सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

- श्री मद देवी भागवत पुराण -- कई मनुओ का वर्णन ; भगवती विन्ध्य वासिनी , तथा वेद माता गायत्री की कथा --

- श्री मद देवी भागवत पुराण --  कई  मनुओ  का वर्णन  ; भगवती  विन्ध्य वासिनी  ,  तथा वेद माता गायत्री  की कथा  --
   *************** प्रार्थना  ************
     भरा अमित दोषो से हूँ मैं श्रद्धा भक्ति भावना हीन।
                               साधन रहित कलुष-रत अविरत सन्तत चंचल चित्त मलीन ।।
     पर तू   है मैया ,मेरी वात्सल्यमयी  ,शुचि  स्नेहाधीन।
                               हूँ  कुपुत्र , पर पाकर तेरा ,स्नेह रहूँगा कैसे  दीन ?
    तू तो  दयामयी रखती है मुझको नित अपनी ही गोद ।
                              भूल इसे ,मैं मूर्ख मानता हूँ ,भव के भोगो में  मोद ।।
     इसी  हेतु  घेरे रह पाते ,पाप ताप , मुझको सविनोद ।
                              मैया यह आवरण  हटा लें ,बढ़े सर्वदा शुभ आमोद ।।
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             श्री मद देवी भागवत के दशम स्कन्ध में , स्वायम्भू मनु के चरित्र का वर्णन है । श्रष्टि के प्रारम्भ में श्री  ब्रम्हा   जी  ने  अपने मानस पुत्र के रूप में मनु को उत्पन्न किया -फिर  अपने मन से ही धर्मस्वरूपिणी शतरूपा को प्रकट कर उन्हें मनु  की पत्नी बनाया - मनु   ने  श्रष्टि उत्पन्न  करने के लिए शक्ति पाने के लिए वाग्भव मन्त्र से    महान भाग्यफल प्रदान करने वाली भगवती देवी की आराधना की -  देवी के प्रसन्न  होने पर   मनु ने   उनसे श्रष्टि के स्रजन में कोई विघ्न न आये  यह वर मांगा --व वाग्भव मन्त्र के साधकों को -- पूर्व जन्मों की स्मृति रहना  ,भाषण करने में प्रवीणता , ज्ञान -सिद्धि  , कर्मयोग- सिद्धि व सर्व पारिवारिक सुख उपलब्ध हो -- यह वर मांगा -
           भगवती विंध्यवासिनी के प्राकट्य के बारे में वर्णित है कि एक बार विंध्याचल  पर्वत अभिमानवश अचानक ऊंचा होने लगा जिससे सूर्य का मार्ग रुक गया या कहे कि पश्चिम दिशा में अंधकार छा गया तब देवताओ की स्तुति पर भगवती आद्द्या देवी के परम साधक  काशी में निवास कर रहे  , कुम्भ योनि  श्री अगस्त्य मुनि अपने तप रूपी विमान पर चढ़ कर आधे निमेष में ही  विंध्य  पर्वत के पास जा  पँहुचे ,-- विंध्य ने उन्हें शास्त्रांग प्रणाम किया तब मुनि अगस्त्य  ने   उससे ऐसे ही तब तक लेटे रहने को कहा जब तक वे वापस न आये -  विंध्य ने वचन दिया और फिर अगस्त्य जी ने पर्वत के दक्षिण में जाकर वही आश्रम बनाया और कभी वापस नही लौटे ,--
मुनि की प्रार्थना  पर विंध्य पर्वत पर जो देवी पधारी थी वे ही विंध्यवासिनी  नाम से प्रसिद्ध हुयी और मनु द्वारा पूजित हुई  -
           ****** मुनि  अगस्त्य   भगवती के    सिद्ध  साधक के साथ ही महान वैज्ञानिक भी थे - समुद्र को पी जाने  का करतब उन्ही का था -माने विशाल नौसेना  के जनक जिनके सम्मुख  समुद्र  कोई बाधक नही रहा था -- इसी प्रकार  उपर्युक्त विंध्य पर्वत कथा -- माने उन्होंने  पर्वत के दक्षिण में  आने जाने की बाधाओं को समाप्त करके सड़के आदि का निर्माण  कराया  होगा फिर दक्षिण  भारत  को राक्षसों से मुक्त करके ऋषियों के लिए निरापद बनाने के  लिए वे वही रुक गए ********
          फिर दशम अध्याय में , स्वायंभू , स्वरोचित , उत्तम ,तामस ,रैवत , चाकछुष आदि तमाम  मनुओं का वर्णन है -
      ग्यारहवे स्कन्ध में  सदाचार का वर्णन है - आचार दो प्रकार के होते है -- शास्त्रीय और लौकिक । शुभ की इच्छा रखने वाले को दोनों का पालन करना चाहिए -सत्पुरुषों को ग्राम धर्म , जाति धर्म , देश धर्म और कुलधर्म  सबका आदर करना चाहिए --दुराचारी  व्यक्ति संसार मे निंदा का पात्र समझा जाता है --जो अर्थ और काम  धर्म विरुद्ध हों उन्हें त्याग देना चाहये --

      गायत्री  माता की साधना ---सभी को त्रिकाल  सन्ध्या और गायत्री  मन्त्र का जाप करना चाहिए -वेदों और -छन्दों की माता , अक्षर ब्रम्हस्वरूपनी , वरदायिनि भगवती गायत्री महादेवी , जो सर्ववर्णा , सन्ध्या , विद्या , सरस्वती ,अजरा अमरा और सर्व देवी है उन्हें नमस्कार करना  चाहिए -विधिवत पूजन करके गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए । मन्त्र सभी जानते है
   --" ॐ  भूर्भुव: स्व: तत्सवितूर्वरेण्यम , भर्गो देवस्य धीमहि  ,धियो यो न:  प्रचोदयात ।।
        कामना सिद्धि  के लिए और उपद्र्व शान्ति के लिए गायत्री के विशेष प्रयोगों का भी वर्णन है

       श्री देवी भागवत का बारहवां स्कन्ध ---श्री नारद जी द्वारा भगवान नारायण से सदाचार के विषय मे पूछने पर वे बोले --" मुने अन्य कोई अनुष्ठान किया किया जाए या न किया जाए  ,किन्तु अगर द्विज केवल गायत्री का अनुष्ठान कर ले , तो वह कृतकृत्य हो जाता है --तीनो संध्याओं में भगवान सूर्य को अर्ध्य देना और गायत्री  का जाप करना आवश्यक है -प्रतिदिन 3000 जाप करने वाले पुरूष का देवता भी आदर करते है  - निष्कपट भाव से सच्चिदानन्द  स्वरूपणी भगवती गायत्री का ध्यान करके जप करना चाहये
           भगवान नारायण बोले -- गायत्री के 24 ऋषि है , 24 छंद है  ,24 अक्षरो के 24 देवता है  --और  24 ही शक्तियां है ,तथा 24 ही वर्ण है  , इनमे महान पापो का संहार करने की शक्ति है -इसके अलावा गायत्री कवच  का पाठ करके धारण करने पर मनुष्य सम्पूर्ण पापो से मुक्त हो जाता है और उसकी सारी कामनाये सिद्ध हो जाती है -इसकी कृपा से 64 प्रकार की कलाये सहज ही  प्राप्त हो जाती है  और वह मनुष्य  मुक्त हो जाता है
          इसके बाद  इस अध्याय में गायत्री  स्तोत्र और गायत्री सहस्त्र नाम का वर्णन है
    समस्त जड़ व चेतन्य प्राणियों व अखिल ब्रम्हाण्ड मे गति एवं ऊर्जा के रूप मे विद्यमान रहने वाली परा-शक्ति माँ गायत्री जो भगवान श्रीमन्नारायण की ही श्रीतेजस्वरूपा है उनके श्री चरण कमलों हम सहृदय प्रणाम करते हैं।

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सोमवार, 22 अक्टूबर 2018

वाल्मीकि तथा श्री राम जी का संवाद

सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता॥
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥2॥


भावार्थ:-हे रामजी! सुनिए, अब मैं वे स्थान बताता हूँ, जहाँ आप, सीताजी और लक्ष्मणजी समेत निवास कीजिए। जिनके कान समुद्र की भाँति आपकी सुंदर कथा रूपी अनेक सुंदर नदियों से-॥2॥

* भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गुह रूरे॥
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥3॥


भावार्थ:-निरंतर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे (तृप्त) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिए सुंदर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है, जो आपके दर्शन रूपी मेघ के लिए सदा लालायित रहते हैं,॥3॥

* निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥
तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥4॥


भावार्थ:-तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं और आपके सौंदर्य (रूपी मेघ) की एक बूँद जल से सुखी हो जाते हैं (अर्थात आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूप के किसी एक अंग की जरा सी भी झाँकी के सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत के अर्थात पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक के सौंदर्य का तिरस्कार करते हैं), हे रघुनाथजी! उन लोगों के हृदय रूपी सुखदायी भवनों में आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजी सहित निवास कीजिए॥4॥

दोहा :


* जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥128॥

भावार्थ:-आपके यश रूपी निर्मल मानसरोवर में जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुण समूह रूपी मोतियों को चुगती रहती है, हे रामजी! आप उसके हृदय में बसिए॥128॥

चौपाई :


* प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥1॥

भावार्थ:-जिसकी नासिका प्रभु (आप) के पवित्र और सुगंधित (पुष्पादि) सुंदर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती (सूँघती) है और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसाद रूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं,॥1॥

* सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥
कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा॥2॥


भावार्थ:-जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर बड़ी नम्रता के साथ प्रेम सहित झुक जाते हैं, जिनके हाथ नित्य श्री रामचन्द्रजी (आप) के चरणों की पूजा करते हैं और जिनके हृदय में श्री रामचन्द्रजी (आप) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं,॥2॥

* चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥3॥


भावार्थ:-तथा जिनके चरण श्री रामचन्द्रजी (आप) के तीर्थों में चलकर जाते हैं, हे रामजी! आप उनके मन में निवास कीजिए। जो नित्य आपके (राम नाम रूप) मंत्रराज को जपते हैं और परिवार (परिकर) सहित आपकी पूजा करते हैं॥3॥

* तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥4॥


भावार्थ:-जो अनेक प्रकार से तर्पण और हवन करते हैं तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर बहुत दान देते हैं तथा जो गुरु को हृदय में आपसे भी अधिक (बड़ा) जानकर सर्वभाव से सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं,॥4॥

दोहा :


* सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥129॥

भावार्थ:-और ये सब कर्म करके सबका एक मात्र यही फल माँगते हैं कि श्री रामचन्द्रजी के चरणों में हमारी प्रीति हो, उन लोगों के मन रूपी मंदिरों में सीताजी और रघुकुल को आनंदित करने वाले आप दोनों बसिए॥129॥

चौपाई :


* काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥1॥

भावार्थ:-जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह हैं, न लोभ है, न क्षोभ है, न राग है, न द्वेष है और न कपट, दम्भ और माया ही है- हे रघुराज! आप उनके हृदय में निवास कीजिए॥1॥

* सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥2॥


भावार्थ:-जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा (बड़ाई) और गाली (निंदा) समान है, जो विचारकर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते-सोते आपकी ही शरण हैं,॥2॥

* तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥3॥


भावार्थ:-और आपको छोड़कर जिनके दूसरे कोई गति (आश्रय) नहीं है, हे रामजी! आप उनके मन में बसिए। जो पराई स्त्री को जन्म देने वाली माता के समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है,॥3॥

* जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥
जिन्हहि राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥4॥


भावार्थ:-जो दूसरे की सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष रूप से दुःखी होते हैं और हे रामजी! जिन्हें आप प्राणों के समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहने योग्य शुभ भवन हैं॥4॥

दोहा :


* स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥130॥

भावार्थ:-हे तात! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में सीता सहित आप दोनों भाई निवास कीजिए॥130॥

चौपाई :


* अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥1॥

भावार्थ:-जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गो के लिए संकट सहते हैं, नीति-निपुणता में जिनकी जगत में मर्यादा है, उनका सुंदर मन आपका घर है॥1॥

* गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥
राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥2॥


भावार्थ:-जो गुणों को आपका और दोषों को अपना समझता है, जिसे सब प्रकार से आपका ही भरोसा है और राम भक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदय में आप सीता सहित निवास कीजिए॥2॥

* जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥3॥


भावार्थ:-जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देने वाला घर, सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदय में धारण किए रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदय में रहिए॥3॥

* सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥
करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥4॥


भावार्थ:-स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टि में समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ (सब जगह) केवल धनुष-बाण धारण किए आपको ही देखता है और जो कर्म से, वचन से और मन से आपका दास है, हे रामजी! आप उसके हृदय में डेरा कीजिए॥4॥

दोहा :


* जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥131॥

भावार्थ:-जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है॥131॥

चौपाई :


* एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए॥
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक॥1॥

भावार्थ:-इस प्रकार मुनि श्रेष्ठ वाल्मीकिजी ने श्री रामचन्द्रजी को घर दिखाए। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्री रामजी के मन को अच्छे लगे। फिर मुनि ने कहा- हे सूर्यकुल के स्वामी! सुनिए, अब मैं इस समय के लिए सुखदायक आश्रम कहता हूँ (निवास स्थान बतलाता हूँ)॥1॥

* चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥
सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू॥2॥


भावार्थ:-आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए, वहाँ आपके लिए सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुंदर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों का विहार स्थल है॥2॥

* नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तप बल आनी॥
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि॥3॥


भावार्थ:-वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणों ने प्रशंसा की है और जिसको अत्रि ऋषि की पत्नी अनसुयाजी अपने तपोबल से लाई थीं। वह गंगाजी की धारा है, उसका मंदाकिनी नाम है। वह सब पाप रूपी बालकों को खा डालने के लिए डाकिनी (डायन) रूप है॥3॥

* अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं॥
चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू॥4॥


भावार्थ:-अत्रि आदि बहुत से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीर को कसते हैं। हे रामजी! चलिए, सबके परिश्रम को सफल कीजिए और पर्वत श्रेष्ठ चित्रकूट को भी गौरव दीजिए॥4॥

हवन के माध्यम से बीमारियों की रोकथाम की जा सकती है

*✍🏻प्रश्न :- क्या हवन के माध्यम से बीमारियों की रोकथाम की जा सकती है ?*
*🙏🏻✅उत्तर :- हाँ ! हवन में विशेष प्रकार के पदार्थों की आहुति देने से कई प्रकार के रोग नष्ट होते हैं, इसे आधुनिक विज्ञान की भाषा में यज्ञ चिकित्सा कहते हैं।  विश्व के कई देशों में रोगों को दूर करने के लिए यज्ञ चिकित्सा का प्रचलन बढ़ रहा है।*
👉🏻कुछ रोगों के सन्दर्भ में नीचे दिए उपायों को पढ़ें –
✅ *टाइफाईड* – नीम, चिरायता, पितपापडा, त्रिफला सम्भाग शुद्ध गौ घृत मिश्रित आहुति दें
✅ *ज्वरनाशक* – अजवाइन की आहुति हवन में दें
*✅नजला, जुकाम, सिरदर्द* – मुनक्का की आहुति हवन में दें
✅ *नेत्रज्योति वर्धक* – शहद की आहुति हवन में दें
*✅मस्तिष्क बलवर्धक* – शहद व सफ़ेद चन्दन की आहुति दें
*✅वातरोग नाशक* – पिप्पली की आहुति दें
*✅मनोविकार नाशक* – गुग्गल और अपामार्ग की आहुति दें
*✅मानसिक उन्माद नाशक* – सीताफल के बीज एवं जटामासी चूर्ण की आहुति दें
*✅पीलिया नाशक* – देवदारु, चिरायत, नागरमोथा, कुटकी और वायविडग्ग की आहुति दें
*✅मधुमेह नाशक* – गुग्गल, लोभान, जामुन के वृक्ष की छाल और करेला के डंठल संभाग की आहुति दें
✅ *चित्त भ्रम नाशक* – कचूर, खस, नागरमोथा महुआ, सफ़ेद चन्दन, गुग्गल, अगर, बड़ी इलायची, नरवी और शहद की आहुति दें
✅ *क्षय नाशक(टी.बी)* – गुग्गल, सफ़ेद चन्दन, गिलोय बांसा का चूर्ण और कपूर की आहुति दें
*✅मलेरिया नाशक* – गुग्गल, लोभान, कपूर, कचूर, हल्दी, दारुहल्दी, अगर, वायविडग्ग, जटामासी, वच, देवदारु, कठु, अजवाइन, नीम पत्ते, समभागचूर्ण, की आहुति दें
✅ *सर्वरोग नाशिनी* – गुग्गल, वच, गंध, नीम पत्ते, आक पत्ते, अगर, राल, देवदारु, छिलका सहित मसूर की आहुति दें
✅ *जोड़ों का दर्द* – निर्गुन्डी के पत्ते, गुग्गल, सफ़ेद सरसों, नीम पत्ते और राल संभाग चूर्ण की आहुति दें
*✅निमोनिया नाशक* – पोहकर मूल, वच, लोभान, गुग्गल और अडूसा संभाग चूर्ण की आहुति दें
✅ *जुकाम नाशक* – खुरासानी अजवाइन, जटामासी, पशमीना कागज, लाल बूरा और संभाग चूर्ण की आहुति दें
*✅पीनस* – बरगद पत्ते, तुलसी पत्ते, नीम पत्ते, वायविडग्ग, सहजने की छाल संभाग चूर्ण में धूप का चूरा मिलाकर आहुति दें
*✅कफ नाशक* – बरगद पत्ते, तुलसी पत्ते, वच, पोहकर मूल, अडूसा पत्र सम्भाग चूर्ण की आहुति दें
✅ *सिर दर्द नाशक* – काले तिल और वायविडग्ग चूर्ण की आहुति दें
*✅चेचक, खसरा नाशक* – गुग्गल, लोभान, नीम पत्ते, गंधक, कपूर, काले तिल और वायविडग्ग चूर्ण की आहुति दें
*✅जिव्हा तालू रोग नाशक* – मुलहटी, देवदारु, गंधाविरोजा, राल, गुग्गल, पीपल, कुलंजन, कपूर और लोभान की आहुति दें
*✅कैंसर नाशक* – गूलर फूल, अशोक छाल, अर्जन छाल, लोध्र, माजूफल, दारुहल्दी, हल्दी, खोपरा, तिल, जौ चिकनी सुपारी, शतावर, काकजंघा, मोचरस, खस, मंजीष्ठ, अनारदाना, सफ़ेद चन्दन, लाल चन्दन, गंधा, विरोजा, नरवी, जामुन पत्ते, धाय के पत्ते सम्भाग चूर्ण में दस गुना शक्कर और एक गुना केसर से दिन में तीन बार हवन करें।।
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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

💚💚जय श्री सीताराम जी 💚💚 💝🔔💝🔔💝🔔💝🔔💝🔔 महिषासुर का वध °°°°°°°°°°°°°°°° जगदम्बा के श्रीअंगों की कांति उदयकाल के सहस्रों सूर्यों के समान है । वे लाल रंग की साड़ी पहने हुए हैं। उनके गले में मुण्डमाला शोभा पा रही है। उनके मस्तक पर चन्द्रमा के साथ ही रत्नमय मुकुट बँधा है। ऐसी देवी को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ । अपनी सेना का संहार होता देख महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण करके देवी के गणों को त्रास देना आरम्भ किया। किन्हीं को थूथन से मारकर, किन्हीं के ऊपर खुरों का प्रहार करके, कुछ को सींगों से विदीर्ण करके, किन्हीं को सिंहनाद से, कुछ को चक्कर देकर और कितनों को निःस्वास वायु के झोंके से धराशायी कर दिया। इससे जगदम्बा को बड़ा क्रोध हुआ । उधर महिषासुर भी क्रोध में भरकर धरती को खुरों से खोदने लगा तथा अपने सींगों से ऊंचे-ऊंचे पर्वतों को उठाकर फेंकने और गर्जने लगा ।उसकी पूंछ से टकराकर समुद्र सब ओर से धरती को डुबोने लगा, उसके सींगों के प्रहार से बादलों के टुकड़े-टुकड़े हो गये। इस प्रकार क्रोध में भरे हुए उस दैत्य को अपनी ओर आते देख चंडिका ने उसका वध करने के लिए महान क्रोध किया। उन्होंने पाश फेंक कर उस असुर को बाँध लिया। बँध जाने पर उसने भैंसे का रूप त्याग दिया और तत्काल सिंह के रूप में प्रकट हो गया। उस अवस्था में जगदम्बा ज्योंही उसका मस्तक काटने के लिए उद्यत हुईं, त्यों ही वह खड्गधारी पुरुष के रूप में दिखाई देने लगा। तब देवी ने तुरंत बाणों की वर्षा करके ढाल और तलवार के साथ उस पुरुष को भी बींध डाला। इतने में वह महान गजराज के रूप में परिणत हो गया तथा सूंड़ से देवी के विशाल सिंह को खींचने लगा। खींचते समय देवी ने तलवार से उसकी सूंड़ काट डाली। तब उस महादैत्य ने पुनः भैंसे का रूप धारण कर लिया और पहले की ही भाँति तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा। तब क्रोध में भरी हुई जगन्माता उत्तम मधु का पान करने और लाल आँखें करके हँसने लगीं। देवी ने कहा-- ओ मूढ़। मैं जब तक मधु पीती हूँ, तब तक तू क्षणभर के लिए खूब गर्ज ले। मेरे हाथ से यहीं तेरी मृत्यु हो जाने पर अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे। यों कहकर देवी उछलीं और उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गयीं। फिर अपने पैर से उसे दबाकर उन्होंने शूल से उसके कण्ठ में आघात किया। उनके पैर में दबा होने पर भी महिषासुर अपने मुख से दूसरे रूप में बाहर होने लगा। अभी आधे शरीर से ही वह बाहर निकल पाया था कि देवी ने उसे रोक दिया। आधा निकला होने पर भी वह महादैत्य देवी से युद्ध करने लगा। तब देवी ने बहु बड़ी तलवार से उसका मस्तक काट गिराया। फिर तो हाहाकार करती हुयी दैत्यों की सारी सेना भाग गयी तथा सम्पूर्ण देवता अत्यन्त प्रसन्न हो गये। देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ दुर्गादेवी का स्तवन किया। गन्धर्वराज गाने लगे तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। ---श्री हरिः शरणम्---

💚💚जय श्री सीताराम जी 💚💚
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              महिषासुर का वध
              °°°°°°°°°°°°°°°°

          जगदम्बा के श्रीअंगों की कांति उदयकाल के सहस्रों सूर्यों के समान है । वे लाल रंग की साड़ी पहने हुए हैं। उनके गले में मुण्डमाला शोभा पा रही है। उनके मस्तक पर चन्द्रमा के साथ ही रत्नमय मुकुट बँधा है। ऐसी देवी को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ ।
        अपनी सेना का संहार होता देख महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण करके देवी के गणों को त्रास देना आरम्भ किया। किन्हीं को थूथन से मारकर, किन्हीं के ऊपर खुरों का प्रहार करके, कुछ को सींगों से विदीर्ण करके, किन्हीं को सिंहनाद से, कुछ को चक्कर देकर और कितनों को निःस्वास वायु के झोंके से धराशायी कर दिया।
          इससे जगदम्बा को बड़ा क्रोध हुआ । उधर महिषासुर भी क्रोध में भरकर धरती को खुरों से खोदने लगा तथा अपने सींगों से ऊंचे-ऊंचे पर्वतों को उठाकर फेंकने और गर्जने लगा ।उसकी पूंछ से टकराकर समुद्र सब ओर से धरती को डुबोने लगा, उसके सींगों के प्रहार से बादलों के टुकड़े-टुकड़े हो गये। इस प्रकार क्रोध में भरे हुए उस दैत्य को अपनी ओर आते देख चंडिका ने उसका वध करने के लिए महान क्रोध किया। उन्होंने पाश फेंक कर उस असुर को बाँध लिया। बँध जाने पर उसने भैंसे का रूप त्याग दिया और तत्काल सिंह के रूप में प्रकट हो गया।
         उस अवस्था में जगदम्बा ज्योंही उसका मस्तक काटने के लिए उद्यत हुईं, त्यों ही वह खड्गधारी पुरुष के रूप में दिखाई देने लगा। तब देवी ने तुरंत बाणों की वर्षा करके ढाल और तलवार के साथ उस पुरुष को भी बींध डाला। इतने में वह महान गजराज के रूप में परिणत हो गया तथा सूंड़ से देवी के विशाल सिंह को खींचने लगा। खींचते समय देवी ने तलवार से उसकी सूंड़ काट डाली।
         तब उस महादैत्य ने पुनः भैंसे का रूप धारण कर लिया और पहले की ही भाँति तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा। तब क्रोध में भरी हुई जगन्माता उत्तम मधु का पान करने और लाल आँखें करके हँसने लगीं।
       देवी ने कहा-- ओ मूढ़। मैं जब तक मधु पीती हूँ,  तब तक तू क्षणभर के लिए खूब गर्ज ले। मेरे हाथ से यहीं तेरी मृत्यु हो जाने पर अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे।
        यों कहकर देवी उछलीं और उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गयीं। फिर अपने पैर से उसे दबाकर उन्होंने  शूल से उसके कण्ठ में आघात किया। उनके पैर में दबा होने पर भी महिषासुर अपने मुख से दूसरे रूप में बाहर होने लगा। अभी आधे शरीर से ही वह बाहर निकल पाया था कि देवी ने उसे रोक दिया। आधा निकला होने पर भी वह महादैत्य देवी से युद्ध करने लगा।
       तब देवी ने बहु बड़ी तलवार से उसका मस्तक काट गिराया। फिर तो हाहाकार करती हुयी दैत्यों की सारी सेना भाग गयी तथा सम्पूर्ण देवता अत्यन्त प्रसन्न हो गये।
         देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ दुर्गादेवी का स्तवन किया। गन्धर्वराज गाने लगे तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।
             ---श्री हरिः शरणम्---

दशहरा


विजयादशमी की पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान राम को जब आयोद्धा छोड़कर 14 वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा था और उसी वनवास काल के दौरान रावण ने सीता का हरण कर लिया था तब भगवान राम सीता माता को वापस लाने के लिए नौ देवियों की पूजा की थी और पूजा से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने श्री राम भगवान को वरदान दिया था और कई शक्तियां भी प्रदान की थी वरदान प्राप्त करने के बाद दसवें दिन भगवान श्री राम और रावण का युद्ध हुआ और इसी युद्ध में रावण का बध हुआ ।


      रावण की मृत्यु अष्टमी-नवमी के संधिकाल में हुई थी और उसका दाह संस्कार दशमी तिथि को हुआ। जिसका उत्सव दशमी दिन मनाया जाता है । इसीलिये इस त्यौहार को विजयदशमी के नाम भी से जाना जाता है।

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पूर्व कल्प में जब महिषासुर नामक राक्षस तपस्या कर रहा था तो उसकी तपस्या से खुश होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वरदान दिया था, वरदान प्राप्त करने के बाद महिषा सुर और ज्यादा हिंसक हो गया था उसने अपना आतंक इतना ज्यादा फैला रखा था की सारे देवतागण उसके भय के कारण देवीदुर्गा की आराधना करने लगे, ऐसा माना जाता है की देवी दुर्गा के निर्माण होने में देवताओं का सहयोग था महिषा सुर के आतंक से बचने के लिए देवताओं ने अपने अस्त्र शस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे तब जाकर देवी दुर्गा और शक्तिशाली हो गयी थी, इसके बाद महिषा सुर को समाप्त करने के लिए देवी दुर्गा ने  महिषा सुर के साथ पूरे 9 दिन युद्ध की थी और महिषा सुर का वध करने के बाद देवी दुर्गा महिषासुर मर्दिनी कहलाई. तभी से नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है।





दशहरा का त्यौहार सम्पूर्ण भारत में उत्साह और धार्मिक निष्ठा के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम ने राक्षस रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से छुड़ाया था। राम-रावण युद्ध नवरात्रों में हुआ था। रावण की मृत्यु अष्टमी-नवमी के संधिकाल में हुई थी और उसका दाह संस्कार दशमी तिथि को हुआ। जिसका उत्सव दशमी दिन मनाया, इसीलिये इस त्यौहार को विजयदशमी के नाम भी से जाना जाता है।


सम्पूर्ण भारत में यह त्यौहार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को बड़े ही उत्साह और धार्मिक निष्ठा के साथ मनाया जाता है।


रविवार, 14 अक्टूबर 2018

रोग नाशक देवी मन्त्र :

रोग नाशक देवी मन्त्र :
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“ॐ उं उमा-देवीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से मस्तक-शूल (headache) तथा मज्जा-तन्तुओं (Nerve Fibres) की समस्त विकृतियाँ दूर होती है – ‘पागल-पन’(Insanity, Frenzy, Psychosis, Derangement, Dementia, Eccentricity)तथा ‘हिस्टीरिया’ (hysteria) पर भी इसका प्रभाव पड़ता है ।


“ॐ यं यम-घण्टाभ्यां नमः”
इस मन्त्र से ‘नासिका’ (Nose) के विकार दूर होते हैं ।


“ॐ शां शांखिनीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से आँखों के विकार (Eyes disease) दूर होते हैं । सूर्योदय से पूर्व इस मन्त्र से अभिमन्त्रित रक्त-पुष्प से आँख झाड़ने से ‘फूला’ आदि विकार नष्ट होते हैं ।


“ॐ द्वां द्वार-वासिनीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से समस्त ‘कर्ण-विकार’ (Ear disease) दूर होते हैं ।


“ॐ चिं चित्र-घण्टाभ्यां नमः”
इस मन्त्र से ‘कण्ठमाला’ तथा कण्ठ-गत विकार दूर होते हैं ।


“ॐ सं सर्व-मंगलाभ्यां नमः”
इस मन्त्र से जिह्वा-विकार (tongue disorder) दूर होते हैं । तुतलाकर बोलने वालों (Lisper) या हकलाने वालों (stammering) के लिए यह मन्त्र बहुत लाभदायक है ।


“ॐ धं धनुर्धारिभ्यां नमः”
इस मन्त्र से पीठ की रीढ़ (Spinal) के विकार (backache) दूर होते है । This is also useful for Tetanus.


“ॐ मं महा-देवीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से माताओं के स्तन विकार अच्छे होते हैं । कागज पर लिखकर बालक के गले में बाँधने से नजर, चिड़चिड़ापन आदि दोष-विकार दूर होते हैं ।


“ॐ शों शोक-विनाशिनीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से समस्त मानसिक व्याधियाँ नष्ट होती है । ‘मृत्यु-भय’ दूर होता है । पति-पत्नी का कलह-विग्रह रुकता है । इस मन्त्र को साध्य के नाम के साथ मंगलवार के दिन अनार की कलम से रक्त-चन्दन से भोज-पत्र पर लिखकर, शहद में डुबो कर रखे । मन्त्र के साथ जिसका नाम लिखा होगा, उसका क्रोध शान्त होगा ।


“ॐ लं ललिता-देवीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से हृदय-विकार (Heart disease) दूर होते हैं ।


“ॐ शूं शूल-वारिणीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से ‘उदरस्थ व्याधियों’ (Abdominal) पर नियन्त्रण होता है । प्रसव-वेदना के समय भी मन्त्र को उपयोग में लिया जा सकता है ।


“ॐ कां काल-रात्रीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से आँतों (Intestine) के समस्त विकार दूर होते हैं । विशेषतः ‘अक्सर’, ‘आमांश’ आदि विकार पर यह लाभकारी है ।


“ॐ वं वज्र-हस्ताभ्यां नमः”
इस मन्त्र से समस्त ‘वायु-विकार’ दूर होते हैं । ‘ब्लड-प्रेशर’ के रोगी के रोगी इसका उपयोग करें ।


“ॐ कौं कौमारीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से दन्त-विकार (Teeth disease) दूर होते हैं । बच्चों के दाँत निकलने के समय यह मन्त्र लाभकारी है ।

“ॐ गुं गुह्येश्वरी नमः”
इस मन्त्र से गुप्त-विकार दूर होते हैं । शौच-शुद्धि से पूर्व, बवासीर के रोगी १०८ बार इस मन्त्र का जप करें । सभी प्रकार के प्रमेह – विकार भी इस मन्त्र से अच्छे होते हैं ।


“ॐ पां पार्वतीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से ‘रक्त-मज्जा-अस्थि-गत विकार’ दूर होते हैं । कुष्ठ-रोगी इस मन्त्र का प्रयोग करें ।


“ॐ मुं मुकुटेश्वरीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से पित्त-विकार दूर होते हैं । अम्ल-पित्त के रोगी इस मन्त्र का उपयोग करें ।


“ॐ पं पद्मावतीभ्यां नमः”
इस मन्त्र से कफज व्याधियों पर नियन्त्रण होता है ।


विधिः-
उपर्युक्त मन्त्रों को सर्व-प्रथम नवरात्रि अथवा  किसी अन्य पर्व-काल में १००८ बार जप कर सिद्ध कर लेना चाहिये । फिर प्रतिदिन जब तक विकार रहे, १०८ बार जप करें अथवा सुविधानुसार अधिक-से-अधिक जप करें । विकार दूर होने पर ‘कुमारी-पूजन, ब्राह्मण-भोजन आदि करें ।

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