बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

कार्तिक दामोदर मास..14 अक्टूबर से 12 नवम्बर...कथा एवं नियम...* पवित्र कार्तिक मास का एक नाम दामोदर मास भी है। 'दाम' कहते हैं रस्सी को और 'उदर' कहते हैं पेट को। इस महीने में माता यशोदा ने भगवान नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण के पेट पर रस्सी बाँध कर उन्हें ऊखल से बाँधा था, अतः उनका एक नाम हुआ 'दामोदर'। भगवान और उनकी माता के बीच यह लीला कार्तिक के महीने में हुई थी, अतः उस लीला की याद में इस महीने को "दामोदर" भी कहते हैं। बृज में सुबह-सुबह जब गोपियाँ दही मन्थन करतीं, तो उनका यही भाव होता कि नन्दलाल ये मक्खन - दही खाएं, हमारे कहने पर वो छलिया- नटखट नाचता और नन्हें-नन्हें हाथों से मक्खन को पकड़ता। भक्तों की इच्छा को पूरा करने के लिये भगवान उनके यहाँ जाते किन्तु जब देखते कि दही-मक्खन तो उनकी पहुँच से दूर ऊपर छींके पर रखा है तो, अपने मित्रों के साथ उसको किसी प्रकार से लूटते। गोपियां इससे आनन्दित तो होतीं किन्तु नंदनन्दन को देखने के लिये, किसी न किसी बहाने से यशोदा माता के यहाँ जातीं और शिकायत करतीं। माता यशोदा अपने लाल से यही कहतीं कि अरे कान्हा! अपने घर में इतन मक्खन-दही है, फिर तू बाहर क्यों जाता है? एक दिन माता यशोदा भगवान को दूध पिला रहीं थीं तभी उन्हें याद आया कि रसोई में दूध चूल्हे पर चढ़ाया हुआ था, अब तक ऊबल गया होगा। माता ने लाल को गोद से उतारा और उबलते दूध को आग से उतारने के लिये लपकीं। श्रीकृष्ण ने रोष-लीला प्रकट की और मन ही मन बोलने लगे कि मेरा पेट अभी भरा नहीं और मैया मुझे छोड़कर रसोई में चली गईं। बस फिर क्या था, भगवान ने सामने दही,घी,माखन रखे हुये मिट्टी के बर्तन को तोड़ दिया। जिससे सारे कमरे में दही बिखर गया, परन्तु इससे भी बालकृष्ण का गुस्सा शान्त नहीं हुआ। उन्होंने कमरे में रखे सभी दूध और दही की मटकियों को तोड़ डाला। इसके बाद छींके पर रखे हुये मक्खन व दही के मटकों को तोड़ने के लिये एक ओखली के ऊपर चढ़ गये। उधर यशोदा मैय्या जब दूध संभाल कर मुड़ीं तो वह यह देख कर हैरान हो गयीं कि दरवाज़े में से दूध-दही-मक्खन बह रहा है। माता को देखकर श्रीकृष्ण ओखली से कूद कर सरपट भागे। अपने घर में माखन चोरी की श्रीकृष्ण की यह पहली लीला थी। माता यशोदा श्रीकृष्ण को पकड़ने के लिये उनके पीछे दौड़ीं। मईया ने सोचा आज कन्हैया को सबक सिखाना ही होगा। अतः छड़ी उठाई और उनके पीछे-पीछे भागीं। यह निश्चित है कि सर्वशक्तिमान-अनन्त गुणों से विभूषित भगवान यदि अपने आप को न पकड़वायें तो कोई उनको नहीं पकड़ सकता। यदि वे अपने आप को न जनायें तो कोई उन्हें जान भी नहीं सकता। माता यशोदा का परिश्रम देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी चाल को थोड़ा धीमा किया। माता ने उन्हें पकड़ लिया और वापिस नन्द-भवन में वहीं पर ले आयीं जहाँ ऊखल पर चढ़ कर भगवान बन्दरों को माखन बाँट रहे थे। सजा देने की भावना से माता यशोदा श्रीकृष्ण को ऊखल से बाँधने लगीं। जब रस्सी से बाँधने लगीं तो रस्सी दो ऊँगल छोटी पड़ गयी। माता रस्सी पर रस्सी जोड़ती जाती परन्तु भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य चमत्कारी लीला से हर बार रस्सी दो ऊँगल छोटी पड़ जाती। सारे गोकुल की रस्सियाँ आ गयीं किन्तु भगवान नहीं बंध पाये, रस्सी हमेशा दो ऊँगल छोटी रही। भगवान ने अपनी इस लीला के माध्यम से हमें बताया कि वे छोटे से गोपाल के रूप में होते हुये भी अनन्त हैं। अपनी वात्सल्य रस की भक्त माता यशोदा की इच्छा पूरी करने के लिये वे लीला पुरुषोत्तम जब बँधे तो पहली रस्सी से ही बँध गये, बाकी रस्सियों का ढेर यूँ ही पड़ा रहा। इस लीला के बाद से ही भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम हो गया दामोदर। *श्रीलविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर* श्रीमद्भागवत की टीका में हर बार रस्सी के दो ऊँगल कम पड़ने का कारण बताते हैं -- दो ऊँगल अर्थात् मनुष्य की भगवान को पाने की निष्कपट भक्तिमयी चेष्टा (एक ऊँगल) और भगवान की कृपा (दूसरी ऊँगल)। जब दोनों होंगे तब ही भगवान हाथ आयेंगे, नहीं तो कोई भी भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता। *कार्तिक मास के नियम...* *कार्तिक मास में 7 नियम प्रधान माने गए हैं, जिन्हें करने से शुभ फल मिलते हैं और हर मनोकामना पूरी होती है। ये 7 नियम इस प्रकार हैं -* *दीपदान -* धर्म शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास में सबसे प्रमुख काम दीपदान करना बताया गया है। इस महीने में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीपदान किया जाता है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है। *तुलसी पूजा-* इस महीने में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है। *भूमि पर शयन-* भूमि पर सोना कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख काम माना गया है। भूमि पर सोने से मन में सात्विकता का भाव आता है तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं। *तेल लगाना वर्जित -* कार्तिक महीने में केवल एक बार नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) के दिन ही शरीर पर तेल लगाना चाहिए। कार्तिक मास में अन्य दिनों में तेल लगाना वर्जित है। सुगंधित तेल लगा सकते है। *दलहन (दालों) खाना निषेध -* कार्तिक महीने में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई आदि नहीं खाना चाहिए। *ब्रह्मचर्य का पालन -* कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है। इसका पालन नहीं करने पर पति-पत्नी को दोष लगता है और इसके अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं। *संयम रखें -* कार्तिक मास का व्रत करने वालों को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करें अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करें, मन पर संयम रखें आदि। *श्रीदामोदर भगवान की जय...👏🏻* *‼जय श्री राधे कृष्ण जी‼*

कार्तिक दामोदर मास..14 अक्टूबर से 12 नवम्बर...कथा एवं नियम...*

पवित्र कार्तिक मास का एक नाम दामोदर मास भी है। 'दाम' कहते हैं रस्सी को और 'उदर' कहते हैं पेट को। इस महीने में माता यशोदा ने भगवान नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण के पेट पर रस्सी बाँध कर उन्हें ऊखल से बाँधा था, अतः उनका एक नाम हुआ 'दामोदर'।

भगवान और उनकी माता के बीच यह लीला कार्तिक के महीने में हुई थी, अतः उस लीला की याद में इस महीने को "दामोदर" भी कहते हैं।

बृज में सुबह-सुबह जब गोपियाँ दही मन्थन करतीं, तो उनका यही भाव होता कि नन्दलाल ये मक्खन - दही खाएं, हमारे कहने पर वो छलिया- नटखट नाचता और नन्हें-नन्हें हाथों से मक्खन को पकड़ता।

भक्तों की इच्छा को पूरा करने के लिये भगवान उनके यहाँ जाते किन्तु जब देखते कि दही-मक्खन तो उनकी पहुँच से दूर ऊपर छींके पर रखा है तो, अपने मित्रों के साथ उसको किसी प्रकार से लूटते।

गोपियां इससे आनन्दित तो होतीं किन्तु नंदनन्दन को देखने के लिये, किसी न किसी बहाने से यशोदा माता के यहाँ जातीं और शिकायत करतीं। माता यशोदा अपने लाल से यही कहतीं कि अरे कान्हा! अपने घर में इतन मक्खन-दही है, फिर तू बाहर क्यों जाता है?

एक दिन माता यशोदा भगवान को दूध पिला रहीं थीं तभी उन्हें याद आया कि रसोई में दूध चूल्हे पर चढ़ाया हुआ था, अब तक ऊबल गया होगा। माता ने लाल को गोद से उतारा और उबलते दूध को आग से उतारने के लिये लपकीं। श्रीकृष्ण ने रोष-लीला प्रकट की और मन ही मन बोलने लगे कि मेरा पेट अभी भरा नहीं और मैया मुझे छोड़कर रसोई में चली गईं।

बस फिर क्या था, भगवान ने सामने दही,घी,माखन रखे हुये मिट्टी के बर्तन को तोड़ दिया। जिससे सारे कमरे में दही बिखर गया, परन्तु इससे भी बालकृष्ण का गुस्सा शान्त नहीं हुआ। उन्होंने कमरे में रखे सभी दूध और दही की मटकियों को तोड़ डाला। इसके बाद छींके पर रखे हुये मक्खन व दही के मटकों को तोड़ने के लिये एक ओखली के ऊपर चढ़ गये।

उधर यशोदा मैय्या जब दूध संभाल कर मुड़ीं तो वह यह देख कर हैरान हो गयीं कि दरवाज़े में से दूध-दही-मक्खन बह रहा है। माता को देखकर श्रीकृष्ण ओखली से कूद कर सरपट भागे। अपने घर में माखन चोरी की श्रीकृष्ण की यह पहली लीला थी। माता यशोदा श्रीकृष्ण को पकड़ने के लिये उनके पीछे दौड़ीं।

मईया ने सोचा आज कन्हैया को सबक सिखाना ही होगा। अतः छड़ी उठाई और उनके पीछे-पीछे भागीं। यह निश्चित है कि सर्वशक्तिमान-अनन्त गुणों से विभूषित भगवान यदि अपने आप को न पकड़वायें तो कोई उनको नहीं पकड़ सकता। यदि वे अपने आप को न जनायें तो कोई उन्हें जान भी नहीं सकता। माता यशोदा का परिश्रम देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी चाल को थोड़ा धीमा किया।

माता ने उन्हें पकड़ लिया और वापिस नन्द-भवन में वहीं पर ले आयीं जहाँ ऊखल पर चढ़ कर भगवान बन्दरों को माखन बाँट रहे थे। सजा देने की भावना से माता यशोदा श्रीकृष्ण को ऊखल से बाँधने लगीं। जब रस्सी से बाँधने लगीं तो रस्सी दो ऊँगल छोटी पड़ गयी। माता रस्सी पर रस्सी जोड़ती जाती परन्तु भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य चमत्कारी लीला से हर बार रस्सी दो ऊँगल छोटी पड़ जाती। सारे गोकुल की रस्सियाँ आ गयीं किन्तु भगवान नहीं बंध पाये, रस्सी हमेशा दो ऊँगल छोटी रही।

भगवान ने अपनी इस लीला के माध्यम से हमें बताया कि वे छोटे से गोपाल के रूप में होते हुये भी अनन्त हैं।

अपनी वात्सल्य रस की भक्त माता यशोदा की इच्छा पूरी करने के लिये वे लीला पुरुषोत्तम जब बँधे तो पहली रस्सी से ही बँध गये, बाकी रस्सियों का ढेर यूँ ही पड़ा रहा। इस लीला के बाद से ही भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम हो गया दामोदर।

*श्रीलविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर*

श्रीमद्भागवत की टीका में हर बार रस्सी के दो ऊँगल कम पड़ने का कारण बताते हैं -- दो ऊँगल अर्थात् मनुष्य की भगवान को पाने की निष्कपट भक्तिमयी चेष्टा (एक ऊँगल) और भगवान की कृपा (दूसरी ऊँगल)। जब दोनों होंगे तब ही भगवान हाथ आयेंगे, नहीं तो कोई भी भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता।

*कार्तिक मास के नियम...*

*कार्तिक मास में 7 नियम प्रधान माने गए हैं, जिन्हें करने से शुभ फल मिलते हैं और हर मनोकामना पूरी होती है। ये 7 नियम इस प्रकार हैं -*

*दीपदान -* धर्म शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास में सबसे प्रमुख काम दीपदान करना बताया गया है। इस महीने में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीपदान किया जाता है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है।

*तुलसी पूजा-* इस महीने में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।

*भूमि पर शयन-*  भूमि पर सोना कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख काम माना गया है। भूमि पर सोने से मन में  सात्विकता का भाव आता है तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।

*तेल लगाना वर्जित -*  कार्तिक महीने में केवल एक बार नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) के दिन ही शरीर पर  तेल लगाना चाहिए। कार्तिक मास में अन्य दिनों में तेल लगाना वर्जित है। सुगंधित तेल लगा सकते है।

*दलहन (दालों) खाना निषेध -* कार्तिक महीने में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई आदि नहीं खाना  चाहिए।

*ब्रह्मचर्य का पालन -* कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है। इसका पालन नहीं करने  पर पति-पत्नी को दोष लगता है और इसके अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं।

*संयम रखें -* कार्तिक मास का व्रत करने वालों को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करें अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करें, मन पर संयम रखें आदि।

*श्रीदामोदर भगवान की जय...👏🏻*

*‼जय श्री राधे कृष्ण जी‼*

श्री राम में मन्दोदरी को ब्रह्म-दर्शन


🏵️🏵️जय श्री सीताराम जी 🏵️🏵️
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श्रीराम में मन्दोदरी को ब्रह्म-दर्शन
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         श्री राम कथा के नारी पात्रों में मन्दोदरी का  अत्यन्त विशिष्ट एवं गौरवपूर्ण स्थान है, यद्यपि वह सब के लिए दुखदायी रावण की पत्नी और मेघनाद जैसे देवशत्रु की माता थी, पर उसका स्वयं का व्यक्तित्व श्री राम के प्रति अत्यन्त आदरभाव से परिपूर्ण रहा। वह रावण की पत्नी के रूप में परम पतिव्रता, नीतिमती और पति का परमहित चाहने वाली थी, परन्तु साथ ही वह उसके अनैतिक कार्यों की विरोधी भी थी। वह श्री राम को एक आदर्श पुरुष के रूप में देखती थी, साथ ही उन्हें परमब्रह्म परमात्मा मानती थी। यद्यपि रावण के वध पर उसे स्वाभाविक शोक था, परन्तु श्री राम के प्रति उनके मन में कहीं भी द्वेषभाव नहीं था, अपितु उसने उनकी भक्तवत्सलता और रावण जैसे शत्रु को भी अपना परमधाम देने की प्रशंसा की थी। विभिन्न ग्रंथों में श्री राम के प्रति उसके निम्नलिखित कथन उसके हृदय की पवित्रता और भगवद्भक्ति को प्रमाणित करते हैं ----

         'रामो न मानुष:' -- श्री राम जी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं।

         'मानुषं रूपमास्थाय विष्णु: सत्यपराक्रम:' -- सत्यपराक्रमी भगवान विष्णु ने समस्त लोकों का हित करने की इच्छा से मनुष्य का रूप धारण किया है।

        'रामो देववर: साक्षात्प्रधानपुरुषेश्वर:' -- देवाधिदेव भगवान श्रीराम साक्षात् प्रकृति और पुरुष के नियामक हैं।

         'बिस्वरूप रघुवंसमनि' -- रघुकुल-शिरोमणि श्री राम विश्वरूप हैं।

          'मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान' -- सारा विश्व उन्हीं का स्वरूप है। उन्हीं चराचररूप भगवान श्री रामचन्द्रजी  ने मनुष्य रूप में अवतार लिया है।

         'राघवो भक्तवत्सल:' -- श्री राघव भक्तवत्सल हैं।

          ये कथन ही नहीं, अपितु मन्दोदरी के हृदय के उद्गार हैं। मयतनुजा निशाचरराज रावण की भार्या मन्दोदरी के श्री राम में ब्रह्मत्व-दर्शन को महर्षि वाल्मीकि जी, महामुनि वेदव्यास जी एवं गोस्वामी तुलसीदास जी तीनों ही युग-सन्तों ने उसे 'महाबुद्धिशालिनी', 'शुभलक्षणा' , नारिललामा' आदि विशेषणों से विभूषित किया है। राक्षसराज रावण स्वयं उसे देवी की तरह सम्मान देता था। यह विधि का विधान ही था कि वह दानवराज मय की पुत्री एवं राक्षसराज रावण की पत्नी थी। हेमा नामक अप्सरा से उसका जन्म हुआ था।

         रावण पुलस्त्य का पौत्र था, उसके उच्च वंश को देखकर और पितामह ब्रह्माजी द्वारा वरदान की बात जानकर मय ने उसका रावण के साथ विवाह कर दिया था।

         मन्दोदरी के चरित्र में किसी भी रामायण के रचयिता ने किसी तरह की राक्षसीय वृत्ति या विकार नहीं पाया है। जन्म से असुर होने पर भी उसमें आसुरी सम्पत्ति का लेश भी नहीं था। वृत्रासुर, प्रह्लाद एवं विभीषण भी असुरकुलों के ही थे, परन्तु वृत्ति से परम भागवत थे। यह सत्य मन्दोदरी पर भी लागू होता है।

         नारी होने के नाते मन्दोदरी की अपनी मर्यादाएं थीं। राजमहल की चहारदीवारी उसकी सीमाएं थीं। अनुनय-विनय उसके अस्त्र-शस्त्र थे। पति हित उसका प्रथम कर्तव्य था। वह पूर्णतया 'पतिहिते रता' सुनारि थी। फिर भी जब-जब रावण कुमार्ग पर जाने को होता, वह अनुनय-विनय से उसे सावधान करती रहती थी। वह विभीषण की तरह राम-शरणागत नहीं हुई। पत्नी होने के नाते शायद उसकी अपनी लक्ष्मण-रेखा थी, परन्तु भगवान तो भावना के भूखे हैं (भाव बस्य भगवान) । इस सन्दर्भ में मन्दोदरी कहीं भी किसी रूप में कम पड़ती दृष्टिगोचर नहीं होती। श्री राम की प्रभुता बताकर वह रावण को समझाते हुए कहती है -- हे नाथ! सुनिए, सीता को लौटाये विना शम्भु और ब्रह्मा के किए भी आपका भला नहीं हो सकता---

सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें।
हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।

         नाच-गान के अखाड़े में रावण के साथ बैठी मन्दोदरी के कर्णफूल जब श्री रामचन्द्र जी के एक ही बाण ने काट गिराये, तो उसी क्षण मन्दोदरी को श्री राम में ब्रह्म के दर्शन हो जाते हैं। वह रावण से हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है, 'हे प्रियतम! अपना यह हठ छोड़ दीजिए कि श्री राम मनुष्य हैं। मेरे इन वचनों पर विश्वास कीजिए कि रघुकुल के शिरोमणि श्री रामचन्द्र जी विश्वरूप हैं, वेद जिनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं।' श्री राम के परब्रह्मरूप का वर्णन करते हुए वह कहती है ---

बिस्वरूप रघुबंस मनि
        करहु बचन  बिस्वासु।
लोक कल्पना बेद कर
        अंग अंग  प्रति जासु।।

अहंकार सिव बुद्धि अज
        मन ससि चित्त महान।
मनुज बास सचराचर
        रूप   राम   भगवान।।

        रावण ने मन्दोदरी के बचनों को हँसकर टाल दिया। इससे विदुषी मन्दोदरी को यह विश्वास हो गया कि पति कालवश है।

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श्री राम में मन्दोदरी को ब्रह्म-दर्शन
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         अंगद ने रावण के गर्व को चूर करके सभा में जब यह सुनाया कि वह रणभूमि में रावण को खेला-खेलाकर मारेगा तो रावण उदास होकर महल में चला गया। चिन्तित रावण को मन्दोदरी इतिहास के कटु सत्यों की याद दिलाकर उनसे शिक्षा लेने की सम्मति देती है, हे स्वामी? आप इस कुमति का परित्याग कर दो कि श्री रघुपति मनुष्य हैं, वे चराचर के स्वामी और अतुलनीय बलवान हैं --

पति रघुपतिहि मनुज जनि मानहु।
अग जग नाथ अतुलबल जानहु।।

         आपकी और श्री राम जी की कोई बराबरी नहीं है। श्री राम जी के लघु भ्राता ने एक छोटी सी रेखा खींची थी, आप तो उसको भी नहीं लाँघ सके। फिर उनसे युद्ध कैसे जीतोगे? रणबांकुरे हनुमान एवं अंगद जैसे उनके अनुचर हैं, जो खेल-खेल में ही समुद्र लांँघ जाते हैं। हनुमान ने आपकी अशोक वाटिका क्षत-विक्षत कर दी। आपके महाबली बेटे अक्षयकुमार को मार डाला। सारी लंका जला डाली, फिर भी आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके।
       
          याद कीजिए सीता-स्वयंवर, जिसमें आप भी अपना बल आजमाने गये थे। वहाँ इन्हीं श्री राम जी ने शिव जी का धनुष तोड़कर सीता जी को ब्याहा था, उस समय आपने इन्हें संग्राम में क्यों नहीं जीता?

         शूर्पणखा की दशा आप देख ही चुके हैं। अकेले श्री रामचन्द्र जी ने आप जैसे ही बलवान खर-दूषण को मार डाला। मारीच से आपने इनकी किशोरावस्था का बल-विक्रम सुन ही लिया है। विराध और कबन्ध को भी इन्होंने ही मारा था। आपके सामने ही इन्होंने खेल-खेल में ही विशाल समुद्र को बांध दिया। ऐसे नारायण को आप पुन:-पुन: साधारण मनुष्य कहते हैं। सच है, संसार में कभी किसी भी प्राणी की मृत्यु अकारण नहीं होती है। लगता है, सीता आपकी मृत्यु की कारण बन गई है। काल--विवश आपकी मति भ्रष्ट हो गई है। काल किसी को लाठी लेकर नहीं मारता। वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार को हर लेता है।

        हे नाथ! जिसका काल निकट आ जाता है, उसे आपकी ही तरह भ्रम हो जाता है।

         हे प्रियतम! जो हुआ सो हुआ। अभी भी समय है, करुणावरुणालय श्री रघुनाथ जी को भज कर भूल की समाप्ति कर लीजिए। उनसे वैर त्यागकर उनका भजन करके निर्मल यश प्राप्त कीजिए ---

कृपासिंधु रघुनाथ भजि
        नाथ बिमल जसु लेहु।।

        काल--कुण्ठित रावण कहाँ मानने वाला था? वह विकट घड़ी आ ही गई जिसकी काली परछाई का आभास मन्दोदरी को पहले ही हो चुका था। रावण के कटे सिर मन्दोदरी के सामने आकर गिरते हैं। रावण-वध पर जैसा विलाप मन्दोदरी ने किया, इतिहास में ऐसा तत्त्व-ज्ञान-मय विलाप पति के शव पर शायद ही किसी पत्नी ने किया हो। दोष वह वध करने वाले श्री राम जी पर नहीं, बल्कि वध होने वाले अपने पति के कुकृत्यों  को देती है।

          सर्वप्रथम मन्दोदरी मृत पति को उपालम्भ देती है और कहती है, राजन् ! आपने बहुत ही धर्मपरायणा, पतिव्रता कुल ललनाओं को विधवा बनाया और उनका अपमान किया था। यह फल आपको मिलने वाला ही था। महाराज! पतिव्रताओं के आँसू इस पृथ्वी पर व्यर्थ नहीं गिरते। यह कहावत आपके ऊपर ठीक-ठीक घटी है ---

'पतिव्रतानां नाकस्मात् पतन्त्यश्रूणि भूतले।'

         परंतु पतिपरायणा मन्दोदरी पति का अतुल्य प्रताप बखान करना कैसे भूल सकती है? हे नाथ! तुम्हारी प्रभुता जगत प्रसिद्ध थी। विधाता की सारी सृष्टि तुम्हारे वश में थी। तुम्हारे बल से पृथ्वी कांपती रहती थी। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि का तेज तुम्हारे सामने फीका लगता था। शेष और कच्छप तुम्हारा भार सहन करने में कष्ट महसूस करते थे। लोकपाल तुमको डरकर प्रणाम करते थे। यहाँ तक कि काल और यमराज को भी तुमने अपने भुजबल से जीत लिया था। तुम तो मृत्यु की भी मृत्यु थे। इंद्रजीत जैसे तुम्हारे बेटे एवं अनेक कुटुम्बियों के बल प्रताप का तो कहना ही क्या?

        आज उसी दिग्विदयी दशानन के शव को गीदड़ और गिद्ध खा रहे हैं। कुल में तुम्हारे लिए कोई रोने वाला भी नहीं बचा, राम विमुख के लिए यह अनुचित भी नहीं है--

'राम विमुख यह अनुचित नाहीं।'

        स्वामिन्! कालविवश होने से आपने किसी का कहना नहीं माना और चराचर के स्वामी परमात्मा को मनुष्य करके जाना --

काल बिबस पति कहा न माना।
अग जग नाथ मनुज करि जाना।।

         महाभागवत मन्दोदरी पूर्णतया राम मय हो जाती है, वह स्तुति करती है---

जान्यो मनुज करि दनुज कानन
         दहन   पावक।  हरि स्वयं।
जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर
         पिय भजेहु नहिं करुनामयं।।
आजन्म जे परद्रोह रत
         पापौघमय तव तनु अयं।
तुम्हहू दियो निज धाम राम
         नमामि  ब्रह्म निरामयं।।

         प्रभु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती हुई राजमहल को जाती है, विलाप करती हुई नहीं, बल्कि श्री राम के गुणगान करती हुई ---

अहह नाथ रघुनाथ सम
         कृपा सिंधु नहिं आन।
जोगि  बृंद   दुर्लभ  गति
         तोहि दीन्हि भगवान।।

         इस प्रकार मन्दोदरी ने प्रभु श्रीराम को परब्रह्म परमात्मा और श्री सीता जी को जगज्जननी जगदम्बा ही माना था। श्री राम कथा के समस्त पात्रों में उसका चरित्र अत्यन्त विशिष्ट है। शत्रुपत्नी होते हुए भी उसने धर्म, नीति एवं न्यायपथ का सदा अनुसरण किया और पति को भी उसी मार्ग पर ले जाने का निरन्तर प्रयास किया।

         --🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴जय सियाराम जय जय हनुमान

रविवार, 13 अक्टूबर 2019

साधु और नचनिया


                   
                    ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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किसी गाँव मेँ एक साधु रहता था जो दिन भर लोगोँ को उपदेश दिया करता था। उसी गाँव मेँ एक नर्तकी थी, जो लोगोँ के सामनेँ नाचकर उनका मन बहलाया करती थी।
एक दिन गाँव मेँ बाढ़ आ गयी और दोनोँ एक साथ ही मर गये। मरनेँ के बाद जब ये दोनोँ यमलोक पहूँचे तो इनके कर्मोँ और उनके पीछे छिपी भावनाओँ के आधार पर इन्हेँ स्वर्ग या नरक दिये जानेँ की बात कही गई। साधु खुद को स्वर्ग मिलनेँ को लेकर पुरा आश्वस्त था। वहीँ नर्तकी अपनेँ मन मेँ ऐसा कुछ भी विचार नहीँ कर रही थी। नर्तकी को सिर्फ फैसले का इंतजार था।
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तभी घोषणा हूई कि साधु को नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है। इस फैसले को सुनकर साधु गुस्से से यमराज पर चिल्लाया और क्रोधित होकर पूछा , “यह कैसा न्याय है महाराज?, मैँ जीवन भर लोगोँ को उपदेश देता रहा और मुझे नरक नसीब हुआ! जबकि यह स्त्री जीवन भर लोगोँ को रिझानेँ के लिये नाचती रही और इसे स्वर्ग दिया जा रहा है। ऐसा क्योँ?”

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यमराज नेँ शांत भाव से उत्तर दिया ,” यह नर्तकी अपना पेट भरनेँ के लिये नाचती थी लेकिन इसके मन मेँ यही भावना थी कि मैँ अपनी कला को ईश्वर के चरणोँ मेँ समर्पित कर रही हूँ। जबकि तुम उपदेश देते हुये भी यह सोँचते थे कि कि काश तुम्हे भी नर्तकी का नाच देखने को मिल जाता !
हे साधु ! लगता है तुम इस ईश्वर के इस महत्त्वपूर्ण सन्देश को भूल गए कि इंसान के कर्म से अधिक कर्म करने के पीछे की भावनाएं मायने रखती है। अतः तुम्हे नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है। “
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मित्रों , हम कोई भी काम करें , उसे करने के पीछे की नियत साफ़ होनी चाहिए , अन्यथा दिखने में भले लगने वाले काम भी हमे पुण्य की जगह पाप का ही भागी बना देंगे।

किसको मिला किसका श्राप 🔴🔴🔴🔴🔴

किसको मिला किसका श्राप

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आचार्य डा.अजय दीक्षित

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 विभिन्न युगों में दैवी शक्तियों नें अवतार ले कर पृथ्वी को पाप मुक्त किया है। और उन्हीं पौराणिक ग्रंथों में सिद्ध ऋषि मुनियों और दैवी पात्रों के द्वारा, दूसरे कई पात्रों को दिये गए शाप का भी वर्णन किया गया है।



श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता और राजा दशरथ का दर्दनाक किस्सा 

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अपने दृष्टिहीन माता-पिता की प्यास बुझाने के लिए जब श्रवणकुमार नदी पर पानी भरने जाते हैं, तभी पास में अयोध्या नगरी के राजा दशरथ जंगल में शिकार खेल रहे होते हैं। दशरथ के पास शब्द भेदी बाण चला कर शिकार करने की विद्या होती है।

श्रवणकुमार नदी पर पहुंच कर जैसे ही पानी भरने लगते हैं, तभी राजा दशरथ को ऐसा लगता है कि नदी पर कोई हिंसक प्राणी जल पीने आया है। वे उसी वक्त बिना देखे शब्द भेदी बाण छोड़ देते हैं।

बाण सीधा श्रवणकुमार की छाती भेद जाता है और वो जोर से चीख पड़ते हैं। उनकी आवाज सुनकर दशरथ भी नदी की ओर दौड़ पड़ते हैं। वहां श्रवण कुमार अपनी मृत्यु से लड़ रहे होते हैं। दशरथ उनका हाथ पकड़ क्षमा मांगने लगते हैं।

मरने से पहले श्रवणकुमार दशरथ से कहते हैं, “मेरे दृष्टिहीन माता पिता प्यासे हैं उन्हे यह जल पिला देना।”

और इतना कह कर श्रवण कुमार अपना देह त्याग देते हैं।

राजा दशरथ श्रवणकुमार के पिता ऋषि शांतनु और माता देवी ज्ञानवती को सारी हकीकत दुख और शोक के साथ काँपते हुए सुनाते हैं। अपने इकलौते बुढ़ापे के सहारे और जीवन से भी प्रिय पुत्र की मौत की खबर सुन कर देवी ज्ञानवती उसी वक्त परलोक सिधार जाती हैं।

श्रवण कुमार के पिता ऋषि शांतनु करुण रुदन करते हुए, क्रोधाग्नि में जलने लगते हैं। और अपराधी राजा दशरथ को यह शाप देते हैं कि-.

जिस तरह हमारी मौत के समय हमारा इकलौता पुत्र हमारे पास नहीं है, उसी तरह जब तुम देह त्यागोगे तो तुम्हारा कोई भी पुत्र तुम्हारे पास नहीं होगा… और जिस तरह अपने पुत्र के वियोग में हम बूढ़े माँ-बाप मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं, ठीक वैसे ही तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग के प्रगाढ़ दुख में होगी।


यह शाप देने के पश्चात तुरंत ही ऋषि शांतनु भी देह त्याग कर देते हैं।

और जैसा कि हम सब जानते हैं, भविष्य में राजा दशरथ, अपने लाडले पुत्र राम के वनवास के दौरान मृत्यु को प्राप्त होते हैं। उस समय लक्ष्मण भी राम के साथ वन में होते हैं, तथा भरत और शत्रुग्न अपने मामा के वहाँ गए होते हैं। इस प्रकार ऋषि शांतनु का शाप सत्य साबित होता है।

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“ सम्राट युद्धिष्ठिर ” द्वारा अपनी माता “देवी कुंती” और समस्त नारी जाती को दिया हुआ शाप


दुर्योधन का आखिरी महान योद्धा अंग राज कर्ण मारा जा चुका था । देवी कुंती अपनी आँखों में आँसू लिए कुरुक्षेत्र रण में आ पहुँचती हैं। जहां रात में अर्जुन, युद्धिष्ठिर, नकुल, सहदेव, और श्री कृष्ण, जीवित सैनिकों से, मृत सैनिकों के शव उठवा रहे होते हैं। तभी देवी कुंती अंग राज कर्ण के मृत देह के पास बैठ कर विलाप करने लगती हैं।

अपनी माता को शत्रु के शव पर विलाप करते देख अर्जुन, युद्धिष्ठिर, नकुल, सहदेव, और भीम देवी कुंती से पूछने लगते हैं कि वह क्यों ऐसा कर रही है। तभी कुंती वर्षों से छुपाया भेद खोल देती हैं कि कर्ण उन्हीं का ज्येष्ठ पुत्र है। यह बात सुन कर सारे भाई अपनी माता से बहुत क्रुद्ध हो जाते हैं। और इतना बड़ा भेद छुपाने के लिए युद्धिष्ठिर अपनी माता देवी कुंती और समस्त नारी जाती को यह शाप देते हैं कि-

आज के पश्चात कोई भी नारी मन में कोई भेद नहीं छुपा पाएगी, भेद छुपाने की नारी जाती की वृति ही नहीं रहेगी।


युद्धिष्ठिर का यह कहना था कि अगर हमे पता होता की कर्ण हमारा ज्येष्ठ भ्राता है, तो हम कदापी उसके प्राण नहीं हरते। और उसी को राजा बना देते। पर कृष्ण ने ऐसा होने नहीं दिया क्योंकि अगर कर्ण को राज्य मिलता तो वह मित्रता का ऋण उतारने के लिए, राज्य दुर्योधन को दे देता और दुर्योधन की विजय यानी अधर्म की धर्म पर विजय। जिसे कभी कृष्ण होने नहीं दे सकते थे।

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भगवान श्री कृष्ण को देवी गांधारी का दिया हुआ शाप


कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। अधर्म का साथ देने वाले गांधारी के निन्यानवे पुत्र, और उनका सौवा पुत्र जो युद्धिष्ठिर, के पक्ष से लड़ा था, वह सारे के सारे मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। विजय के बाद अर्जुन, युद्धिष्ठिर, नकुल, सहदेव, भीम, देवी कुंती तथा श्री कृष्ण हस्तिनापुर आये और ध्रितराष्ट्र तथा देवी गांधारी से भेंट की।

वापस जाते समय श्री कृष्ण देवी गांधारी के कक्ष में आज्ञा लेने जाते हैं। उस समय गांधारी अपने सौ पुत्रों की मृत्यु के शौक में लिप्त होती हैं। वह कृष्ण से कहती हैं कि अगर तुम चाहते तो युद्ध को रोक सकते थे ना ? श्री कृष्ण हाँ में जवाब देते हैं। यह वचन सुन कर गांधारी के क्रोध का बांध टूट जाता है और वह श्री कृष्ण को शाप दे देती है कि-

जैसे हमारे वंश का नाश हुआ और हम उसे रोक ना पाये… वैसे ही तुम्हारे वंश का भी सर्वनाश होगा और तुम भी उसे रोक नहीं पाओगे।


हकीकत में उसके बाद भविष्य में यादवों का वंश नाश हो गया। यादव एक दूजों के साथ ही लड़ मरे थे। और इस तरह देवी गांधारी का शाप सत्य हुआ था।



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 पवन पुत्र केसरी नन्दन हनुमान को बाल्य काल में मिला हुआ शाप


हनुमान बाल्यकाल में काफी नटखट थे। वह हंसी-खेल में ऋषि-मुनियों को खूब सताते थे। एक बार तो उन्होने सूर्य को अपने मुह में समा लिया था। हनुमान के नटखट व्यवहार से क्रुद्ध हो कर उन्हे एक महा तपस्वी ऋषि ने शाप दिया कि…

है उदण्ड नटखट बालक… तुम जिन दिव्य शक्तियों के प्रभाव से उधम मचाते फिर रहे हो उन चमत्कारी दिव्य शक्तियों को अभी के अभी भूल जाओगे।


बाल हनुमान की माता उस ऋषि से अपना शाप वापस लेने को प्राथना करती हैं। पर वह ऋषि ऐसा कहते हैं कि जब भी भविष्य में राम काज के लिए कोई व्यक्ति हनुमान को उनकी शक्तियों, और बाल्य काल की बातों को स्मरण कराएगा तब उसी वक्त हनुमान की शक्तियाँ उनके पास लौट आएंगी।

और आग चल कर यही हुआ। सीता मैया को रावण की कैद से छुडाने के लिए प्रयत्न कर रहे श्री राम की मदद करते समय ही हनुमान जी को अपनी शक्तियों का स्मरण हो पाया था।

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क ब्राह्मण के द्वारा अंग राज कर्ण को दिया हुआ शाप


एक दिन सूर्य पुत्र कर्ण शिकार खेलने गए थे। झाड़ियों के पीछे किसी हिंसक प्राणी की आशंका होने पर बिना पड़ताल किए ही कर्ण बाण चला देते हैं। दुर्भाग्य वश वह एक गाय होती है। उस गाय का रखवाला ब्राह्मण यह दृश्य देख बहुत क्रुद्ध हो जाता है।

कर्ण उस ब्राह्मण से माफी मांगने लगते है। पर वह ब्राह्मण कहता है कि मैं तुम्हे माफ तो कर दूंगा पर पहले मेरी इस गाय को जीवित कर के दो; इसका भूखा बछड़ा मेरे घर पर बंधा हुआ है, और वह भूख से बिलख रहा होगा…मुझे इस गाय को उसके बछड़े के पास जीवित ले कर जाना है!
कर्ण ऐसा करने के लिए अपनी असमर्थता बताते हैं। तभी वह ब्राह्मण कर्ण को अपनी उस गलती के लिए शाप देता है कि-

जिस तरह तुम रथ पर सवार हो कर, अपनी शक्तियों के मध में खुद को श्रेष्ठ समझने लगे हो, और दूसरों पर बिना सोचे समझे कहर ढा रहे हो, एक दिन जब तुम अपने जीवन की सब से बड़ी लड़ाई लड़ रहे होगे तब तुम्हारे रथ के पहिये जमीन में धंस जाएंगे। और भय का राक्षस तुम्हें चारों ओर से घेर लेगा…


भविष्य में जब कर्ण अपने जीवन की सब से बड़ी लड़ाई अर्जुन से लड़ रहे होते हैं तभी कर्ण के रथ के पहिये रण भूमि में जमीन में धस जाते हैं। और तब कर्ण जमीन में धसा पहिया निकालने नीचे उतरते हैं। इस अवसर का लाभ उठा कर अर्जुन कपट से कर्ण का वध कर देते हैं। इस तरह ब्राह्मण का शाप सत्य हो जाता है।

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राज कुमारी अंबा का भीष्म को दिया हुआ श्राप


काशी राज्य के राजा की तीन पुत्रियाँ अंबा, अंबिका, और अंबालिका का काशी में स्वयंवर हो रहा होता है। तभी वहाँ धनुष बाण लिए क्रोध में गंगा पुत्र भीष्म पहुँच आते हैं। उस सभा में कई महाराजा उपस्थित होते हैं जो भीष्म का मज़ाक उड़ाने लगते हैं कि उनकी ब्रह्मचर्य की प्रातिज्ञा का क्या हुआ? तभी भीष्म एक ही बाण से सारे राजा-महाराजाओं का मुकुट उतार लेते हैं और काशी की राजकुमारियों का हरण कर के हस्तिनापुर ले जाते हैं ताकि उनका विवाह विचित्रवीर्य से किया जा सके। भीष्म ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि सदियों से काशी की राजकुमारीयों का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमारों से होता आ रहा होता है। इसलिए काशी की राजकुमारी या इस बार भी हस्तिनापुर राज्य में ही ब्याही जानी चाहिए थी।

हस्तिनापुर आ कर पता चलता है की काशी राजकुमारी अंबा तो पहले ही शालव नरेश को मन ही मन अपना पति मान चुकी है और वह दोनों एक दुसरे से प्रेम करते हैं। फौरन ही भीष्म काशी राजकुमारी अंबा को शाल्व नरेश के पास भेज देते हैं पर शाल्व अंबा को अस्वीकार कर देते हैं।

अंबा अब अपमानित हो कर काशी वापस तो जा नहीं सकती थी। और शाल्व ने भी उसे ठुकरा दिया था। इसलिए वह वापस हस्तिनापुर आती है और हस्तिनापुर नरेश से कहती हैं कि मेरी इस हालत का ज़िम्मेदार भीष्म है। उसे यह आदेश दिया जाये कि वह मुझसे विवाह करे।
पर अपने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत के कारण भीष्म अंबा से विवाह करने से इन्कार कर देते हैं और तभी क्रोध की आग में जलती अंबा यह शाप देती है कि-

हे! कायर भीष्म… मैं अपने इस अपमान का बदला तुम्हारी जान ले कर लूँगी… चाहे मुझे जन्म पर जन्म ही क्यों ना लेने पड़े पर तुम्हारी मौत का कारण मै ही बनूँगी…


कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन से भीष्म का सामना हुआ तब अर्जुन के रथ पर शिखंडी नामक योद्धा खड़ा था और वह एक अर्धनारी था। अंबा ने ही शिखंडी के रूप में जन्म लिया था। उसे पता था की भीष्म कभी उस दिशा में बाण नहीं चलाएगा जिस दिशा में एक नारी खड़ी हो। भीष्म ने तुरंत शिखंडी के अंदर छुपी अंबा को पहचान लिया और तुरंत अपने शस्त्र त्याग दिये। निहत्थे भीष्म पर शिखंडी के पीछे छुपे अर्जुन ने बाणों की वर्षा कर दी। और भीष्म बाणों की शय्या पर लेट गए। युद्ध के अंत में महान योद्धा भीष्म मृत्यु को प्राप्त हुए। इस तरह अंबा ने अपना दिया हुआ शाप सच कर दिया और अपने अपमान का बदला लिया।

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

चाक्षुषोपनिषद

चाक्षुषोपनिषद
आचार्य डा.अजय दीक्षित
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“चाक्षुषोपनिषद्” अथवा “चाक्षुषी” विद्या समस्त प्रकार के नेत्र रोगों के नाश के लिए पढ़ी जाती है.  
ॐ तस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बन्ध्यु ऋषि:, गायत्री छन्द:,
सूर्यो देवता, चक्षूरोगनिवृत्तये जपे विनियोग:।
ॐ चक्षु: चक्षु: चक्षु: तेज: स्थिरो भव । मां पाहि पाहि । त्वरितं चक्षुरोगान् शमय शमय । मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय । यथाहं अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय । कल्याणं कुरु कुरु । यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षु: प्रतिरोधकदुष्कृतानि तानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय ।
ॐ नम: चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय ।  ॐ नम: करुणाकरायामृताय । ॐ नम: सूर्याय ।  ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नम: । खेचराय नम: । महते नम: । रजसे नम: । तमसे नम: । असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । उष्णो भगवाञ्छुचिरूप: । हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूप: । य इमां चक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति । न तस्य कुले अन्धो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।
ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा ।

चाक्षुषोपनिषद् की शीघ्र फल प्रदान करने की विधि निम्नलिखित प्रकार से है :-
जो भी व्यक्ति नेत्र के किसी भी प्रकार के रोग से ग्रस्त है उसे इस विधि का लाभ उठाना चाहिए. जिस व्यक्ति को नेत्र रोग है वह रविवार के दिन (अगर शुक्ल पक्ष का रविवार हो या रविपुष्य योग हो तब अत्यधिक शुभ है लेकिन आपातकालीन परिस्थिति में किसी भी रविवार को लिया जा सकता है) से प्रारंभ कर के प्रतिदिन सुबह के समय काँसे की थाली में नीचे दिया यंत्र बनाए. इस यंत्र को हल्दी से लिखना है और अनार के पौधे की कलम से लिखना है. यंत्र के नीचे जो चार शब्द लिखे हैं वे भी थाली में लिखने है, यंत्र है :

                      



मम चक्षुरोगान् शमय शमय

जिस काँसे की थाली पर यह यंत्र बनाया है उसी यंत्र पर ताँबे की कटोरी में चतुर्मुखी शुद्ध घी का दीपक जलाकर रख दें. गन्ध से व पुष्पादि से यंत्र का पूजन करें. इसके बाद पूर्व की ओर मुँह कर के बैठ जाएँ. इसके बाद हल्दी की माला से “ॐ ह्रीं हंस:” इस बीज मंत्र की 6 मालाएँ करें. मालाएँ जपने के बाद चाक्षुषोपनिषद् के बारह पाठ करें. पाठ के बाद फिर से इस बीज मंत्र की पाँच मालाओं का जाप करें.
उपरोक्त पाठ करने से पहले एक ताम्र पात्र (ताँबे का बर्तन) में लाल पुष्प व लाल चन्दन मिश्रित जल रख लें. जाप करने की पूरी विधि के बाद अंत में लाल पुष्प व लाल चन्दन मिश्रित जल से सूर्य भगवान को अर्घ्य देकर प्रणाम करें और अपने मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्र रोग शीघ्र दूर हो जाएगा. इसके साथ ही प्रत्येक रविवार को सूर्य महाराज के आकाश में रहने तक दिन में केवल एक बार बिना नमक का भोजन करें.

विश्व का सबसे बड़ा भारतीय और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो का अनुसंधान )

विश्व का सबसे बड़ा भारतीय और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो का अनुसंधान )

■ क्रति = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुति = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुति = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 76 महायुग = मनवन्तर ,
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
■ महाकाल = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )

सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।

तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।

चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।

पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच  उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच),  मोह, आलस्य।

सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।

आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।

नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।

दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।

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