बुधवार, 10 जून 2020

श्री मद् भगवद। गीता :---प्रथम अध्याय

अध्याय एक - कर्मयुद्ध-योग
(योद्धाओं की गणना और सामर्थ्य)
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ (१)

भावार्थ : धृतराष्ट्र ने कहा - हे संजय! धर्म-भूमि और कर्म-भूमि में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? (१)
संजय उवाच
दृष्टा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌ ॥ (२)

भावार्थ : संजय ने कहा - हे राजन्! इस समय राजा दुर्योधन पाण्डु पुत्रों की सेना की व्यूह-रचना को देखकर आचार्य द्रोणाचार्य के पास जाकर कह रहे हैं। (२)
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌ ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।।


भवार्थ : हे आचार्य! पाण्डु पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न ने इतने कौशल से व्यूह के आकार में सजाया है। (३)
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ (४)
भावार्थ : इस युद्ध में भीम तथा अर्जुन के समान अनेकों महान शूरवीर और धनुर्धर है, युयुधान, विराट और द्रुपद जैसे भी महान योद्धा है। (४)
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌ ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः ॥ (५)
भावार्थ : धृष्टकेतु, चेकितान तथा काशीराज जैसे महान शक्तिशाली और पुरुजित्, कुन्तीभोज तथा शैब्य जैसे मनुष्यों मे श्रेष्ठ योद्धा भी है। (५)
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌ ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ (६)
भावार्थ : युधामन्यु जैसे महान पराक्रमी तथा उत्तमौजा जैसे अत्यन्त शक्तिशाली, सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्रों सहित ये सभी महान योद्धा हैं। (६)
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ (७)
भावार्थ : हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हमारी तरफ़ के भी उन विशेष शक्तिशाली योद्धाओं को भी जान लीजिये और आपकी जानकारी के लिये मेरी सेना के उन योद्धाओं के बारे में बतलाता हूँ। (७)
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ (८)
भावार्थ : मेरी सेना में स्वयं आप-द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा जैसे योद्धा है, जो सदैव युद्ध में विजयी रहे हैं। (८)
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ (९)
भावार्थ : ऎसे अन्य अनेक शूरवीर भी है जो मेरे लिये अपने जीवन का बलिदान देने के लिये अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है और यह सभी युद्ध-विधा में निपुण है। (९)
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥ (१०)
भावार्थ : इस प्रकार भीष्म पितामह द्वारा अच्छी प्रकार से संरक्षित हमारी सेना की शक्ति असीमित है, किन्तु भीम द्वारा अच्छी प्रकार से संरक्षित होकर भी पांडवों की सेना की शक्ति सीमित है। (१०)
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ (११)
भावार्थ : अत: सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहकर आप सभी निश्चित रूप से भीष्म पितामह की सभी ओर से सहायता करें। (११)
(योद्धाओं द्वारा शंख-ध्वनि)

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌ ॥ (१२)

भावार्थ : तब कुरुवंश के वयोवृद्ध परम-प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए सिंह-गर्जना के समान उच्च स्वर से शंख बजाया। (१२)
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌ ॥ (१३)

भावार्थ : तत्पश्चात् अनेक शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और सींग आदि बाजे अचानक एक साथ बज उठे, उनका वह शब्द बड़ा भयंकर था। (१३)
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ (१४)

भावार्थ : तत्पश्चात् दूसरी ओर से सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ पर आसीन योगेश्वर श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए। (१४)
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः ॥ (१५)

भावार्थ : हृदय के सर्वस्व ज्ञाता श्रीकृष्ण ने "पाञ्चजन्य" नामक, अर्जुन ने "देवदत्त" नामक और भयानक कर्म वाले भीमसेन ने "पौण्ड्र" नामक महाशंख बजाया। (१५)
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ (१६)

भावार्थ : हे राजन! कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने "अनन्तविजय" नामक और नकुल तथा सहदेव ने "सुघोष" और "मणिपुष्पक" नामक शंख बजाए। (१६)
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ (१७)

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌ ॥ (१८)

भावार्थ : श्रेष्ठ धनुष वाले काशीराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और कभी न हारने वाला सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजा वाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु आदि सभी ने अलग-अलग शंख बजाए। (१७-१८)
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌ ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌ ॥ (१९)

भावार्थ : उस भयंकर ध्वनि ने आकाश और पृथ्वी को गुंजायमान करते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय में शोक उत्पन्न कर दिया। (१९)
(अर्जुन द्वारा सैन्य-निरीक्षण)

अर्जुन उवाचः
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ (२०)

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ (२१)

भावार्थ : हे राजन्‌! इसके बाद हनुमान से अंकित पताका लगे रथ पर आसीन पाण्डु पुत्र अर्जुन ने धनुष उठाकर तीर चलाने की तैयारी के समय धृतराष्ट्र के पुत्रों को देखकर हृदय के सर्वस्व ज्ञाता श्री कृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहा कि हे अच्युत! कृपा करके मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खडा़ करें। (२०-२१)
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌ ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ (२२)

भावार्थ : जिससे मैं युद्धभूमि में उपस्थित युद्ध की इच्छा रखने वालों को देख सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन से एक साथ युद्ध करना है। (२२)
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ (२३)

भावार्थ : मैं उनको भी देख सकूँ जो यह राजा लोग यहाँ पर धृतराष्ट् के दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधन के हित की इच्छा से युद्ध करने के लिये एकत्रित हुए हैं। (२३)
संजय उवाचः
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌ ॥ (२४)

भावार्थ : संजय ने कहा - हे भरतवंशी! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृदय के पूर्ण ज्ञाता श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस उत्तम रथ को खड़ा कर दिया। (२४)
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌ ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति ॥

भावार्थ : इस प्रकार भीष्म पितामह, आचार्य द्रोण तथा संसार के सभी राजाओं के सामने कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए एकत्रित हुए इन सभी कुरु वंश के सद्स्यों को देख। (२५)
तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌ ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ (२६)

भावार्थ : वहाँ पृथापुत्र अर्जुन ने अपने ताऊओं-चाचाओं को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को और मित्रों को देखा। (२६)
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌ ॥ (२७)

भावार्थ : कुन्ती-पुत्र अर्जुन ने ससुरों को और शुभचिन्तकों सहित दोनों तरफ़ की सेनाओं में अपने ही सभी सम्बन्धियों को देखा। (२७)
(अर्जुन की अज्ञानता का निरूपण )

अर्जुन उवाच
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌ ।
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌ ॥ (२८)

भावार्थ : तब करुणा से अभिभूत होकर शोक करते हुए अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा वाले इन सभी मित्रों तथा सम्बन्धियों को उपस्थित देखकर। (२८)
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते ॥ (२९)

भावार्थ : मेरे शरीर के सभी अंग काँप रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है, और मेरे शरीर के कम्पन से रोमांच उत्पन्न हो रहा है। (२९)
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ (३०)

भावार्थ : मेरे हाथ से गांडीव धनुष छूट रहा है और त्वचा भी जल रही है, मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा भी नही रह पा रहा हूँ। (३०)
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ (३१)

भावार्थ : हे केशव! मुझे तो केवल अशुभ लक्षण ही दिखाई दे रहे हैं, युद्ध में स्वजनों को मारने में मुझे कोई कल्याण दिखाई नही देता है। (३१)
न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ (३२)

भावार्थ : हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न ही राज्य और सुखों की इच्छा करता हूँ, हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य, सुख अथवा इस जीवन से भी क्या लाभ है। (३२)
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ (३३)

भावार्थ : जिनके साथ हमें राज्य आदि सुखों को भोगने की इच्छा हैं, जब वह ही अपने जीवन के सभी सुखों को त्याग करके इस युद्ध भूमि में खड़े हैं। (३३)
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा ॥ (३४)

भावार्थ : गुरुजन, परिवारीजन, पुत्रगण, पितामह, मामा, ससुर, पौत्रगण, साले और सभी सम्बन्धी भी मेरे सामने खडे़ है। (३४)
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ (३५)

भावार्थ : हे मधुसूदन! मैं इन सभी को मारना नहीं चाहता हूँ, भले ही यह सभी मुझे ही मार डालें, तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सभी को मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है? (३५)
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः ॥(३६)

भावार्थ : हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी? बल्कि इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। (३६)
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌ ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ (३७)

भावार्थ : हे माधव! अत: मुझे धृतराष्ट्र के पुत्रों को उनके मित्रों और सम्बन्धियों सहित मारना उचित नही लगता है, क्योंकि अपने ही कुटुम्बियों को मार कर हम कैसे सुखी हो सकते हैं? (३७)
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌ ॥ (३८)

भावार्थ : यधपि लोभ के कारण इन भ्रमित चित्त वालों को कुल के नाश से उत्पन्न होने वाले दोष दिखाई नही देते हैं, और मित्रों से विरोध करने में कोई पाप दिखाई नही देता है।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌ ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ (३९)

भावार्थ : हे जनार्दन! हम लोग तो कुल के नाश से उत्पन्न दोष को समझने वाले हैं क्यों न हमें इस पाप से बचने के लिये विचार करना चाहिये। (३९)
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ (४०)

भावार्थ : कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में अधर्म फैल जाता है। (४०)
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ (४१)

भावार्थ : हे कृष्ण! अधर्म अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, स्त्रियों के दूषित हो जाने पर अवांछित सन्ताने उत्पन्न होती है। (४१)
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ (४२)

भावार्थ : अवांछित सन्तानों की वृद्धि से निश्चय ही कुल में नारकीय जीवन उत्पन्न होता है, ऎसे पतित कुलों के पितृ गिर जाते है क्योंकि पिण्ड और जल के दान की क्रियाऎं समाप्त हो जाती है। (४२)
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ (४३)

भावार्थ : इन अवांछित सन्तानो के दुष्कर्मों से सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं। (४३)
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ (४४)

भावार्थ : हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में रहना पडता है, ऐसा हम सुनते आए हैं। (४४)
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌ ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ (४५)

भावार्थ : ओह! कितने आश्चर्य की बात है कि हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने प्रियजनों को मारने के लिए आतुर हो गए हैं। (४५)

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌ ॥ (४६)

भावार्थ : यदि मुझ शस्त्र-रहित विरोध न करने वाले को, धृतराष्ट्र के पुत्र हाथ में शस्त्र लेकर युद्ध में मार डालें तो भी इस प्रकार मरना मेरे लिए अधिक श्रेयस्कर होगा। (४६)

संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌ ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ (४७)

भावार्थ : संजय ने कहा - इस प्रकार शोक से संतप्त हुआ मन वाला अर्जुन युद्ध-भूमि में यह कहकर बाणों सहित धनुष को त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ गया। (४७)
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे कृष्णार्जुनसंवादे धर्मकर्मयुद्धयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः॥
इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद भगवदगीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में धर्मकर्मयुद्ध-योग नाम का पहला अध्याय संपूर्ण हुआ॥

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

सोमवार, 18 मई 2020

आखिर!क्या है उपयोग :--जीवन में पीतल के बर्तनों का !

।। हरी ओम् धन्वंतराय नमः ।।
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आखिर!क्या है उपयोग :--जीवन में पीतल के बर्तनों का !
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                  आचार्य डा. अजय दीक्षित

पीतल के पात्रों का महत्व :-----
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पीतल के पात्रों का महत्व ज्योतिष व धार्मिक शास्त्रों में भी बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सुवर्ण व पीतल की ही भांति पीला रंग देवगुरु बृहस्पति को संबोधित करता है तथा ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार पीतल पर देवगुरु बृहस्पति का आधिपत्य होता है। बृहस्पति ग्रह की शांति हेतु पीतल का उपयोग किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रह शांति व ज्योतिष अनुष्ठानों में दान हेतु भी पीतल के बर्तन दिए जाते हैं।

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पीतल के बर्तनों का कर्मकांड में अत्यधिक महत्व है। वैवाहिक कार्य में वेदी पढ़ने हेतु व कन्यादान के समय पीतल का कलश प्रयोग किया जाता है। शिवलिंग पर दूध चढ़ाने हेतु भी पीतल के कलश का उपयोग किया जाता है तथा बगलामुखी देवी के अनुष्ठानों में मात्र पीतल के बर्तन ही प्रयोग लिए जाते हैं।

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पीतल के बर्तनों का उपयोग
भारत के कई क्षेत्रों में आज भी सनातनधर्मी जन्म से लेकर मृत्यु के उपरांत तक पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। स्थानिक मान्यताओं के अनुसार बालक के जन्म पर नाल छेदन करने के उपरांत पीतल की थाली तो छुरी से पीटा जाता है। मान्यता है कि इससे पितृगण को सूचित किया जाता है कि आपके कुल में जल और पिंडदान करने वाले वंशज का जन्म हो चुका है। 

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मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि क्रिया के 10वें दिन अस्थि विसर्जन के उपरांत नारायणवली व पीपल पर पितृ जलां‍जलि मात्र पीतल कलश से दी जाती है। मृत्यु संस्कार के अंत में 12वें दिन त्रिपिंडी श्राद्ध व पिंडदान के बाद 12वीं के शुद्धि हवन व गंगा प्रसादी से पहले पीतल के कलश में सोने का टुकड़ा व गंगा जल भरकर पूरे घर को पवित्र किया जाता है।

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पीतल के बर्तन घर में रखना शुभ माना जाता है। सेहत की दृष्टि से पीतल के बर्तनों में बना भोजन स्वादिष्ट तुष्टि-प्रदाता होता है तथा इससे आरोग्य और शरीर को तेज प्राप्त होता है। पीतल का बर्तन जल्दी गर्म होता है जिससे गैस तथा अन्य ऊर्जा की बचत होती है। पीतल का बर्तन दूसरे बर्तनों से ज्यादा मजबूत और जल्दी न टूटने वाला धातु है। पीतल के कलश में रखा जल अत्यधिक ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है।

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पीतल पीले रंग का होने से हमारी आंखों के लिए टॉनिक का काम करता है। पीतल का उपयोग थाली, कटोरे, गिलास, लोटे, गगरे, हंडे, देवताओं की मूर्तियां व सिंहासन, घंटे, अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र, ताले, पानी की टोंटियां, मकानों में लगने वाले सामान और गरीबों के लिए गहने बनाने में होता है।

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पीतल के बर्तनों से लाभ :---------
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1. भाग्योदय हेतु पीतल की कटोरी में चना दाल भिगोकर रातभर सिरहाने रखें व सुबह चना दाल पर गुड़ रखकर गाय को खिलाएं।

2. अटूट धन प्राप्ति हेतु पूर्णिमा के दिन भगवान श्रीकृष्ण पर शुद्ध घी से भरा पीतल का कलश चढ़ाकर निर्धन विप्र को दान करें।

3. लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु वैभवलक्ष्मी का पूजन कर पीतल के दीये में शुद्ध घी का दीपक करें।

4. दुर्भाग्य से मुक्ति पाने हेतु पीतल की कटोरी में दही भरकर कटोरी समेत पीपल के नीचे रखें।

5. सौभाग्य प्राप्ति हेतु पीतल के कलश में चना दाल भरकर विष्णु मंदिर में चढ़ाएं।
पीतल के बर्तन में खट्टे पदार्थ कभी भी न रखें।

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जय सियाराम जय जय हनुमान

         किसी भी शंका समाधान के लिए :----
         ह्वाटसप नम्बर :-9559986789 पर मैसेज करें ।

                  .आचार्य डा. अजय दीक्षित

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

वैशाख-स्नान से पाँच प्रेतों का उद्धार :---आचार्य डा.अजय दीक्षित

वैशाख-स्नान से पाँच प्रेतों का उद्धार :---आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया ।

अम्बरीष ने कहा – मुने ! जिसके चिन्तन मात्र से पाप राशि का लय हो जाता है, उस पाप प्रशमन नामक स्तोत्र को मैं भी सुनना चाहता हूँ। आज मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, आपने मुझे उस शुभ विधि का श्रवण कराया, जिसके सुनने मात्र से पापों का क्षय हो जाता है। वैशाख मास में जो भगवान केशव के कल्याणमय नामों का कीर्तन किया जाता है, उसी को मैं संसार में सबसे बड़ा पुण्य, पवित्र, मनोरम तथा एकमात्र सुकृत से ही सुलभ होने वाला शुभ कर्म मानता हूँ।। अहो ! जो लोग माधव मास में भगवान मधुसूदन के नामों का स्मरण करते हैं वे धन्य हैं। अत: यदि आप उचित समझें तो मुझे पुन: माधवमास की ही पवित्र कथा सुनाएँ।

सूतजी कहते हैं – राजाओं में श्रेष्ठ हरिभक्त अम्बरीष का वचन सुनकर नारद मुनि को बड़ी प्रसन्नता हुई। यद्यपि वे वैशाख स्नान के लिये जाने को उत्कंठित थे, तथापि सत्संग में आनन्द आने के कारण रुक गये और राजा से बोले।

नारद जीने कहा – महीपाल ! मुझे ऎसा जान पड़ता है कि यदि दो व्यक्तियों में परस्पर भगवत्कथा-संबंधी सरस वार्तापाल छिड़ जाए तो वह अत्यन्त विशुद्ध – अन्त:करण को शुद्ध करने वाला होता है। आज तुम्हारे साथ जो माधवमास के माहात्म्य की चर्चा चल रही है, यह वैशाख-स्नान की अपेक्षा अधिक पुण्य प्रदान करने वाली है क्योंकि माधवमास के देवता भगवान श्रीविष्णु हैं (अत: उनका कीर्तन भगवान का ही कीर्तन है)। जिसका जीवन धर्म के लिए और धर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए है तथा जो रातों-दिन पुण्योपार्जन में ही लगा रहता है, उसी को इस पृथ्वी पर मैं वैष्णव मानता हूँ। राजन् ! अब मैं वैशाख स्नान से होने वाले पुण्य फल का संक्षेप में वर्णन करता हूँ। विस्तार के साथ सारा वर्णन तो मेरे पिता – ब्रह्माजी भी नहीं कर सकते। वैशाख में डुबकी लगाने मात्र से समस्त पाप छूट जाते हैं।

पूर्वकाल की बात है कोई मुनीश्वर तीर्थयात्रा के प्रसंग से सर्वत्र घूम रहे थे। उनका नाम था मुनिशर्मा। वे बड़े धर्मात्मा, सत्यवादी, पवित्र तथा शम, दम एवं शान्तिधर्म से युक्त थे। वे प्रतिदिन पितरों का तर्पण और श्राद्ध करते थे। उन्हें वेदों और स्मृतियों के विधानों का सम्यक् ज्ञान था। वे मधुर वाणी बोलते और भगवान का पूजन करते रहते थे। वैष्णवों के संसर्ग में ही उनका समय व्यतीत होता था। वे तीनों कालों के ज्ञाता, मुनि, दयालु, अत्यन्त तेजस्वी, तत्वज्ञानी और ब्राह्मणभक्त थे। वैशाख का महीना था, मुनिशर्मा स्नान के लिए नर्मदा के किनारे जा रहे थे। उसी समय उन्होंने अपने सामने पाँच पुरुषों को देखा, जो भारी दुर्गति में फँसे हुए थे। वे अभी-अभी एक-दूसरे से मिले थे। उनके शरीर का रंग काला था। वे एक बरगद की छाया में बैठे थे और पापों के कारण उद्विग्न होकर चारों ओर दृष्टिपात कर रहे थे।

उन्हें देखकर द्विजवर मुनिशर्मा बड़े विस्मय में पड़े और सोचने लगे – इस भयानक वन में मनुष्य कहाँ से आए? इनकी चेष्टा बड़ी दयनीय है किन्तु इनका आकार बड़ा भयंकर दिखाई देता है। ये पापभागी चोर तो नहीं हैं? विप्रवर मुनिशर्मा की बुद्धि बड़ी स्थिर थी, वे ज्यों ही इस प्रकार विचार करने लगे, उसी समय उपर्युक्त पाँचों पुरुष उनके पास आये और हाथ जोड़कर मुनिशर्मा से बोले।

उन पुरुषों ने कहा – विप्रवर ! हमें आप कल्याणमय पुरुषोत्तम जान पड़ते हैं, हम दु:खी जीव हैं। अपना दु:ख विचारकर आपको बताना चाहते हैं। द्विजराज ! आप कृपा करके हमारी कष्ट कथा सुनें। दैववश जिनके पाप प्रकट हो गए हैं, उन दीन दु:खी प्राणियों के आधार आप जेसे संत महात्मा ही हैं। साधु पुरुष अपनी दृष्टिमात्र से पीड़ितों की पीड़ाएँ हर लेते हैं, अब उनमें से एक ने सबका परिचय देना आरंभ किया – मैं पंचाल देश का क्षत्रिय हूँ, मेरा नाम नरवाहन है।

मैंने मार्ग में मोहवश बाण द्वारा एक ब्राह्मण की हत्या कर डाली। मुझसे ब्रह्म हत्या का पाप हो गया इसलिए शिखा, सूत्र और तिलक से रहित होकर इस पृथ्वी पर घूमता हूँ और सबसे कहता फिरता हूँ कि “मैं ब्रह्महत्यारा हूँ।” मुझ महापापी ब्रह्मघाती को आप कृपा की भिक्षा दें। इस दशा में पड़े-पड़े मुझे एक वर्ष बीत गया। मैं पाप से जल रहा हूँ, मेरा चित्त शोक से व्याकुल है तथा ये जो सामने दिखाई देते हैं, इनका नाम चन्द्रशर्मा है। ये जाति के ब्राह्मण है, इन्होंने मोह से मलिन होकर गुरु का वध किया है और ये मगध देश के निवासी हैं। इनके स्वजनों ने इनका परित्याग कर दिया है। ये भी घूमते-घामते दैवात् यहाँ आ पहुँचे हैं। इनके भी न शिखा है न सूत्र। ब्राह्मण का कोई भी चिह्न इनके शरीर में नहीं रह गया है।

इनके सिवा जो ये तीसरे व्यक्ति हैं, इनका नाम देवशर्मा है। स्वामिन् ! ये भी बड़े कष्ट में है। ये भी जाति के ब्राह्मण हैं, किन्तु मोहवश वेश्या की आसक्ति में फँसकर शराबी हो गए थे। इन्होंने भी पूछने पर अपना सारा हाल सच-सच कह सुनाया है। अपने प्रथम पापाचार को याद करके इनके हृदय में बड़ा संताप होता है। ये सदा मनस्ताप से पीड़ित रहते हैं। इनको इनकी स्त्री ने, बन्धु-बान्धवों ने तथा गाँव के सब लोगों ने वहाँ से निकाल दिया है। ये अपने उसी पाप के साथ भ्रमण करते हुए यहाँ आए हैं।

ये चौथे महाशय जाति के वैश्य हैं। इनका नाम विधुर है। ये गुरुपत्नी के साथ समागम करने वाले हैं। इनकी माता मिथिला में जाकर वेश्या हो गई थी। इन्होंने मोहवश तीन महीनों तक उसी का उपभोग किया है परन्तु जब असली बात का पता लगा है तो बहुत दु:खी होकर पृथ्वी पर विचरते हुए ये भी यहाँ आ पहुँचे हैं। हम में से ये जो पाँचवें दिखाई दे रहे हैं, ये भी वैश्य ही हैं, इनका नाम नन्द है। ये पापियों का संसर्ग करने वाले महापापी हैं। इन्होंने प्रतिदिन धन के लालच में पड़कर बहुत चोरी की है। पातकों से आक्रान्त हो जाने पर इन्हें स्वजनों ने त्याग दिया है तब ये स्वयं भी खिन्न होकर दैवात् यहाँ आ पहुँचे हैं।

इस प्रकार हम पाँचों महापापी एक स्थान पर जुट गए हैं। हम सब के सब दु:खों से घिरे हुए हैं। अनेकों तीर्थों में घूम आए मगर हमारा घोर पातक नहीं मिटता। आपको तेज से उद्दीप्त देखकर हम लोगों का मन प्रसन्न हो गया है। आप जैसे साधु पुरुष के पुण्यमय दर्शन से हमारे पातकों के अन्त होने की सूचना मिल रही है। स्वामिन् ! कोई ऎसा उपाय बताइए, जिससे हम लोगों के पापों का नाश हो जाए। प्रभो ! आप वेदार्थ के ज्ञाता और परम दयालु जान पड़ते हैं, आपसे हमें अपने उद्धार की बड़ी आशा है।

मुनिशर्मा ने कहा – तुम लोगों ने अज्ञानवश पाप किया, किन्तु इसके लिए तुम्हारे हृदय में अनुताप है तथा तुम सब के सब सत्य बोल रहे हो, इस कारण तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करना मेरा कर्तव्य है। मैं अपनी भुजा उठाकर कहता हूँ, मेरी सत्य बातें सुनो। पूर्वकाल में जब मुनियों का समुदाय एकत्रित हुआ था, उस समय मैंने महर्षि अंगिरा के मुख से जो कुछ सुना था वही वेद शास्त्रों में भी देखा। वह सबके लिए विश्वास करने योग्य है। मेरी आराधना से संतुष्ट हुए स्वयं भगवान विष्णु ने भी पहले ऎसी ही बात बताई थी, वह इस प्रकार है।

भोजन से बढ़कर दूसरा कोई तृप्ति का साधन नहीं है। पिता से बढ़कर कोई गुरु नहीं है। ब्राह्मणों से उत्तम दूसरा कोई पात्र नहीं है तथा भगवान विष्णु से श्रेष्ठ दूसरा कोई देवता नहीं है। गंगा की समानता करने वाला कोई तीर्थ, गोदान की तुलना करने वाला कोई दान, गायत्री के समान जप, एकादशी के तुल्य व्रत, भार्या के सदृश मित्र, दया के समान धर्म तथा स्वतंत्रता के समान सुख नहीं है। गार्हस्थ्य से बढ़कर आश्रम और सत्य से बढ़कर सदाचार नहीं है। इसी प्रकार संतोष के समान सुख तथा वैशाख माह के समान महान् पापों का अपहरण करने वाला दूसरा कोई मास नहीं है।

वैशाख मास भगवान मधुसूदन को बहुत ही प्रिय है। गंगा आदि तीर्थों में तो वैशाख स्नान का सुयोग अत्यन्त दुर्लभ है। उस समय गंगा, जमुना तथा नर्मदा की प्राप्ति कठिन होती है। जो शुद्ध हृदय वाला मनुष्य भगवान के भजन में तत्पर हो पूरे वैशाख भर प्रात:काल गंगा स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है। इसलिए पुण्य के सारभूत इस वैशाख मास में तुम सभी पातकी मेरे साथ नर्मदा तट पर चलो और उसमें गोते लगाओ। नर्मदा के जल का मुनि लोग भी सेवन करते हैं, वह समस्त पापों के भय का नाश करने वाला है। मुनि के यों कहने पर वे सब पापी उनके साथ अद्भुत पुण्य प्रदान करने वाली नर्मदा की प्रशंसा करते हुए उसके तट पर गए।

किनारे पहुँचकर ब्राह्मण श्रेष्ठ मुनिशर्मा का चित्त परसन्न हो गया। उन्होंने वेदोक्त विधि के अनुसार नर्मदा के जल में प्रात: स्नान किया। उपर्युक्त पाँचों पापियों ने भी ब्राह्मण के कहने से ज्यों ही नर्मदा में डुबकी लगाई त्यों ही उनके शरीर का रंग बदल गया। वे तत्काल सुवर्ण के समान कान्तिमान हो गए फिर मुनिशर्मा ने सब लोगों के सामने उन्हें पाप-प्रशमन नामक स्तोत्र सुनाया।

भूपाल ! अब तुम पाप-प्रशमन नामक स्तोत्र सुनो। इसका भक्तिपूर्वक श्रवण करके भी मनुष्य पाप राशि से मुक्त हो जाता है। इसके चिन्तन मात्र से बहुतेरे पापी शुद्ध हो चुके हैं। इसके सिवा और भी बहुत-से मनुष्य इस स्तोत्र का सहारा लेकर अज्ञानजनित पाप से मुक्त हो गए हैं। जब मनुष्यों का चित्त परायी स्त्री, पराए धन तथा जीव-हिंसा आदि की ओर जाए तो इस प्रायश्चित्तरुपा स्तुति की शरण लेनी चाहिए, यह स्तुति इस प्रकार है –

 

विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नम:।

नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतं हरिम्।।

चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम्।

विष्णुमीड्यमशेषाणामनादिनिधनं हरिम्।।

अर्थ – संपूर्ण विश्व में व्यापक भगवान श्रीविष्णु को सर्वदा नमस्कार है। विष्णु को बारम्बार प्रणाम है। मैं अपने चित्त में विराजमान विष्णु को नमस्कार करता हूँ। अपने अहंकार में व्याप्त श्रीहरि को मस्तक झुकाता हूँ। श्रीविष्णु चित्त में विराजमान ईश्वर (मन और इन्द्रियों के शासक), अव्यक्त, अनन्त, अपराजित, सबके द्वारा स्तवन करने योग्य तथा आदि-अन्त से रहित है, ऎसे श्रीहरि को मैं नित्य-निरन्तर प्रणाम करता हूँ।

 

विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्।

योsहंकारगतो विष्णुर्यो विष्णुर्मयि संस्थित:।।

करोति कर्तृभूतोsसौ स्थावरस्य चरस्य च।

तत्पापं नाशमायाति तस्मिन् विष्णौ विचिन्तिते।।

अर्थ – जो विष्णु मेरे चित्त में विराजमान हैं, जो विष्णु मेरी बुद्धि में स्थित हैं, जो विष्णु मेरे अहंकार में व्याप्त हैं तथा जो विष्णु सदा मेरे स्वरुप में स्थित हैं, वे ही कर्ता होकर सब कुछ करते हैं। उन विष्णु भगवान का चिन्तन करने पर चराचर प्राणियों का सारा पाप नष्ट हो जाता है।

 

ध्यातो हरति य: पापं स्वप्ने दृष्टश्च पापिनाम्।

तमुपेन्द्रमहं विष्णुं नमामि प्रणतप्रियम्।।

अर्थ – जो ध्यान करने और स्वप्न में दिख जाने पर भी पापियों के पाप हर लेते हैं तथा चरणों में पड़े हुए शरणागत भक्त जिन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, उन वामनरूपधारी भगवान श्रीविष्णु को नमस्कार करता/करती हूँ।

 

जगत्यस्मिन्निरालम्बे ह्यजमक्षरमव्ययम्।

हस्तावलम्बनं स्तोत्रं विष्णुं वन्दे सनातनम्।।

अर्थ – जो अजन्मा, अक्षर और अविनाशी हैं तथा इस अवलम्बशून्य संसार में हाथ का सहारा देने वाले हैं, स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति की जाती है, उन सनातन श्रीविष्णु को मैं सदा प्रणाम करता/करती हूँ।

 

सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज।

हृ्षीकेश हृ्षीकेश हृ्षीकेश नमोsस्तु ते।।

अर्थ – हे सर्वेश्वर ! हे ईश्वर ! हे व्यापक परमात्मन् ! हे अधोक्षज ! हे इन्द्रियों का शासन करने वाले अन्तर्यामी हृषीकेश ! आपको बारम्बार नमस्कार है।

 

नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव।

दुरुक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाशु जनार्दन।।

अर्थ – हे नृसिंह ! हे अनन्त ! हे गोविन्द ! हे भूतभावन ! हे केशव ! हे जनार्दन ! मेरे दुर्वचन, दुष्कर्म और दुश्चिन्तन को शीघ्र नष्ट कीजिए।

 

यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना।

आकर्णय महाबाहो तच्छमं नय केशव।।

अर्थ – महाबाहो ! मेरी प्रार्थना सुनिए – अपने चित्त के वश में होकर मैंने जो कुछ बुरा चिन्तन किया हो, उसको शान्त कर दीजिए।

 

ब्रह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण।

जगन्नाथ जगद्धात: पापं शमय मेsच्युत।।

अर्थ – ब्राह्मणों का हित साधन करने वाले देवता गोविन्द ! परमार्थ में तत्पर रहने वाले जगन्नाथ ! जगत को धारण करने वाले अच्युत ! मेरे पापों का नाश कीजिए।

 

यच्चापराह्णे सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि।

कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता।।

जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।

नामत्रयोच्चारणत: सर्वं यातु मम क्षयम्।।

अर्थ – मैंने पूर्वाह्न, सायाह्न, मध्याह्न तथा रात्रि के समय शरीर, मन और वाणी के द्वारा, जानकर या अनजान में जो कुछ पाप किया हो, वह सब “हृषीकेश, पुण्डरीकाक्ष और माधव” – इन तीन नामों के उच्चारण से नष्ट हो जाए।

 

शारीरं मे हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष मानसम्।

पापं प्रशममायातु वाक्कृतं मम माधव।।

अर्थ – हृषीकेश ! आपके नामोच्चारण से मेरा शारीरिक पाप नष्ट हो जाए, पुण्डरीकाक्ष ! आपके स्मरण से मेरा मानस पाप शान्त हो जाए तथा माधव ! आपके नाम-कीर्तन से मेरे वाचिक पाप का नाश हो जाए।

 

यद् भुज्जान: पिबंस्तिष्ठन् स्वपण्जाग्रद् यदा स्थित:।

अकार्षं पापमर्थार्थं कायेन मनसा गिरा।।

महदल्पं च यत्पापं दुर्योनिनरकावहम्।

तत्सर्वं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात् ।।

अर्थ – मैंने खाते, पीते, खड़े होते, सोते, जागते तथा ठहरते समय मन, वाणी और शरीर से, स्वार्थ या धन के लिए जो कुत्सित योनियों और नरकों की प्राप्ति कराने वाला महान या थोड़ा पाप किया है, वह सब भगवान वासुदेव का नामोच्चारण करने से नष्ट हो जाए।

 

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्।

अस्मिन् संकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु।।

अर्थ – जिसे परब्रह्म, परम धाम और परम पपवित्र कहते हैं, वह तत्त्व भगवान विष्णु ही है, इन श्रीविष्णु भगवान का कीर्तन करने से मेरे जो भी पाप हों, वे नष्ट हो जाएँ।

 

यत्प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शविवर्जितम्।

सूरयस्तत्पदं विष्णोस्तत्सर्वं मे भवत्वलम्।।

अर्थ – जो गन्ध और स्पर्श से रहित हैं, ज्ञानी पुरुष जिसे पाकर पुन: इस संसार में नहीं लौटते, वह श्रीविष्णु का ही परम पद है। वह सब मुझे पूर्णरूप से प्राप्त हो जाए।

 

पापप्रशमनं स्तोत्रं य: पठेच्छृृणुयान्नर:।

शारीरैर्मानसैर्वाचा कृतै: पापै: प्रमुच्यते।।

मुक्त: पापग्रहादिभ्यो याति विष्णो:परं पदम्।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रं  सर्वाघनाशनम्।।

प्रायश्चित्तमघौघानां पठितव्यं नरोत्तमै: (अध्याय 88, श्लोक 72 से 91 तक)

अर्थ – यह “पाप-प्रशमन” नामक स्तोत्र है. जो मनुष्य इसे पढ़ता और सुनता है वह शरीर, मन और वाणी द्वारा किए हुए पापों से मुक्त हो जाता है. इतना ही नहीं वह पाप ग्रह आदि के भय से भी मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है. यह स्तोत्र सब पापों का नाश करने वाला तथा पाप राशि का प्रायश्चित है. इसलिए श्रेष्ठ मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न कर के इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए.

राजन् ! इस स्तोत्र के श्रवण मात्र से पूर्वजन्म तथा इस जन्म के किये हुए पाप भी तत्काल नष्ट हो जाते हैं। यह स्तोत्र पापरूपी वृक्ष के लिए कुठार और पापमय ईंधन के लिए दावानल है। पापराशिरूपी अन्धकार-समूह का नाश करने के लिए यह स्तोत्र सूर्य के समान है। मैंने सम्पूर्ण जगत पर अनुग्रह करने के लिए इसे तुम्हारे सामने प्रकाशित किया है। इसके पुण्यमय माहात्म्य का वर्णन करने में स्वयं श्रीहरि भी समर्थ नहीं हैं

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

सर्वार्थ सिद्धि योग – 2020आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

सर्वार्थ सिद्धि योग – 2020

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

कुछ विशेष कार्य जैसे – कोई व्यापार या बिजनेस शुरु करना हो, कोई सरकारी अथवा राजकीय कॉन्ट्रैक्ट करना हो, परीक्षा देनी हो, नौकरी पर जाना हो, चुनाव के लिए आवेदन पत्र देना हो, भूमि से संबंधित कोई कार्य हो, यात्रा पर जाना हो, वस्त्र या आभूषण आदि लेने हो या फिर मुकदमा आरंभ करना हो लेकिन कोई शुभ मूहुर्त ना मिल रहा हो तब सर्वार्थ सिद्धि योग में ये सभी काम शुरु किए जा सकते हैं. कई बार शुक्र या गुरु अस्त होता है या अधिकमास पड़ जाता है या फिर वेध आदि की वजह से भी नया काम प्रारंभ करने की मनाही होती हैं लेकिन इन सब के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग उस दिन बन रहा हो तब उपरोक्त काम शुरु किए जा सकते हैं. 

 

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सर्वार्थ सिद्धि योग – मई 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                             समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
3 मई 21:434 मई सूर्योदय 
8 मई 08:38 9 मई सूर्योदय 
10 मई सूर्योदय 11 मई 04:13 
17 मई 13:59 18 मई सूर्योदय 
19 मई 19:53 20 मई सूर्योदय 
23 मई सूर्योदय 24 मई 04:52 
25 मई सूर्योदय 25 मई 06:10 
28 मई सूर्योदय 28 मई 07:27 
31 मई सूर्योदय 1 जून सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – जून 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                             समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
1 जून सूर्योदय तक 
4 जून 18:37 5 जून 16:44
7 जून सूर्योदय 7 जून 14:11 
14 जून सूर्योदय 14 जून 24:22
16 जून सूर्योदय 17 जून सूर्योदय 
20 जून सूर्योदय 20 जून 12:02
26 जून 11:26 27 जून सूर्योदय 
28 जून सूर्योदय 29 जून सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – जुलाई 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                        समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 जुलाई 02:343 जुलाई 01:14
5 जुलाई 23:026 जुलाई सूर्योदय 
6 जुलाई 23:12 7 जुलाई सूर्योदय 
12 जुलाई सूर्योदय 12 जुलाई 08:18 
14 जुलाई सूर्योदय 14 जुलाई 14:07
15 जुलाई 16:4316 जुलाई सूर्योदय 
20 जुलाई 21:2121 जुलाई सूर्योदय 
24 जुलाई सूर्योदय 24 जुलाई 16:03
26 जुलाई सूर्योदय 26 जुलाई 12:37
29 जुलाई 08:3330 जुलाई 07:41


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – अगस्त 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                      समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 अगस्त 06:523 अगस्त सूर्योदय 
3 अगस्त 07:194 अगस्त सूर्योदय 
7 अगस्त सूर्योदय 7 अगस्त 13:33
9 अगस्त 19:0610 अगस्त सूर्योदय 
11 अगस्त 24:5713 अगस्त 03:26
17 अगस्त 06:4418 अगस्त 05:43 
18 अगस्त सूर्योदय 19 अगस्त 04:08 
26 अगस्त सूर्योदय 26 अगस्त 13:04
30 अगस्त सूर्योदय 30 अगस्त 13:52 
31 अगस्त सूर्योदय 31 अगस्त 15:04


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – सितंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                      समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
4 सितंबर 23:285 सितंबर सूर्योदय 
6 सितंबर सूर्योदय 7 सितंबर 05:24
8 सितंबर 08:2610 सितंबर सूर्योदय 
13 सितंबर 16:3414 सितंबर 15:52
15 सितंबर सूर्योदय 15 सितंबर 14:25
21 सितंबर 20:4922 सितंबर सूर्योदय 
26 सितंबर 19:2627 सितंबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – अक्तूबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                   समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 अक्तूबर 05:573 अक्तूबर सूर्योदय 
4 अक्तूबर सूर्योदय 4 अक्तूबर 11:52
6 अक्तूबर सूर्योदय 6 अक्तूबर 17:54
7 अक्तूबर सूर्योदय 8 अक्तूबर सूर्योदय 
9 अक्तूबर 24:27 10 अक्तूबर सूर्योदय 
11 अक्तूबर सूर्योदय 11 अक्तूबर 25:19 (रात्रि 01:19)
17 अक्तूबर 11:5218 अक्तूबर सूर्योदय 
19 अक्तूबर सूर्योदय 20 अक्तूबर 03:53
23 अक्तूबर 25:28 (रात्रि 01:28)24 अक्तूबर 26:38 (रात्रि 02:38) 
29 अक्तूबर 12:0031 अक्तूबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – नवंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                    समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 नवंबर 23:503 नवंबर सूर्योदय 
4 नवंबर सूर्योदय 5 नवंबर 04:51
6 नवंबर 06:457 नवंबर सूर्योदय 
8 नवंबर सूर्योदय 8 नवंबर 08:45
12 नवंबर 04:2512 नवंबर सूर्योदय 
14 नवंबर सूर्योदय 14 नवंबर 20:09
16 नवंबर सूर्योदय 16 नवंबर 14:37
20 नवंबर 09:2221 नवंबर 09:53
24 नवंबर 15:3225 नवंबर सूर्योदय 
26 नवंबर सूर्योदय 27 नवंबर 24:23
30 नवंबर सूर्योदय 1 दिसंबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – दिसंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                        समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
1 दिसंबर सूर्योदय तक 
2 दिसंबर सूर्योदय 2 दिसंबर 10:38 
3 दिसंबर 12:21 4 दिसंबर 13:39 
9 दिसंबर 12:3310 दिसंबर सूर्योदय 
18 दिसंबर सूर्योदय 18 दिसंबर 19:04
22 दिसंबर सूर्योदय 22 दिसंबर 25:37 (रात्रि 01:37) 
24 दिसंबर सूर्योदय 25 दिसंबर 07:36 
28 दिसंबर सूर्योदय 29 दिसंबर सूर्योदय 
31 दिसंबर सूर्योदय 1 जनवरी (2021) सूर्योदय 

अथ कीलकम् :------आचार्य डा.अजय दीक्षित

अथ कीलकम् :------

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आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

ऊँ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य शिव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्रीमहासरस्वती देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोग: ।

 

ऊँ नमश्चण्डिकायै ।।

 

मार्कण्डेय उवाच 

ऊँ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।

श्रेय:प्राप्तिनिमित्ताय नम: सोमार्धधारिणे ।।1।।

सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् ।

सोsपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्पर: ।।2।।

सिद्धय्न्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि ।

एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति ।।3।।

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किंचिदपि विद्यते ।

विना जाप्येन सिद्धयेत सर्वमुच्चाटनादिकम् ।।4।।

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशंकामिमां हर: ।

कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ।।5।।

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार स: ।

समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ।।6।।

सोsपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशय: ।

कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहित: ।।7।।

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति ।

इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ।।8।।

यो निष्कीलां विधायैना नित्यं जपति संस्फुटम् ।

स सिद्ध: स गण: सोsपि गन्धर्वो जायते नर: ।।9।।

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते ।

नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।।10।।

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति ।

ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधै: ।।11।।

सौभाग्यादि च यत्किंचिद् दृश्यते ललनाजने ।

तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ।।12।।

शनैस्तु जप्यमानेsस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकै: ।

भवत्येव समग्रापि तत: प्रारभ्यमेव तत् ।।13।।

ऎश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पद: ।

शत्रुहानि: परो मोक्ष: स्तूयते सा न किं जनै: ।।14।।

 

।। इति देव्या: कीलकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

अथ देव्या कवचम :---आचार्य डा.अजय दीक्षित

अथ देव्या कवचम🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया:--
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महर्षि मार्कण्डेयजी बोले – हे पितामह! संसार में जो गुप्त हो और जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करता हो और जो आपने आज तक किसी को बताया ना हो, वह कवच मुझे बताइए। श्री ब्रह्माजी कहने लगे – अत्यन्त गुप्त व सब प्राणियों की भलाई करने वाला कवच मुझसे सुनो, प्रथम शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघंटा, चौथी कूष्माण्डा, पाँचवीं स्कन्दमाता। छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्री, आठवीं महा गौरी, नवीं सिद्धि दात्री यह देवी की नौ मूर्त्तियाँ, “नवदुर्गा” कहलाती हैं। आग में जलता हुआ, रण में शत्रु से घिरा हुआ, विषम संकट में फँसा हुआ मनुष्य यदि दुर्गा के नाम का स्मरण करे तो उसको कभी भी हानि नहीं होती। रण में उसके लिए कुछ भी आपत्ति नहीं और ना उसे किसी प्रकार का दुख या डर ही होता है।

हे देवी! जिसने श्रद्धा पूर्वक तुम्हारा स्मरण किया है उसकी वृद्धि होती है। और जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करने वाली हो। चामुण्डा प्रेत पर, वाराही भैंसे पर, रौद्री हाथी पर, वैष्णवी गरुड़ पर अपना आसन जमाती है। माहेश्वरी बैल पर, कौमारी मोर पर, और हाथ में कमल लिए हुए विष्णु प्रिया लक्ष्मी जी कमल के आसन पर विराजती है। बैल पर बैठी हुई ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित ब्राह्मी देवी हंस पर बैठती है और इस प्रकार यह सब देवियाँ सब प्रकार के योगों से युक्त और अनेक प्रकार के रत्न धारण किये हुए है।

भक्तों की रक्षा के लिए संपूर्ण देवियाँ रथ मेंबैठी तथा क्रोध में भरी हुई दिखाई देती हैं तथा चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, भाला और त्रिशूल एवं उत्तम शारंग आदि शस्त्रों को दैत्यों के नाश के लिए और भक्तों की रक्षा करने के लिए और देवताओं के कल्याण के लिए धारण किया है। हे महारौद्रे! अत्यन्त घोर पराक्रम, महान बल और महान उत्साह वाली देवी! तुमको मैं नमस्कार करता हूँ। हे देवि! तुम्हारा दर्शन दुर्लभ है तथा आप शत्रुओं के भय को बढ़ाने वाली हैं।

हे जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऎंन्द्री मेरी रक्षा करें, अग्निकोण में शक्ति, दक्षिण कोण में वाराही देवी, नैऋत्यकोण में खड्ग धारिणी देवी मेरी रक्षा करें। वारुणी पश्चिम दिशा में, वायुकोण में मृगवाहिनी, उत्तर में कौमारी और ईशान में शूलधारिणी देवी मेरी रक्षा करें, ब्राह्मणी ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करें और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करें और इसी प्रकार शव पर बैठ  चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें।

जया देवी आगे, विजया पीछे की ओर, अजिता बायीं ओर, अपराजिता दाहिनी ओर मेरी रक्षा करें, उद्योतिनी देवी शिखा की रक्षा करें तथा उमा शिर में स्थित होकर मेरी करें, इसी प्रकार मस्तक में मालाधारी देवी रक्षा करें और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करें। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा, नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे, नेत्रों के मध्य में शंखिनी देवी और द्वारवासिनी देवी कानों की रक्षा करें, सुगंधा नासिका में और चर्चिका ऊपर के होंठ में, अमृतकला नीचे के होंठ की, सरस्वती देवी जीभ की रक्षा करे, कौमारी देवी दाँतों की और चण्डिका कण्ठ प्रदेश की रक्षा करे, चित्रघण्टा गले की घण्टी की और महामाया तालु की रक्षा करे, कामाक्षी ठोढ़ी की, सर्वमंगला वाणी की रक्षा करे।

भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी पीठ के मेरुदण्ड की रक्षा करें, कण्ठ के बाहरी भाग की नील ग्रीवा और कण्ठ की नली की नलकूबरी रक्षा करे, दोनो कन्धों की खड्गिनी और वज्रधारिणी मेरी दोनों बाहों की रक्षा करे, दण्डिनी दोनों हाथों की और अम्बिकादेवी समस्त अंगुलियों की रक्षा करे, शूलेश्वरी देवी संपूर्ण नखोंकी, कुलेश्वरी देवी मेरी कुक्षि की रक्षा करे, महादेवी दोनों स्तनों की, शोक विनाशिनी मन की रक्षा करे, ललितादेवी ह्रदय की, शूलधारिणी उदर की रक्षा करे।

कामिनी देवी नाभि की गुह्येश्वरी गुह्य स्थान की, पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे, सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने वाली महाबलादेवी दोनों जंघाओं की रक्षा करे, विन्ध्यावासिनी दोनों घुटनों की और तैजसी देवी दोनों पाँवों के पृष्ठ भग की, श्रीधरी पाँवों की अंगुलियों की, स्थलवासिनी तलुओं की, दंष्ट्रा करालिनीदेवी नखों की, ऊर्ध्वकेशिनी केशों की, बागेश्वरी वाणी की रक्षा करे, रोमाबलियों के छिद्रों की कौबेरी और त्वचा की बागेश्वरी देवी रक्षा करे। पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी की रक्षा करे।

कालरात्री आँतों की रक्षा करें, मुकुटेश्वरी देवी पित्त की, पद्मावती कमलकोष की, चूड़ामणि कफ की रक्षा करें, ज्वालामुखी नसों के जल की रक्षा करें, अभेद्यादेवी शरीर के सब जोड़ो की रक्षा करें, बह्माणी मेरे वीर्य की, छत्रेश्वरी छाया की और धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन तथा बुद्धि की रक्षा करें। प्राण अपान, समान, उदान और व्यान की वज्रहस्ता देवी रक्षा करें, कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे, रस, रूप, गन्ध शब्द और स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी मेरी रक्षा करें तथा मेरे सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें।

आयु की रक्षा बाराही देवी करे, वैष्णवी धर्म की तथा चक्रिणी देवी मेरी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन, विद्या की रक्षा करे, इन्द्राणी मेरे शरीर की रक्षा करे और हे चण्डिके! आप मेरे पशुओं की रक्षा करिये। महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करे, मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षमाकरी देवी रक्षा करे, राजा के दरबार में महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी चारों ओर से मेरी रक्षा करे।

जो स्थान रक्षा से रहित हो और कवच में रह गया हो उसकी पापों का नाश करने वाली जयन्ती देवी रक्षा करे। अपना शुभ चाहने वाले मनुष्य को बिना कवच के एक पग भी कहीं नहीं जाना चाहिए क्योंकि कवच रखने वाला मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता हैं, वहाँ-वहाँ उसे अवश्य धन लाभ होता है तथा विजय प्राप्त करता है। वह जिस अभीष्ट वस्तु की इच्छा करता है वह उसको इस कवच के प्रभाव से अवश्य मिलती हैऔर वह इसी संसार में महा ऎश्वर्य को प्राप्त होता है, कवचधारी मनुष्य निर्भय होता है, और वह तीनों लोकों में माननीय होता है, देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी कठिन है।

जो नित्य प्रति नियम पूर्वक तीनों संध्याओं को श्रद्धा के साथ इसका पठन-पाठन करता है उसे देव-शक्ति प्राप्त होती है, वह तीनों लोकों को जीत सकता है तथा अकाल मृत्यु से रहित होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है, उसकी लूता, चर्मरोग, विस्फोटक आदि समस्त व्याधियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं और स्थावर, जंगम तथा कृत्रिम विष दूर होकर उनका कोई असर नहीं होता है तथा समस्त अभिचारक प्रयोग और इस तरह के जितने यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र इत्यादि होते हैं इस कवच के हृदय में धारण कर लेने पर नष्ट हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त पृथ्वी पर विचरने वाले भूचर, नभचर, जलचर प्राणी उपदेश मात्र से, सिद्ध होने वाले निम्न कोटि के देवता, जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुल देवता, कण्ठमाला आदि डाँकिनी शाँकिनी अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाँकिनियाँ, गृह, भूत, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस वैताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी उस मनुष्य को जिसने कि अपने हृदय में यह कवच धारण किया हुआ है, देखते ही भाग जाते हैं। इस कवच के धारण करने से मान और तेज बढ़ता है।

जो मनुष्य इस कवच का पाठ करके उसके पश्चात सप्तशती चंडीका का पाठ करता है उसका यश जगत में विख्यात होता है, और जब तक वन पर्वत और काननादि इस भूमण्डल पर स्थित हैं, तब तक यहाँ पुत्र पौत्र आदि सन्तान परम्परा बनी रहती है, फिर देहान्त होने पर मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है जो देवताओं के लिए भी कठिन है और अन्त में सुन्दर रूप को धारण करके भगवान शंकर के साथ आनन्द करता हुआ परम मोक्ष को प्राप्त होता है।

 

संतान गोपाल स्तोत्र :----आचार्य डा.अजय दीक्षित

संतान गोपाल स्तोत्र :-----🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् ।

सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ।।1।।

नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम् ।

यशोदांकगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम् ।।2।।

अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।

नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा ।।3।।

गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम् ।

पुत्रसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुंगवम् ।।4।।

पुत्रकामेष्टिफलदं कंजाक्षं कमलापतिम् ।
देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम ।।5।।

पद्मापते पद्मनेत्र पद्मनाभ जनार्दन ।

देहि में तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते ।।6।।

यशोदांकगतं बालं गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।

अस्माकं पुत्रलाभाय नमामि श्रीशमच्युतम् ।।7।।

श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिहरणाच्युत ।

गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन ।।8।।

भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।।9।।

रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा ।

भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गत: ।।10।।

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।11।।

वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।12।।

कंजाक्ष कमलानाथ परकारुरुणिकोत्तम ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।13।।

लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।14।।

कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।

नमामि पुत्रलाभार्थं सुखदाय बुधाय ते ।।15।।

राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे कवे ।

तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ।।16।।

अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ।।17।।

श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।।18।।

अस्माकं पुत्रसम्प्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।

रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।।19।।

वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।

पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ।।20।।

डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।

भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ।।21।।

नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।

कमलानाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ।।22।।

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ।।23।।

यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनम् ।

वन्देsहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ।।24।।

नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।

रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ।।25।।

पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।

अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ।।26।।

गोपालडिम्भ गोविन्द वासुदेव रमापते ।

अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ।।27।।

मद्वांछितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।

मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ।।28।।

याचेsहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसम्पदम् ।

भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ।।29।।

आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।

अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ।।30।।

वन्दे सन्तानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।

अस्माकं पुत्रसम्प्राप्त्यै सदा गोविन्दच्युतम् ।।31।।

ऊँकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।

कलींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ।।32।।

वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।

देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ।।33।।

राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।

समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ।।34।।

अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।

देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ।।35।।

नन्दपाल धरापाल गोविन्द यदुनन्दन ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।।36।।

दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।

गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ।।37।।

यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।

देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ।।38।।

अस्माकं वांछितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।

भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ।।39।।

रमाहृदयसम्भार सत्यभामामन:प्रिय ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।।40।।

चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।

अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ।।41।।

कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।

देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ।।42।।

देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।

समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ।।43।।

भक्तमन्दार गम्भीर शंकराच्युत माधव ।

देहि मे तनयं गोपबालवत्सल श्रीपते ।।44।।

श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।

भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ।।45।।

जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।

वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ।।46।।

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।47।।

दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।48।।

गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।49।।

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।

मत्पुत्रफलसिद्धयर्थं भजामि त्वां जनार्दन ।।50।।

स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखाम्बुजं 

विलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलांगम् ।

स्पृशन्तमन्यस्तनमंगुलीभि-

र्वन्दे यशोदांकगतं मुकुन्दम् ।।51।।

याचेsहं पुत्रसन्तानं भवन्तं पद्मलोचन ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।52।।

अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।

शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ।।53।।

वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।

कुरु मां पुत्रदत्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ।।54।।

कुरु मां पुत्रदत्तं च यशोदाप्रियनन्दन ।

मह्यं च पुत्रसंतानं दातव्यं भवता हरे ।।55।।

वासुदेव जगन्नाथ गोविन्द देवकीसुत ।

देहि मे तनयं राम कौसल्याप्रियनन्दन ।।56।।

पद्मपत्राक्ष गोविन्द विष्णो वामन माधव ।

देहि मे तनयं सीताप्राणनायक राघव ।।57।।

कंजाक्ष कृष्ण देवेन्द्रमण्डित मुनिवन्दित ।

लक्ष्मणाग्रज श्रीराम देहि मे तनयं सदा ।।58।।

देहि मे तनयं राम दशरथप्रियनन्दन ।

सीतानायक कंजाक्ष मुचुकुन्दवरप्रद ।।59।।

विभीषणस्य या लंका प्रदत्ता भवता पुरा ।

अस्माकं तत्प्रकारेण तनयं देहि माधव ।।60।।

भवदीयपदाम्भोजे चिन्तयामि निरन्तरम् ।

देहि मे तनयं सीताप्राणवल्लभ राघव ।।61।।

राम मत्काम्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद ।

देहि मे तनयं श्रीश कमलासनवन्दित ।।62।।

राम राघव सीतेश लक्ष्मणानुज देहि मे ।

भाग्यवत्पुत्रसंतानं दशरथात्मज श्रीपते ।।63।।

देवकीगर्भसंजात यशोदाप्रियनन्दन ।

देहि मे तनयं राम कृष्ण गोपाल माधव ।।64।।

कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शंकर ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।65।।

गोपबालमहाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।।66।।

दिशतु दिशतु पुत्रं देवकीनन्दनोsयं 

दिशतु दिशतु शीघ्रं भाग्यवत्पुत्रलाभम् ।

दिशति दिशतु श्रीशो राघवो रामचन्द्रो 

दिशतु दिशतु पुत्रं वंशविस्तारहेतो: ।।67।।

दीयतां वासुदेवेन तनयो मत्प्रिय: सुत: ।

कुमारो नन्दन: सीतानायकेन सदा मम ।।68।।

राम राघव गोविन्द देवकीसुत माधव ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।69।।

वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।70।।

ममाभीष्टसुतं देहि कंसारे माधवाच्युत ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।71।।

चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।72।।

विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।

देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ।।73।।

नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।

मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ।।74।।

भगवन कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।

देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गत: ।।75।।

स्वामिंस्त्वं भगवन् राम कृष्ण माधव कामद ।

देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गत: ।।76।।

तनयं देहि गोविन्द कंजाक्ष कमलापते ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।77।।

पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्नजनक प्रभो ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।78।।

शंखचक्रगदाखड्गशांर्गपाणे रमापते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।79।।

नारायण रमानाथ राजीवपत्रलोचन ।

सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ।।80।।

राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।

रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ।।81।।

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।82।।

मुनिवन्दित गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।83।।

गोपिकार्जितपंकेजमरन्दासक्तमानस ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।84।।

रमाहृदयपंकेजलोल माधव कामद ।

ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।85।।

वासुदेव रमानाथ दासानां मंगलप्रद ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।86।।

कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।87।।

पुत्रप्रद मुकुन्देश रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।88।।

पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।89।।

दयानिधे वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।90।।

पुत्रसम्पत्प्रदातारं गोविन्दं देवपूजितम् ।

वन्दामहे सदा कृष्णं पुत्रलाभप्रदायिनम् ।।91।।

कारुण्यनिधये गोपीवल्लभाय मुरारये ।

नमस्ते पुत्रलाभार्थं देहि मे तनयं विभो ।।92।।

नमस्तस्मै रमेशाय रुक्मिणीवल्लभाय ते ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।93।।

नमस्ते वासुदेवाय नित्यश्रीकामुकाय च ।

पुत्रदाय च सर्पेन्द्रशायिने रंगशायिने ।।94।।

रंगशायिन् रमानाथ मंगलप्रद माधव ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।95।।

दासस्य मे सुतं देहि दीनमन्दार राघव ।

सुतं देहि सुतं देहि पुत्रं देहि रमापते ।।96।।

यशोदातनयाभीष्टपुत्रदानरत: सदा ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।97।।

मदिष्टदेव गोविन्द वासुदेव जनार्दन ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।98।।

नीतिमान् धनवान् पुत्रो विद्यावांश्च प्रजायते ।

भगवंस्त्वत्कृपायाश्च वासुदेवेन्द्रपूजित ।।99।।

य: पठेत् पुत्रशतकं सोsपि सत्पुत्रवान् भवेत् ।

श्रीवासुदेवकथितं स्तोत्ररत्नं सुखाय च ।।100।।

जपकाले पठेन्नित्यं पुत्रलाभं धनं श्रियम् ।

ऎश्वर्यं राजसम्मानं सद्यो याति न संशय: ।।101।।

।।इति सन्तानगोपालस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।