गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

भारतवर्ष का गुलामी का इतिहास

भारतवर्ष का गुलामी का इतिहास
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*I N D I A N   R  U  L E  R  S*

युवा जागेगा तो देश जागेगा

*गुलाम वंश*
1=1193 मुहम्मद गौरी
2=1206 कुतुबुद्दीन ऐबक
3=1210 आराम शाह
4=1211 इल्तुतमिश
5=1236 रुकनुद्दीन फिरोज शाह
6=1236 रज़िया सुल्तान
7=1240 मुईज़ुद्दीन बहराम शाह
8=1242 अल्लाउदीन मसूद शाह
9=1246 नासिरुद्दीन महमूद 
10=1266 गियासुदीन बल्बन
11=1286 कै खुशरो
12=1287 मुइज़ुदिन कैकुबाद
13=1290 शमुद्दीन कैमुर्स
1290 गुलाम वंश समाप्त्
(शासन काल-97 वर्ष लगभग )

*👉खिलजी वंश*
1=1290 जलालुदद्दीन फ़िरोज़ खिलजी
2=1296
अल्लाउदीन खिलजी
4=1316 सहाबुद्दीन उमर शाह
5=1316 कुतुबुद्दीन मुबारक शाह
6=1320 नासिरुदीन खुसरो  शाह
7=1320 खिलजी वंश स्माप्त
(शासन काल-30 वर्ष लगभग )

*👉तुगलक  वंश*
1=1320 गयासुद्दीन तुगलक  प्रथम
2=1325 मुहम्मद बिन तुगलक दूसरा  
3=1351 फ़िरोज़ शाह तुगलक
4=1388 गयासुद्दीन तुगलक  दूसरा6
5=1389 अबु बकर शाह
6=1389 मुहम्मद  तुगलक  तीसरा
7=1394 सिकंदर शाह पहला
8=1394 नासिरुदीन शाह दुसरा
9=1395 नसरत शाह
10=1399 नासिरुदीन महमद शाह दूसरा दुबारा सता पर
11=1413 दोलतशाह
1414 तुगलक  वंश समाप्त
(शासन काल-94वर्ष लगभग )

*👉सैय्यद  वंश*
1=1414 खिज्र खान
2=1421 मुइज़ुदिन मुबारक शाह दूसरा
3=1434 मुहमद शाह चौथा
4=1445 अल्लाउदीन आलम शाह
1451 सईद वंश समाप्त
(शासन काल-37वर्ष लगभग )

*👉लोदी वंश*
1=1451 बहलोल लोदी
2=1489 सिकंदर लोदी दूसरा
3=1517 इब्राहिम लोदी
1526 लोदी वंश समाप्त
(शासन काल-75 वर्ष लगभग )

*👉मुगल वंश*
1=1526 ज़ाहिरुदीन बाबर
2=1530 हुमायूं
1539 मुगल वंश मध्यांतर

*👉सूरी वंश*
1=1539 शेर शाह सूरी
2=1545 इस्लाम शाह सूरी
3=1552 महमूद  शाह सूरी
4=1553 इब्राहिम सूरी
5=1554 फिरहुज़् शाह सूरी
6=1554 मुबारक खान सूरी
7=1555 सिकंदर सूरी
सूरी वंश समाप्त,(शासन काल-16 वर्ष लगभग )

*मुगल वंश पुनःप्रारंभ*
1=1555 हुमायू दुबारा गाद्दी पर
2=1556 जलालुदीन अकबर
3=1605 जहांगीर सलीम
4=1628 शाहजहाँ
5=1659 औरंगज़ेब
6=1707 शाह आलम पहला
7=1712 जहादर शाह
8=1713 फारूखशियर
9=1719 रईफुदु राजत
10=1719 रईफुद दौला
11=1719 नेकुशीयार
12=1719 महमूद शाह
13=1748 अहमद शाह
14=1754 आलमगीर
15=1759 शाह आलम
16=1806 अकबर शाह
17=1837 बहादुर शाह जफर
1857 मुगल वंश समाप्त
(शासन काल-315 वर्ष लगभग )

*👉ब्रिटिश राज (वाइसरॉय)*
1=1858 लॉर्ड केनिंग
2=1862 लॉर्ड जेम्स ब्रूस एल्गिन
3=1864 लॉर्ड जहॉन लोरेन्श
4=1869 लॉर्ड रिचार्ड मेयो
5=1872 लॉर्ड नोर्थबुक
6=1876 लॉर्ड एडवर्ड लुटेनलॉर्ड
7=1880 लॉर्ड ज्योर्ज रिपन
8=1884 लॉर्ड डफरिन
9=1888 लॉर्ड हन्नी लैंसडोन
10=1894 लॉर्ड विक्टर ब्रूस एल्गिन
11=1899 लॉर्ड ज्योर्ज कर्झन
12=1905 लॉर्ड गिल्बर्ट मिन्टो
13=1910 लॉर्ड चार्ल्स हार्डिंज
14=1916 लॉर्ड फ्रेडरिक सेल्मसफोर्ड
15=1921 लॉर्ड रुक्स आईजेक रिडींग
16=1926 लॉर्ड एडवर्ड इरविन
17=1931 लॉर्ड फ्रिमेन वेलिंग्दन
18=1936 लॉर्ड एलेक्जंद लिन्लिथगो
19=1943 लॉर्ड आर्किबाल्ड वेवेल
20=1947 लॉर्ड माउन्टबेटन

ब्रिटिस राज समाप्त शासन काल 90 वर्ष लगभग

*🇮🇳आजाद भारत,प्राइम मिनिस्टर🇮🇳*
1=1947 जवाहरलाल नेहरू
2=1964 गुलजारीलाल नंदा
3=1964 लालबहादुर शास्त्री
4=1966 गुलजारीलाल नंदा
5=1966 इन्दिरा गांधी
6=1977 मोरारजी देसाई
7=1979 चरणसिंह
8=1980 इन्दिरा गांधी
9=1984 राजीव गांधी
10=1989 विश्वनाथ प्रतापसिंह
11=1990 चंद्रशेखर
12=1991 पी.वी.नरसिंह राव
13=अटल बिहारी वाजपेयी
14=1996 ऐच.डी.देवगौड़ा
15=1997 आई.के.गुजराल
16=1998 अटल बिहारी वाजपेयी
17=2004 डॉ.मनमोहनसिंह
*18=2014 से  नरेन्द्र मोदी*

764 सालों  बाद मुस्लिमों तथा अंग्रेज़ों के ग़ुलामी से आज़ादी मिली है। ये हिन्दुओं का देश है। यहाँ बहुसंख्यक होते हुए भी हिन्दू अपने ही देश ग़ुलाम बन के रहे और आज लोग कह रहे है। हिन्दू साम्प्रदायिक हो गए ,,,,,,,,.....
सदियों बाद नरेन्द्र मोदी तथा  महाराज बाबा योगी आदित्यनाथ जी के रूप में हिन्दू की सरकार आयी है। सभी भारतियों को इन पर गर्व करना चाहिए।

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🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

*आन्तरजालं सम्बंधितशब्दानि*

*आन्तरजालं सम्बंधितशब्दानि*
(1)ID.— परिचयपत्रम्
(2)Data – टंकितांश:
(3) Edit – सम्पादनम्
(4)Keyboard – कुंचिपटलम्
(5) Timeline – समयरेखा
(6) Login – प्रवेश:
(7)Share - वितरणम्, प्रसारणम्
(8) Laptop – अंकसंगणकम्
(9) Search - अन्वेषणम्
(10)Default - पूर्वनिविष्ठम्
(11)Input – निवेश:
(12)Output - फलितम्
(13)Block – अवरोध:
(14)Display – प्रदर्शनम् / विन्यास:
(15)Wallpaper - भीत्तिचित्रम्
(16)Theme – विषयवस्तु:
(17)User – उपभोक्ता
(18) Smart phone - कुशलदूरवाणी/स्मार्त्तदूरवाणी
(19)Tag - चिह्नम्
(20)Setup – प्रतिष्ठितम्
(21)Install - प्रस्थापना / प्रतिस्थापनम्
(22)Privacy - गोपनीयता
(23)Manual – हस्तक्रिया
(24)Accessibility - अभिगम्यता
(25)Error – त्रुटि:
(26)Pass word – गूढशब्द:
(27) Code no. - कूटसंख्या
(28) Pen drive - स्मृतिशलाका।
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जय संस्कृतवाणी जनकल्याणी
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शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

राजा पृथु

राजा पृथु
डा.अजय दीक्षित

               



प्राचीन समय की बात है, विष्णु-भक्त ध्रुव के वंश में अंग नामक राजा हुए। वे बड़े धर्मात्मा और प्रजा-प्रिय थे। वृद्धावस्था में वे राजपाट त्याग कर तपस्या करने वन में चले गए। भृगु आदि मुनियों ने जब देखा कि उनके जाने के बाद पृथ्वी की रक्षा करने वाला कोई नहीं बचा है, तब उनहोंने उनके पुत्र वेन का राज्यभिषेक कर दिया। राजा बनते ही वेन अपने बलऔर ऐश्वर्य के मद में चूर हो गया। उसने राज्य में घोषणा करवा दी कि ऋषि मुनि किसी भी प्रकार का यज्ञ और हवन न करें। जो राजाज्ञा का उल्लंघन करेंगे उन्हें दण्डित किया जाएगा। उसके भय से चारों ओर धर्म-कर्म बंद हो गए।
धर्म-संबंधी कार्य में विघ्न उत्पन्न होने पर सभी ऋषि-मुनि एकत्रित होकर राजा वेन के पास गए और उनसे विनम्र स्वर में बोले- ‘‘राजन ! कृपया हमारी बात ध्यानपूर्वक सुनें। इससे आपकी आयु, बल और यश में वृद्धि होगी। राजन ! यदि मनुष्य मन, वाणी, शरीर और बुद्धि से धर्म का पालन करे तो उसे स्वर्ग आदि लोकों की प्राप्ति होती है और यदि वह निष्काम भाव से धर्म का पालन करे तो मोक्ष का अधिकारी बनता है। अतः प्रजा का धर्म आप द्वारा नष्ट नहीं होना चाहिए। धर्म नष्ट होने पर राजा नष्ट हो जाता है। राजन ! आपके राज्य में जो यज्ञ और हवन आदि होंगे, उनसे देवता भी प्रसन्न होकर, आपको इच्छित वर प्रदान करेंगे। अतएव आपको यज्ञादि अनुष्ठान बंद करके देवताओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।’’
दुष्ट वेन अहंकार भरे स्वर में बोला—‘‘मुनियों ! तुम बड़े मूर्ख हो। तुमने सारा ज्ञान त्यागकर अधर्म में अपनी बुद्धि लिप्त कर रखी है। तभी तो तुम अपने पालन करने वाले मुझ प्रत्यक्ष ईश्वर को छोड़कर किसी दूसरे ईश्वर की पूजा-अर्चना करना चाहते हो, जो तुम्हारे लिए कल्पित है। जो लोग मूर्खतावश अपने राज-रूपी परमेश्वर का अपमान करते हैं, उन्हें न तो इस लोक में सुख मिलता है और न ही परलोक में। देवगण राजा के शरीर में ही वास करते हैं। इसलिए तुम मेरा ही पूजन करो और मुझे ही यज्ञ का भाग अर्पित करो।’’ अहंकार के कारण वेन की बुद्धि पूर्णतः भ्रष्ट हो गई थी। वह अत्यंत क्रूर, अन्यायी, अधर्मी और कुमार्गी हो गया था। इसलिए ऋषि-मुनियों की विनीत प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया।
उसके पापयुक्त शब्द शुनकर मुनिगण क्रोधित होकर बोले—‘‘वेन ! तू बड़ा अधर्मी और पापी है। यदि तू जीवित रहा तो कुछ ही दिनों में इस सृष्टि को नष्ट कर देगा। जिन भगवान विष्णु की कृपा से तुझे पृथ्वी का राज्य प्राप्त हुआ है, तू उन्हीं परब्रह्म का अपमान कर रहा है। जगत् के कल्याण के लिए तेरा मरना ही उचित है।’’
इस प्रकार उन्होंने दुष्ट वेन को मारने का निश्चय कर उस पर प्रहार करने आरम्भ कर दिए। फिर शीघ्र ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया और अपने आश्रमों को लौट गए। इधर वेन की माता मोहवश अपने पुत्र के मृत शरीर की रक्षा करने लगी। वेन की मृत्यु के पश्चात् राज्य में चोरो-डाकुओं का अतंक बढ़ गया।
एक दिन सरस्वती नदी के तट पर कुछ मुनिगण बैठे धर्म-चर्चा कर रहे थे। तभी डाकुओं का एक दल उधर से निकला। उन्हें देखकर मुनिगण सोच में पड़ गए। उनके मन में एक ही विचार उत्पन्न होने लगा-‘‘वेन के मरते ही राज् में अराजकता फैल गई है। राज्य में चोर डाकू बढ़ गए हैं, जो निर्दोष प्रजा को लूट रहे हैं। यद्यपि ऋषि-मुनि शांत स्वभाव के होते हैं, तथापि दीनों की उपेक्षा करने से उनका तप क्षण भर में ही क्षीण हो जाता है। राजा अंग का वंश नष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसमें अनेक पराक्रमी और धर्मात्मा राजा हो चुके हैं। इसलिए हमें उनका उत्तराधिकारी अवश्य उत्पन्न करना होगा, जो अपने पुरुषार्थ से प्रजा की रक्षा कर सके।’
तब उन्होंने आपस में विचार कर राज्य के उत्तराधिकारी के लिए वेन की जँघा को बड़े जोर से मथा तो उसमें से एक बौना पुरुष उत्पन्न हुआ। उसका रंग काला था उसके सभी अंग टेढ़े-मेढ़े और छोटे थे। उसने जन्म लेते ही राजा वेन के सभी भयंकर पापों को अपने ऊपर ले लिया। बाद में, वह और उसके वंशधर वन और पर्वतों में रहनेवाले ‘निषाद’ कहलाए। इसके बाद मुनियों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया। उसमें से दिव्य स्वरूप धारण किए स्त्री-पुरुष का एक जोड़ा प्रकट हुआ। उस पुरुष के दाहिने हाथ में भगवान विष्णु के हस्तरेखाएँ और चरणों में कमल का चिह्न अंकित देखकर उन्होंने उसे भगवान विष्णु का ही अंश समझा। 
मुनिगण प्रसन्न होकर बोले—‘‘यह पुरुष भगवान नारायण की कला से प्रकट हुआ है और यह स्त्री साक्षात् लक्ष्मी का अवतार है। यह दिव्य पुरुष अपने सुयश का विस्तार करने के कारण संसार में पृथु के नाम से प्रसिद्ध होगा। सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत यह अतीव सुंदर स्त्री इसकी पत्नी अर्चि होगी। पृथु के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ने संसार की रक्षा के लिए लक्ष्मीरूपा अर्चि के साथ अवतार लिया है।’’
महात्मा पृथु जैसे सत्पुत्र ने उत्पन्न होकर अपने शुभ-कर्मों द्वारा पापी वेन को नरक से छुड़ा दिया। तत्पश्चात् ऋषियों-मुनियों ने पृथु के राज्यभिषेक का आयोजन किया। इस शुभ अवसर पर समस्त देवगण उपस्थित हुए। भगवान विष्णु ने पृथु को अपना सुदर्शन चक्र, ब्रह्माजी ने वेदमयी कवच, भगवान शिव ने दस चक्रकार चिह्नों वाली दिव्य तलवार, वायुदेव ने दो चँवर, धर्म ने कीर्तिमयी माला, देवराज इन्द्र ने मनोहर मुकुट, यमराज ने कालदण्ड, अग्निदेव ने दिव्य धनुष और कुबेर ने सोने का राजसिंहासन भेट किया।
जब मुनिगण पृथु की स्तुति करने लगे, तब पृथु बोले—‘‘मान्यवरों ! अभी इस लोक में मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ है, फिर आप किन गुणों के लिए मेरी स्तुति करेंगे ? आप केवल परब्रह्म परमात्मा की ही स्तुति करें। भगवान विष्णु के रहते तुच्छ मनुष्यों की स्तुति नहीं करते। इसलिए आप कृपया मेरी स्तुति न करें।’’ उनकी बात सुन सभी ऋषि-मुनि आत्मविभोर हो गए। तब पृथु ने उन्हें अभिलषित वस्तुएँ देकर संतुष्ट किया। वे सभी राजा पृथु को आशीर्वाद देने लगे। जब ऋषि-मुनियों ने पृथु का राज्याभिषेक किया, उन दिनों पृथ्वी अन्नहीन हो गयी थी, प्रजाजन के शरीर अन्न के अभाव में दुर्बल हो गए थे। उन्होंने राजा पृथु से सहायता की विनती की।
प्रजाजन की करुण विनती सुनकर पृथु का मन करुणा से द्रवित हो गया। कुछ देर विचार करके उन्हें पृथ्वी के अन्नहीन होने का कारण ज्ञात हो गया। वे जान गए कि पृथ्वी ने सभी प्रकार के अन्न तथा औषधियों को अपने गर्भ में छिपा लिया है। तब उन्होंने क्रोधित होकर धनुष उठाया और पृथ्वी को लक्ष्य बनाकर बाण चलाने के लिए उद्यत हो गए। उन्हें बाण चढ़ाए देखकर पृथ्वी अपने प्राण बचाने के लिए गाय का रूप रख कर भागने लगी।
पृथ्वी को गाय-रूप में भागते देख क्रोधित पृथु ने उसका पीछा करने लगे। वह प्राण बचाते हुए जिस-जिस स्थान पर जाती, वहीं-वहीं उसे राजा पृथु हाथ में धनुष बाण लिए दिखाई देते।
जब उसे कहीं भी शरण नहीं मिली तो वह भयभीत होकर उन्हीं की शरण में आई और बोली—‘‘महाराज ! आप सभी प्राणियों की रक्षा करने को सदा तत्पर रहते हैं, फिर मुझ दीन-हीन और निरपराधिनी को क्यों मारना चाहते हैं ? आप धर्मज्ञ हैं, आप क्या आपका क्षत्रिय धर्म एक स्त्री का वध करने का अनुमति देगा ? स्त्रियाँ कोई अपराध करें तो साधाण जीव भी उन पर हाथ नहीं उठाते, फिर आप जैसे करुणामय और दीन-वत्सल ऐसा कैसे कर सकते हैं ? फिर सोचें की मेरा वध करने के बाद आप अपनी प्रजा को कहाँ रखेंगे ?’’
तब पृथु बोले—‘‘पृथ्वी ! तुमने यज्ञों का भाग लेकर भी प्रजा को अन्न नहीं दिया, इसलिए आज मैं तुम्हें समाप्त कर दूँगा। तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। तुमने ब्रह्मा जी द्वारा उतपन्न किए गए अन्नादि बीजों को अपने गर्भ में छिपा लिया है और उन्हें न निकाल कर अनेक जीवों की हत्या कर रही हो। जो केवल अपना पोषण करने वाला तथा अन्य प्राणियों के प्रति निर्दय हो—उसका वध शास्त्रों में तर्कसंगत है। अब मैं तुम्हारे गर्भ को अपने बाणों से छिन्न-भिन्न कर दूँगा और प्रजाजन की क्षुधा शांत कर योगबल से उन्हें धारण करूँगा।’’
क्रोध की तीव्रता से राजा पृथु उस समय साक्षात् काल के समान दिखाई पड़ रहे थे। उनके भयंकर रूप को देखकर पृथ्वी करुण स्वर में उनकी स्तुति करती हुई बोली—‘‘राजन ! ब्रह्माजी ने जिस अन्नादि को उत्पन्न किया था, उसे केवल दुराचारी मनुष्य ही खा रहे थे। अनेक राजाओं ने मेरा आदर करना छोड़ दिया था, इसलिए मैंने अन्न को अपने गर्भ में छिपा लिया। यदि आप वह अन्न प्राप्त करना चाहते हैं तो मेरे योग्य एक बछड़ा, दोहन पात्र और दुहनेवाले की व्यवस्था कीजिए। मैं दूध के रूप में आपको वे पदार्थ प्रदान कर दूँगी। एक बात और राजन ! आप मुझे समतल कर दें। जिससे कि मेरे ऊपर इन्द्र द्वारा बरसाया गया जल वर्ष भर बना रहे। यह आप सभी के लिए मंगलकारक होग।’’तब पृथु ने स्वयंभू मनु को बछड़ा बनाकर अपने हाथों से ही पृथ्वी का सारा दुग्ध दुह लिया। फिर उन्होंने अपने धनुष की नोक से पर्वतों को तोड़कर पृथ्वी को समतल कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने पृथ्वी को अपनी पुत्री रूप में स्वीकार किया। दैत्य मधु-कैटभ के मेद से निर्मित होने के कारण पृथ्वी को पहले मोदिनी कहा जाता था, किंतु राजा पृथु की पुत्री बनने के बाद यह पृथ्वी नाम से प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार राजा पृथु ने पृथ्वी का मनोरथ सिद्ध करते हुए अपनी प्रजा की रक्षा की।

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

जानें, प्राचीन काल में भारत कितना विशाल था, कहां तक हमारी संस्कृति थी

जानें, प्राचीन काल में भारत कितना विशाल था, कहां तक हमारी संस्कृति थी

BY 🛐🛐डा.अजय दीक्षित
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भारत बहुत प्राचीन देश है। विविधताओं से भरे इस देश में आज बहुत से धर्म, संस्कृतियां और लोग हैं। आज हम जैसा भारत देखते हैं अतीत में भारत ऐसा नहीं था भारत बहुत विशाल देश हुआ करता था। ईरान से इंडोनेशिया तक सारा हिन्दुस्थान ही था। समय के साथ-साथ भारत के टुकड़े होते चले गये जिससे भारत की संस्कृति का अलग-अलग जगहों में बटवारां हो गया। हम आपको उन देशों को नाम बतायेंगे जो कभी भारत के हिस्से थे।

ईरान – ईरान में आर्य संस्कृति का उद्भव 2000 ई. पू. उस वक्त हुआ जब ब्लूचिस्तान के मार्ग से आर्य ईरान पहुंचे और अपनी सभ्यता व संस्कृति का प्रचार वहां किया। उन्हीं के नाम पर इस देश का नाम आर्याना पड़ा। 644 ई. में अरबों ने ईरान पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।

कम्बोडिया – प्रथम शताब्दी में कौंडिन्य नामक एक ब्राह्मण ने हिन्दचीन में हिन्दू राज्य की स्थापना की।

वियतनाम – वियतनाम का पुराना नाम चम्पा था। दूसरी शताब्दी में स्थापित चम्पा भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। यहां के चम लोगों ने भारतीय धर्म, भाषा, सभ्यता ग्रहण की थी। 1825 में चम्पा के महान हिन्दू राज्य का अन्त हुआ।

Source

मलेशिया – प्रथम शताब्दी में साहसी भारतीयों ने मलेशिया पहुंचकर वहां के निवासियों को भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से परिचित करवाया। कालान्तर में मलेशिया में शैव, वैष्णव तथा बौद्ध धर्म का प्रचलन हो गया। 1948 में अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो यह सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य बना।

Source

इण्डोनेशिया – इण्डोनिशिया किसी समय में भारत का एक सम्पन्न राज्य था। आज इण्डोनेशिया में बाली द्वीप को छोड़कर शेष सभी द्वीपों पर मुसलमान बहुसंख्यक हैं। फिर भी हिन्दू देवी-देवताओं से यहां का जनमानस आज भी परंपराओं के माधयम से जुड़ा है।

फिलीपींस – फिलीपींस में किसी समय भारतीय संस्कृति का पूर्ण प्रभाव था पर 15 वीं शताब्दी में मुसलमानों ने आक्रमण कर वहां आधिपत्य जमा लिया। आज भी फिलीपींस में कुछ हिन्दू रीति-रिवाज प्रचलित हैं।

अफगानिस्तान – अफगानिस्तान 350 इ.पू. तक भारत का एक अंग था। सातवीं शताब्दी में इस्लाम के आगमन के बाद अफगानिस्तान धीरे-धीरे राजनीतिक और बाद में सांस्कृतिक रूप से भारत से अलग हो गया।

Source

नेपाल – विश्व का एक मात्र हिन्दू राज्य है, जिसका एकीकरण गोरखा राजा ने 1769 ई. में किया था। पूर्व में यह प्राय: भारतीय राज्यों का ही अंग रहा।

भूटान – प्राचीन काल में भूटान भद्र देश के नाम से जाना जाता था। 8 अगस्त 1949 में भारत-भूटान संधि हुई जिससे स्वतंत्र प्रभुता सम्पन्न भूटान की पहचान बनी।

तिब्बत – तिब्बत का उल्लेख हमारे ग्रन्थों में त्रिविष्टप के नाम से आता है। यहां बौद्ध धर्म का प्रचार चौथी शताब्दी में शुरू हुआ। तिब्बत प्राचीन भारत के सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र में था। भारतीय शासकों की अदूरदर्शिता के कारण चीन ने 1957 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया।

श्रीलंका – श्रीलंका का प्राचीन नाम ताम्रपर्णी था। श्रीलंका भारत का प्रमुख अंग था। 1505 में पुर्तगाली, 1606 में डच और 1795 में अंग्रेजों ने लंका पर अधिकार किया। 1935 ई. में अंग्रेजों ने लंका को भारत से अलग कर दिया।

म्यांमार (बर्मा) – अराकान की अनुश्रुतियों के अनुसार यहां का प्रथम राजा वाराणसी का एक राजकुमार था। 1852 में अंग्रेजों का बर्मा पर अधिकार हो गया। 1937 में भारत से इसे अलग कर दिया गया।

पाकिस्तान – 15 अगस्त, 1947 के पहले पाकिस्तान भारत का एक अंग था। हालांकि बटवारे के बाद पाकिस्तान में बहुत से हिन्दू मंदिर तोड़ दिये गये हैं, जो बचे भी हैं उनकी हालत बहुत ही जर्जर है। 

बांग्लादेश – बांग्लादेश भी 15 अगस्त 1947 के पहले भारत का अंग था। देश विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान के रूप में यह भारत से अलग हो गया। 1971 में यह पाकिस्तान से भी अलग हो गया।

प्राचीन भारत बहुत संपन्न था, दूर – दूर से लोग हमारी संस्कृति सीखने आया करते थे। नालंदा और तक्षशिला जैसे ज्ञान के भंडार हमारे देश में ही थे। जब दुनिया अपना नाम तक नहीं जानती थी, हमारे ऋषि – मुनि बहुत से गहरे अनुसंधान किया करते थे। मेरा सभी भारतवासियों से निवेदन है कि थोड़ा अपने जीवन का कीमती समय निकालकर अपने भारतके इतिहास और धरोवरों को बारे में भी पढ़ना चाहिए। 

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

कालगणना और इसके मात्रक :

कालगणना और इसके मात्रक :
(Chronology and its Units)

6 प्राण (Breath) = 1 पल (विनाडी) = 24 Seconds
60 पल (विनाडी) = 1 नाडी (= घटी = घड़ी) = 24 Minutes
2 घटी = 1 मुहूर्त्त = 1 क्षण = 48 Minutes
60 नाडी (घटी) = 30 मुहुर्त्त = 1 अहोरात्र = 24 Hours
7 अहोरात्र = 1 सप्ताह (Week)
2 सप्ताह = 1 पक्ष (fortnight)
2 पक्ष = 1 मास (Month)
2 मास = 1 ऋतु (Season)
3 ऋतु = 1 अयन
2 अयन = 1 सम्वत् = 1 वर्ष (Year)

360 वर्ष = 1 दिव्य वर्ष

सतयुग = 4800 दिव्य-वर्ष = 17,28,000 वर्ष 
त्रेता = 3600 दिव्य-वर्ष = 12,96,000 वर्ष 
द्वापर = 2400 दिव्य-वर्ष = 8,64,000 वर्ष
कलियुग = 1200 दिव्य-वर्ष = 4,32,000 वर्ष

चतुर्युग = महायुग = दिव्ययुग = देवयुग = (सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग)

1 चतुर्युग = 43,20,000 वर्ष
71 चतुर्युग = 1 मन्वन्तर = 30,67,20,000 वर्ष

1 सन्धिकाल = 3 चतुर्युग = 1,29,60,000 वर्ष

14 मन्वन्तर + 2 सन्धिकाल = 1000 चतुर्युग
1000 चतुर्युग = 1 सृष्टि = 1 कल्प = 1 ब्राह्म-दिन = 4 अरब 32 करोड़ वर्ष
1000 चतुर्युग = 1 प्रलय = 1 विकल्प = 1 ब्राह्म-रात्रि = 4 अरब 32 करोड़ वर्ष

2000 चतुर्युग = 1 ब्राह्म-अहोरात्र = 8 अरब 64 करोड़ वर्ष
30 ब्राह्म-अहोरात्र =  1 ब्राह्म-मास
12 ब्राह्म-मास = 1 ब्राह्म-वर्ष
100 ब्राह्म-वर्ष = 1 परा = 1 महाकल्प

मुक्ति की अवधि 1 पराकाल की होती है. [मुण्डक-उपनिषद् 3.2.6]

अभी 'श्वेत वराह' नामक प्रथम ब्राह्म-दिन के 7वें 'वैवस्वत' नामक मन्वन्तर के 28वें चतुर्युग का कलियुग चल रहा है. विक्रम सम्वत् 2073 (ईसाई वर्ष 2016) में हमारे वैदिक सम्वत् निम्नलिखित चल रहे हैं:

कल्प सम्वत् = 1,97,38,13,117 वर्ष
मानव सम्वत् = 1,96,08,53,117 वर्ष
वेद सम्वत् = 1,96,08,53,112 वर्ष
कलियुग सम्वत् = 5117 वर्ष

यूरोपीय ज्योतिषी Bailley के अनुसार, अभी कलियुग सम्वत् 5118 चल रहा है.

14 मन्वंतरों के नाम:
1. स्वायम्भुव 2. स्वारोचिष 3. औत्तमेय 4. तामस 5. रैवत 6. चाक्षुष 7. वैवस्वत 8. सावर्णि 9. दक्षसावर्णि 10. ब्रह्मसावर्णि 11. धर्मसावर्णि 12. रूद्रसावर्णि 13. देवसावर्णि (रौप्यसावर्णि) 14. इन्द्रसावर्णि (मौत्यसावर्णि)

30 कल्पों (ब्राहम-दिनों) के नाम:
1. श्वेतवाराह  2. नीललोहित  3. वामदेव  4. रथन्तर  5. रौरव  6. प्राण  7. बृहत्  8. कन्दर्प   9. सद्यः  10. ईशान  11. तमः  12. सारस्वत  13. उदान  14. गारुड  15. कौर्म  16.  नरसिंह  17. समान  18. आग्नेय  19. सोम  20. मानव  21. पुमान्  22. वैकुण्ठ  23. लक्ष्मी  24. सावित्री  25. घोर  26. वाराह  27. वैराज  28. गौरी  29. माहेश्वर  30. पितृ

दिन के 15 मुहूर्त्त:
सूर्योदय से प्रथम मुहूर्त्त का प्रारम्भ होता है.
1.  रुद्र  2.  अहि  3.  मित्र  4.  पितॄ  5.  वसु  6.  वाराह  7.  विश्वेदेवा  8.  विधि  9.  सतमुखी  10.  पुरुहूत  11.  वाहिनी  12.  नक्तनकरा  13.  वरुण  14.  अर्यमन्  15.  भग 

रात्रि के 15 मुहूर्त्त:
1.  गिरीश  2.  अजपाद  3.  अहिर्बुध्न्य  4.  पुष्य  5.  अश्विनी  6.  यम  7.  अग्नि  8.  विधातृ  9.  कण्ड  10.  अदिति  11.  जीव/अमृत  12.  विष्णु  13.  द्युमद्गद्युति  14.  ब्रह्म  15.  समुद्रम् 

14 लोकों (भुवनों) के नाम:
1. भू:  2. भुवः  3. स्वः  4. मह:  5. जनः  6. तपः  7. सत्य  8. अतल  9. वितल  10. सुतल  11. तलातल  12. महातल  13. रसातल  14. पाताल

भूलोक के 7 भाग हैं, जिन्हें महाद्वीप (सप्तद्वीपा वसुमती) Continent कहते हैं:
1. जम्बूद्वीप (Asia) 2. प्लक्ष  3. शाल्मलि  4. कुश  5. क्रौन्च  6. शाक  7. पुष्कर

जम्बूद्वीप के भीतर 9 खण्ड हैं:
1. भारतवर्ष  2. इलावृत्तवर्ष  3. रम्यकवर्ष  4. हिरण्यवर्ष  5. कुरुवर्ष  6. हरिवर्ष  7. किन्नरवर्ष  8. भद्राश्ववर्ष  9. केतुमालवर्ष

आर्यावर्त्त = वर्त्तमान भारत + पाकिस्तान + बांग्लादेश
भारतवर्ष = आर्यावर्त्त + अफगानिस्तान (गान्धार) + म्यान्मार (ब्रह्मा) + भूटान + तिब्बत (त्रिविष्टप) + नेपाल + श्रीलंका + थाईलैंड (श्याम) + मलेशिया (मलय) + वियतनाम + इंडोनेशिया

सन्दर्भ ग्रन्थ:
ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, मनुस्मृति, सूर्यसिद्धान्त आदि

राम नाम से शुरू हुई चौपाईयां 🔯🔯डा.अजय दीक्षित

।। जयश्रीमहाकाल ।।
मानस प्रेमी ही जान पायेगें कि पंडितजी ने कितना परिश्रम किया होगा,प्रस्तुति को संकलित करने में,,,
श्रीरामचरितमानस में श्रीरामनाम से प्रारंभ होने वाले दोहे और चौपाइयाँ!!!!!!
                   ।। श्री गणेशाय नमः ।।

           ।। राम श्रीराम श्रीराम श्रीराम ।।

राम भक्ति जँह सुरसरि धारा सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ।।
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ।।
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ । सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ।।
राम सुकीरति  भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ।।
राम चरन पंकज  मन जासू । लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ।।

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरेहुँ जौ चाहसि उजिआर ।।

राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।
राम भगत हित नर तनु धारी । सहि संकट किए साधु सुखारी ।।
राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी ।।
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ । राखे सरन जान सबु कोऊ ।।
राम भालु कपि कटकु बटोरा । सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा ।।
राम सकुल रन रावनु मारा । सीय सहित निज पुर पगु धारा ।।
राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितु माता ।।

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल ।
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिह दलि सुरसाल ।।

राम सुस्वामि कुसेवक मोसो । निज दिसि देखि दयानिधि पोसो ।।

राम निकाई रावरी है सबही को नीक ।
जौ यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ।।

रामकथा कलि पनंग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ।।
रामकथा कलि कामद गाई । सुजन सजीवनि मूरि सुहाई ।।
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी । तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी ।।

रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु ।
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ।।

रामचरित चिंतामनि चारू । संत सुमति तिय सुभग सिंगारू ।।
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु ।
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ।।

रामकथा कै मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं ।।

राम अनंत अनंत गुन अमित कथा विस्तार ।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह के बिमल बिचार ।।

राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदिति अति पावन ।।
रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा ।।
रामचरितमानस मुनि भावन । बिरचेउ संभु सुहावन पावन ।।
राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम ।।
रामभगति सुरसरितहि जाई । मिली सुकीरति सरजु सुहाई ।।
राम तिलक हित मंगल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ।।
राम राज सुख विनय बड़ाई । बिसद सुखद सोइ  सरद सुहाई ।।
राम सुप्रेमहि पोषत पानी । हरत सकल कलि कलुष गलानी ।।
राम नाम कर अमित प्रभावा । संत पुरान उपनिषद गावा ।।
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ।।
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी । चतुराई तुम्हारि मैं जानी ।।
रामकथा ससि किरन समाना । संत चकोर करहिं जेहि पाना ।।
रामकथा मुनिबर्ज बखानी । सुनी महेस परम सुख मानी ।।

राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु ।
सती सभीत महेस पहिं चलीं ह्रदयँ बड़ सोचु ।।

राम नाम सिव सुमिरन लागे । जानेउ सतीं जगतपति जागे।
राम चरित अति अमित मुनीसा । कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा ।।
रामु सो अवध नृपति सुत सोई । की अज अगुन अलखगति कोई ।।

राम कृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं ।
सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं ।।

रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि ।
सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि ।।

रामकथा सुंदर कर तारी । संसय बिहग उड़ावनिहारी ।।
रामकथा कलि बिटप कुठारी । सादर सुनु गिरिराजकुमारी।
राम नाम गुन चरित सुहाए । जनम करम अगनित श्रुति गाए ।।
राम सच्चिदानन्द दिनेसा । नहिं तँह मोह निसा लवलेसा ।।
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना । परमानंद परेस पुराना ।।
राम सो परमातमा भवानी । तँह  भ्रम अति अबिहित तव बानी ।।
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्ब रहित सब उर पुर बासी ।।
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ।।
राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक ते एका ।।
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई । करै अन्यथा अस नहिं कोई।
रामचन्द्र के चरित सुहाए । कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।

रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम ।
मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम ।।

राम अनुज मन की गति जानी । भगत बछलता हियँ हुलसानी ।।
राम देखावहिं अनुजहि रचना । कहि मृदु मधुर मनोहर बचना ।।
राम कहा सब कौसिक पाहीं । सरल सुभाव छुअत छल नाहीं ।।
रामहि चितव भाँय जेहि सीया । सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया ।।
राम रूप अरु सिय छबि देखें।नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।।

रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ ।
सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ ।।

राम चहहिं संकर धनु तोरा।होहु सजग सुनि आयसु  मोरा।
राम बाहुबल सिंधु अपारू।चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू।

राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि ।
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि ।।

रामरूप राकेसु निहारी । बढ़त बीचि पुलकावलि भारी ।।
रामहि लखनु बिलोकत कैसें । ससिहि चकोर किसोरकु जैसें ।।
रामु सुभाँय चले गुरू पाहीं । सिय सनेहु बरनत मन माहीं।
रामु लखन दसरथ के ढोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा ।।
रामहि चितइ रहे थकि लोचन । रूप अपार मार मद मोचन।

राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने । कहि कछु लखन बहुरि मुसुकाने ।।
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा । कर कुठारू आगें यह सीसा ।।
राम मात्र लघु नाम हमारा । परसु सहित बड़ नाम तोहारा।
राम कहा मुनि कहहु बिचारी । रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ।।
राम रमापति कर धनु लेहू । खैंचहु मिटै मोर संदेहू ।।
रामु लखनु उर कर बर चीठी । रहि गए कहत न खाटी मीठी ।।

राम लखन कै कीरति करनी । बारहिं बार भूपबर बरनी ।।
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता । समधी दसरथु जनकु पुनीता ।।
रामहि देखि बरात जुड़ानी । प्रीति कि रीति न जाति  बखानी ।।


रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज ।
जँह तँह पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज ।।

राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि ।
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि ।।

रामहि चितव सुरेस सुजाना गौतम श्रापु परम हित माना।

रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर ।
करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर ।।

राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं । जगमगात मनि खंभन माहीं ।।
राम सीय सिर सेंदुर देहीं।सोभा कहि न जाति बिधि कहीं।
राम बिदा मागत कर जोरी । कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी ।।
राम करौं केहि भाँति प्रसंसा।मुनि महेस मन मानस हंसा ।।
रामहि निरखि ग्राम नर नारी।पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।
राम दरस हित अति अनुरागीं । परिछनि साजु सजन सब लागीं ।।
रामहि देखि रजायसु पाई।निज निज भवन चले सिर नाई।

राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर वैन ।
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन ।।

रामु सप्रेंम संग सब भाई । आयसु पाइ फिरे पहुँचाई ।।

राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु ।
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु ।।

राम रूपु गुन सील सुभाऊ । प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।
राम सीय तन सगुन जनाए । फरकहिं मंगल अंग सुहाए ।।
रामहि बंधु सोच दिन राती । अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती ।।

राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि ।
लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि ।।

राम करहु सब संजम आजू । जौ बिधि कुसल निबाहै काजू ।।
रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू । जेहि जनेसु देइ जुबराजू ।।
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली । देउँ मागु मन भावत आली ।।
रामहि तिलक कालि जौं भयऊ ।  तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ ।।
रामहि देउँ कालि जुबराजू । सजहि सुलोचनि मंगल साजू ।।
राम सपथ सत कहँउ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ ।।
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने । राममातु भलि सब पहिचाने ।।
राम राम रट बिकल भूआलू । जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू ।।
राम सुमंत्रहि आवत देखा । आदरु कीन्ह पिता सम लेखा ।।

रामु कुभाँति सचिव संग जाहीं । देखि लोग जँह तँह बिलखाहीं ।।
राम सत्य सबु जो कछु कहहू ।  तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू ।। 
रामहि मातु बचन सब भाए । जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए ।।
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू । चला बिलोचन बारि प्रबाहू ।।
राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू ।।
राम उठाइ मातु उर लाई । कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई ।।
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना । समउ सनेहु न जाइ बखाना ।।
राम बिलोकि बंधु कर जोरें । देह गेह सब सन तृनु तोरे ।।

रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित सखा सबही के ।।
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई । चले जनक जननिहि सिरु नाई ।।
राम चलत अति भयउ बिषादू । सुनि न जाइ पुर आरत नादू ।।
रामु चले बन प्रान न जाहीं । केहि सुख लागि रहत तन माहीं ।।
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े । जँह तँह  मनँहु चित्र लिखि काढ़े ।।
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही ।बिषय भोग बस करहिं  कि तिन्हही ।।

राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ ।
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ ।।

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि ।
मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि ।।

राम लखन सिय रूप निहारी । कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी ।।

रामचंदु पति सो बैदेही । सोवत महि बिधि बाम न केही ।।

राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अलख अनादि अनूपा ।।
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । तदपि होति नहिं सीतलि छाती ।।

राम लखन सिय पद सिरु नाई । फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई ।।
राम प्रनाम कीन्ह सब काहू । मुदित भए लहि लोयन लाहू ।।

राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ ।
चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ ।।

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं । नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं ।।

राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा ।।
राम लखन सिय रूप निहारी । होहिं सनेह बिकल नर नारी ।।

राम लखन सिय रूप निहारी । पाइ नयन फलु होहिं सुखारी ।।

रामहि देखि एक अनुरागे । चितवत चले जाहिं सँग लागे ।।

राम लखन सिय सुंदरताई । सब चितवहिं चित मन मति लाई ।।
राम लखन पथि कथा सुहाई । रही सकल मग कानन छाई ।।
राम लखन सिय प्रीति सुहाई । बचन अगोचर किमि कहि जाई ।।
राम धाम पथ पाइहि सोई । जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई ।।
राम दीख मुनि बासु सुहावन । सुंदर गिरि काननु जलु पावन ।।

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर ।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ।।

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ।।

राम भगत प्रिय लागहिं जेही । तेहि उर बसहु सहित बैदेही ।।

राम प्रनामु कीन्ह सब काहू । मुदित देव लहि लोचन लाहू ।।
राम सनेह मगन सब जाने । कहि प्रिय बचन सकल सनमाने ।।

रामहि केवल प्रेमु पिआरा । जानि लेउ जो जाननिहारा ।।

राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ।।
राम सँग सिय रहित सुखारी । पुर परिजन गृह सुरति बिसारी ।।

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत ।
जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत ।।

राम राम सिय लखन पुकारी । परेउ धरनितल ब्याकुल भारी ।।

राम रहित रथ देखिहि जोई । सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई ।।

राम जननि तब आइहि धाई । सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई ।।

राम राम कह राम सनेही । पुनि कह राम लखन बैदेही ।।

राम कुसल कहु सखा सनेही । कँह रघुनाथु लखन बैदेही ।।

राम रूप गुन सील सुभाऊ । सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ ।।
राम सखा तब नाव मगाई । प्रिय चढ़ाइ चढ़े रघुराई ।।

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम ।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ।।

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि ।
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि ।।

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए । गइउँ न संग न प्रान पठाए ।।
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु ते प्यारे ।।
राम पुनीत बिषय रस रूखे । लोलुप भूमि भोग के भूखे ।।
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि ।
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ।।

राम दरस बस सब नर नारी । जनु करि करिनि चले तकि बारी ।।

राम प्रताप नाथ बल तोरे । करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे ।

रामहि भरतु मनावन जाहीं । सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं ।।

राम सखा सुनि संदनु त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा ।।

राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ।।

राम नाम महिमा सुर कहहीं । सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं ।।

रामसखहि मिलि भरत सप्रेम । पूँछी कुसल सुमंगल खेमा ।।

राम कीन्ह आपन जबही तें । भयउँ भुवन भूषन तबही तें ।।

रामघाट कँह कीन्ह प्रनामू । भा मनु मगनु मिले जनु रामू ।।

राम जनमि जगु कीन्ह उजागर । रूप सील सुख सब गुन सागर ।।

राम सुना दुखु कान न काऊ । जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ ।।

राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि । यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि ।।

रामु पयादेहि पाँय सिधाए । हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ।।

राम गवनु बन अनरथ मूला । जो सुनि सकल विस्व भइ सूला ।।

राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ । कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ।।

राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू । भूप सोच कर कवन प्रसंगू ।।
राम लखन सिय बिनु पग पनहीं । करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं ।।

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज ।
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ।।

रामसखा कर दीन्हें लागू । चलत देह धरि जनु अनुरागू ।।

राम बास थल बिटप बिलोकें । उर अनुराग रहत नहिं रोकें ।।
रामु संकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि ।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ।।

राम सदा सेवक रूचि राखी । बेद पुरान साधु सुर साखी ।।

राम भगत परहित निरत पर दुःख दुखी दयाल ।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल ।।

रामसखाँ तेहि समय देखावा । सैल सिरोमनि सहज सुहावा ।।

राम निरादर कर फलु पाई । सोवहुँ समर सेज दोउ भाई ।।

रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ।।

राम बास बन संपति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ।।
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु ।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु ।।

रामसखा रिषि बरबस भेंटा । जनु महि लुठत सनेह समेटा ।।

राम बचन सुनि सभय समाजू । जनु जलनिधि मँहु बिकल जहाजू ।।

राम सैल बन देखन जाहीं । जँह सुख सकल सकल दुख नाही ।।

राम कृपाल निषाद नेवाजा । परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ।। 

राम दरस लालसा उछाहू । पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू ।।

राम सनेह सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू ।।

राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ । सो करि कहउँ सखी सत भाऊ ।।

रामु जाइ बनु करि सुर काजू । अचल अवधपुर करिहहिं राजू ।।

राम भरत गुन गनत सप्रीती । निसि दंपतिहि पलक सम बीती ।।

राम बचन गुरू नृपहि सुनाए । सील सनेह सुभायँ सुहाए ।।
रामहि राँय कहेउ बन जाना । कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना ।

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु ।
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ।।

राम भगतिमय भरतु निहारे । सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ।।

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु ।
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ।

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत ।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत ।।

राम रजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नहीं ।।

रामहि चितवत चित्र लिखे से । सकुचत बोलत बचन सिखे से ।।

राम मातु दुखु सुखु सम जानी । कहि गुन राम प्रबोधीं रानी ।।

रामकृपाँ अवरेब सुधारी । बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ।।
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास ।
तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि की आस ।।

राम मातु गुर पद सिरु नाई । प्रभु पद पीठ रजायसु पाई ।

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति ।
चातक हंस सराहिअत टेक बिबेक बिभूति ।।

राम पेम बिधु अचल अदोषा । सहित समाज सोह नित चोखा ।।

राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा । मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा ।।

राम अनुज समेत बैदेही । निसि दिनु देव जपत हहु जेही ।।
राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान ।

करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान ।।

राम रोष पावक अति घोरा । होइहि सकल सलभ कुल तोरा ।।

राम कहा तनु राखहु ताता । मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता ।।
राम सकल नामन्ह ते अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ।

राम जबहिं प्रेरेउ निज माया । मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया ।।
राम राम हा राम पुकारी । हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी ।।

राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।

सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग ।।

राम बालि निज धाम पठावा । नगर लोग सब ब्याकुल धावा ।।

राम कहा अनुजहि समुझाई । राज देहु सुग्रीवहि जाई ।।

राम काजु अरु मोर निहोरा । बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा ।।
राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़भागी ।।
राम काज लगि तव अवतारा । सुनतहिं भयउ पर्बताकारा ।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं । सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ।।
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ।।

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।

नव तुलसिका बृंद तँह देखि हरष कपिराइ ।।

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ।।

रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ।।

राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुनानिधान की ।।

राम बान रबि उएँ जानकी । तम बरूथ कहँ जातुधान की ।।

राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम्ह करहू ।।

राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ।।

राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई ।।

राम कपिन्ह जब आवत देखा । किएँ काजु मन हरष विसेषा ।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा । भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ।।

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक ।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ।।

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि ।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ।।

राम बचन सुनि बानर जूथा । सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं । तृन समान त्रैलोकहि  गनहीं ।।
राम तेज बल बुधि बिपुलाई । शेष सहस सत सकहिं न गाई ।।
रामानुज दीन्ही यह पाती । नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ।।

रामं कामारिसेब्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं ।
योग्रीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम् ।।

राम प्रताप सुमिरि मन माहीं । करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ।।
राम चरन पंकज उर धरहू । कौतुक एक भालु कपि करहू ।।
राम बचन सब के जिय भाए । मुनिबर निज निज आश्रम आए ।।

रामहि सौपिं जानकी नाइ कमल पद माथ ।
सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ ।।

राम बिरोध कुसल जसि होई । सो सब तोहि सुनाइहि सोई ।।
राम मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ।।
रामु मनुज बोलत असि बानी । गिरहिं न तव रसना अभिमानी ।।
रामानुज लघु रेख खचाई । सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई ।।
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा । मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा ।।
राम कृपा करि जुगल निहारे । भए बिगतश्रम परम सुखारे ।।
राम कृपा करि चितवा सबही । भए बिगतश्रम बानर तबही ।।

राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन ।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ।।

राम चरन सरसिज उर राखी । चला प्रभंजनसुत बल भाषी ।।
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना । सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ।।
राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ।।

राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक ।
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ।।

राम सेन निज पाछे घाली । चले सकोप महा बलसाली ।।
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा । जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा ।।

रामानुज कहँ राम कहँ अस कहि छाड़ेसि प्रान ।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान ।।

राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान ।
बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान ।।

राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा ।।
राम बिमुख सठ चहसि संपदा । अस कहि हनेसि माझ उर गदा ।।
राम सुभाव सुमिरि बैदेही । उपजी बिरह बिथा अति तेही ।।
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ।।
रामाकार भए तिन्ह के मन । मुक्त भए छूटे भव बंधन ।।
राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी।।

राम बिरह सागर मँह भरत मगन मन होत ।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत ।।

राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ।।

राम कहा सेवकन्ह बुलाई । प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।
राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि ।
देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ।।

राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ।।
राम राज बैठे त्रैलोका । हरषित भए गए सब सोका ।।
राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ।।

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं ।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ।।

राम राज कर सुख संपदा । बरनि न सकइ फनीस सारदा ।।
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती । नाना भाँति सिखावहिं नीती ।।
राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ।।
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी । कृपासिंधु बिनती कछु मोरी ।।
राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनै पारा ।।
राम अनंत अनंत गुनानी । जन्म कर्म अनंत नामानी ।।
राम चरित जे सुनत अघाहीं । रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं ।।

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर ।
नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर  ।।

राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।
राम भगति पथ परम प्रबीना । ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।।
राम कथा सो कहइ निरंतर । सादर सुनहिं बिबिधि बिहंगबर ।।
राम कृपाँ तव दरसन भयऊ।तव प्रसाद सब संसय गयऊ।

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता । हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ।।
राम कृपा आपनि जड़ताई ।कहउँ खगेस सुनहु मन लाई ।।

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्वान ।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ।।

राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ।।
राम प्रसाद भगति बर पायउँ । प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ ।।
राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ।।
राम भजन बिनु मिटहिं न कामा । थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ।।
रामु काम सत कोटि सुभग तन । दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन ।।

रामु अमित गुनसागर थाह कि पावइ कोइ ।
संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायँउ सोइ ।।

राम चरित सर सुंदर स्वामी । पायहु कहाँ कहहु नभगामी।राम बिमुख लहि बिधि सम देही । कबि कोबिद न प्रसंसहि तेही ।।
राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी ।।
रामहि भजहिं तात सिव धाता।नर पावँर कै केतिक बाता।।
राम चरन बारिज जब देखौं । तब निज जन्म सफल करि लेखौं ।।

राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ।।
रामचरित सर गुप्त सुहावा । संभु प्रसाद तात मैं पावा ।।
राम भगति जिन्ह के उर नाहीं । कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाही ।।
राम भगति अबिरल उर तोरे । बसिहि सदा प्रसाद अब मोरे
राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।।
राम भगति निरुपम निरुपाधी । बसइ जासु उर सदा अबाधी ।।
राम भजत सोइ मुकुति गोसाई । अनइच्छित आवइ बरिआई ।।
राम भगति चिंतामनि सुंदर । बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।।

राम भगति मनि उर बस जाके । दुख लवलेस न सपनेहुँ ताके ।।
राम सिंधु घन सज्जन धीरा । चंदन तरु हरि संत समीरा ।।
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा । जौं एहि भाँति बनै संजोगा ।।
राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ।।
राम कथा के तेइ अधिकारी । जिन्ह के सत संगति अति प्यारी ।।

राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान ।
भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ।।

राम कथा गिरिजा मैं बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ।।
राम उपासक जे जग माहीं । एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं ।।