज्ञा ही लेने तो आया हूँ।' इतना सुनते ही भगवान ब्रह्मा जी अपनी सफेद दाढ़ी को हिलाते हुए बड़े ही जोरों से हंसने लगे और बोले- 'राजन! जिस राजकुमार का तुम नाम ले रहे हो, वह कुल तो कबका नष्ट हो गया। अब तो उन वंशों का नाम-निशान भी नहीं रहा। तुम्हारी पुरी को अन्य राजाओं ने अपनी राजधानी बना लिया। अब तो वहाँ कलियुग आ रहा है। तुम इसी समय जाओ, व्रज में भगवान श्रीकृष्ण जी के बड़े भाई शेष जी के अवतार बलराम जी अवतीर्ण हुए हैं, जाकर इस कन्या को उन्हें ही दे दो, वे सब ठीक कर लेंगे।' भगवान ब्रह्मदेव जी की आज्ञा शिरोधार्य करके और उनके चरणों में प्रणाम करके महाराज पृथ्वी पर आये और रेवती जी को श्री बलराम जी को देकर वे तपस्या करने चले गये। इधर बलराम जी ने अपनी पत्नी को बहुत लम्बी देखकर उसके गले में अपना हल डालकर नीचे खींचकर अपने बराबर बना लिया।' सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! बड़े आश्चर्य की बात है। ब्रह्मा जी भी स्थायी नहीं रहते। इस जगत के एकमात्र स्वामी की भी अन्त में यह गति होती है।' प्रभु ने कहा- 'जो उत्पन्न हुआ है, उसका अन्त अवश्य होगा, चाहे आज हो या कल। हाँ, मैं तुम्हें यह बता रहा था कि जैसा यह चौदह लोक वाला ब्रह्माण्ड है, वैसे असंख्य ब्रह्माण्ड इस विश्व में हैं और उनके स्वामी असंख्य ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। जैसे गूलर के पेड़ पर असंख्य गूलर के फल लगे रहते हैं, इसी प्रकार विश्व में अनन्त गूलर के समान ब्रह्माण्ड लटके हुए हैं। ब्रह्माण्ड के समस्त प्राणी गूलर के भीतर के भुनगों के समान हैं। महाविष्णु की नाभिकमल में से ब्रह्मा जी उत्पन्न होते हैं और वे सृष्टि करने लगे जाते हैं। असंख्य ब्रह्मा गंगा जी के प्रवाह की तरह निकल-निकलकर सृष्टि में प्रवृत्त होते हैं। उनके नीचे सांस लेने से ब्रह्माण्डों का नाश होता है, ऊपर सांस लेने से ब्रह्मा जी के सहित ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो जाता है इसी व्यापार का नाम संसार चक्र है। कुम्हार के चक्र के समान यह संसार चक्र घूमता रहता है, इसी से लोकों की सृष्टि होती रहती है।' सनातन जी ने परम वैराग्य के स्वर में कहा- 'प्रभो! इस चक्रसे छुटकारा पाने का उपाय बताइये?' प्रभु ने कहा- 'श्री कृष्ण इस चक्र से एकदम पृथक हैं। उन्हें संसार की सृष्टि, स्थिति और प्रलय से कुछ काम नहीं। इसे तो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि करते रहते हैं। वे तो नित्य ही गोपियों के साथ आनन्द में रासक्रीड़ा करते रहते हैं। वे वृन्दावन को छोड़कर एक पग भी इधर-उधर नहीं जाते इसलिये सर्वात्मना और सर्वभाव से उन्हीं की शरण जाने से इस चक्र से मुक्ति हो सकती है।' सनातन- 'प्रभो! मैं उपाय जानना चाहता हूँ।' प्रभु ने कहा- 'सनातन! मैंने कह तो दिया। वे तप से, जप से, योग-यज्ञ से तथा पाठ-पूजा से प्रसन्न नहीं होते, उनकी प्रसन्नता का एकमात्र साधन अनन्य होकर उनकी भक्ति करना ही है। बिना प्रेमा भक्ति के कोई उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। जिसे वे अपना कहकर वरण कर लेते हैं, उसे अपनी गोपी वा सखी बनाकर अपनी लीला में सम्मिलित कर लेते हैं, सखी बने बिना उनकी क्रीड़ा का दूसरा कोई अनुभव कर ही नहीं सकता। सखी कोई स्वयं थोड़े ही बन सकता है। जो अपने पुरुषार्थ से उनकी क्रीड़ा में सम्मिलित होने का अभिमान करते हैं, वे उन तक कभी नहीं पहुँच सकते। जब अनन्य होकर, दीन होकर, निराश्रय होकर सभी प्रकार के पुरुषार्थों का परित्याग करके केवल मात्र उन्हीं का आश्रय ग्रहण किया जाय तब कहीं उस ओर पैर बढ़ाने का अधिकार प्राप्त हो सकता है।' सनातन- 'प्रभो! अनन्यता कैसे प्राप्त हो, भक्ति का अंकुर कैसे हृदय में उत्पन्न हो ?' प्रभु ने कहा- 'सनातन! अनन्यता प्राप्त करने का सर्वोत्तम एक ही उपाय है, जैसे कि परमहंसशिरोमणि जडभरत जी ने राजा रहूगण से कहा है- रहूगणैतत्तपसा न याति न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा। न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यैंर्विना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥ भगवान जडभरत कहते हैं- 'राजन् रहूगण! महात्माओं की चरणरज में लोटे बिना भगवत-कृपा की प्राप्ति तप से, यज्ञ से, दान से, घर-द्वार छोड़ देने से, वेदों के पढ़ने से, जल, अग्नि या सूर्य के सेवन करने से नहीं हो सकती।' उसकी प्राप्ति का एक ही साधन है, श्रद्धापूर्वक परम समर्थ भगवद्भक्त साधु पुरुषों की चरणधूलि में लोटा जाय। उसे मस्तक पर धारण किया जाय यही एकमात्र उपाय है। साधु-सेवा के बिना जो भगवत्कृपा का अनुभव करना चाहता है, वह मानो बिना नौका या जहाज के ही अपार सागर को हाथों से तैरकर उस पार जाना चाहता है। इसी बात को लक्ष्य करके भक्तराज प्रह्लाद जी ने अपने पिता हिरण्यकशिपु से कहा है- नैषां मतिस्तावदुरुक्रमांघ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किंचनानां न वृणीत यावत्॥ हे तात! जिनके हृदय से विषयों का विकार एक दम दूर हो गया है, ऐसे परम पूजनीय भगवद्भक्तों की चरणरज से जब तक मनुष्य भलीभाँति सिर से पैर तक स्नान नहीं करता तब तक वेदवाक्यों से उत्पन्न हुई भी उसकी बुद्धि उसे प्रभु के पादपद्मों के समीप पहुँचाने में एक दम असमर्थ होती है। अर्थात बिना भगवद्भक्तों की चरण धूलि मस्तक पर धारण किये कोई भी पुरुष श्रीकृष्ण पादपद्मों के स्पर्श करने के निमित्त आगे नहीं बढ़ सकता। तत्त्वदर्शी ज्ञानियों की जब तक श्रद्धा के साथ, भक्ति के साथ प्रेम पूर्वक सेवा नहीं की जाती, उनके चरणों में जब तक स्वाभाविक स्नेह नहीं होता, तब तक वह भगवत-कथा श्रवण करने का भी अधिकारी नहीं होता। भगवान ने अर्जुन को उपदेश करते हुए गीता में स्वयं ही लिखा है- तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ अर्थात 'हे अर्जुन! तू दण्डवत-प्रणाम-सेवा और निष्कपट भाव से किये हुए प्रश्न द्वारा उस ज्ञान को जान। (विनीतभाव से पूछने पर) वे तत्त्वदर्शी महात्मागण तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे।' उपदेश का वही अधिकारी है, जिसके हृदय में देवता, द्विज, गुरुजन और भगवत-भक्तों के प्रति श्रद्धा के भाव हैं। जो इनमें श्रद्धा के भाव नहीं रखता, वह परमार्थ की ओर अग्रसर ही नहीं हो सकता। फिर प्रभु कृपा का अधिकारी तो बन ही कैसे सकता है? सनातन! बहुत बातों में क्या रखा है, मैं तुझे सारातिसार बताता हूँ। प्राणिमात्र का परम पुरुषार्थ श्रीकृष्ण-प्रेम की प्राप्ति करना ही है। परम अराध्य वे ही श्री नन्दनन्दन वृन्दावनचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र जी हैं। अपने सभी पुरुषार्थों का आश्रय छोड़कर अनन्य भाव से व्रजांगनाओं की भाँति संसारी सम्बन्धों से मुख मोड़कर पतिभाव से उनकी आराधना करना यही उपासना की उत्तम-से-उत्तम प्रणाली है और पठनीय शास्त्रों में श्रीमद्भागवत ही सर्वोपरि शास्त्र है। क्योकि इसे भगवान व्यासदेव ने सभी पुराणों के अनन्तर जिस प्रकार दही को मथकर उसमें से सारभूत मक्खन को निकाल लेते हैं, उसी प्रकार सर्वशास्त्रों को मथकर उनका सार निकाला है। बस, यही कल्याण का मार्ग है। इसे तुम मेरे मत का सार समझो। इससे अधिक कोई किसी बात का आग्रह करे तो उसे तुम अन्यथा समझना। मेरे इस ज्ञान को हृदय में धारण करो। साधु-महात्मा, संत तथा भगवद्भक्तों के चरणों में दृढ़ अनुराग रखो। वे कैसे भी हों उनकी निन्दा कभी मत करो। सबको ईश्वर-बुद्धि से नम्र होकर प्रणाम करो। तुम्हारा कल्याण होगा, मैं तुम्हें हृदय से आशीर्वाद देता हूँ। मेरे इस अमल-विमल शास्त्र सम्मत ज्ञान का तुम विस्तार के साथ भक्ति के ग्रन्थों में वर्णन करना। मंगलमय भगवान तुम्हारा मंगल करेंगे!' इतना कहकर महाप्रभु चुप हो गये। महाप्रभु के चुप हो जाने पर सनातन जी ने भक्तिभाव के सहित महाप्रभु के चरणों में प्रणाम किया और महाप्रभु ने उनके शरीर पर हाथ फेरते हुए उन्हें आशीर्वाद दिया। इस प्रकार दो महीनों तक महाप्रभु के समीप काशी में रहकर सनातन भाँति-भाँति के शास्त्रीय प्रश्न पूछते रहे और प्रभु उन्हें प्रेम पूर्वक सभी गुप्त तत्त्व समझाते रहें। इन दो महीनों में ही सनातन जी ने प्रभु से बहुत-सी भक्तिमार्ग की गूढ़ता तिगूढ़ बातें समझ लीं, जिनका विस्तार के साथ उन्होंने अपने अनेकों ग्रन्थों में वर्णन किया है। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे

बुधवार, 10 जून 2020

श्री मद् भगवद। गीता :---प्रथम अध्याय

अध्याय एक - कर्मयुद्ध-योग
(योद्धाओं की गणना और सामर्थ्य)
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ (१)

भावार्थ : धृतराष्ट्र ने कहा - हे संजय! धर्म-भूमि और कर्म-भूमि में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? (१)
संजय उवाच
दृष्टा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌ ॥ (२)

भावार्थ : संजय ने कहा - हे राजन्! इस समय राजा दुर्योधन पाण्डु पुत्रों की सेना की व्यूह-रचना को देखकर आचार्य द्रोणाचार्य के पास जाकर कह रहे हैं। (२)
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌ ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।।


भवार्थ : हे आचार्य! पाण्डु पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न ने इतने कौशल से व्यूह के आकार में सजाया है। (३)
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ (४)
भावार्थ : इस युद्ध में भीम तथा अर्जुन के समान अनेकों महान शूरवीर और धनुर्धर है, युयुधान, विराट और द्रुपद जैसे भी महान योद्धा है। (४)
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌ ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः ॥ (५)
भावार्थ : धृष्टकेतु, चेकितान तथा काशीराज जैसे महान शक्तिशाली और पुरुजित्, कुन्तीभोज तथा शैब्य जैसे मनुष्यों मे श्रेष्ठ योद्धा भी है। (५)
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌ ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ (६)
भावार्थ : युधामन्यु जैसे महान पराक्रमी तथा उत्तमौजा जैसे अत्यन्त शक्तिशाली, सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्रों सहित ये सभी महान योद्धा हैं। (६)
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ (७)
भावार्थ : हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हमारी तरफ़ के भी उन विशेष शक्तिशाली योद्धाओं को भी जान लीजिये और आपकी जानकारी के लिये मेरी सेना के उन योद्धाओं के बारे में बतलाता हूँ। (७)
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ (८)
भावार्थ : मेरी सेना में स्वयं आप-द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा जैसे योद्धा है, जो सदैव युद्ध में विजयी रहे हैं। (८)
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ (९)
भावार्थ : ऎसे अन्य अनेक शूरवीर भी है जो मेरे लिये अपने जीवन का बलिदान देने के लिये अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है और यह सभी युद्ध-विधा में निपुण है। (९)
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥ (१०)
भावार्थ : इस प्रकार भीष्म पितामह द्वारा अच्छी प्रकार से संरक्षित हमारी सेना की शक्ति असीमित है, किन्तु भीम द्वारा अच्छी प्रकार से संरक्षित होकर भी पांडवों की सेना की शक्ति सीमित है। (१०)
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ (११)
भावार्थ : अत: सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहकर आप सभी निश्चित रूप से भीष्म पितामह की सभी ओर से सहायता करें। (११)
(योद्धाओं द्वारा शंख-ध्वनि)

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌ ॥ (१२)

भावार्थ : तब कुरुवंश के वयोवृद्ध परम-प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए सिंह-गर्जना के समान उच्च स्वर से शंख बजाया। (१२)
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌ ॥ (१३)

भावार्थ : तत्पश्चात् अनेक शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और सींग आदि बाजे अचानक एक साथ बज उठे, उनका वह शब्द बड़ा भयंकर था। (१३)
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ (१४)

भावार्थ : तत्पश्चात् दूसरी ओर से सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ पर आसीन योगेश्वर श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए। (१४)
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः ॥ (१५)

भावार्थ : हृदय के सर्वस्व ज्ञाता श्रीकृष्ण ने "पाञ्चजन्य" नामक, अर्जुन ने "देवदत्त" नामक और भयानक कर्म वाले भीमसेन ने "पौण्ड्र" नामक महाशंख बजाया। (१५)
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ (१६)

भावार्थ : हे राजन! कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने "अनन्तविजय" नामक और नकुल तथा सहदेव ने "सुघोष" और "मणिपुष्पक" नामक शंख बजाए। (१६)
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ (१७)

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌ ॥ (१८)

भावार्थ : श्रेष्ठ धनुष वाले काशीराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और कभी न हारने वाला सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजा वाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु आदि सभी ने अलग-अलग शंख बजाए। (१७-१८)
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌ ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌ ॥ (१९)

भावार्थ : उस भयंकर ध्वनि ने आकाश और पृथ्वी को गुंजायमान करते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय में शोक उत्पन्न कर दिया। (१९)
(अर्जुन द्वारा सैन्य-निरीक्षण)

अर्जुन उवाचः
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ (२०)

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ (२१)

भावार्थ : हे राजन्‌! इसके बाद हनुमान से अंकित पताका लगे रथ पर आसीन पाण्डु पुत्र अर्जुन ने धनुष उठाकर तीर चलाने की तैयारी के समय धृतराष्ट्र के पुत्रों को देखकर हृदय के सर्वस्व ज्ञाता श्री कृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहा कि हे अच्युत! कृपा करके मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खडा़ करें। (२०-२१)
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌ ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ (२२)

भावार्थ : जिससे मैं युद्धभूमि में उपस्थित युद्ध की इच्छा रखने वालों को देख सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन से एक साथ युद्ध करना है। (२२)
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ (२३)

भावार्थ : मैं उनको भी देख सकूँ जो यह राजा लोग यहाँ पर धृतराष्ट् के दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधन के हित की इच्छा से युद्ध करने के लिये एकत्रित हुए हैं। (२३)
संजय उवाचः
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌ ॥ (२४)

भावार्थ : संजय ने कहा - हे भरतवंशी! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृदय के पूर्ण ज्ञाता श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस उत्तम रथ को खड़ा कर दिया। (२४)
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌ ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति ॥

भावार्थ : इस प्रकार भीष्म पितामह, आचार्य द्रोण तथा संसार के सभी राजाओं के सामने कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए एकत्रित हुए इन सभी कुरु वंश के सद्स्यों को देख। (२५)
तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌ ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ (२६)

भावार्थ : वहाँ पृथापुत्र अर्जुन ने अपने ताऊओं-चाचाओं को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को और मित्रों को देखा। (२६)
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌ ॥ (२७)

भावार्थ : कुन्ती-पुत्र अर्जुन ने ससुरों को और शुभचिन्तकों सहित दोनों तरफ़ की सेनाओं में अपने ही सभी सम्बन्धियों को देखा। (२७)
(अर्जुन की अज्ञानता का निरूपण )

अर्जुन उवाच
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌ ।
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌ ॥ (२८)

भावार्थ : तब करुणा से अभिभूत होकर शोक करते हुए अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा वाले इन सभी मित्रों तथा सम्बन्धियों को उपस्थित देखकर। (२८)
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते ॥ (२९)

भावार्थ : मेरे शरीर के सभी अंग काँप रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है, और मेरे शरीर के कम्पन से रोमांच उत्पन्न हो रहा है। (२९)
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ (३०)

भावार्थ : मेरे हाथ से गांडीव धनुष छूट रहा है और त्वचा भी जल रही है, मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा भी नही रह पा रहा हूँ। (३०)
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ (३१)

भावार्थ : हे केशव! मुझे तो केवल अशुभ लक्षण ही दिखाई दे रहे हैं, युद्ध में स्वजनों को मारने में मुझे कोई कल्याण दिखाई नही देता है। (३१)
न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ (३२)

भावार्थ : हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न ही राज्य और सुखों की इच्छा करता हूँ, हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य, सुख अथवा इस जीवन से भी क्या लाभ है। (३२)
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ (३३)

भावार्थ : जिनके साथ हमें राज्य आदि सुखों को भोगने की इच्छा हैं, जब वह ही अपने जीवन के सभी सुखों को त्याग करके इस युद्ध भूमि में खड़े हैं। (३३)
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा ॥ (३४)

भावार्थ : गुरुजन, परिवारीजन, पुत्रगण, पितामह, मामा, ससुर, पौत्रगण, साले और सभी सम्बन्धी भी मेरे सामने खडे़ है। (३४)
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ (३५)

भावार्थ : हे मधुसूदन! मैं इन सभी को मारना नहीं चाहता हूँ, भले ही यह सभी मुझे ही मार डालें, तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सभी को मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है? (३५)
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः ॥(३६)

भावार्थ : हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी? बल्कि इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। (३६)
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌ ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ (३७)

भावार्थ : हे माधव! अत: मुझे धृतराष्ट्र के पुत्रों को उनके मित्रों और सम्बन्धियों सहित मारना उचित नही लगता है, क्योंकि अपने ही कुटुम्बियों को मार कर हम कैसे सुखी हो सकते हैं? (३७)
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌ ॥ (३८)

भावार्थ : यधपि लोभ के कारण इन भ्रमित चित्त वालों को कुल के नाश से उत्पन्न होने वाले दोष दिखाई नही देते हैं, और मित्रों से विरोध करने में कोई पाप दिखाई नही देता है।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌ ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ (३९)

भावार्थ : हे जनार्दन! हम लोग तो कुल के नाश से उत्पन्न दोष को समझने वाले हैं क्यों न हमें इस पाप से बचने के लिये विचार करना चाहिये। (३९)
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ (४०)

भावार्थ : कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में अधर्म फैल जाता है। (४०)
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ (४१)

भावार्थ : हे कृष्ण! अधर्म अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, स्त्रियों के दूषित हो जाने पर अवांछित सन्ताने उत्पन्न होती है। (४१)
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ (४२)

भावार्थ : अवांछित सन्तानों की वृद्धि से निश्चय ही कुल में नारकीय जीवन उत्पन्न होता है, ऎसे पतित कुलों के पितृ गिर जाते है क्योंकि पिण्ड और जल के दान की क्रियाऎं समाप्त हो जाती है। (४२)
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ (४३)

भावार्थ : इन अवांछित सन्तानो के दुष्कर्मों से सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं। (४३)
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ (४४)

भावार्थ : हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में रहना पडता है, ऐसा हम सुनते आए हैं। (४४)
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌ ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ (४५)

भावार्थ : ओह! कितने आश्चर्य की बात है कि हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने प्रियजनों को मारने के लिए आतुर हो गए हैं। (४५)

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌ ॥ (४६)

भावार्थ : यदि मुझ शस्त्र-रहित विरोध न करने वाले को, धृतराष्ट्र के पुत्र हाथ में शस्त्र लेकर युद्ध में मार डालें तो भी इस प्रकार मरना मेरे लिए अधिक श्रेयस्कर होगा। (४६)

संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌ ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ (४७)

भावार्थ : संजय ने कहा - इस प्रकार शोक से संतप्त हुआ मन वाला अर्जुन युद्ध-भूमि में यह कहकर बाणों सहित धनुष को त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ गया। (४७)
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे कृष्णार्जुनसंवादे धर्मकर्मयुद्धयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः॥
इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद भगवदगीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में धर्मकर्मयुद्ध-योग नाम का पहला अध्याय संपूर्ण हुआ॥

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

सोमवार, 18 मई 2020

आखिर!क्या है उपयोग :--जीवन में पीतल के बर्तनों का !

।। हरी ओम् धन्वंतराय नमः ।।
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आखिर!क्या है उपयोग :--जीवन में पीतल के बर्तनों का !
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                  आचार्य डा. अजय दीक्षित

पीतल के पात्रों का महत्व :-----
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पीतल के पात्रों का महत्व ज्योतिष व धार्मिक शास्त्रों में भी बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सुवर्ण व पीतल की ही भांति पीला रंग देवगुरु बृहस्पति को संबोधित करता है तथा ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार पीतल पर देवगुरु बृहस्पति का आधिपत्य होता है। बृहस्पति ग्रह की शांति हेतु पीतल का उपयोग किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रह शांति व ज्योतिष अनुष्ठानों में दान हेतु भी पीतल के बर्तन दिए जाते हैं।

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पीतल के बर्तनों का कर्मकांड में अत्यधिक महत्व है। वैवाहिक कार्य में वेदी पढ़ने हेतु व कन्यादान के समय पीतल का कलश प्रयोग किया जाता है। शिवलिंग पर दूध चढ़ाने हेतु भी पीतल के कलश का उपयोग किया जाता है तथा बगलामुखी देवी के अनुष्ठानों में मात्र पीतल के बर्तन ही प्रयोग लिए जाते हैं।

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पीतल के बर्तनों का उपयोग
भारत के कई क्षेत्रों में आज भी सनातनधर्मी जन्म से लेकर मृत्यु के उपरांत तक पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। स्थानिक मान्यताओं के अनुसार बालक के जन्म पर नाल छेदन करने के उपरांत पीतल की थाली तो छुरी से पीटा जाता है। मान्यता है कि इससे पितृगण को सूचित किया जाता है कि आपके कुल में जल और पिंडदान करने वाले वंशज का जन्म हो चुका है। 

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मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि क्रिया के 10वें दिन अस्थि विसर्जन के उपरांत नारायणवली व पीपल पर पितृ जलां‍जलि मात्र पीतल कलश से दी जाती है। मृत्यु संस्कार के अंत में 12वें दिन त्रिपिंडी श्राद्ध व पिंडदान के बाद 12वीं के शुद्धि हवन व गंगा प्रसादी से पहले पीतल के कलश में सोने का टुकड़ा व गंगा जल भरकर पूरे घर को पवित्र किया जाता है।

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पीतल के बर्तन घर में रखना शुभ माना जाता है। सेहत की दृष्टि से पीतल के बर्तनों में बना भोजन स्वादिष्ट तुष्टि-प्रदाता होता है तथा इससे आरोग्य और शरीर को तेज प्राप्त होता है। पीतल का बर्तन जल्दी गर्म होता है जिससे गैस तथा अन्य ऊर्जा की बचत होती है। पीतल का बर्तन दूसरे बर्तनों से ज्यादा मजबूत और जल्दी न टूटने वाला धातु है। पीतल के कलश में रखा जल अत्यधिक ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है।

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पीतल पीले रंग का होने से हमारी आंखों के लिए टॉनिक का काम करता है। पीतल का उपयोग थाली, कटोरे, गिलास, लोटे, गगरे, हंडे, देवताओं की मूर्तियां व सिंहासन, घंटे, अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र, ताले, पानी की टोंटियां, मकानों में लगने वाले सामान और गरीबों के लिए गहने बनाने में होता है।

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पीतल के बर्तनों से लाभ :---------
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1. भाग्योदय हेतु पीतल की कटोरी में चना दाल भिगोकर रातभर सिरहाने रखें व सुबह चना दाल पर गुड़ रखकर गाय को खिलाएं।

2. अटूट धन प्राप्ति हेतु पूर्णिमा के दिन भगवान श्रीकृष्ण पर शुद्ध घी से भरा पीतल का कलश चढ़ाकर निर्धन विप्र को दान करें।

3. लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु वैभवलक्ष्मी का पूजन कर पीतल के दीये में शुद्ध घी का दीपक करें।

4. दुर्भाग्य से मुक्ति पाने हेतु पीतल की कटोरी में दही भरकर कटोरी समेत पीपल के नीचे रखें।

5. सौभाग्य प्राप्ति हेतु पीतल के कलश में चना दाल भरकर विष्णु मंदिर में चढ़ाएं।
पीतल के बर्तन में खट्टे पदार्थ कभी भी न रखें।

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जय सियाराम जय जय हनुमान

         किसी भी शंका समाधान के लिए :----
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                  .आचार्य डा. अजय दीक्षित

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

वैशाख-स्नान से पाँच प्रेतों का उद्धार :---आचार्य डा.अजय दीक्षित

वैशाख-स्नान से पाँच प्रेतों का उद्धार :---आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया ।

अम्बरीष ने कहा – मुने ! जिसके चिन्तन मात्र से पाप राशि का लय हो जाता है, उस पाप प्रशमन नामक स्तोत्र को मैं भी सुनना चाहता हूँ। आज मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, आपने मुझे उस शुभ विधि का श्रवण कराया, जिसके सुनने मात्र से पापों का क्षय हो जाता है। वैशाख मास में जो भगवान केशव के कल्याणमय नामों का कीर्तन किया जाता है, उसी को मैं संसार में सबसे बड़ा पुण्य, पवित्र, मनोरम तथा एकमात्र सुकृत से ही सुलभ होने वाला शुभ कर्म मानता हूँ।। अहो ! जो लोग माधव मास में भगवान मधुसूदन के नामों का स्मरण करते हैं वे धन्य हैं। अत: यदि आप उचित समझें तो मुझे पुन: माधवमास की ही पवित्र कथा सुनाएँ।

सूतजी कहते हैं – राजाओं में श्रेष्ठ हरिभक्त अम्बरीष का वचन सुनकर नारद मुनि को बड़ी प्रसन्नता हुई। यद्यपि वे वैशाख स्नान के लिये जाने को उत्कंठित थे, तथापि सत्संग में आनन्द आने के कारण रुक गये और राजा से बोले।

नारद जीने कहा – महीपाल ! मुझे ऎसा जान पड़ता है कि यदि दो व्यक्तियों में परस्पर भगवत्कथा-संबंधी सरस वार्तापाल छिड़ जाए तो वह अत्यन्त विशुद्ध – अन्त:करण को शुद्ध करने वाला होता है। आज तुम्हारे साथ जो माधवमास के माहात्म्य की चर्चा चल रही है, यह वैशाख-स्नान की अपेक्षा अधिक पुण्य प्रदान करने वाली है क्योंकि माधवमास के देवता भगवान श्रीविष्णु हैं (अत: उनका कीर्तन भगवान का ही कीर्तन है)। जिसका जीवन धर्म के लिए और धर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए है तथा जो रातों-दिन पुण्योपार्जन में ही लगा रहता है, उसी को इस पृथ्वी पर मैं वैष्णव मानता हूँ। राजन् ! अब मैं वैशाख स्नान से होने वाले पुण्य फल का संक्षेप में वर्णन करता हूँ। विस्तार के साथ सारा वर्णन तो मेरे पिता – ब्रह्माजी भी नहीं कर सकते। वैशाख में डुबकी लगाने मात्र से समस्त पाप छूट जाते हैं।

पूर्वकाल की बात है कोई मुनीश्वर तीर्थयात्रा के प्रसंग से सर्वत्र घूम रहे थे। उनका नाम था मुनिशर्मा। वे बड़े धर्मात्मा, सत्यवादी, पवित्र तथा शम, दम एवं शान्तिधर्म से युक्त थे। वे प्रतिदिन पितरों का तर्पण और श्राद्ध करते थे। उन्हें वेदों और स्मृतियों के विधानों का सम्यक् ज्ञान था। वे मधुर वाणी बोलते और भगवान का पूजन करते रहते थे। वैष्णवों के संसर्ग में ही उनका समय व्यतीत होता था। वे तीनों कालों के ज्ञाता, मुनि, दयालु, अत्यन्त तेजस्वी, तत्वज्ञानी और ब्राह्मणभक्त थे। वैशाख का महीना था, मुनिशर्मा स्नान के लिए नर्मदा के किनारे जा रहे थे। उसी समय उन्होंने अपने सामने पाँच पुरुषों को देखा, जो भारी दुर्गति में फँसे हुए थे। वे अभी-अभी एक-दूसरे से मिले थे। उनके शरीर का रंग काला था। वे एक बरगद की छाया में बैठे थे और पापों के कारण उद्विग्न होकर चारों ओर दृष्टिपात कर रहे थे।

उन्हें देखकर द्विजवर मुनिशर्मा बड़े विस्मय में पड़े और सोचने लगे – इस भयानक वन में मनुष्य कहाँ से आए? इनकी चेष्टा बड़ी दयनीय है किन्तु इनका आकार बड़ा भयंकर दिखाई देता है। ये पापभागी चोर तो नहीं हैं? विप्रवर मुनिशर्मा की बुद्धि बड़ी स्थिर थी, वे ज्यों ही इस प्रकार विचार करने लगे, उसी समय उपर्युक्त पाँचों पुरुष उनके पास आये और हाथ जोड़कर मुनिशर्मा से बोले।

उन पुरुषों ने कहा – विप्रवर ! हमें आप कल्याणमय पुरुषोत्तम जान पड़ते हैं, हम दु:खी जीव हैं। अपना दु:ख विचारकर आपको बताना चाहते हैं। द्विजराज ! आप कृपा करके हमारी कष्ट कथा सुनें। दैववश जिनके पाप प्रकट हो गए हैं, उन दीन दु:खी प्राणियों के आधार आप जेसे संत महात्मा ही हैं। साधु पुरुष अपनी दृष्टिमात्र से पीड़ितों की पीड़ाएँ हर लेते हैं, अब उनमें से एक ने सबका परिचय देना आरंभ किया – मैं पंचाल देश का क्षत्रिय हूँ, मेरा नाम नरवाहन है।

मैंने मार्ग में मोहवश बाण द्वारा एक ब्राह्मण की हत्या कर डाली। मुझसे ब्रह्म हत्या का पाप हो गया इसलिए शिखा, सूत्र और तिलक से रहित होकर इस पृथ्वी पर घूमता हूँ और सबसे कहता फिरता हूँ कि “मैं ब्रह्महत्यारा हूँ।” मुझ महापापी ब्रह्मघाती को आप कृपा की भिक्षा दें। इस दशा में पड़े-पड़े मुझे एक वर्ष बीत गया। मैं पाप से जल रहा हूँ, मेरा चित्त शोक से व्याकुल है तथा ये जो सामने दिखाई देते हैं, इनका नाम चन्द्रशर्मा है। ये जाति के ब्राह्मण है, इन्होंने मोह से मलिन होकर गुरु का वध किया है और ये मगध देश के निवासी हैं। इनके स्वजनों ने इनका परित्याग कर दिया है। ये भी घूमते-घामते दैवात् यहाँ आ पहुँचे हैं। इनके भी न शिखा है न सूत्र। ब्राह्मण का कोई भी चिह्न इनके शरीर में नहीं रह गया है।

इनके सिवा जो ये तीसरे व्यक्ति हैं, इनका नाम देवशर्मा है। स्वामिन् ! ये भी बड़े कष्ट में है। ये भी जाति के ब्राह्मण हैं, किन्तु मोहवश वेश्या की आसक्ति में फँसकर शराबी हो गए थे। इन्होंने भी पूछने पर अपना सारा हाल सच-सच कह सुनाया है। अपने प्रथम पापाचार को याद करके इनके हृदय में बड़ा संताप होता है। ये सदा मनस्ताप से पीड़ित रहते हैं। इनको इनकी स्त्री ने, बन्धु-बान्धवों ने तथा गाँव के सब लोगों ने वहाँ से निकाल दिया है। ये अपने उसी पाप के साथ भ्रमण करते हुए यहाँ आए हैं।

ये चौथे महाशय जाति के वैश्य हैं। इनका नाम विधुर है। ये गुरुपत्नी के साथ समागम करने वाले हैं। इनकी माता मिथिला में जाकर वेश्या हो गई थी। इन्होंने मोहवश तीन महीनों तक उसी का उपभोग किया है परन्तु जब असली बात का पता लगा है तो बहुत दु:खी होकर पृथ्वी पर विचरते हुए ये भी यहाँ आ पहुँचे हैं। हम में से ये जो पाँचवें दिखाई दे रहे हैं, ये भी वैश्य ही हैं, इनका नाम नन्द है। ये पापियों का संसर्ग करने वाले महापापी हैं। इन्होंने प्रतिदिन धन के लालच में पड़कर बहुत चोरी की है। पातकों से आक्रान्त हो जाने पर इन्हें स्वजनों ने त्याग दिया है तब ये स्वयं भी खिन्न होकर दैवात् यहाँ आ पहुँचे हैं।

इस प्रकार हम पाँचों महापापी एक स्थान पर जुट गए हैं। हम सब के सब दु:खों से घिरे हुए हैं। अनेकों तीर्थों में घूम आए मगर हमारा घोर पातक नहीं मिटता। आपको तेज से उद्दीप्त देखकर हम लोगों का मन प्रसन्न हो गया है। आप जैसे साधु पुरुष के पुण्यमय दर्शन से हमारे पातकों के अन्त होने की सूचना मिल रही है। स्वामिन् ! कोई ऎसा उपाय बताइए, जिससे हम लोगों के पापों का नाश हो जाए। प्रभो ! आप वेदार्थ के ज्ञाता और परम दयालु जान पड़ते हैं, आपसे हमें अपने उद्धार की बड़ी आशा है।

मुनिशर्मा ने कहा – तुम लोगों ने अज्ञानवश पाप किया, किन्तु इसके लिए तुम्हारे हृदय में अनुताप है तथा तुम सब के सब सत्य बोल रहे हो, इस कारण तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करना मेरा कर्तव्य है। मैं अपनी भुजा उठाकर कहता हूँ, मेरी सत्य बातें सुनो। पूर्वकाल में जब मुनियों का समुदाय एकत्रित हुआ था, उस समय मैंने महर्षि अंगिरा के मुख से जो कुछ सुना था वही वेद शास्त्रों में भी देखा। वह सबके लिए विश्वास करने योग्य है। मेरी आराधना से संतुष्ट हुए स्वयं भगवान विष्णु ने भी पहले ऎसी ही बात बताई थी, वह इस प्रकार है।

भोजन से बढ़कर दूसरा कोई तृप्ति का साधन नहीं है। पिता से बढ़कर कोई गुरु नहीं है। ब्राह्मणों से उत्तम दूसरा कोई पात्र नहीं है तथा भगवान विष्णु से श्रेष्ठ दूसरा कोई देवता नहीं है। गंगा की समानता करने वाला कोई तीर्थ, गोदान की तुलना करने वाला कोई दान, गायत्री के समान जप, एकादशी के तुल्य व्रत, भार्या के सदृश मित्र, दया के समान धर्म तथा स्वतंत्रता के समान सुख नहीं है। गार्हस्थ्य से बढ़कर आश्रम और सत्य से बढ़कर सदाचार नहीं है। इसी प्रकार संतोष के समान सुख तथा वैशाख माह के समान महान् पापों का अपहरण करने वाला दूसरा कोई मास नहीं है।

वैशाख मास भगवान मधुसूदन को बहुत ही प्रिय है। गंगा आदि तीर्थों में तो वैशाख स्नान का सुयोग अत्यन्त दुर्लभ है। उस समय गंगा, जमुना तथा नर्मदा की प्राप्ति कठिन होती है। जो शुद्ध हृदय वाला मनुष्य भगवान के भजन में तत्पर हो पूरे वैशाख भर प्रात:काल गंगा स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है। इसलिए पुण्य के सारभूत इस वैशाख मास में तुम सभी पातकी मेरे साथ नर्मदा तट पर चलो और उसमें गोते लगाओ। नर्मदा के जल का मुनि लोग भी सेवन करते हैं, वह समस्त पापों के भय का नाश करने वाला है। मुनि के यों कहने पर वे सब पापी उनके साथ अद्भुत पुण्य प्रदान करने वाली नर्मदा की प्रशंसा करते हुए उसके तट पर गए।

किनारे पहुँचकर ब्राह्मण श्रेष्ठ मुनिशर्मा का चित्त परसन्न हो गया। उन्होंने वेदोक्त विधि के अनुसार नर्मदा के जल में प्रात: स्नान किया। उपर्युक्त पाँचों पापियों ने भी ब्राह्मण के कहने से ज्यों ही नर्मदा में डुबकी लगाई त्यों ही उनके शरीर का रंग बदल गया। वे तत्काल सुवर्ण के समान कान्तिमान हो गए फिर मुनिशर्मा ने सब लोगों के सामने उन्हें पाप-प्रशमन नामक स्तोत्र सुनाया।

भूपाल ! अब तुम पाप-प्रशमन नामक स्तोत्र सुनो। इसका भक्तिपूर्वक श्रवण करके भी मनुष्य पाप राशि से मुक्त हो जाता है। इसके चिन्तन मात्र से बहुतेरे पापी शुद्ध हो चुके हैं। इसके सिवा और भी बहुत-से मनुष्य इस स्तोत्र का सहारा लेकर अज्ञानजनित पाप से मुक्त हो गए हैं। जब मनुष्यों का चित्त परायी स्त्री, पराए धन तथा जीव-हिंसा आदि की ओर जाए तो इस प्रायश्चित्तरुपा स्तुति की शरण लेनी चाहिए, यह स्तुति इस प्रकार है –

 

विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नम:।

नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतं हरिम्।।

चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम्।

विष्णुमीड्यमशेषाणामनादिनिधनं हरिम्।।

अर्थ – संपूर्ण विश्व में व्यापक भगवान श्रीविष्णु को सर्वदा नमस्कार है। विष्णु को बारम्बार प्रणाम है। मैं अपने चित्त में विराजमान विष्णु को नमस्कार करता हूँ। अपने अहंकार में व्याप्त श्रीहरि को मस्तक झुकाता हूँ। श्रीविष्णु चित्त में विराजमान ईश्वर (मन और इन्द्रियों के शासक), अव्यक्त, अनन्त, अपराजित, सबके द्वारा स्तवन करने योग्य तथा आदि-अन्त से रहित है, ऎसे श्रीहरि को मैं नित्य-निरन्तर प्रणाम करता हूँ।

 

विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्।

योsहंकारगतो विष्णुर्यो विष्णुर्मयि संस्थित:।।

करोति कर्तृभूतोsसौ स्थावरस्य चरस्य च।

तत्पापं नाशमायाति तस्मिन् विष्णौ विचिन्तिते।।

अर्थ – जो विष्णु मेरे चित्त में विराजमान हैं, जो विष्णु मेरी बुद्धि में स्थित हैं, जो विष्णु मेरे अहंकार में व्याप्त हैं तथा जो विष्णु सदा मेरे स्वरुप में स्थित हैं, वे ही कर्ता होकर सब कुछ करते हैं। उन विष्णु भगवान का चिन्तन करने पर चराचर प्राणियों का सारा पाप नष्ट हो जाता है।

 

ध्यातो हरति य: पापं स्वप्ने दृष्टश्च पापिनाम्।

तमुपेन्द्रमहं विष्णुं नमामि प्रणतप्रियम्।।

अर्थ – जो ध्यान करने और स्वप्न में दिख जाने पर भी पापियों के पाप हर लेते हैं तथा चरणों में पड़े हुए शरणागत भक्त जिन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, उन वामनरूपधारी भगवान श्रीविष्णु को नमस्कार करता/करती हूँ।

 

जगत्यस्मिन्निरालम्बे ह्यजमक्षरमव्ययम्।

हस्तावलम्बनं स्तोत्रं विष्णुं वन्दे सनातनम्।।

अर्थ – जो अजन्मा, अक्षर और अविनाशी हैं तथा इस अवलम्बशून्य संसार में हाथ का सहारा देने वाले हैं, स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति की जाती है, उन सनातन श्रीविष्णु को मैं सदा प्रणाम करता/करती हूँ।

 

सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज।

हृ्षीकेश हृ्षीकेश हृ्षीकेश नमोsस्तु ते।।

अर्थ – हे सर्वेश्वर ! हे ईश्वर ! हे व्यापक परमात्मन् ! हे अधोक्षज ! हे इन्द्रियों का शासन करने वाले अन्तर्यामी हृषीकेश ! आपको बारम्बार नमस्कार है।

 

नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव।

दुरुक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाशु जनार्दन।।

अर्थ – हे नृसिंह ! हे अनन्त ! हे गोविन्द ! हे भूतभावन ! हे केशव ! हे जनार्दन ! मेरे दुर्वचन, दुष्कर्म और दुश्चिन्तन को शीघ्र नष्ट कीजिए।

 

यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना।

आकर्णय महाबाहो तच्छमं नय केशव।।

अर्थ – महाबाहो ! मेरी प्रार्थना सुनिए – अपने चित्त के वश में होकर मैंने जो कुछ बुरा चिन्तन किया हो, उसको शान्त कर दीजिए।

 

ब्रह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण।

जगन्नाथ जगद्धात: पापं शमय मेsच्युत।।

अर्थ – ब्राह्मणों का हित साधन करने वाले देवता गोविन्द ! परमार्थ में तत्पर रहने वाले जगन्नाथ ! जगत को धारण करने वाले अच्युत ! मेरे पापों का नाश कीजिए।

 

यच्चापराह्णे सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि।

कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता।।

जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।

नामत्रयोच्चारणत: सर्वं यातु मम क्षयम्।।

अर्थ – मैंने पूर्वाह्न, सायाह्न, मध्याह्न तथा रात्रि के समय शरीर, मन और वाणी के द्वारा, जानकर या अनजान में जो कुछ पाप किया हो, वह सब “हृषीकेश, पुण्डरीकाक्ष और माधव” – इन तीन नामों के उच्चारण से नष्ट हो जाए।

 

शारीरं मे हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष मानसम्।

पापं प्रशममायातु वाक्कृतं मम माधव।।

अर्थ – हृषीकेश ! आपके नामोच्चारण से मेरा शारीरिक पाप नष्ट हो जाए, पुण्डरीकाक्ष ! आपके स्मरण से मेरा मानस पाप शान्त हो जाए तथा माधव ! आपके नाम-कीर्तन से मेरे वाचिक पाप का नाश हो जाए।

 

यद् भुज्जान: पिबंस्तिष्ठन् स्वपण्जाग्रद् यदा स्थित:।

अकार्षं पापमर्थार्थं कायेन मनसा गिरा।।

महदल्पं च यत्पापं दुर्योनिनरकावहम्।

तत्सर्वं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात् ।।

अर्थ – मैंने खाते, पीते, खड़े होते, सोते, जागते तथा ठहरते समय मन, वाणी और शरीर से, स्वार्थ या धन के लिए जो कुत्सित योनियों और नरकों की प्राप्ति कराने वाला महान या थोड़ा पाप किया है, वह सब भगवान वासुदेव का नामोच्चारण करने से नष्ट हो जाए।

 

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्।

अस्मिन् संकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु।।

अर्थ – जिसे परब्रह्म, परम धाम और परम पपवित्र कहते हैं, वह तत्त्व भगवान विष्णु ही है, इन श्रीविष्णु भगवान का कीर्तन करने से मेरे जो भी पाप हों, वे नष्ट हो जाएँ।

 

यत्प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शविवर्जितम्।

सूरयस्तत्पदं विष्णोस्तत्सर्वं मे भवत्वलम्।।

अर्थ – जो गन्ध और स्पर्श से रहित हैं, ज्ञानी पुरुष जिसे पाकर पुन: इस संसार में नहीं लौटते, वह श्रीविष्णु का ही परम पद है। वह सब मुझे पूर्णरूप से प्राप्त हो जाए।

 

पापप्रशमनं स्तोत्रं य: पठेच्छृृणुयान्नर:।

शारीरैर्मानसैर्वाचा कृतै: पापै: प्रमुच्यते।।

मुक्त: पापग्रहादिभ्यो याति विष्णो:परं पदम्।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रं  सर्वाघनाशनम्।।

प्रायश्चित्तमघौघानां पठितव्यं नरोत्तमै: (अध्याय 88, श्लोक 72 से 91 तक)

अर्थ – यह “पाप-प्रशमन” नामक स्तोत्र है. जो मनुष्य इसे पढ़ता और सुनता है वह शरीर, मन और वाणी द्वारा किए हुए पापों से मुक्त हो जाता है. इतना ही नहीं वह पाप ग्रह आदि के भय से भी मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है. यह स्तोत्र सब पापों का नाश करने वाला तथा पाप राशि का प्रायश्चित है. इसलिए श्रेष्ठ मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न कर के इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए.

राजन् ! इस स्तोत्र के श्रवण मात्र से पूर्वजन्म तथा इस जन्म के किये हुए पाप भी तत्काल नष्ट हो जाते हैं। यह स्तोत्र पापरूपी वृक्ष के लिए कुठार और पापमय ईंधन के लिए दावानल है। पापराशिरूपी अन्धकार-समूह का नाश करने के लिए यह स्तोत्र सूर्य के समान है। मैंने सम्पूर्ण जगत पर अनुग्रह करने के लिए इसे तुम्हारे सामने प्रकाशित किया है। इसके पुण्यमय माहात्म्य का वर्णन करने में स्वयं श्रीहरि भी समर्थ नहीं हैं

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

सर्वार्थ सिद्धि योग – 2020आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

सर्वार्थ सिद्धि योग – 2020

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

कुछ विशेष कार्य जैसे – कोई व्यापार या बिजनेस शुरु करना हो, कोई सरकारी अथवा राजकीय कॉन्ट्रैक्ट करना हो, परीक्षा देनी हो, नौकरी पर जाना हो, चुनाव के लिए आवेदन पत्र देना हो, भूमि से संबंधित कोई कार्य हो, यात्रा पर जाना हो, वस्त्र या आभूषण आदि लेने हो या फिर मुकदमा आरंभ करना हो लेकिन कोई शुभ मूहुर्त ना मिल रहा हो तब सर्वार्थ सिद्धि योग में ये सभी काम शुरु किए जा सकते हैं. कई बार शुक्र या गुरु अस्त होता है या अधिकमास पड़ जाता है या फिर वेध आदि की वजह से भी नया काम प्रारंभ करने की मनाही होती हैं लेकिन इन सब के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग उस दिन बन रहा हो तब उपरोक्त काम शुरु किए जा सकते हैं. 

 

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सर्वार्थ सिद्धि योग – मई 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                             समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
3 मई 21:434 मई सूर्योदय 
8 मई 08:38 9 मई सूर्योदय 
10 मई सूर्योदय 11 मई 04:13 
17 मई 13:59 18 मई सूर्योदय 
19 मई 19:53 20 मई सूर्योदय 
23 मई सूर्योदय 24 मई 04:52 
25 मई सूर्योदय 25 मई 06:10 
28 मई सूर्योदय 28 मई 07:27 
31 मई सूर्योदय 1 जून सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – जून 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                             समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
1 जून सूर्योदय तक 
4 जून 18:37 5 जून 16:44
7 जून सूर्योदय 7 जून 14:11 
14 जून सूर्योदय 14 जून 24:22
16 जून सूर्योदय 17 जून सूर्योदय 
20 जून सूर्योदय 20 जून 12:02
26 जून 11:26 27 जून सूर्योदय 
28 जून सूर्योदय 29 जून सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – जुलाई 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                        समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 जुलाई 02:343 जुलाई 01:14
5 जुलाई 23:026 जुलाई सूर्योदय 
6 जुलाई 23:12 7 जुलाई सूर्योदय 
12 जुलाई सूर्योदय 12 जुलाई 08:18 
14 जुलाई सूर्योदय 14 जुलाई 14:07
15 जुलाई 16:4316 जुलाई सूर्योदय 
20 जुलाई 21:2121 जुलाई सूर्योदय 
24 जुलाई सूर्योदय 24 जुलाई 16:03
26 जुलाई सूर्योदय 26 जुलाई 12:37
29 जुलाई 08:3330 जुलाई 07:41


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – अगस्त 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                      समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 अगस्त 06:523 अगस्त सूर्योदय 
3 अगस्त 07:194 अगस्त सूर्योदय 
7 अगस्त सूर्योदय 7 अगस्त 13:33
9 अगस्त 19:0610 अगस्त सूर्योदय 
11 अगस्त 24:5713 अगस्त 03:26
17 अगस्त 06:4418 अगस्त 05:43 
18 अगस्त सूर्योदय 19 अगस्त 04:08 
26 अगस्त सूर्योदय 26 अगस्त 13:04
30 अगस्त सूर्योदय 30 अगस्त 13:52 
31 अगस्त सूर्योदय 31 अगस्त 15:04


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – सितंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                      समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
4 सितंबर 23:285 सितंबर सूर्योदय 
6 सितंबर सूर्योदय 7 सितंबर 05:24
8 सितंबर 08:2610 सितंबर सूर्योदय 
13 सितंबर 16:3414 सितंबर 15:52
15 सितंबर सूर्योदय 15 सितंबर 14:25
21 सितंबर 20:4922 सितंबर सूर्योदय 
26 सितंबर 19:2627 सितंबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – अक्तूबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                   समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 अक्तूबर 05:573 अक्तूबर सूर्योदय 
4 अक्तूबर सूर्योदय 4 अक्तूबर 11:52
6 अक्तूबर सूर्योदय 6 अक्तूबर 17:54
7 अक्तूबर सूर्योदय 8 अक्तूबर सूर्योदय 
9 अक्तूबर 24:27 10 अक्तूबर सूर्योदय 
11 अक्तूबर सूर्योदय 11 अक्तूबर 25:19 (रात्रि 01:19)
17 अक्तूबर 11:5218 अक्तूबर सूर्योदय 
19 अक्तूबर सूर्योदय 20 अक्तूबर 03:53
23 अक्तूबर 25:28 (रात्रि 01:28)24 अक्तूबर 26:38 (रात्रि 02:38) 
29 अक्तूबर 12:0031 अक्तूबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – नवंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                    समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 नवंबर 23:503 नवंबर सूर्योदय 
4 नवंबर सूर्योदय 5 नवंबर 04:51
6 नवंबर 06:457 नवंबर सूर्योदय 
8 नवंबर सूर्योदय 8 नवंबर 08:45
12 नवंबर 04:2512 नवंबर सूर्योदय 
14 नवंबर सूर्योदय 14 नवंबर 20:09
16 नवंबर सूर्योदय 16 नवंबर 14:37
20 नवंबर 09:2221 नवंबर 09:53
24 नवंबर 15:3225 नवंबर सूर्योदय 
26 नवंबर सूर्योदय 27 नवंबर 24:23
30 नवंबर सूर्योदय 1 दिसंबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – दिसंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                        समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
1 दिसंबर सूर्योदय तक 
2 दिसंबर सूर्योदय 2 दिसंबर 10:38 
3 दिसंबर 12:21 4 दिसंबर 13:39 
9 दिसंबर 12:3310 दिसंबर सूर्योदय 
18 दिसंबर सूर्योदय 18 दिसंबर 19:04
22 दिसंबर सूर्योदय 22 दिसंबर 25:37 (रात्रि 01:37) 
24 दिसंबर सूर्योदय 25 दिसंबर 07:36 
28 दिसंबर सूर्योदय 29 दिसंबर सूर्योदय 
31 दिसंबर सूर्योदय 1 जनवरी (2021) सूर्योदय 

अथ कीलकम् :------आचार्य डा.अजय दीक्षित

अथ कीलकम् :------

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आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

ऊँ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य शिव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्रीमहासरस्वती देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोग: ।

 

ऊँ नमश्चण्डिकायै ।।

 

मार्कण्डेय उवाच 

ऊँ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।

श्रेय:प्राप्तिनिमित्ताय नम: सोमार्धधारिणे ।।1।।

सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् ।

सोsपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्पर: ।।2।।

सिद्धय्न्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि ।

एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति ।।3।।

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किंचिदपि विद्यते ।

विना जाप्येन सिद्धयेत सर्वमुच्चाटनादिकम् ।।4।।

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशंकामिमां हर: ।

कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ।।5।।

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार स: ।

समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ।।6।।

सोsपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशय: ।

कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहित: ।।7।।

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति ।

इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ।।8।।

यो निष्कीलां विधायैना नित्यं जपति संस्फुटम् ।

स सिद्ध: स गण: सोsपि गन्धर्वो जायते नर: ।।9।।

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते ।

नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।।10।।

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति ।

ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधै: ।।11।।

सौभाग्यादि च यत्किंचिद् दृश्यते ललनाजने ।

तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ।।12।।

शनैस्तु जप्यमानेsस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकै: ।

भवत्येव समग्रापि तत: प्रारभ्यमेव तत् ।।13।।

ऎश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पद: ।

शत्रुहानि: परो मोक्ष: स्तूयते सा न किं जनै: ।।14।।

 

।। इति देव्या: कीलकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।