शनिवार, 21 सितंबर 2019

जब 0 की खोज आर्यभट्ट ने की तो रावण के 10 सर और गांधारी के 100 पुत्र कैसे गिने गए?

#सनातन_धर्म_की_वैज्ञानिकता!
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मित्रो, जब 0 की खोज आर्यभट्ट ने की तो रावण के 10 सर और गांधारी के 100 पुत्र कैसे गिने गए?

आज इसका उत्तर देता हूँ!

मित्रो सोसल मीडिया में एक पोस्ट चल रही है कि यदि आर्यभट्ट ने शून्य का आविष्कार किया था तो रावण के दस सिरों की गणना कैसे हुई थी?

महाभारत काल मे कौरवों के 100 भाइयों की गणना कैसे हुई थी?

ऐसा कहने वालों का मत है कि जब 5वीं शताब्दी में आर्यभट्ट ने शून्य का आविष्कार किया तो रामायण,महाभारत इसके बाद ही लिखी गयी है!
और यदि इसके सैकड़ों साल पहले अगर लिखी गयी है तो सिद्ध किया जाय कि आर्य भट्ट ने शून्य का आविष्कार नहीं किया था!

मित्रो यह प्रश्न एक वाणिज्य के प्रोफेसर अनिल कुमार यादव जी ने भी किया है!

दरअसल मित्रो सोशल मीडिया में लोग ज्ञान वर्धन नहीं करते हैं!
सिर्फ मनोरंजन करते हैं और हिन्दू धर्म को हेय नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं!

आरक्षण से नौकरी प्राप्त और विदेशी सुवरो ने ही इस विवाद को जन्म दिया है!

मुख्य विवाद शून्य और दस की संख्या का है!

विश्व मे कहीं भी पहले मन मे भाव आये भाव से शब्द बने!
अंक तो गणना के लिए बाद में प्रतीकों के रूप में आये!
जिस समय जितनी समझ थी उसी प्रकार प्रतीक बनाकर उसे ही अंक मानकर गणना किया गया!

भारत की संस्कृत सबसे प्राचीन भाषा है!

संस्कृत में गणना के मूल शब्द शुन्यम,एकः एका एकम,द्वौ दवे,त्रयः त्रीणि ,चत्वारः, पंच, षष्ठ,सप्त,अष्ट,नव,दस,शत, ये सब प्रारम्भ से रहे हैं!

ऋग्वेद में पुरुष सूक्त में सहस्र सिर,सहस्र आंख,सहस्र पैर,दस अंगुल शब्द लिखे हैं!
यजुर्वेद से निकले ईश उपनिषद में सौ वर्ष जीने की बात लिखी है!

अथर्ववेद में सौ शरद जीना लिखा है!

पाणिनि ने अष्टअध्यायी में अंकों के शब्द रूपों का सूत्र भी लिखा है!

ये सब आर्यभट्ट से बहुत पहले हुए हैं!
इसका मतलब भारत मे गणना के अंक शब्दों में थे बाद में अलग अलग समय पर इन शब्दों के लिए प्रतीकों से गणना किया गया!

तो जब शब्द थे तो रावण के दस सिर व कौरव के सौ पुत्र निश्चित रूप से गिने गए होंगे और रामायण महाभारत आर्य भट्ट से बहुत पहले लिखा गया होगा!

हाँ उस समय शून्य अंक रूप में नहीं रहा होगा!

पर यह शून्य आर्य भट्ट से पहले भी था!

शून्य दार्शनिक विचारों में हर समय रहा है शून्य का मतलब ब्रह्म होता है!

आर्य भट्ट से पहले नागार्जुन का शून्यवाद आ चुका था!

आर्य भट्ट ने शून्य का आविष्कार नहीं शून्य पर आधारित दाशमिक प्रणाली दिया था!

एक बात और जान लीजिये कि पाश्चात्य चिंतन के दर्शन में पृथ्वी,जल,अग्नि वायु,ये चार ही मूल तत्व है!

यही चार्वाक दर्शन में भी है लेकिन भारतीय वैदिक दर्शन में इनके अलावा पांचवा तत्व आकाश है!
यही शून्य है मतलब नथिंग!

कुछ भी नहीं!

शून्य को आत्मसात करने के लिए हमें ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में जाना होगा जब कुछ भी नहीं था तो क्या था अर्थात सृष्टि का जन्म एवं आरंभ!

नासदीय सूक्त,ऋग्वेद,दसम मण्डल,सूक्त संख्या 129

नासदासीन्नो सदासात्तदानीं नासीद्रजो नोव्योमा परोयत्।
किमावरीवः कुहकस्य शर्मन्नंभः किमासीद् गहनंगभीरम् ॥१॥

अन्वय- तदानीम् असत् न आसीत् सत् नो आसीत्; रजः न आसीत्; व्योम नोयत् परः अवरीवः, कुह कस्य शर्मन् गहनं गभीरम्।

अर्थ- उस समय अर्थात सृष्टि की उत्पत्ति से पहले प्रलय दशा में असत् अर्थात् अभावात्मक तत्त्व नहीं था!
सत्= भाव तत्त्व भी नहीं था रजः=स्वर्गलोक मृत्युलोक और पाताल लोक नहीं थे!
अन्तरिक्ष नहीं था और उससे परे जो कुछ है वह भी नहीं था, वह आवरण करने वाला तत्त्व कहाँ था और किसके संरक्षण में था!
उस समय गहन= कठिनाई से प्रवेश करने योग्य गहरा क्या था, अर्थात् वे सब नहीं थे!

न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।
अनीद वातं स्वधया तदेकं तस्मादधान्यन्न पर किं च नास ॥२॥

अन्वय-तर्हि मृत्युः नासीत् न अमृतम्, रात्र्याः अह्नः प्रकेतः नासीत् तत् अनीत अवातम, स्वधया एकम् ह तस्मात् अन्यत् किञ्चन न आस न परः।

अर्थ – उस प्रलय कालिक समय में मृत्यु नहीं थी और अमृत = मृत्यु का अभाव भी नहीं था!
रात्री और दिन का ज्ञान भी नहीं था उस समय वह ब्रह्म तत्व ही केवल प्राण युक्त,क्रिया से शून्य और माया के साथ जुड़ा हुआ एक रूप में विद्यमान थ!
उस माया सहित ब्रह्म से कुछ भी नहीं था और उस से परे भी कुछ नहीं था!

तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥३॥

अन्वय -अग्रे तमसा गूढम् तमः आसीत्, अप्रकेतम् इदम् सर्वम् सलिलम्, आःयत्आभु तुच्छेन अपिहितम आसीत् तत् एकम् तपस महिना अजायत।

अर्थ- सृष्टि के उत्पन्न होने से पहले अर्थात् प्रलय अवस्था में यह जगत अन्धकार से आच्छादित था और यह जगत् तमस रूप मूल कारण में विद्यमान था!
अज्ञात यह सम्पूर्ण जगत् सलिल=जल रूप में था अर्थात् उस समय कार्य और कारण दोंनों मिले हुए थे यह जगत् है वह व्यापक एवं निम्न स्तरीय अभाव रूप अज्ञान से आच्छादित था इसीलिए कारण के साथ कार्य एकरूप होकर यह जगत् ईश्वर के संकल्प और तप की महिमा से उत्पन्न हुआ!

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥

अन्वय-अग्रे तत् कामः समवर्तत;यत्मनसःअधिप्रथमं रेतःआसीत्, सतः बन्धुं कवयःमनीषाहृदि प्रतीष्या असति निरविन्दन

अर्थ – सृष्टि की उत्पत्ति होने के समय सब से पहले काम=अर्थात् सृष्टि रचना करने की इच्छा शक्ति उत्पन्न हुयी जो परमेश्वर के मन मे सबसे पहला बीज रूप कारण हुआ!
भौतिक रूप से विद्यमान जगत् के बन्धन-कामरूप कारण को क्रान्तदर्शी ऋषियो ने अपने ज्ञान द्वारा भाव से विलक्षण अभाव मे खोज डाला!

तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त्।
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥५॥

अन्वय-एषाम् रश्मिःविततः तिरश्चीन अधःस्वित् आसीत्, उपरिस्वित् आसीत्रेतोधाः आसन् महिमानःआसन् स्वधाअवस्तात प्रयति पुरस्तात्।

अर्थ- पूर्वोक्त मन्त्रों में नासदासीत् कामस्तदग्रे मनसारेतः में अविद्या, काम-सङ्कल्प और सृष्टि बीज-कारण को सूर्य-किरणों के समान बहुत व्यापकता उनमें विद्यमान थी यह सबसे पहले तिरछा था या मध्य में या अन्त में?
क्या वह तत्त्व नीचे विद्यमान था या ऊपर विद्यमान था?
वह सर्वत्र समान भाव से भाव उत्पन्न था इस प्रकार इस उत्पन्न जगत् में कुछ पदार्थ बीज रूप कर्म को धारण करने वाले जीव रूप में थे और कुछ तत्त्व आकाशादि महान रूप में प्रकृति रूप थे!
स्वधा=भोग्य पदार्थ निम्नस्तर के होते हैं और भोक्ता पदार्थ उत्कृष्टता से परिपूर्ण होते हैं!

को आद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥६॥

अन्वय-कः अद्धा वेद कः इह प्रवोचत् इयं विसृष्टिः कुतः कुतः आजाता, देवा अस्य विसर्जन अर्वाक् अथ कः वेद यतः आ बभूव।

अर्थ - कौन इस बात को वास्तविक रूप से जानता है और कौन इस लोक में सृष्टि के उत्पन्न होने के विवरण को बता सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि किस उपादान कारण से और किस निमित्त कारण से सब ओर से उत्पन्न हुयी!
देवता भी इस विविध प्रकार की सृष्टि उत्पन्न होने से बाद के हैं अतः ये देवगण भी अपने से पहले की बात के विषय में नहीं बता सकते इसलिए कौन मनुष्य जानता है जिस कारण यह सारा संसार उत्पन्न हुआ!

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥७॥

अन्वय- इयं विसृष्टिः यतः आबभूव यदि वा दधे यदि वा न। अस्य यः अध्यक्ष परमे व्यामन् अंग सा वेद यदि न वेद।

अर्थ – यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुयी इस का मुख्या कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना!
इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है!
हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उस के अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।

तो जो यह आर्य भट्ट के शून्य की बात है!
यह भारतीय शून्य का व्यावहारिक प्रयोग है मतलब एक शक्ति भारत मे थी जो दाहिनी ओर आ जाये तो शक्ति दस गुनी हो जाएगी बाई ओर चली जाय तो निशक्त की स्थिति!

इसी ब्रह्म रूप को गोलाकार शून्य प्रतीक में लाया गया और इस प्रकार भारतीय आर्यभट्ट नामक ब्राह्मण ने विश्व व्याप्त विभिन्न गणना के प्रतीकों को समाप्त कर एक कर दिया!

वेदान्त ने बताया कि सबमे आत्मा एक ही है!

अगर हम शब्दों की बात करें तो आर्य भट्ट से बहुत पहले कपिल मुनि ने सांख्य में 25 तत्व बता दिया था!
इसका मतलब अंकों का शब्द ज्ञान यहां शुरू से ही था तो किसी के सरों की गणना व्यक्तियों की गणना क्यों नहीं हो सकती थी?

अब कुछ उदारण प्रस्तुत करता हूँ-

पश्येम शरदः शतम् ।।1।।
जीवेम शरदः शतम् ।।2।।
बुध्येम शरदः शतम् ।।3।।
रोहेम शरदः शतम् ।।4।।
पूषेम शरदः शतम् ।।5।।
भवेम शरदः शतम् ।।6।।
भूयेम शरदः शतम् ।।7।।
भूयसीः शरदः शतात् ।।8।।

(अथर्ववेद, काण्ड 19, सूक्त 67)

जिसका अर्थ समझना कदाचित सरल है –

1.हम सौ शरदों तक देखें यानी सौ वर्षों तक हमारे आंखों की ज्योति स्पष्ट बनी रहे!
2.सौ वर्षों तक हम जीवित रहें!
3.सौ वर्षों तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे हम ज्ञानवान् बने रहे!
4.सौ वर्षों तक हम वृद्धि करते रहें, हमारी उन्नति होती रहे!
5.सौ वर्षों तक हम पुष्टि प्राप्त करते रहें, हमें पोषण मिलता रहे!
6.हम सौ वर्षों तक बने रहें (वस्तुतः दूसरे मंत्र की पुनरावृत्ति!)
7.सौ वर्षों तक हम पवित्र बने रहें कुत्सित भावनाओं से मुक्त रहें!
8.सौ वर्षों से भी आगे ये सब कल्याणमय बातें होती रहें!

मित्रो ईश उपनिषद यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय का उपनिषद है जो उपनिषदों में प्रथम स्थान रखता है!

इसमें दूसरे श्लोक में लिखा है-

यहाँ इस जगत् में सौ वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा करनी चाहिए!

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत्ँ समा:।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥2॥[

ऋग्वेद,दशम मण्डल,90सूक्त

पुरुष सूक्त,पहला मंत्र।

सहस्त्रशीर्षा पुरुष:सहस्राक्ष:सहस्रपात् |
स भूमि सर्वत: स्पृत्वाSत्यतिष्ठद्द्शाङ्गुलम् ||१||

अर्थात - जो सहस्रों सिरवाले,सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरणवाले विराट पुरुष हैं वे सारे ब्रह्मांड को आवृत करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं ||1||

ज्योतिष शास्त्र की पुस्तक मुहूर्त चिंतामणि में ही एक जगह नक्षत्रों में ताराओं की संख्या बताते हुए एक श्लोक है!(नक्षत्र प्रकरण, श्लोक-58)

त्रित्र्यङ्गपञ्चाग्निकुवेदवह्नयः शरेषुनेत्राश्विशरेन्दुभूकृताः |
वेदाग्निरुद्राश्वियमाग्निवह्नयोSब्धयः शतंद्विरदाः भतारकाः ||

अन्वय - त्रि (3) + त्रय(3) + अङ्ग(6) + पञ्च(5) +अग्नि(3) + कु(1) + वेद(4) + वह्नय(3); शर(5) + ईषु(5) + नेत्र(2) + अश्वि(2) + शर(5) + इन्दु(1) + भू(1) + कृताः(4)

वेद(4) + अग्नि(3) + रुद्र(11) + अश्वि(2) + यम(2) + अग्नि(3) + वह्नि(3); अब्धयः(4) + शतं(100) + द्वि(2) + द्वि(2) + रदाः(32) + भ + तारकाः ||

यहाँ थोड़ी संस्कृत बता दूं भतारकाः का अर्थ है भ (नक्षत्रों) के तारे!

तो यदि नक्षत्रों में तारे अश्विनी नक्षत्र से गिनें तो इतने तारे प्रत्येक नक्षत्र में होते हैं!

सन् 498 ई० में भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलवेत्ता आर्यभट्ट ने आर्यभटीय सङ्ख्यास्थाननिरूपणम् में कहा है-

एकं च दश च शतं च सहस्रं तु अयुतनियुते तथा प्रयुतम् ।
कोट्यर्बुदं च वृन्दं स्थानात्स्थानं दशगुणं स्यात् ॥ २ ॥

अर्थात-"एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, कोटि, अर्बुद तथा बृन्द में प्रत्येक पिछले स्थान वाले से अगले स्थान वाला दस गुना है!

तो मित्रो उक्त खण्डन से स्पष्ट होता है कि यह जो अनर्गल विवाद उछाला गया है वह मूर्खों के प्रलाप के अतिरिक्त कुछ नहीं है!

इन मूर्खों के विषय मे पहले ही महाराज भर्तृहरि ने लिख दिया था कि इन्हें ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते!

जय श्री राम

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

राहु काल

राहु काल



राहु काल के समय में किसी नये काम को शुरु नहीं किया जाता है परन्तु  जो काम इस समय से पहले शुरु हो चुका है उसे राहु-काल के समय में बीच में नहीं छोडा जाता है. कोई व्यक्ति अगर किसी शुभ काम को इस समय में करता है तो यह माना जाता है की उस व्यक्ति को किये गये काम का शुभ फल नहीं मिलता है. उस व्यक्ति की मनोकामना पूरी नहीं होगी. अशुभ कामों के लिये इस समय का विचार नहीं किया जाता है. उन्हें दिन के किसी भी समय किया जा सकता है.

दिनराहु कालसोमवारसुबह 7:30 बजे से सुबह 9:00 बजे तकमंगलवारदोपहर 3:00 बजे से शाम 4:30 बजे तकबुधवारदोपहर 12:00 बजे से दोपहर 1:30 बजे तकबृ्ह्स्पतिवारदोपहर 1:30 बजे से दोपहर 3:00 बजे तकशुक्रवारसुबह 10:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तकशनिवारसुबह 9:00 बजे से सुबह 10:30 बजे तकरविवारशाम 4:30 बजे से शाम 6:00 बजे तक

विभिन्न वारों(Weekdays) में किए जाने वाले कार्य –-

विभिन्न वारों(Weekdays) में किए जाने वाले कार्य –



सप्ताह में सात वार होते हैं और सभी का अपना महत्व होता है. आप जब भी कोई नया कार्य आरंभ करें तब एक बार इन वारों में किए जाने वाले कार्यों पर एक निगाह अवश्य डालें ताकि जिस वार में जो काम शुभ होता है, आप उसे उसी वार विशेष से आरंभ कर सकें जिससे कार्य में सफलता प्राप्त हो. आइए जाने कि कौन सा कार्य किस वार से आरंभ करना चाहिए.

 

रविवार से आरंभ होने वाले कार्य – Tasks, Begins From Sunday  

यदि किसी का राज्याभिषेक करना हो या कोई पद ग्रहण करना हो अथवा शपथग्रहण ही क्यूँ ना करनी हो तब वह रविवार के दिन करनी चाहिए. सभी तरह से मंगल कार्य, सेवाकर्म अथवा यात्रा भी इस दिन आरंभ कर सकते हैं. अस्त्र-शस्त्र चलाना आरंभ करना भी इस दिन से ही किया जाना चाहिए. औषधिकर्म भी इसी दिन शुभ माना गया है. युद्ध संबंधी कार्य भी इसी दिन आरंभ करना शुभ माना गया है. अन्न-धान्यादि कार्य भी इसी दिन आरंभ करने चाहिए.

 

सोमवार से आरंभ होने वाले कार्य – Tasks, Begins From Monday  

जल संबंधी कार्यों को सोमवार से आरंभ करना चाहिए जैसे – बर्फ जमाने का व्यवसाय आरंभ करना, फ्रिज खरीदकर उसे चालू करना, सिंचाई का काम, नल लगवाना अथवा कुंए बनवाना आदि कार्य इस दिन से आरंभ करने चाहिए. शंख तथा मोती आदि का काम भी इस दिन आरंभ करना शुभ होगा. पेड़ो से संबंधित काम भी सोमवार से ही आरंभ करने चाहिए. गुड़ अथवा शक्कर आदि से जुड़े काम का आरंभ भी इस दिन से करना शुभ होगा. वस्त्र तथा आभूषणों का काम, फूलों का काम, गीत-संगीत आदि का काम भी इस दिन शुरु करना चाहिए. यज्ञ आदि का आरंभ भी इस दिन से किया जाना चाहिए. दूध से संबंधित कामों को भी इस दिन से आरंभ करना चाहिए. किसानों को कृषि संबंधी कोई भी नया काम सोमवार से आरंभ करना चाहिए.

 

मंगलवार से आरंभ होने वाले कार्य – Tasks, Begins From Tuesday  

विष का उपयोग यदि करना है तो मंगलवार से करना चाहिए. यहां विष का प्रयोग नकारात्मक ना लेकर सकारात्मक लेना चाहिए जैसे कि विष से कई प्रकार की औषधियाँ अथवा अन्य शुभ काम किए जाते हैं. अग्नि से जुड़े कामों को भी इस दिन से आरंभ करना चाहिए. किसी से झगड़ा करना हो या संधि करनी हो तब उसके लिए यही दिन उपयुक्त माना गया है. युद्ध तथा अस्त्र-शस्त्र से संबंधित कामों का आरंभ भी इसी दिन से करना अच्छा होगा.

 

बुधवार से आरंभ होने वाले कार्य – Tasks, Begins From Wednesday  

नृत्य से जुड़े काम अथवा नृत्य सीखना भी इसी दिन से आरंभ करना चाहिए. शिल्पकर्म, गायन, कला संबंधी काम इस दिन आरंभ करना शुभ होता है. लेखन से जुड़े काम तथा चित्रकला आदि से संबंधित काम बुधवार से आरंभ करना शुभ होता है. धरती से संबंधित काम भी इसी दिन से करना शुभ होता है. धरती से मिले रसों का संग्रह करना भी इस दिन आरंभ करना चाहिए. विवाह आदि के लिए भी यह दिन शुभ माना गया है यदि इस दिन वर-वधू की कुंडली अनुसार कोई शुभ मुहूर्त भी निकल रहा हो. धातुकर्म, युद्ध आदि भी इस दिन शुभ माने गए हैं.

 

बृहस्पतिवार से आरंभ होने वाले कार्य – Tasks, Begins From Thursday  

बृहस्पतिवार को धार्मिक कार्यों के लिए शुभ माना गया है इसलिए इस दिन से यज्ञकार्य आरंभ करने चाहिए. पौष्टिकता से भरे कर्म भी इसी दिन से करना शुभ होता है. मांगलिक कार्य, सोने के आभूषण तथा वस्त्र-भूषा आदि के कार्य भी इसी दिन से शुभ होते हैं करने. गुल्मलता वनस्पति तथा वृक्षकार्य भी इसी दिन से आरंभ करना शुभ होता है.

 

शुक्रवार से आरंभ होने वाले कार्य – Tasks, Begins From Friday  

शुक्र को कला का कारक माना गया है इसलिए कला संबंधी सभी कार्य जैसे – नृत्य, गायन, वादन, चित्रकारी, मेहंदी रचाना आदि कार्यों का आरंभ इस दिन से करना शुभ होता है. स्वर्ण तथा रजतादि का संग्रह भी इस दिन से किया जाना शुभ है. स्त्रियों से संबंधित फैंसी काम जैसे फैंसी कपड़े तथा फैंसी मेहंदी लगाना आदि काम भी इसी दिन शुरु किया जाना चाहिए. रत्नों को धारण भी इसी दिन से करना चाहिए. आभूषणों का निर्माण करना तथा उन्हें धारण करना इसी दिन से शुरु करना चाहिए. दुकानदारी चलाने का काम भी इस दिन से किया जाना चाहिए. किसी भी तरह का उत्सव हो, उसका आरंभ भी इसी दिन से किया जाना चाहिए.

 

शनिवार से आरंभ होने वाले कार्य – Tasks, Begins From Saturday  

इस दिन से रांगा, सीसा तथा लोहे आदि से संबंधित कार्यों का आरंभ किया जाना चाहिए. पत्थर, अस्त्र-शस्त्र आदि से जुड़े कार्य भी इसी दिन आरंभ करने चाहिए. विषकर्म, स्थिर कार्य तथा वास्तु संबंधी कार्य भी शनिवार को करना शुभ रहता है.  

 

वारों का प्रभाव – Effects of Weekdays

सभी सात वारों का प्रभाव भी भिन्न माना गया है जो निम्नलिखित है :-  

रविवार को स्थिरता प्रदान करने वाला कहा गया है.


सोमवार को चंद्रवार भी कहा जाता है और चंद्रमा चर स्वभाव का होता है.


मंगलवार को क्रूर कहा गया है.


बुधवार को सर्वगुणसंपन्न कहा गया है. बुध को शुद्ध भी कहते हैं इसलिए कोई भी काम इस दिन आरंभ कर सकते हैं.


बृहस्पतिवार को लघु प्रभाव देने वाला कहा गया है.


शुक्रवार को मृदु प्रभाव देने वाला माना गया है.


शनिवार को तीक्ष्ण प्रभाव देने वाला कहा गया है.


 

विशेष – Special Conclusion

वैसे तो सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार तथा शुक्रवार सभी को शुभ माना गया है और सभी तरह के शुभ कर्मों के लिए ये चारों दिन शुभ होते हैं. लेकिन क्रूर कार्यों के लिए मंगलवार तथा शनिवार को अच्छा माना गया है इसलिए किसी भी क्रूर कार्य का आरंभ इन दोनों वारों में से किसी एक में करना चाहिए. यहाँ रविवार का जिक्र नहीं किया गया है क्योंकि रविवार को शुभ तथा क्रूर दोनों ही कार्यों के लिए मध्यम माना गया है.

 

ग्रहों के रंग अनुसार कार्य – Tasks According to Color of The Planets

सूर्य को रक्त वर्ण का माना गया है, चंद्रमा को गौरवर्ण का माना गया है, मंगल को लोहित वर्ण का माना गया है, बुध को दूब जैसे हरे रंग का माना गया है, गुरु का पीत वर्ण, शुक्र का श्वेत रंग तथा शनि को कृष्ण रंग का माना गया है इसलिए रंग संबंधी कार्य करना हो या रंगीन वस्तुओं का उपयोग करना हो, ये उनके वारों के अनुसार ही करना चाहिए.

शून्य तिथियाँ

शून्य तिथियाँ
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सूर्य और चन्द्रमा के बीच जब 12 डिग्री का अंतर होता है तब एक तिथि बनती है.  अमावस्या के बाद जब चन्द्रमा सूर्य से 12 अंश दूर पहुंचता है तो प्रतिपदा समाप्त होती है. इस प्रकार 30 तिथियों का निर्माण होता है और इस तरह से एक चन्द्र मास बनता है. हिन्दु ज्योतिष में एक चन्द्र मास को दो पक्षों में बांटा गया है.  शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष. एक पक्ष में 15 तिथियाँ होती है. प्रतिपदा से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष होता है. फिर प्रतिपदा से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष.

कई बार कुण्डली में ग्रहों की स्थिति और योग बहुत बली होते हैं परन्तु फिर भी शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती. इस दोष का कारण कई बार “तिथि शून्य” भी हो सकता है. इस दोष का उल्लेख द्रिक गणित पंचांग में मिलता है जो दक्षिण भारत में प्रचलित है.

शून्य तिथि दोष में एक तिथि दो राशियों को शून्य करती है. चतुर्दशी तिथि में चार राशियाँ शून्य होती हैं. लेकिन पूर्णिमा और अमावस्या किसी भी राशि को शून्य नहीं करती. जब हम शून्य तिथि की गणना करते हैं तो उसमें शुक्ल या कृष्ण पक्ष का विचार नहीं करते.

शून्य राशियों के स्वामी कई बार नैसर्गिक शुभ या तात्कालिक शुभ होने पर भी शुभ फलों में कमी लाते हैं. कई बार शून्य राशियों में स्थित शुभ भावों के स्वामी भी अपने शुभ फल देने में असमर्थ हो जाते हैं. परन्तु पाप भावों के स्वामी शून्य राशि में अगर स्थित हैं तो अपनी दशा/अन्तर्दशा में शुभ फल देने में सक्षम हो सकते हैं. शून्य ग्रह यदि वक्री ना हो तो तृतीय, षष्ठ, अष्टम व द्वादश भावों या अशुभ राशियों में गोचर के समय शुभ फल देते हैं.   

(1) प्रतिपदा व द्वादशी तिथि में तुला और मकर राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.

(2) द्वितीया व एकादशी तिथि में धनु और मीन राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.

(3) तृतीया तिथि में सिंह और मकर राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.

(4) चतुर्थी तिथि में वृ्ष और कुंभ राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.

(5) पंचमी व अष्टमी तिथि में मिथुन और कन्या राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.

(6) षष्ठी तिथि में मेष और सिंह राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.

(7) सप्तमी तिथि में कर्क और धनु राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.

(8) नवमी व दशमी तिथि में सिंह और वृ्श्चिक राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.

(9) त्रयोदशी तिथि में वृ्ष और सिंह राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.

(10) चतुर्दशी तिथि में मिथुन, कन्या, धनु और मीन राशियाँ शून्य मानी जाती हैं.                                                 

युगादि तिथियां

           युगादि तिथियाँ

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जो तिथियाँ चार युगों सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और सतयुग के प्रारम्भ के समय चल रही थी उनको युगादि तिथियाँ कहते हैं. सतयुग के प्रारम्भ का समय कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी है, त्रेतायुग के प्रारम्भ का समय वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया है, द्वापरयुग के प्रारम्भ का समय माघ माह की अमावस्या है और कलियुग के प्रारम्भ का समय भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी है, जो युगादि तिथियाँ कहलाती है.

प्रत्येक प्रलय के बाद जिस तिथि को पुनः सृष्टि का प्रारम्भ हुआ था वह तिथियाँ मन्वादि तिथियाँ कहलाती हैं. विभिन्न मनुओं के नाम और मन्वादि तिथियाँ निम्नलिखित हैं :-

मनु का नाममन्वन्तर के प्रारम्भ की तिथियाँस्वायम्भुवचैत्रशुक्ल की तृतीयास्वारोचिषचैत्र पूर्णिमाऔत्तम, उत्तमकार्तिक पूर्णिमातामसकार्तिक शुक्ल द्वादशीरैवतआषाढ़ शुक्ल द्वादशीचाक्षुषआषाढ़ शुक्ल पूर्णिमावैवस्वतज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमासावर्णिफाल्गुन शुक्ल पूर्णिमादक्षसावर्णिआश्विन शुक्ल नवमीब्रह्मसावर्णिमाघ शुक्ल सप्तमीधर्मसावर्णिपौष शुक्ल त्रयोदशीरूद्रसावर्णिभाद्रपद शुक्ल तृतीयादेवसावर्णिश्रावण माह की अमावस्याइंद्रसावर्णि  श्रावण कृष्ण पक्ष की अष्टमी

 

वर्तमान समय में हम वैवस्वत मन्वन्तर में चल रहे हैं. ऊपर दी गई सभी युगादि और मन्वादी तिथियों को उपनयन, शिक्षा प्रारम्भ, विवाह, गृह निर्माण तथा गृहप्रवेश और यात्रा आदि के मुहूर्त में त्याग देना चाहिए. इन तिथियों में पवित्र नदियों में स्नान करना, दान देना तथा हवन करना आदि श्रेष्ठ कार्य शुभ माने गए हैं.  

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तिथियों का स्वभाव – Hindu Tithis


हिन्दू तिथियों का अपना एक स्वभाव भी माना जाता है. चाहे कृष्ण पक्ष हो या शुक्ल पक्ष, यहां दोनों पक्षों की तिथियों की बात कही गई है.

  • प्रतिपदा को वृद्धिप्रदा अर्थात वृद्धि करने वाली या उत्थान करने वाली तिथि कहा जाता है.
  • द्वित्तीया तिथि को मंगलप्रदा या शुभ घटनाएं देने वाली कहा गया है.
  • तृतीया तिथि को बलप्रदा या शक्ति देने वाली तिथि कहा गया है.
  • चतुर्थी तिथि को खल कहा गया है जो की शुभ नहीं है.
  • पंचमी तिथि लक्ष्मीप्रदा या संपत्ति देने वाली कही गई है.
  • षष्टी तिथि यशप्रदा अथवा प्रसिद्धि देने वाली कही गई है.
  • सप्तमी तिथि को मित्र कहा गया है.
  • अष्टमी तिथि द्वंद्व अथवा विरोध देने वाली कही गई है.
  • नवमी तिथि को उग्र अथवा उत्तेजना देने वाली कहा गया है.
  • दशमी तिथि सौम्य अर्थात शांत कही गई है.
  • एकादशी तिथि आनन्दप्रदा अथवा सुख देने वाली तिथि मानी गई है.
  • द्वादशी तिथि यशप्रदा अथवा प्रसिद्धि देने वाली तिथि कही गई है.
  • त्रयोदशी तिथि जयप्रदा अर्थात विजय देने वाली कही गई है.
  • चतुर्दशी तिथि को उग्र अर्थात उत्तेजना देने वाली तिथि कहा गया है.
  • पूर्णिमा तिथि सौम्य अर्थात शांत तिथि है.
  • अमावस्या तिथि पूर्वजों को दर्शाती है.
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तिथियों के स्वामी


प्रतिपदा तिथि से लेकर विभिन्न तिथियों के भिन्न-भिन्न स्वामी होते हैं. इन तिथियों का स्वाभाव भी भिन्न होता है. जिस तिथि का जो स्वामी होता है वह तिथि उस इष्ट की पूजा, प्राणप्रतिष्ठा आदि के लिए अनुकूल होती है.                                      

तिथि   स्वभावस्वामी
प्रतिपदावृद्धिप्रदायकअग्नि
द्वितीया                  शुभदा   ब्रह्मा
तृतीया                    बलप्रदायकगौरी
चतुर्थी                            खलागणेश
पंचमी                   लक्ष्मीप्रदा  नाग
षष्ठी             यशप्रदा अर्थात सिद्धि देने वाली  कार्तिकेय
सप्तमीमित्रवत, मित्रासूर्य
अष्टमी                   द्वंदवमयीशिव
नवमी           उग्र अर्थात आक्रामकता देने वालीदुर्गा
दशमी           सौम्य अर्थात शांतयम
एकादशी       आनन्दप्रदा अर्थात सुख देने वालीविश्वेदेव
द्वादशी                      यशप्रदाविष्णु
त्रयोदशी          जयप्रदा अर्थात विजय देने वालीकामदेव
चतुर्दशी         उग्र अर्थात आक्रामकता देने वालीशिव
पूर्णिमा                 सौम्याचन्द्रमा
अमावस्या                      पितर (पूर्वज)

 



      


इस हँसी का क्या रहस्य है?

इस हँसी का क्या रहस्य है?
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एक बार राजा भोज की पत्नी भोज को स्नान करा रही थी दोनों आनन्द का अनुभव कर रहे थे . भोज बार बार अपनी पत्नी से आग्रह करते कि पानी और डालो इस पर उनकी पत्नी जोर जोर से हंसने लगी . राजा ने पूछा कि तुम क्यों हंस रही हो इस पर उसने कहा कि ये बताने की बात नहीं है . लेकिन राजा अङ गया कि तुम्हें बताना होगा।

तब उसने कहा कि ये बात तुम्हें मैं नहीं मेरी बहन बतायेगी उल्लेखनीय है कि भोज की पत्नी उस ग्यान को जानती थी जिसमें पूर्वजन्म का ग्यान होता है।उसकी बहन भी इस ग्यान को जानती थी पर क्योंकि इस ग्यान का संसार के नातों से कोई सम्बन्ध नहीं होता इसलिये कितना भी सगा हो उसे ये ग्यान नहीं बताते . बताने पर ये ग्यान नियम विरुद्ध हो जाने से चला जाता है।

राजा भोज अपनी भारी जिग्यासा के चलते अपनी साली के घर पहुँचा वहाँ उस वक्त कोई कार्यक्रम चल रहा था ।

अतः राजा बात न पूछ सका फ़िर फ़ुरसत मिलते ही राजा ने वह प्रश्न अपनी साली से कर दिया तब उसने कहा कि तुम्हारी बहन ने कहा है कि बार बार पानी डालने की बात पर हंसने का रहस्य मेरी बहन बतायेगी..तब राजा की साली ने कहा कि आज आधी रात को बच्चे को जन्म देते ही मेरी मृत्यु हो जायेगी इसके अठारह साल बाद मेरे पुत्र जिसका आज जन्म होगा उसकी पत्नी तुम्हें ये राज बतायेगी।

राजा ने बहुत हठ किया पर इससे ज्यादा बताने से उसने इंकार कर दिया .ठीक वैसा ही हुआ पुत्र को जन्म देकर भोज की साली मर गयी..राजा ने अठारह साल तक बेसब्री से इंतजार किया और फ़िर वो दिन आ ही गया जब उस पुत्र का विवाह हुआ राजा उसी बात का इंतजार कर रहा था सो जैसे ही उसे वधू से मिलने का मौका मिला . उसने कहा मैं अठारह साल से इस समय का इंतजार कर रहा हूँ....और भोज ने पूरीबात बता दी।

वधू ने कहा कि पहले तो आप ये बात न ही पूछो तो बेहतर है और अगर पूछते ही हो तो मेरे पति से कभी इसका जिक्र न करना..अन्यथा वो पति धर्म से विमुख हो जायेगा और इससे विधान में खलल पङेगा..राजा मान गया।

तब उस वधू ने कहा कि आज जो मेरा पति है अठारह साल पहले इसे मैंने ही जन्म दिया था ...तुम्हारी पत्नी इस लिये हंस रही थी कि इससे पहले के जन्म में जब तुम उसके पुत्र थे वह तुम्हें बाल अवस्था में नहलाने के लिये पकङती थी तब तुम नहाने से बचने के लिये बार बार भागते थे।

और आज स्वयं तुम पानी डालने को कह रहे थे..इसलिये उस जन्म की बात याद कर वो हस रही थी ..उसने या मैंने उसी समय तुम्हें ये बात इसलिये नहीं बतायी कि वैसी अवस्था में तुम उसे पत्नी मानने के धर्म से विमुख हो सकते थे...यह बात सुनते ही राजा में गहरा वैराग्य जाग्रत हो गया।

यही प्रभु की अजीव लीला है।