मंगलवार, 1 अगस्त 2017

"गौ" पुत्र "गोकर्ण" की कथा 🔛🔛डा.अजय दीक्षित

डा.अजय दीक्षित
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         कथा

गोकर्ण के जन्म के संबंध में एक कथा विख्यात है। कहा जाता है कि गोकर्ण के पिता आत्मदेव एक विद्वान् और धनवान ब्राह्मण थे। आत्मदेव की पत्नी का नाम धुन्धुली था। ये ब्राह्मण दम्पति संतानहीन थे। एक दिन वह ब्राह्मण संतानचिन्ता में निमग्न होकर घर से निकल पड़ा और वन में जाकर एक तालाब के किनारे बैठ गया। वहाँ उसे एक सन्न्यासी महात्मा के दर्शन हुए। ब्राह्मण ने उनसे अपनी संतानहीनता का दु:ख बताकर संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महात्मा ने कहा- 'ब्राह्मणदेव! संतान से कोई सुखी नहीं होता है। तुम्हारे प्रारब्ध में संततियोग नहीं है। तुम्हें भगवान के भजन में मन लगाना चाहिये।' ब्राह्मण बोला- 'महाराज! मुझे आपका ज्ञान नहीं चाहिये। मुझे संतान दीजिये, अन्यथा मैं अभी आपके सामने अपने प्राणों का त्याग कर दूँगा।' ब्राह्मण का हठ देखकर महात्माजी ने उसे एक फल दिया और कहा- 'तुम इसे अपनी पत्नी को खिला दो। इसके प्रभाव से तुम्हें पुत्र प्राप्ति होगी।' आत्मदेव ने वह फल ले जाकर अपनी पत्नी धुन्धुली को दे दिया, किंतु उसकी पत्नी दुष्टस्वभाव की कलहकारिणी स्त्री थी। उसने गर्भधारण एवं प्रसवकष्ट का स्मरण करके फल को अपनी गाय को खिला दिया और पहले से गर्भवती अपनी छोटी बहन से प्रसव के बाद संतान को अपने लिये देने का वचन ले लिया। समय आने पर धुन्धुली की बहन को एक पुत्र हुआ और उसने अपने पुत्र को धुन्धुली को दे दिया। उस पुत्र का नाम धुन्धुकारी रखा गया।

गोकर्ण का जन्म

तीन मास के बाद गाय को भी एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसके शरीर के सभी अंग मनुष्य के थे, केवल कान गाय के समान थे। ब्राह्मण ने उस बालक का नाम गोकर्ण रखा। गोकर्ण थोड़े ही समय में परम विद्वान् और ज्ञानी हो गये। धुन्धुकारी दुश्चरित्र, चोर और वेश्यागामी निकला। आत्मदेव उससे दु:खी होकर और गोकर्ण से उपदेश प्राप्त करके वन में चले गये और वहीं भगवान का भजन करते हुए परलोक सिधारे। गोकर्ण भी तीर्थ यात्रा के लिये चले गये। धुन्धुकारी ने अपने पिता की सम्पत्ति नष्ट कर दी। उसकी माता ने कुएँ में गिरकर अपना प्राण त्याग दिया। उसके बाद धुन्धुकारी ने निरंकुश होकर पाँच वेश्याओं को अपने घर में रख लिया। एक दिन वेश्याओं ने उसे भी मार डाला। धुन्धुकारी अपने दूषित आचरण के कारण प्रेतयोनि को प्राप्त हुआ।

धुन्धुकारी का उद्धार

गोकर्ण तीर्थ यात्रा करके लौट आये। वे जब रात में घर में सोने गये, तब प्रेत बना हुआ धुन्धुकारी उनके निकट आया। उसने बड़े ही दीन शब्दों में अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त गोकर्ण से कह सुनाया और प्रेतयोनि की भीषण यातना से छूटने का उपाय पूछा। भगवान सूर्य की सलाह पर गोकर्ण ने धुन्धुकारी को प्रेतयोनि से मुक्त करने के लिये श्रीमद्भागवत की सप्ताह-कथा प्रारम्भ की। श्रीमद्भागवतकथा का समाचार सुनकर आस-पास के गाँवों के लोग भी कथा सुनने के लिये एकत्र हो गये। जब व्यास के आसन पर बैठकर गोकर्ण ने कथा कहनी प्रारम्भ की, तब धुन्धुकारी भी प्रेतरूप में सात गाँठों के एक बाँस के छिद्र में बैठकर कथा सुनने लगा। सात दिनों की कथा में क्रमश: उस बाँस की सातों गाठें फट गयीं और धुन्धुकारी प्रेतयोनि से मुक्त होकर भगवान के धाम को चला गया। श्रावण के महीने में गोकर्ण ने एक बार फिर उसी प्रकार श्रीमद्भागवत की कथा कही और उसके प्रभाव से कथा-समाप्ति के दिन वे अपने श्रोताओं के सहित भगवान विष्णुके परमधाम को पधारे।

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शिव जी के आत्म लिंग की कथा----जिसे रावण लंका ले जाना चाहता था ।

    डा.अजय दीक्षित

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बात त्रेतायुग की है जब रावण की माता कैकसी, मानस पुत्र ब्रह्मा पुलस्ति की पत्नी, प्रतिदिन लंका में समुद्र किनारे शिवजी की पूजा करती थी। हर दिन वह मिटटी का शिवलिंग बनाती थी, उसमे प्राण प्रतिष्ठा करती थी। फिर उसका पूजा व अभिषेक करती थी। फिर वह लिंग समुद्र के उतार चढ़ाव वाले प्रवाह में बह जाता।

रावण की माता मिटटी के शिवलिंग की पूजा करती हैं।

एक दिन मातृभक्त रावण ने आपनी माँ से पूछा, कि क्यों इस मिट्टी के शिवलिंग को पूज रही हो। तो उसने बताया की मरने के बाद उसे कैलाश में स्थान मिलेगा। रावण ने कहा कि मैं स्वयं कैलाश ही आपके लिए ले आता हूँ, शिवजी की तपस्या करके। आप कृपया निश्चित रहिये। और रावण चल पड़ा कैलाश की ओर।

रावण अपनी माता के कहता है की वोह ओसके लिए कैलाश ही उठा कर लेके आएगा.

रावण शिव शंकर की घोर तपस्या करता रहा ।

 

एक बार रावण फिर तपस्या करता है.

नारद मुनि जाते है श्री हरी विष्णु भगवान के पास, चिंतित और जिग्यात्सुक होकर। तो श्री हरी बोलते है की वह अपनी माया से रावण को भ्रमित करेंगे, जिससे रावण जो मांगने गया है वह उसे स्मरण नहीं रहे।

नारद और बाकी देवता भगवान श्री महाविष्णु के पास जाते है मदत के लिए.

बहुत तपस्या करने के बाद जब भगवान शिव प्रकट नहीं होते तो शक्तिशाली रावण आपने मजबूत हाथों से स्वयं कैलाश उठाता है और प्रचंडतापूर्वक हिलाता है। रावण के कैलाश हिलाने से सातों पाताललोक हिलने लगते है। शेषनाग अपना फन हिला देता है। कछुआ डर के मारे कापने लगता है। अमरपुर (इन्द्र की राजधानी) और स्वर्ग हैरान हो जाते है। पार्वती जी शिवजी से कहती है कि आज कैलाश को क्या हुआ है? इस संकट को रोकने के लिए कुछ कीजिये। शिवजी बोलते है “मेरा एक भक्त मेरी तपस्या कर रहा है, यह उसी के कारण हो रहा है।” पार्वती जी कहती है “कृपा करके सारे देवताओं की रक्षा कीजिये जो बहुत डर गए है।” शिवजी अपने पैर के अंगूठे से कैलाश को दबाते है तो रावण के हाथ फँस जाते है। रावण शिवजी को प्रसन्न करने के लिए शिव तांडव स्त्रोत्र गाता है। यहाँ पर रावण का अहंकार अपनी ताकत का शिवजी विनाश करते है ।  इसलिए  लिंगाष्टकम में लिखा गया है दुसरे पैराग्राफ़  में “रावण दर्प विनाशक लिंगम , तत्प्रनमामी सदाशिवालिंगम“।

शक्तिशाली मातृभक्त रावण अपने सैकड़ो हाथो से कैलाश उठाता है

भोलेनाथ बहुत प्रसन्न होते है, और पार्वती के साथ प्रकट होते है, रावण के सामने। अब चलती है श्री हरी की माया। रावण कैलाश को भूलकर जगदम्बा पार्वती पर मोहित हो जाता है। और भगवान शिव से पार्वती को मांग लेता है। हमारे भोलेनाथ अपने भक्त को इतना चाहते है की वह पार्वती रावण को दे देते है लेकिन कहते है कि आप आगे-आगे चले और पार्वती जी पीछे-पीछे आएगी। जब तक लंका नहीं पहुँचते, तब तक पीछे मुडकर देखना मत और अगर देखा तो पार्वती वही स्थापित हो जायेगी। रावण ले चलता है पार्वती जी को लेकर।

रावण पार्वती माँ को ही मांग लेता है.और हमारे भोलेंनाथ दे देते है

पार्वती अपने भाई श्रीहरी को याद करती है इस संकट का निवारण करने के लिए। श्री हरी भगवान इसके लिए नारद को भेज देते है रावण की ओर। जब रावण गोकर्ण पहुँचता है तो नारद अपनी वाक्पटुता से रावण को भ्रमित करके पूछता है कि किस बदसूरत और भयंकर स्त्री को ले जा रहा है? रावण कहता है की यह विश्वसुन्दरी जगदम्बा पार्वती है। नारद उसपर हँसता है और कहता है कि ज़रा पीछे मूड के देखो। तो रावण पीछे मुड के देखता है तो देवी ने भद्रकाली का रूप धारण किया हुआ था। और जैसे ही उसने देखा तो वह भद्रकाली की मूर्ति के रूप में गोकर्ण में स्थापित हो जाती है जैसे शिवजी ने कहा था। फिर नारद कहता है कि असली पार्वती ने पाताल में मायासुर के घर में जन्म लिया है जिसका नाम मंदोदरी है।

रावण देवी को त्याग देता है तो वोह भद्रकाली का रूप में गोकर्ण में बस जाती है.

रावण चल देता है पाताल की ओर। मायासुर से युद्ध करता है, उसे हराता है और उसकी बेटी मंदोदरी से शादी करता है।

, रावण शादी करता है मंदोदरी से.

शादी करने के बाद वह लंका में लेके आता है। रावण की माता यह सब देखकर उसे पूछती है “शादी करी वह ठीक है, लेकिन जिस काम के लिए गए थे, वह तो किया ही नहीं। कैलाश यहाँ लाना था और कहा की देवताओं ने उसे भ्रमित किया है। अब की बार लक्ष्य को हासिल करके ही आये।

रावण की माता शादी की प्रतिक्रया देते हुए .

रावण फिर से घोर तपस्या शुरू करता है। इस बार और भी कठिन और मुश्किल। शिवजी को पता था की वह क्या मांगने वाला है? इस लिए वह प्रकट नहीं होते है।

रावण घोर तपस्या करता है शिवजी की.

लेकिन इस मातृभक्त रावण की जिद के आगे जब भोलेनाथ प्रकट नहीं होते, तब वह एक-एक करके अपने सर काटने लगता है और भोलेनाथ को अर्पण करता है। भोलेनाथ से अब रहा नहीं जाता और और वे प्रकट होते है और रावण को वर मांगने को कहते है। रावण कहता है कि उसे अपनी माता के लिये कैलाश पर्वत चाहिए ताकि उसे मरने के बाद कैलाश नसीब हो। तो शिवजी ने कहा की उसके लिए कैलाश ले के जाने की कोई आवशकता नहीं। उनके आत्मा से एक शिवलिंग जिसे आत्मलिंग कहते है उसे निकालते है और कहते है कि यह उनके आत्मा से निकला है और स्वयं साक्षात शिव के समान है और इसे इस बार नीचे रखना मत लंका पहुँचने से पहले। रावण खुश होकर आत्मलिंग ले के जाता है।

रावण अपने शीश काटता है और उसकी नसों से संगीत बजा कर शिवाजी को प्रसन्न करता है.

फिर से देवता परेशान हो जाते है की अगर रावण आत्मलिंग ले के जाता है लंका में तो वह दिग्विजय हो जायेगा और उसे कोई हरा नहीं सकता। नारद मुनि इसका निवारण करने के लिए श्री गणेशजी के पास जाते है। गणेशजी मदद के लिए तैयार हो जाते है।

नारद फिर गणपतिजी के पास जाते है मदत के लिए.

रावण फिर से जब गोकर्ण पहुँचता है तब गणेशजी एक बालक के रूप में गाय चराने का बहाना करके अपनी लीला करते है। उसी वक्त नारायण श्री हरी भगवान अपने सुदर्शन चक्र से सूर्य भगवान को ढकते है। रावण को लगता है कि सूर्यास्त हो गया है और पूजा संध्या का वक्त हो गया है। वह बालक रुपी गणेश को कहता है कि वह पूजा करने समुद्र में जा रहा है, तब तक थोड़ी देर ले लिए वह यह आत्मलिंग पकड़ के रखे। गणेशजी आत्मलिंग लेते है और कहते है, की उनसे ज्यादा देर उठाया नहीं जाएगा. और वह तीन बार रावण को पुकारेंगे। अगर वह नहीं आयेंगे तो वह आत्मलिंग नीचे रख देगा। रावण फिर जाता है पूजा करने जाता समुद्र की ओर।

रावण आत्मलिंगा गणेश को देता है और पूजा करने समुद्र में जाता है.

अब जैसे ही रावण समुद्र में पूजा शुरू करता है, गणेश जी अपनी लीला शुरू करते है। तीन बार जल्दी-जल्दी रावण को बुलाते है। और तुरंत आत्मलिंग नीचे धरती पर रखने लगते है।

गणेशजी रावण को बुलाते है आत्मलिंग को निचे रकने से पहले.

रावण दूर से इशारा करता है, मत रखो, लेकिन तब तक गणेशजी ने अपना काम कर लिया था। आत्मलिंग नीचे रख दिया था। ऊपर से देवताओ के फूलों की बौछार गणेशजी पर पढ़ती है। रावण समझ जाता है कि देवताओं का काम हो गया।

रावण इशारा करता है की मत रखो.

रावण आकर गणेशजी को पकड़कर जोर से उसके सर पर चोट पहुँचाते है। इसलिए गणेशजी की मूर्ति जो गोकर्ण में है उसके सिर में एक खड्डा है और रावण के बल के कारण उनका सिर नीचे की तरफ और हाथ छोटे हो गए है।

रावण गणेशजी पर बहुत गुस्सा होते है.

रावण जोर उस आत्मलिंग को उठाने की कोशिश करता है। लेकिन नहीं उठा पाता। फिर उसे उखाड़ने की कोशिश करता है। उखाड़ते-उखाड़ते जो लिंग है उसका आकार गाय के कान जैसा हो जाता है। इस लिए जगह का नाम गो :-गाय , कर्ण :- कान, गोकर्ण कहते है। रावण उस लिंग को उठा नहीं सका और उसे महाबल का खिताब दिया। इसलिए उस आत्मलिंग को गोकर्ण महाबलेश्वर कहते है।

रावण अत्मलिंग को उखाड़ने की कोशिश करता है.

रावण ने गुस्से में उस आत्मलिंग के सारी सामग्री जो आत्मलिंग को ढके हुए थी, उसे फेक दिया, उस लिंग की डिबिया, ढक्कन, धागा और कपडा को अलग-अलग जगह पर फेक दिया। और वह सभी अलग जाकर गिर गए और 4 अलग-अलग लिंग में स्थापित हो गये।

1) गोकर्ण, महाबलेश्वर :- मुख्य लिंग

2) सज्जेश्वर :- जहां लिंग की डिबिया गिरी, (35 किमी करवर से)

3) धारेश्वर :- धागा जो लिंग से बंधा हुआ था, (45 किमी गोकर्ण से दक्षिण की ओर)

4) गुनावंतेश्वर :- जहाँ पर लिंग का ढक्कन गिरा था, (60 किमी गोकर्ण से दक्षिण की ओर)

5) मुरुडेश्वर :- पूरे लिंग को ढका हुआ कपड़ा जहा गिरा, ( (70 किमी गोकर्ण के दक्षिण की ओर)

अंत में भगवान शिव, पार्वती माँ और सारे देवता सहित इन पाँचों क्षेत्र में आते और इन्हें पञ्च क्षेत्र नाम देते है।

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सोमवार, 24 जुलाई 2017

भारत के रोचक तथ्य

भारत के रोचक तथ्य
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डा.अजय दीक्षित

1. भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है ।

2. भारत विश्व का सातवां सबसे बड़ा देश है ।

3. भारत का अंग्रेजी में नाम ‘इंडिया’ इं‍डस (सिंध) नदी से बना है |

4. वाराणसी, जिसे बनारस के नाम से भी जाना जाता है, आज विश्व का सबसे पुराना और निरंतर बसे शहर है। विदेशी पर्यटक यहाँ भारी मात्रा में आते हैं।

5.बीज गणित(algebra), त्रिकोणमिति(trigonometry) और कलन(calculation) भारत में ही आरंभ हुआ था। विदेशों में भी गणित भारत के माध्यम से ही पहुंचा।

6. ‘स्थान मूल्य प्रणाली’(place value system) और ‘दशमलव प्रणाली’(decimal system) का विकास भारत में 100 ईसा पूर्व में हुआ था।

7. सांप सीढ़ी(snake & ladder) का खेल भारत में तेरहवीं शताब्‍दी में तैयार किया गया था। संत ज्ञान देव द्वारा तैयार किये गए इस खेल को पहले मोक्षपट के नाम से जाना जाता था।

8. 10वीं शताब्दी के दौरान तिरुपति शहर में बनाया गया विष्णु मंदिर, विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक तीर्थ यात्रा स्थान है।

9. बृहदेश्‍वर मंदिर, विश्व का प्रथम ग्रेनाइट मंदिर हैं। यह तमिलनाडु के तंजौर में स्थित है। इस मंदिर के शिखर ग्रेनाइट के 80 टन के टुकड़ों से बने हैं। यह भव्य मंदिर राजाराज चोल के राज्य के दौरान केवल 5 वर्ष की अवधि में (1004 ए डी और 1009 ए डी के दौरान) निर्मित किया गया था।

10. भारत ने अपने आखिरी 100000 वर्षों के इतिहास में किसी भी देश पर हमला नहीं किया है।

11. भारत का नाम ऋग्वेद के अनुसार प्राचीन जन (कबीला ) ” भरत ” के नाम पर भारत पड़ा। इसके राजा सुदास थे। जिन्होंने परुश्नि (वर्तमान में रावी ) नदी के तट पर दसराज्ञ युद्ध में दस जनों को पराजित किया था।

12. 5000 साल पहले कई संस्कृतियों में घुमंतू(nomads) वनवासी थे, तब भारतीयों ने सबसे पहले सिंधु घाटी (सिंधु घाटी सभ्यता) में हड़प्पा संस्कृति की स्थापना की।

13. हड़प्पा सभ्यता विश्व की पहली नगरीय सभ्यता है। यहाँ हर तरह की बुनियादी सुविधा का बंदोबस्त था।

14. ईरान से आए आक्रमणकारी “स” का उच्चारण(pronunciation) “ह” करते थे। इस तरह उन्होंने सिंधु को हिंदु की तरह प्रयोग किया। और भविष्य में चलकर इसी से देश को ‘हिंदुस्तान’ नाम मिला।

15. दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट का मैदान हिमाचल प्रदेश के चायल नामक स्थान पर है। इसे समुद्री सतह से 2444 मीटर की ऊंचाई पर भूमि को समतल बना कर 1893 में तैयार किया गया था।

16. भारत में विश्व भर से सबसे अधिक संख्या में डाक खाने स्थित हैं।

17. भारतीय रेल देश का सबसे बड़ा नियोक्ता है। यह दस लाख से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है।

18. विश्व का सबसे प्रथम विश्‍वविद्यालय 700 बी सी में तक्षशिला में स्थापित किया गया था। इसमें 60 से अधिक विषयों में 10,500 से अधिक छात्र दुनियाभर से आकर अध्‍ययन करते थे।

19. नालंदा विश्‍वविद्यालय चौथी शताब्‍दी में स्थापित किया गया था जो शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महानतम उपलब्धियों में से एक है। चाणक्य नालंदा विश्वविद्यालय में आचार्य थे।

20. आयुर्वेद मानव जाति के लिए ज्ञात सबसे आरंभिक चिकित्सा शाखा है। शाखा विज्ञान के जनक माने जाने वाले चरक ने 2500 वर्ष पहले आयुर्वेद का समेकन किया था।

21. भारत 17वीं शताब्दी के आरंभ तक ब्रिटिश राज आने से पहले सबसे संपन्न देश था। क्रिस्‍टोफर कोलम्‍बस भारत की सम्पन्नता से आकर्षित हो कर भारत आने का समुद्री मार्ग खोजने चला और उसने गलती से अमेरिका को खोज लिया।

22. नौवहन की कला और नौवहन का जन्‍म 6000 वर्ष पहले सिंध नदी में हुआ था। दुनिया का सबसे पहला नौवहन संस्‍कृ‍त शब्‍द नव गति से उत्पन्न हुआ है। शब्‍द नौ सेना भी संस्कृत शब्‍द नोउ से हुआ।

23. भास्‍कराचार्य ने खगोल शास्त्र के कई सौ साल पहले पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने में लगने वाले सही समय की गणना की थी। उनकी गणना के अनुसार सूर्य की परिक्रमा में पृथ्‍वी को 365.258756484 दिन का समय लगता है।

24. भारतीय गणितज्ञ बुधायन द्वारा जिस संकल्पना को समझाया उसे पाइथागोरस का प्रमेय करते हैं। उन्‍होंने इसकी खोज छठवीं शताब्‍दी में की, जो यूरोपीय गणितज्ञों से काफी पहले की गई थी।

25. बीज गणित, त्रिकोण मिति और कलन का उद्भव भी भारत में हुआ था। चतुष्‍पद समीकरण का उपयोग 11वीं शताब्‍दी में श्री धराचार्य द्वारा किया गया था।

26. ग्रीक तथा रोमनों द्वारा उपयोग की गई की सबसे बड़ी संख्‍या 106 थी जबकि हिन्‍दुओं ने 10*53 जितने बड़े अंकों का उपयोग (अर्थात 10 की घात 53), के साथ विशिष्‍ट नाम 5000 बीसी के दौरान किया। आज भी उपयोग की जाने वाली सबसे बड़ी संख्‍या टेरा: 10*12 (10 की घात12) है।

27. वर्ष 1896 तक भारत विश्व में हीरे का एक मात्र स्रोत था।
(स्रोत: जेमोलॉजिकल इंस्‍टी‍ट्यूट ऑफ अमेरिका)

28. बेलीपुल विश्व में सबसे ऊंचा पुल है। यह हिमाचल पर्वत में द्रास और सुरु नदियों के बीच लद्दाख घाटी में स्थित है।

29. भारत में होने वाला कुम्भ मेला दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला होता है। कुम्भ मेले को अन्तरिक्ष से भी देखा जा सकता है।

30.  “भारत, मानव जाति का उद्गम स्थल, मानव भाषण का जन्मस्थान है, इतिहास की जननी, कथा की दादी, और परंपरा की दादी है। आदमी के इतिहास में सबसे अधिक मूल्यवान और सबसे शिक्षाप्रद सामग्री भारत में ही है। ” -मार्क ट्वेन

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 जय सियाराम 🚩

पृथ्वी का रहस्य ।डा.अजय दीक्षित

डा.अजय दक्षित

1. पृथिवी अथवा पृथ्वी का नाम पौराणिक कथा पर आधारित है जिसका संबंध महाराज पृथु से है। अन्य नाम हैं – धरा, भूमि, धरित्री, रसा, रत्नगर्भा इत्यादि। अंग्रेजी में Earth (अर्थ) और लेटिन भाषा में टेरा।

2. वैज्ञानिकों  के अनुसार पृथ्वी की कुल उम्र 4 .6 अरब वर्ष मानी गई हैं।

3. दुनिया के छह बड़े देश ऐसे हैं जिन्होंने धरती का 40% हिस्सा घेरा हुआ है।

4. रोजाना 4500 बादल पृथ्वी पर गरजते हैं।

5. हर सेकंड पृथ्वी पर कहीं न कहीं 100 बार आसमानी बिजली गिरती है।

6. सौर मंडल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन का अस्तित्व है।

7. पृथ्वी के 29% भाग भू-भाग है और 71% पानी ही पानी है।

8. सूरज को फुटबाल मानने पर हमारी धरती कांच की छोटी गोली की तरह होगी।

9. पृथ्वी पर 97 % पानी खारा है या पीने लायक नहीं है और मात्र  3% ही पीने लायक साफ़ पानी है।

10. सूरज धरती का सबसे पास का तारा है।

11. पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण पर्वतों का 15,000 मीटर से ऊँचा हो पाना संभव नही है।

12. पृथ्वी पर मापा गया सबसे कम तापमान  – 89. 2  डिग्री सेल्सियस है।

13. सौर मंडल में पृथ्वी आकार में सबसे बड़े ग्रहों में पांचवे स्थान पर आती है।

14. सूर्य का प्रकाश धरती पर पहुँचने में 8 मिनट 18 सेकंड लगते हैं।

15. पृथ्वी अपना एक चक्कर 23 घंटे 56 मिनट और 4 सेकंड्स में पूरा करती है।

16. सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में धरती को 365 दिन और 6 घंटे का समय लगता है। 6 घंटे जोड़-जोड़ कर जो एक दिन बढ़ता है। वह हर चौथे साल फ़रवरी में जोड़ दिया जाता है। वही फ़रवरी का महीना 29 दिन का होता है।

17. पृथ्वी 1670 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से घूमती है।

18. अगर चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह नहीं होता तो धरती पर दिन लगभग 30 घंटों का  होता।.

19. धरती पे मौजूद हर जीव में कार्बन जरूर है।

20.  पृथ्वी आकाश गंगा का टैकटोनिक प्लेटों की व्यवस्था  वाला एकमात्र ग्रह है।

21. 1989 में रूस में मनुष्य द्वारा सबसे ज्यादा गहरा गड्ढा खोदा गया था। जिसकी गहराई 12.262 किलोमीटर थी।

22. पृथ्वी के भू-भाग का सिर्फ 11 प्रतीशत हिस्सा ही भोजन उत्पादित करने के लिए उपयोग किया जाता है।

23. धरती पर हर साल 5 लाख भूकंप आते हैं। इनमें से एक लाख भूकंप सिर्फ महसूस किए जाते हैं जबकि 100 विनाशकारी होते हैं।

24.  हर वर्ष लगभग 30,000 आकाशीय पिंड धरती के वायुमंडल मे दाखिल होते हैं। पर इनमें से ज्यादातर धरती के वायुमंडल के अंदर पहुँचने पर घर्षण के कारण जलने लगते है जिन्हें कई लोग ‘टूटता रा’ कह कर पुकारते हैं।

25. माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई समुद्र स्तर से 8850 मीटर है।पर अगर बात करें पृथ्वी के केंद्र से अंतरिक्ष की दूरी की तो हम पाते हैं कि सबसे ऊंचा पर्वत इक्वाडोर का माउंट चिम्बोराजो है। इसकी ऊंचाई 6310 मीटर है।

26. पृथ्वी की एक फोटो 3.7 बिलियन मील की दूरी से ली गयी थी। जिसका नाम ‘पेल ब्ल्यू डॉट’ है। यह अब तक की सबसे अधिक दूरी से ली गई धरती की तस्वीर है।

27. कहते हैं आज से 450 करोड़ साल पहले, सौर्य मंडल में मंगल के आकार का एक ग्रह था। जो कि पृथ्वी के साथ एक ही ग्रहपथ पर सुर्य की परिक्रमा करता था। मगर यह ग्रह किसी कारण धरती से टकराया और एक तो धरती मुड़ गई और दूसरा इस टक्कर के फलस्वरूप जो पृथ्वी का हिस्सा अलग हुआ उससे चाँद बन गया।

28. अंतरिक्ष में मौजूद कचरे का एक टुकड़ा हर दिन पृथ्वी पर गिरता है। यह अनुमान नासा के वैज्ञानिकों ने लगाया है।

29. पृथ्वी पर 1 सेकेंड में 100 बार और हर दिन 80.6 लाख बार आकाशीय बिजली गिरती है।

30. पृथ्वी के केंद्र में इतना सोना मौजूद है जिससे 1.5 फीट की चादर से धरती की पूरी सतह को ढंका जा सकता है।

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 जय सियाराम 🚩

हमारी भारतीय संस्कृति ।डा.अजय दीक्षित

डा.अजय दक्षित

* दो पक्ष *

कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष!

* तीन ऋण *

देव ऋण, पितृ ऋण एवं ऋषि ऋण!

* चार युग *

सतयुग, त्रेता युग, द्वापरयुग एवं कलयुग!

* चार धाम *

द्वारिका, बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम धाम!

* चारपीठ *

शारदा पीठ (द्वारिका ), ज्योतिष पीठ (जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन

पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं श्रन्गेरिपीठ!

* चार वेद *

ऋग्वेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद एवं सामवेद!

* चार आश्रम *

ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास!

* चार अंतःकरण *

मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार!

* पञ्च गव्य *

गाय का घी, दूध, दही, गोमूत्र एवं गोबर!

* पञ्च देव *

गणेश, विष्णु, शिव, देवी और सूर्य!

* पंच तत्व *

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश!

* छह दर्शन *

वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, पूर्व मिसांसा एवं दक्षिण मिसांसा!

* सप्त ऋषि *

विश्वामित्र, जमदाग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्री, वशिष्ठ और कश्यप!

* सप्त पूरी *

अयोध्या पूरी, मथुरा पूरी, माया पूरी ( हरिद्वार ), काशी, कांची (शिन कांची-विष्णु कांची), अवंतिका और द्वारिका पूरी!

* आठ योग *

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधी!

* आठ लक्ष्मी *

आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग एवं योग लक्ष्मी!

* नव दुर्गा *

शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री!

* दस दिशाएं *

पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, इशान, नेत्रत्य, वायव्य आग्नेय, आकाश एवं पाताल!

* मुख्या ग्यारह अवतार *

मत्स्य, कच्छप, बराह, नरसिंह, बामन, परशुराम, श्रीराम, कृष्ण, बलराम, बुद्ध एवं कल्कि!

* बारह मास *

चेत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फागुन!

* बारह राशी *

मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ एवं कन्या!

* बारह ज्योतिर्लिंग *

सोमनाथ, मल्लिकर्जुना, महाकाल, ओमकालेश्वर, बैजनाथ, रामेश्वरम, विश्वनाथ, त्रियम्वाकेश्वर, केदारनाथ, घुष्नेश्वर, भीमाशंकर एवं नागेश्वर!

* पंद्रह तिथियाँ *

प्रतिपदा, द्वतीय, तृतीय,. चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी,

दशमी, एकादशी, द्वादशी,

त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा , अमावस्या।।

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जय सियाराम 🚩

आखिर ! कब, कहां और किस लिए तुलसीदास जी ने की "श्री हनुमान चालीसा की रचना

।।। राम राम राम राम राम ।।।
,,,,,,,डा.अजय दीक्षित,,,आखिर ! कब, कहां और किस लिए तुलसीदास जी ने की "श्री हनुमान चालीसा की रचना"
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   हनुमान चालीसा की रचना
भगवान को अगर किसी युग में आसानी से प्राप्त किया जा सकता है तो वह युग है :- कलियुग। इस कथन को सत्य करता एक दोहा रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है :-
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कलियुग केवल नाम अधारा ,
सुमिर सुमिर  नर उतरहि  पारा।

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जिसका अर्थ है की कलयुग में मोक्ष प्राप्त करने का एक ही लक्ष्य है वो है भगवान का नाम लेना। तुलसीदास ने अपने पूरे जीवन में कोई भी ऐसी बात नहीं लिखी जो गलत हो। उन्होंने अध्यात्म जगत को बहुत सुन्दर रचनाएँ दी हैं।

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गोश्वामी तुलसीदास और अकबर
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हनुमान चालीसा की रचना
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ये बात उस समय की है जब भारत पर मुग़ल सम्राट अकबर का राज्य था। सुबह का समय था एक महिला ने पूजा से लौटते हुए तुलसीदास जी के पैर छुए। तुलसीदास जी ने  नियमानुसार उसे सौभाग्यशाली होने का आशीर्वाद दिया।

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आशीर्वाद मिलते ही वो महिला फूट-फूट कर रोने लगी और रोते हुए उसने बताया कि अभी-अभी उसके पति की मृत्यु हो गई है।

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इस बात का पता चलने पर भी तुलसीदास जी जरा भी विचलित न हुए और वे अपने आशीर्वाद को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थे। क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान भली भाँति था कि भगवान राम बिगड़ी बात संभाल लेंगे और उनका आशीर्वाद खाली नहीं जाएगा।
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उन्होंने उस औरत सहित सभी को राम नाम का जाप करने को कहा। वहां उपस्थित सभी लोगों ने ऐसा ही किया और वह मरा हुआ व्यक्ति राम नाम के जाप आरंभ होते ही जीवित हो उठा।

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यह बात पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गयी। जब यह बात बादशाह अकबर के कानों तक पहुंची तो उसने अपने महल में तुलसीदास को बुलाया और भरी सभा में उनकी परीक्षा लेने के लिए कहा कि कोई चमत्कार दिखाएँ।

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ये सब सुन कर तुलसीदास जी ने अकबर से बिना डरे उसे बताया की वो कोई चमत्कारी बाबा नहीं हैं, सिर्फ श्री राम जी के भक्त हैं।

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गोश्वामी तुलसीदास हनुमान चालीसा के रचयिता

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अकबर इतना सुनते ही क्रोध में आ गया और उसने उसी समय सिपाहियों से कह कर तुलसीदास जी को कारागार में डलवा दिया। तुलसीदास जी ने तनिक भी प्रतिक्रिया नहीं दी और राम का नाम जपते हुए कारागार में चले गए।

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उन्होंने कारागार में भी अपनी आस्था बनाए रखी और वहां रह कर ही हनुमान चालीसा की रचना की और लगातार 40 दिन तक उसका निरंतर पाठ किया।

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हनुमान चालीसा चमत्कार
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चालीसवें दिन एक चमत्कार हुआ। हजारों बंदरों ने एक साथ अकबर के राज्य पर हमला बोल दिया। अचानक हुए इस हमले से सब अचंभित हो गए।

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अकबर एक सूझवान बादशाह था इसलिए इसका कारण समझते देर न लगी।  उसे भक्ति की महिमा समझ में आ गई। उसने उसी क्षण तुलसीदास जी से क्षमा मांग कर कारागार से मुक्त किया और आदर सहित उन्हें विदा किया।

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इतना ही नहीं अकबर ने उस दिन के बाद तुलसीदास जी से जीवनभर मित्रता निभाई।
इस तरह तुलसीदास जी ने एक व्यक्ति को कठिनाई की घड़ी से निकलने के लिए हनुमान चालीसा के रूप में एक ऐसा रास्ता दिया है। जिस पर चल कर हम किसी भी मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं।
इस तरह हमें भी भगवान में अपनी आस्था को बरक़रार रखना चाहिए। ये दुनिया एक उम्मीद पर टिकी है। अगर विश्वास ही न हो तो हम दुनिया का कोई भी काम नहीं कर सकते।

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                   ।। जय सियाराम 🚩।।

शनिवार, 22 जुलाई 2017

आखिर ! क्यों बढ रहे हैं ये पांच शिव लिंग ?

।। ओम् भूतेश्वाराय महादेवाय नमो नमः।।
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डा.अजय दीक्षित
🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔛सदियों से निरंतर बढ़ रहे है ये 5 शिवलिंग
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पूरी दुनिया में करोड़ों शिवलिंग मौजूद हैं, सभी की अपनी मान्यता और महत्व है। कुछ शिवलिंग अपने इतिहास के कारण प्रसिद्ध हैं तो कुछ अपने से जुड़े चमत्कारों के कारण। भारत में ऐसे ही 5 शिवलिंग हैं, जो बहुत खास माने जाते हैं।
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ये 5 शिवलिंग इसलिए खास हैं क्योंकि हर साल इनकी लम्बाई अपने आप चमत्कारिक रूप से बढ़ती जा रही है। कैसे बढ़ रही है इन शिवलिंगों की लम्बाई यह विज्ञान के लिए भी रहस्य की बात है। जानिए कौन से हैं वे 5 चमत्कारी शिवलिंग और उनसे जुड़ी मान्यताएं-
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1. तिल भांडेश्वर, काशी
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भगवान शिव की नगरी काशी में कई शिव प्रसिद्ध शिव मंदिर है, इनमें एक है बाबा तिल भांडेश्वर। कहते हैं यह सतयुग में प्रकट हुआ स्वयंभू शिवलिंग है। कल‌युग से पहले तक यह शिवलिंग हर दिन तिल के आकार में बढ़ता था। लेकिन कलयुग के आगमन पर लोगों को यह चिंता सताने लगी कि यह इसी आकार में हर दिन बढ़ता रहा तो पूरी दुनिया इस शिवलिंग में समा जाएगी। भगवान शिव की आराधाना करने पर भगवान शिव ने प्रकट होकर साल में केवल संक्रांति पर ही इसके बढ़ने का वरदान दिया। कहते हैं उस समय से हर साल मकर संक्रांति पर इस शिवलिंग का आकार बढ़ता है।

2. पौड़ावाला शिव मंदिर, हिमाचल प्रदेश
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हिमाचल प्रदेश में नाहन से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर पौड़ीवाला शिव मंदिर है। इसका संबंध रावण से माना जाता है। कहते हैं कि रावण ने इसकी स्‍थापना की थी। इसे स्वर्ग की दूसरी पौड़ी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि हर वर्ष महाशिवरात्रि पर यह शिवलिंग एक जौ के दाने के बराबर बढ़ता है। ऐसी धारणा है कि इस शिवलिंग में साक्षात शिव विराजते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।

3. मतंगेश्वर शिवलिंग, मध्यप्रदेश
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मध्यप्रदेश के खजुराहो का मतंगेश्वर शिवलिंग जिसके बारे में मान्यता है कि भगवान श्री राम ने भी यहां पूजा की है। 18 फीट के इस शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि हर साल यह तिल के आकार में बढ़ रहा है।

4. भूतेश्वर महादेव, छत्तीसगढ़
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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गरियाबंद जिला में एक प्राकृतिक शिवलिंग है, जिसे भूतेश्वर महादेव कहा जाता है। इसे भकुर्रा महादेव के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि हर साल यह शिवलिंग 6-8 इंच तक बढ़ जाता है। कहते हैं यहां पर भक्तों की मनोकामना जरूर पूरी होती है, मनोकामना पूरी होने पर दौबारा यहां आकर भगवान को धन्यवाद करने की परंपरा है।

5. मृदेश्वर महादेव मंदिर, गुजरात
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गुजरात के गोधरा में स्थित मृदेश्वर महादेव के बढ़ते शिवलिंग के आकार को प्रलय का संकेत माना जाता है। इस शिव लिंग के विषय में मान्यता है कि जिस दिन लिंग का आकार साढ़े आठ फुट का हो जाएगा उस दिन यह मंदिर की छत को छू लेगा। जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन महाप्रलय आ जाएगा। शिवलिंग को मंदिर की छत छूने में लाखों वर्ष लग सकते हैं क्योंकि शिवलिंग का आकार एक वर्ष में एक चावल के दाने के बराबर बढ़ता है।

मृदेश्वर शिवलिंग की विशेषता है कि इसमें से स्वतः ही जल की धारा निकलती रहती है जो शिवलिंग का अभिषेक कर रही है। इस जल धारा में गर्मी एवं सूखे का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, धारा अविरल बहती रहती है।

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