शनिवार, 2 नवंबर 2019

रामायण के उन पात्रों के बारे में जिन्होंने महाभारत में भी निभाई थी भूमिका

रामायण के उन पात्रों के बारे में जिन्होंने महाभारत में भी निभाई थी भूमिका

महाकाव्य रामायण और महाभारत
महाकाव्य रामायण और महाभारत

-नहीं न तो चलिए आज हम आपको उन्हीं पात्रों के बारे में बताते हैं:

  • हनुमान:

-रामायण(Ramayan) में प्रमुख भूमिका निभाने वाले भगवान हनुमान महाभारत(Mahabharat) में महाबली भीम से पांडव के वनवास के समय मिले थे।

-कई जगह तो यह भी कहा गया है कि भीम(Bheem) और हनुमान(Hanuman) दोनों भाई हैं।

रानी सुदक्षिणा पुत्र प्राप्त करने के लिए हनुमान जी के पास आई हनुमान जी से व्याह करने के लिए ।

हनुमान जी ने कहा  तू विधवा है मैं ब्रम्हचारी हूं ।

मैं अपना ब्रम्हचर्य खंडित नही कर सकता तू वापस जा

तेरी कामना पूरी नही हो सकती ।

बदले की भावना ने उसे कही का नही छोडा

उसने योगाग्नि द्वारा अपना तन भस्म कर लिया

  • परशुराम:

-अपने समय के सबसे बड़े ज्ञानी परशुराम को कौन नहीं जानता।

रामायण महाभारत में परशुराम
रामायण महाभारत में परशुराम

-माना जाता है कि परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों को पृथ्वी से नष्ट कर दिया था।

-रामायण(Ramayan) में भी शिव का धनुष तोड़ने पर भगवान राम पर क्रोधित हुए थे।

-वहीं अगर महाभारत(Mahabharat) की बात की जाए तो उन्होंने भीष्म के साथ युद्ध किया था और कर्ण को भी ज्ञान दिया था।

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  • जाम्बवन्त:

-जिस इंजीनियर ने रामायण(Ramayan) में राम सेतु के निर्माण में अपनी प्रमुख भूमिका निभाई थी,उसी जाम्बवन्त ने महाभारत(Mahabharat) में भगवान श्रीकृष्ण के साथ युद्ध किया था।

हनुमान जी ने महाभारत में भीम को बताई थीं यह 7 ख़ास बातें
हनुमान जी ने महाभारत में भीम को बताई थीं यह 7 ख़ास बातें
  • मयासुर:

-बहुत ही कम लोगों को मालूम होगा की रावण के ससुर यानी मंदोदरी के पिता मयासुर एक ज्योतिष(Jyotish) तथा वास्तुशास्त्र(Vaastu shastra) थे।

-इन्होंने ही महाभारत(Mahabharat) में युधिष्ठिर के लिए सभाभवन का निर्माण किया जो मयसभा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

-इसी सभा के वैभव को देखकर दुर्योधन पांडवों से ईर्षा करने लगा था और कहीं न कहीं यही ईर्षा महाभारत(Mahabharat) में युद्ध का कारण बनी।

रामायण महाभारत से जुडी कथा

  • महर्षि दुर्वासा:

-हिंदुओं के एक महान ऋषि महर्षि दुर्वासा रामायण(Ramayan) में एक बहुत ही बड़े भविष्यवक्ता थे।

-इन्होंने ही रघुवंश के भविष्य सम्बंधी बहुत सारी बातें राजा दशरथ को बताई थी।

-वहीं दूसरी तरफ महाभारत(Mahabharat) में भी पांडव के निर्वासन के समय महर्षि दुर्वासा द्रोपदी की परीक्षा लेने के लिए अपने दस हजार शिष्यों के साथ उनकी कुटिया में पंहुचें थे।

  • महर्षि नारद:

-भगवान श्रीकृष्ण(Krishna) देवर्षियों में नारद को अपनी विभूति बताते है।

महर्षि नारद
महर्षि नारद

-रामायण(Ramayan), महाभारत(Mahabharat) से लेकर उपनिषद काल तक में नारद(Narad) का उल्लेख मिलता है।

  • वायु देव:

-वेदों में कई बार वर्णन किए जाने वाले वायु(Vayu) देव को भीम का पिता माना जाता है।

-साथ ही ये हनुमान(Hanuman) के आध्यात्मिक पिता भी हैं।

  • अगस्त्यमुनि:

रावण(Ravan) से युद्ध करने से पहले भगवान राम ने अगस्त्यमुनि से अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान  लिया था।

-अगस्त्यमुनि को ब्रह्मास्त्र का प्रोफेसर माना जाता है। इस वजह से महाभारत(Mahabharat) में भी उनका वर्णन मिला है।

॥ हरे रामा हरे कृष्णा ॥


कलिकाल की पांच सत्य बातें

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आचार्य डा.अजय दीक्षित
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷(  महाभारत से )

महाभारत के समय की बात है पाँचों पाण्डवों ने भगवान श्रीकृष्ण से कलियुग के बारे में चर्चा की और कलियुग के बारे में विस्तार से पुछा और जानने की इच्छा जाहिर की कि कलियुग में मनुष्य कैसा होगा, उसके व्यवहार कैसे होंगे और उसे मोक्ष कैसे प्राप्त होगा ?

इन्ही प्रश्नों का उत्तर देने के लिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ""तुम पाँचों भाई वन में जाओ और जो कुछ भी दिखे वह आकर मुझे बताओ। मैं तुम्हें उसका प्रभाव बताऊँगा।"" पाँचों भाई वन में गये।

युधिष्ठिर महाराज ने देखा कि किसी हाथी की दो सूँड है। यह देखकर आश्चर्य का पार न रहा।

अर्जुन दूसरी दिशा में गये। वहाँ उन्होंने देखा कि कोई पक्षी है, उसके पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं पर वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है यह भी आश्चर्य है !

भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और बछड़े को इतना चाट रही है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है।

सहदेव ने चौथा आश्चर्य देखा कि छः सात कुएँ हैं और आसपास के कुओं में पानी है किन्तु बीच का कुआँ खाली है। बीच का कुआँ गहरा है फिर भी पानी नहीं है।

पाँचवे भाई नकुल ने भी एक अदभुत आश्चर्य देखा कि एक पहाड़ के ऊपर से एक बड़ी शिला लुढ़कती-लुढ़कती आती और कितने ही वृक्षों से टकराई पर उन वृक्षों के तने उसे रोक न सके। कितनी ही अन्य शिलाओं के साथ टकराई पर वह रुक न सकीं। अंत में एक अत्यंत छोटे पौधे का स्पर्श होते ही वह स्थिर हो गई। पाँचों भाईयों के आश्चर्यों का कोई पार नहीं !

शाम को वे श्रीकृष्ण के पास गये और अपने अलग-अलग दृश्यों का वर्णन किया।

युधिष्ठिर कहते हैं- ""मैंने दो सूँडवाला हाथी देखा तो मेरे आश्चर्य का कोई पार न रहा।""

तब श्री कृष्ण कहते हैं- ""कलियुग में ऐसे लोगों का राज्य होगा जो दोनों ओर से शोषण करेंगे। बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ। ऐसे लोगों का राज्य होगा। इससे तुम पहले राज्य कर लो।""

अर्जुन ने आश्चर्य देखा कि पक्षी के पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं और पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है। इसी प्रकार कलियुग में ऐसे लोग रहेंगे जो बड़े- बड़े पंडित और विद्वान कहलायेंगे किन्तु वे यही देखते रहेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और हमारे नाम से संपत्ति कर जाये। ""संस्था"" के व्यक्ति विचारेंगे कि कौन सा मनुष्य मरे और संस्था हमारे नाम से हो जाये। हर जाति धर्म के प्रमुख पद पर बैठे विचार करेंगे कि कब किसका श्राद्ध है ?

चाहे कितने भी बड़े लोग होंगे किन्तु उनकी दृष्टि तो धन के ऊपर (मांस के ऊपर) ही रहेगी।

ऐसे लोगों की बहुतायत होगी जो परधन को हरने और छीनने को आतुर होंगे और कोई कोई विरला ही संत पुरूष होगा।

भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय अपने बछड़े को इतना चाटती है बछड़ा लहुलुहान हो जाता है। कलियुग का आदमी शिशुपाल हो जायेगा। बालकों के लिए इतनी ममता करेगा कि उन्हें अपने विकास का अवसर ही नहीं मिलेगा। """"किसी का बेटा घर छोड़कर साधु बनेगा तो हजारों व्यक्ति दर्शन करेंगे.... किन्तु यदि अपना बेटा साधु बनता होगा तो रोयेंगे कि मेरे बेटे का क्या होगा ?""""

इतनी सारी ममता होगी कि उसे मोहमाया और परिवार में ही बाँधकर रखेंगे और उसका जीवन वहीं खत्म हो जाएगा। अंत में बिचारा अनाथ होकर मरेगा। वास्तव में लड़के तुम्हारे नहीं हैं, वे तो बहुओं की अमानत हैं, लड़कियाँ जमाइयों की अमानत हैं और तुम्हारा यह शरीर मृत्यु की अमानत है। तुम्हारी आत्मा-परमात्मा की अमानत है ।

तुम अपने शाश्वत संबंध को जान लो बस !

सहदेव ने चौथा आश्चर्य यह देखा कि पाँच सात भरे कुएँ के बीच का कुआँ एक दम खाली ! कलियुग में धनाढय लोग लड़के-लड़की के विवाह में, मकान के उत्सव में, छोटे-बड़े उत्सवों में तो लाखों रूपये खर्च कर देंगे परन्तु पड़ोस में ही यदि कोई भूखा प्यासा होगा तो यह नहीं देखेंगे कि उसका पेट भरा है या नहीं। दूसरी और मौज-मौज में, शराब, कबाब, फैशन और व्यसन में पैसे उड़ा देंगे। किन्तु किसी के दो आँसूँ पोंछने में उनकी रूचि न होगी और जिनकी रूचि होगी उन पर कलियुग का प्रभाव नहीं होगा, उन पर भगवान का प्रभाव होगा।

पाँचवा आश्चर्य यह था कि एक बड़ी चट्टान पहाड़ पर से लुढ़की, वृक्षों के तने और चट्टाने उसे रोक न पाये किन्तु एक छोटे से पौधे से टकराते ही वह चट्टान रूक गई। कलियुग में मानव का मन नीचे गिरेगा, उसका जीवन पतित होगा। यह पतित जीवन धन की शिलाओं से नहीं रूकेगा न ही सत्ता के वृक्षों से रूकेगा। किन्तु हरिनाम के एक छोटे से पौधे से, हरि कीर्तन के एक छोटे से पौधे से मनुष्य जीवन का पतन होना रूक जायेगा।
🙏🏻🌷🥀🌷🥀🙏    🙏🏻🌹🌾🥀शुभ रात्रि 🌹🥀🌾🙏🏻

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

रावण विद्वान था जबकि हनुमान जी, विद्यावान थे। एक रोचक कथा-

रावण विद्वान था जबकि हनुमान जी, विद्यावान थे। 
एक रोचक कथा-
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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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*विद्वान और विद्यावान में अन्तर*

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
एक होता है विद्वान और एक विद्यावान।

दोनों में आपस में बहुत अन्तर है। इसे
हम ऐसे समझ सकते हैं, रावण विद्वान है और हनुमान जी विद्यावान हैं।

रावण के दस सिर हैं। चार वेद और छह: शास्त्र दोनों मिलाकर दस हैं। इन्हीं को दस सिर कहा गया है। जिसके सिर में ये दसों भरे हों, वही दस शीश हैं।

रावण वास्तव में विद्वान है लेकिन विडम्बना क्या है ?
सीता जी का हरण करके ले आया। कईं बार विद्वान लोग अपनी विद्वता के कारण दूसरों को शान्ति से नहीं रहने देते। उनका अभिमान दूसरों की सीता रुपी शान्ति का हरण कर लेता है और हनुमान जी उन्हीं खोई हुई सीता रुपी शान्ति को वापिस भगवान से मिला देते हैं।

*हनुमान जी ने कहा*
विनती करउँ जोरि कर रावन।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा कि मैं विनती करता हूँ, तो क्या हनुमान जी में बल नहीं है ?
नहीं, ऐसी बात नहीं है। विनती दोनों करते हैं।
जो भय से भरा हो या भाव से भरा हो।

रावण ने कहा कि तुम क्या, यहाँ देखो कितने लोग हाथ जोड़कर मेरे सामने खड़े हैं।
कर जोरे सुर दिसिप विनीता।
भृकुटी विलोकत सकल सभीता॥
यही विद्वान और विद्यावान में अन्तर है।

हनुमान जी गये, रावण को समझाने। यही विद्वान और विद्यावान का मिलन है।

रावण के दरबार में देवता और दिग्पाल भय से हाथ जोड़े खड़े हैं और भृकुटी की ओर देख रहे हैं।
परन्तु हनुमान जी भय से हाथ जोड़कर नहीं खड़े हैं। रावण ने कहा भी - 
कीधौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।
देखउँ अति असंक सठ तोही॥

रावण ने कहा - “तुमने मेरे बारे में सुना नहीं है ? तू बहुत निडर दिखता है !”

हनुमान जी बोले – “क्या यह जरुरी है कि तुम्हारे सामने जो आये, वह डरता हुआ आये ?”
रावण बोला – “देख लो, यहाँ जितने देवता और अन्य खड़े हैं, वे सब डरकर ही खड़े हैं।”
हनुमान जी बोले - “उनके डर का कारण है, वे तुम्हारी भृकुटी की ओर देख रहे हैं।”
 भृकुटी विलोकत सकल सभीता।
परन्तु मैं भगवान राम की भृकुटी की ओर देखता हूँ।
उनकी भृकुटी कैसी है ? बोले,

भृकुटी विलास सृष्टि लय होई।
सपनेहु संकट परै कि सोई॥

जिनकी भृकुटी टेढ़ी हो जाये तो प्रलय हो जाए और उनकी ओर देखने वाले पर स्वप्न में भी संकट नहीं आए।
मैं उन श्रीराम जी की भृकुटी की ओर देखता हूँ।
रावण बोला - “यह विचित्र बात है। जब राम जी की भृकुटी की ओर देखते हो तो हाथ हमारे आगे क्यों जोड़ रहे हो ?

विनती करउँ जोरि कर रावन।
हनुमान जी बोले – “यह तुम्हारा भ्रम है। हाथ तो मैं उन्हीं को जोड़ रहा हूँ।”

रावण बोला - “वह यहाँ कहाँ हैं ?”

हनुमान जी ने कहा कि
“यही समझाने आया हूँ।"
मेरे प्रभु राम जी ने कहा था -
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमन्त।
मैं सेवक सचराचर रुप स्वामी भगवन्त॥

भगवान ने कहा है कि सबमें मुझको देखना। इसीलिए मैं तुम्हें नहीं, तुझ में भी भगवान को ही देख रहा हूँ ।” इसलिए हनुमान जी कहते हैं -
खायउँ फल प्रभु लागी भूखा।
और सबके देह परम प्रिय स्वामी॥

हनुमान जी रावण को प्रभु और स्वामी कहते हैं और रावण -
मृत्यु निकट आई खल तोही।
लागेसि अधम सिखावन मोही॥

रावण खल और अधम कहकर हनुमान जी को सम्बोधित करता है।
यही विद्यावान का लक्षण है कि अपने को गाली देने वाले में भी जिसे भगवान दिखाई दे, वही विद्यावान है।

*विद्यावान का लक्षण है* - 
विद्या ददाति विनयं।
विनयाति याति पात्रताम्॥

पढ़ लिखकर जो *विनम्र* हो जाये,
वह *विद्यावान* और जो पढ़ लिखकर
*अकड़* जाये, वह *विद्वान*।

तुलसी दास जी कहते हैं -
बरसहिं जलद भूमि नियराये।
जथा नवहिं वुध विद्या पाये॥

जैसे बादल जल से भरने पर नीचे आ जाते हैं, वैसे विचारवान व्यक्ति विद्या पाकर विनम्र हो जाते हैं।
इसी प्रकार *हनुमान जी हैं - विनम्र* और *रावण है - विद्वान*।

यहाँ प्रश्न उठता है कि विद्वान कौन है ?

इसके उत्तर में कहा गया है कि जिसकी दिमागी क्षमता तो बढ़ गयी, परन्तु दिल खराब हो, हृदय में अभिमान हो, वही विद्वान है और अब प्रश्न है कि

विद्यावान कौन है ?

उत्तर में कहा गया है कि *जिसके हृदय*
में *भगवान हो* और जो दूसरों के हृदय
में भी भगवान को बिठाने की बात करे, वही विद्यावान है।

हनुमान जी ने कहा – “रावण ! और तो ठीक है, पर तुम्हारा दिल ठीक नहीं है।
कैसे ठीक होगा ? कहा कि 
राम चरन पंकज उर धरहू।
लंका अचल राज तुम करहू॥

अपने हृदय में राम जी को बिठा लो
और फिर मजे से लंका में राज करो।

यहाँ हनुमान जी रावण के हृदय में भगवान को बिठाने की बात करते हैं, इसलिए वे विद्यावान हैं।

सीख :- विद्वान ही नहीं बल्कि “विद्यावान” बनने का प्रयत्न करे।

सिर्फ खूबसूरती ही नहीं, भाग्य भी बढ़ाता है सोलह श्रृंगार ।

सिर्फ खूबसूरती ही नहीं, भाग्य भी बढ़ाता है सोलह श्रृंगार ।
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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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1 सोलह श्रृंगार के बारें में ये सब नहीं जानते होंगे आप
आपको शायद जानकर हैरानी हो की सोलह शृंगार घर मे सुख और समृद्धि की लाने के लिए किया जाता है। शृंगार अगर पवित्रता और दिव्यता के हिसाब से किया जाए तो यह प्रेम और अहिंसा का सहायक बनकर समाज में सौम्यता और प्यार का वाहक बनता है। तभी तो भारतीय संस्कृति में सोलह शृंगार को जीवन का अहम और अभिन्न अंग माना गया है। ऋग्वेद में सौभाग्य के लिए किए जा रहे सोलह शृंगारों के बारे में बताया गया है। आईए जानते हैं श्रृंगार के बारे में कुछ रोचक तथ्य...

पहला श्रृंगार: बिंदी
संस्कृत भाषा के बिंदु शब्द से बिंदी की उत्पत्ति हुई है। भवों के बीच रंग या कुमकुम से लगाई जाने वाली भगवान शिव के तीसरे नेत्र का प्रतीक मानी जाती है। सुहागिन स्त्रियां कुमकुम या सिंदूर से अपने ललाट पर लाल बिंदी लगाना जरूरी समझती हैं। इसे परिवार की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

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दूसरा श्रृंगार: सिंदूर
उत्तर भारत में लगभग सभी प्रांतों में सिंदूर को स्त्रियों का सुहाग चिन्ह माना जाता है और विवाह के अवसर पर पति अपनी पत्नी के मांग में सिंदूर भर कर जीवन भर उसका साथ निभाने का वचन देता है।

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तीसरा श्रृंगार: काजल
काजल आँखों का श्रृंगार है. इससे आँखों की सुन्दरता तो बढ़ती ही है, काजल दुल्हन और उसके परिवार को लोगों की बुरी नजर से भी बचाता है.

चौथा श्रृंगार: मेहंदी
मेहंदी के बिना सुहागन का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। शादी के वक्त दुल्हन और शादी में शामिल होने वाली परिवार की सुहागिन स्त्रियां अपने पैरों और हाथों में मेहंदी रचाती है। ऐसा माना जाता है कि नववधू के हाथों में मेहंदी जितनी गाढ़ी रचती है, उसका पति उसे उतना ही ज्यादा प्यार करता है।

पांचवां श्रृंगार: शादी का जोड़ा
उत्तर भारत में आम तौर से शादी के वक्त दुल्हन को जरी के काम से सुसज्जित शादी का लाल जोड़ा (घाघरा, चोली और ओढ़नी) पहनाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में फेरों के वक्त दुल्हन को पीले और लाल रंग की साड़ी पहनाई जाती है। इसी तरह महाराष्ट्र में हरा रंग शुभ माना जाता है और वहां शादी के वक्त दुल्हन हरे रंग की साड़ी मराठी शैली में बांधती हैं।

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छठा श्रृंगार: गजरा
दुल्हन के जूड़े में जब तक सुगंधित फूलों का गजरा न लगा हो तब तक उसका श्रृंगार फीका सा लगता है। दक्षिण भारत में तो सुहागिन स्त्रियां प्रतिदिन अपने बालों में हरसिंगार के फूलों का गजरा लगाती है।

सातवां श्रृंगार: मांग टीका
मांग के बीचों-बीच पहना जाने वाला यह स्वर्ण आभूषण सिंदूर के साथ मिलकर वधू की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। ऐसी मान्यता है कि नववधू को मांग टीका सिर के ठीक बीचों-बीच इसलिए पहनाया जाता है कि वह शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और वह बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय ले सके।

आठवां श्रृंगार: नथ
विवाह के अवसर पर पवित्र अग्नि में चारों ओर सात फेरे लेने के बाद देवी पार्वती के सम्मान में नववधू को नथ पहनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि सुहागिन स्त्री के नथ पहनने से पति के स्वास्थ्य और धन-धान्य में वृद्धि होती है। उत्तर भारतीय स्त्रियां आमतौर पर नाक के बायीं ओर ही आभूषण पहनती है, जबकि दक्षिण भारत में नाक के दोनों ओर नाक के बीच के हिस्से में भी छोटी-सी नोज रिंग पहनी जाती है, जिसे बुलाक कहा जाता है।

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आठवां श्रृंगार: नथ
नथ आकार में काफी बड़ी होती है इसे हमेशा पहने रहना असुविधाजनक होता है, इसलिए सुहागन स्त्रियां इसे शादी-व्याह और तीज-त्यौहार जैसे खास अवसरों पर ही पहनती हैं, लेकिन सुहागिन स्त्रियों के लिए नाक में आभूषण पहनना अनिर्वाय माना जाता है। इसलिए आम तौर पर स्त्रियां नाक में छोटी नोजपिन पहनती हैं, जो देखने में लौंग की आकार का होता है। इसलिए इसे लौंग भी कहा जाता है।

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नौवां श्रृंगार: कर्णफूल
कान में पहने जाने वाला यह आभूषण कई तरह की सुंदर आकृतियों में होता है, जिसे चेन के सहारे जुड़े में बांधा जाता है। विवाह के बाद स्त्रियों का कानों में कणर्फूल (ईयरिंग्स) पहनना जरूरी समझा जाता है। इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि विवाह के बाद बहू को दूसरों की, खासतौर से पति और ससुराल वालों की बुराई करने और सुनने से दूर रहना चाहिए।

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दसवां श्रृंगार: हार
गले में पहना जाने वाला सोने या मोतियों का हार पति के प्रति सुहागन स्त्री के वचनवद्धता का प्रतीक माना जाता है। हार पहनने के पीछे स्वास्थ्यगत कारण हैं। गले और इसके आस-पास के क्षेत्रों में कुछ दबाव बिंदु ऐसे होते हैं जिनसे शरीर के कई हिस्सों को लाभ पहुंचता है। इसी हार को सौंदर्य का रूप दे दिया गया है और श्रृंगार का अभिन्न अंग बना दिया है। दक्षिण और पश्चिम भारत के कुछ प्रांतों में वर द्वारा वधू के गले में मंगल सूत्र पहनाने की रस्म की वही अहमियत है।

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ग्यारहवां श्रृंगार: बाजूबंद
कड़े के सामान आकृति वाला यह आभूषण सोने या चांदी का होता है। यह बाहों में पूरी तरह कसा जाता है। इसलिए इसे बाजूबंद कहा जाता है। पहले सुहागिन स्त्रियों को हमेशा बाजूबंद पहने रहना अनिवार्य माना जाता था और यह सांप की आकृति में होता था। ऐसी मान्यता है कि स्त्रियों को बाजूबंद पहनने से परिवार के धन की रक्षा होती और बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।

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बारहवां श्रृंगार: कंगन और चूड़ियां
सोने का कंगन अठारहवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों से ही सुहाग का प्रतीक माना जाता रहा है। हिंदू परिवारों में सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि सास अपनी बड़ी बहू को मुंह दिखाई रस्म में सुख और सौभाग्यवती बने रहने का आशीर्वाद के साथ वही कंगन देती थी, जो पहली बार ससुराल आने पर उसे उसकी सास ने उसे दिये थे। इस तरह खानदान की पुरानी धरोहर को सास द्वारा बहू को सौंपने की परंपरा का निर्वाह पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।

15 
बारहवां श्रृंगार: कंगन और चूड़ियां
पंजाब में स्त्रियां कंगननुमा डिजाइन का एक विशेष पारंपरिक आभूषण पहनती है, जिसे लहसुन की पहुंची कहा जाता है। सोने से बनी इस पहुंची में लहसुन की कलियां और जौ के दानों जैसे आकृतियां बनी होती है। हिंदू धर्म में मगरमच्छ, हांथी, सांप, मोर जैसी जीवों का विशेष स्थान दिया गया है। उत्तर भारत में ज्यादातर स्त्रियां ऐसे पशुओं के मुखाकृति वाले खुले मुंह के कड़े पहनती हैं, जिनके दोनों सिरे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।

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बारहवां श्रृंगार: कंगन और चूड़ियां
पारंपरिक रूप से ऐसा माना जात है कि सुहागिन स्त्रियों की कलाइयां चूड़ियों से भरी हानी चाहिए। यहां तक की सुहागन स्त्रियां चूड़ियां बदलते समय भी अपनी कलाई में साड़ी का पल्लू कलाई में लपेट लेती हैं ताकि उनकी कलाई एक पल को भी सूनी न रहे। ये चूड़ियां आमतौर पर कांच, लाख और हांथी दांत से बनी होती है। इन चूड़ियों के रंगों का भी विशेष महत्व है।

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बारहवां श्रृंगार: कंगन और चूड़ियां
नवविवाहिता के हाथों में सजी लाल रंग की चूड़ियां इस बात का प्रतीक होती हैं कि विवाह के बाद वह पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। हरा रंग शादी के बाद उसके परिवार के समृद्धि का प्रतीक है। होली के अवसर पर पीली या बंसती रंग की चूड़ियां पहनी जाती है, तो सावन में तीज के मौके पर हरी और धानी चूड़ियां पहनने का रीवाज सदियों से चला आ रहा है। विभिन्न राज्यों में विवाह के मौके पर अलग-अलग रंगों की चूड़ियां पहनने की प्रथा है।

18 
तेरहवां श्रृंगार: अंगूठी
शादी के पहले मंगनी या सगाई के रस्म में वर-वधू द्वारा एक-दूसरे को अंगूठी को सदियों से पति-पत्नी के आपसी प्यार और विश्वास का प्रतीक माना जाता रहा है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथ रामायण में भी इस बात का उल्लेख मिलता है। सीता का हरण करके रावण ने जब सीता को अशोक वाटिका में कैद कर रखा था तब भगवान श्रीराम ने हनुमानजी के माध्यम से सीता जी को अपना संदेश भेजा था। तब स्मृति चिन्ह के रूप में उन्होंनें अपनी अंगूठी हनुमान जी को दी थी।

19
चौदहवां श्रृंगार: कमरबंद
कमरबंद कमर में पहना जाने वाला आभूषण है, जिसे स्त्रियां विवाह के बाद पहनती हैं, इससे उनकी छरहरी काया और भी आकर्षक दिखाई पड़ती है। सोने या चांदी से बने इस आभूषण के साथ बारीक घुंघरुओं वाली आकर्षक की रिंग लगी होती है, जिसमें नववधू चाबियों का गुच्छा अपनी कमर में लटकाकर रखती है। कमरबंद इस बात का प्रतीक है कि सुहागन अब अपने घर की स्वामिनी है।

20 
पंद्रहवां श्रृंगार: अंगूठा और बिछुआ
पैरों के अंगूठे में रिंग की तरह पहने जाने वाले इस आभूषण को अरसी या अंगूठा कह जाता है। पारंपरिक रूप से पहने जाने वाले इस आभूषण में छोटा सा शीशा लगा होता है, पुराने जमाने में संयुक्त परिवारों में नववधू सबके सामने पति के सामने देखने में बी सरमाती थी। इसलिए वह नजरें झुकाकर चुपचाप आसपास खड़े पति की सूरत को इसी शीशे में निहारा करती थी।

21 
पंद्रहवां श्रृंगार: अंगूठा और बिछुआ
पैरों के अंगूठे और छोटी अंगुली को छोड़कर बीच की तीन अंगुलियों में चांदी का विछुआ पहना जाता है। शादी में फेरों के वक्त लड़की जब सिलबट्टे पर पेर रखती है, तो उसकी भाभी उसके पैरों में बिछुआ पहनाती है। यह रस्म इस बात का प्रतीक है कि दुल्हन शादी के बाद आने वाली सभी समस्याओं का हिम्मत के साथ मुकाबला करेगी।

22 
सोलहवां श्रृंगार: पायल
पैरों में पहने जाने वाले इस आभूषण की सुमधुर ध्वनि से घर के हर सदस्य को नववधू की आहट का संकेत मिलता है। पुराने जमाने में पायल की झंकार से घर के बुजुर्ग पुरुष सदस्यों को मालूम हो जाता था कि बहू आ रही है और वे उसके रास्ते से हट जाते थे। पायल के संबंध में एक और रोचक बात यह है कि पहले छोटी उम्र में ही लड़िकियों की शादी होती थी। और कई बार जब नववधू को माता-पिता की याद आती थी तो वह चुपके से अपने मायके भाग जाती थी।

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सोलहवां श्रृंगार: पायल
इसलिए नववधू के पैरों में ढेर सारी घुंघरुओं वाली पाजेब पहनाई जाती थी ताकि जब वह घर से भागने लगे तो उसकी आहट से मालूम हो जाए कि वह कहां जा रही है पैरों में पहने जाने वाले आभूषण हमेशा सिर्फ चांदी से ही बने होते हैं। हिंदू धर्म में सोना को पवित्र धातु का स्थान प्राप्त है, जिससे बने मुकुट देवी-देवता धारण करते हैं और ऐसी मान्यता है कि पैरों में सोना पहनने से धन की देवी-लक्ष्मी का अपमान होता है।

श्रीराम के लिए हनुमानजी ने धारण किए विविध रूप ।

श्रीराम के लिए हनुमानजी ने धारण किए विविध रूप ।
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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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ॐ नमो वायुपुत्राय भीमरूपाय धीमते।
नमस्ते रामदूताय कामरूपाय श्रीमते।।

अर्थात्–ॐ भयंकर रूपधारी, बुद्धिमान, वायुपुत्र और स्वेच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ श्रीरामदूत हनुमान को नमस्कार है।

अपने इष्ट श्रीराम की कार्यसिद्धि के लिए रुद्र बने हनुमान। भगवान श्रीराम के कार्य-सम्पादन के लिए व दास्य-भक्ति का रस चखने के लिए परब्रह्म रुद्र ने हनुमानजी के रूप में शरीर धारण किया था।

 ॐकार में मकार उन्हीं का रूप है, मकार शिव का वाचक है–
मकाराक्षरसम्भूत: शिवस्तु हनुमान् स्मृत:।
हनुमानजी की विशेषता यह थी कि वे बड़े ही सुन्दर और विभिन्न प्रकार के रूप धारण कर लिया करते थे। 

श्रीहनुमान के रूप का निश्चित आकार-प्रकार नहीं है। कहीं वे अत्यन्त सूक्ष्म हैं तो कहीं बृहत् से भी बृहत्। हनुमानजी के विशाल शरीर की छाया दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी तथा वेगयुक्त थी।

‘हनुमानजी का अनुसरण करने वाली उनकी वह छाया खारे पानी के समुद्र में पड़ी हुई श्वेत बादलों की पंक्ति के समान लगती थी।’
हनुमानजी के सूक्ष्म, विकट और भीम रूप
हनुमानजी के सूक्ष्म, विकट और भीम आदि अनेक रूपों का वर्णन मिलता है। 

उन्होंने अशोकवाटिका में सीताजी को सूक्ष्मरूप दिखाया, विकटरूप धारणकर लंका जलायी तथा भीमरूप प्रकट कर असुरों का संहार किया–
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे। (हनुमानचालीसा)

सीताजी का पता लगाने के लिए लंका जाते समय सुरसा के विशाल शरीर और मुख को देखकर हनुमानजी ने अत्यन्त लघुरुप धारण कर लिया–’अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।’ (मानस ५।१।५)
लंका में प्रवेश करते समय हनुमानजी ने मशक के समान अति लघुरूप धारण किया–
मसक समान रूप कपि धरी।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।। (रामचरितमानस ५।४।१)

अशोकवाटिका में सीताजी के समक्ष प्रकट होते समय हनुमानजी के रूप का बहुत ही भव्य वर्णन ‘श्रीरंगनाथ रामायण’ में किया गया है–
‘हनुमानजी अंगुष्ठमात्र का आकार ग्रहण कर उस अशोकवृक्ष पर चढ़ गए। 

बालक के रूप में वटवृक्ष के पत्रों में शयन करने वाले भगवान विष्णु के समान वे श्रेष्ठ वानर उस वृक्ष की घनी शाखाओं में बड़ी कुशलता के साथ छिपकर बैठ गए और उन विशालाक्षी सीताजी को बार-बार ध्यान से देखने लगे।’

किष्किन्धा के लिए प्रस्थान करते समय सीताजी से चूड़ामणि लेने से पहले उनका विश्वास प्राप्त करने के लिए हनुमानजी ने अपना विश्वरूप दिखाया जो विन्ध्याचल के समान विशाल दीख पड़ता था।

वाल्मीकिरामायण में उनके शरीर को वज्र के समान सुदृढ़ बतलाया गया है, इसलिए उन्हें ‘वज्रकाय’ भी कहते हैं। वज्रदेहरूप में उनकी स्तुति का मन्त्र है–‘विहंगमाय शर्वाय वज्रदेहाय ते नम:।।’

समुद्र लांघने के लिए हनुमानजी ने जो भयानक रूप धारण किया, उसका बहुत सुन्दर वर्णन वाल्मीकीय रामायण में किया गया है– ‘जिस प्रकार पूर्णिमा के दिन समुद्र बढ़ता है, उसी प्रकार भगवान श्रीराम की कार्यसिद्धि के लिए श्रीहनुमान बढ़ने लगे। 

समुद्र लांघने की इच्छा से उन्होंने अपने शरीर को बहुत बढ़ा लिया और अपनी भुजाओं एवं चरणों से उस पर्वत को दबाया तो वह पर्वत कांप उठा……..जब उन्होंने उछाल मारी तो उनकी जांघों के वेग से टूटे हुए वृक्ष इस प्रकार उनके पीछे चले, जैसे राजा के पीछे सेना चलती है।’

तुलसीदासजी का कहना है कि ‘जिस पहाड़ पर हनुमानजी चरण रखते थे, वह उसी क्षण पाताल में चला जाता था’–
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।। (मानस ५।१।४)

हनुमानजी वानरसेना से कहते हैं– ‘जिनके नाम का एक बार स्मरण करने से ही मनुष्य अपार संसार-सागर को पारकर उनके धाम को चला जाता है, उन्हीं भगवान श्रीराम का दूत, उनके हाथ की मुद्रिका लिए हुए, हृदय में उन्हीं का ध्यान करता हुआ मैं यदि इस छोटे से समुद्र को लांघ जाऊं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है।’

साहब तें सेवक बड़ो जो निज धरम सुजान।
राम बांधि उतरे उदधि लांघि गए हनुमान।।

हनुमानजी कहीं वानरदेह में तो कहीं मानवदेह में हुए प्रकट,गंधमादन पर्वत पर भीम हनुमानजी का विन्ध्यपर्वत के समान अत्यन्त भयंकर और अद्भुत शरीर देखकर घबरा गए। हनुमानजी ने भीम से कहा कि ‘हमलोग तो पशुयोनि के प्राणी है’।

श्रीरामचरितमानस के अनुसार किष्किन्धा में श्रीराम से मिलने हनुमानजी विप्र-वेष धारण करके गए थे–‘विप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ।’
हनुमानजी ने विप्ररूप धारणकर ही विभीषण से भेंट की थी–‘बिप्ररूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।’

अध्यात्मरामायण के अनुसार हनुमानजी नन्दिग्राम में भरतजी को भगवान श्रीराम के आगमन का संदेश सुनाने मनुष्य-शरीर धारणकर गए थे।

चित्रकूट में तुलसीदासजी को दिया दर्शन
चित्रकूट में गोस्वामी तुलसीदासजी को श्रीराम-लक्ष्मण के दर्शन के बाद श्रीहनुमानजी ने प्रकट होकर बतलाया था कि उन्हें श्रीराम ने दर्शन दिया पर वे उन्हें पहिचान न सके।

 तुलसीदासजी ने हनुमानजी के रूप का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है–
स्वर्न-सैल-संकास कोटि रबि-तरुन-तेज-घन।
उर बिसाल, भुजदंड चंड नख बज्र बज्रतन।।
पिंग नयन, भृकुटी कराल, रसना दसनानन।
कपिस केस, करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन।। (श्रीहनुमानबाहुक)

समर्थ गुरुरामदास को श्रीहनुमान ने दिखाया अपना महाकाय रूप। संत समर्थ रामदास प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्त से सूर्योदय तक गोदावरी के जल में खड़े होकर श्रीराम-नाम का जप किया करते थे। उस समय तट पर स्थित अशोकवृक्ष पर एक बंदर बैठा रहता था। बारह वर्षों तक यह क्रम चलता रहा।

 तेरह करोड़ जप पूर्ण होने पर रामदासजी को ध्यान में ऐसा अनुभव हुआ कि वह बंदर उनके सामने आकर उनके हृदय में प्रवेश कर गया। जब उन्होंने नेत्र खोले, तब सामने एक बंदर को देखा। कुछ ही देर में उस बंदर ने महाकाय रूप धारण कर लिया। 

इस प्रकार श्रीहनुमान ने रामदासजी को अपने स्वरूप का दर्शन करा कर कृतार्थ कर दिया।
भगवान शंकर कहते हैं–
हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।।
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।। (मानस ७।५०।४-५)

स्वयं वानर होने पर भी दास्य-भक्ति के प्रताप से हनुमानजी देवता बन गए। यह सिद्धि दूसरा अन्य कोई प्राप्त नहीं कर सका।

श्री शिव लिंगाष्टकम भावार्थ सहित।

श्री शिव लिंगाष्टकम भावार्थ सहित।
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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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लिंगाष्टकम भगवान भोलेनाथ के लिंगस्वरूप की स्तुति कर भोलेनाथ  करने का उत्तम अष्टक है, जो कोई भक्त पूर्ण आस्था तथा श्रृद्धा सहित भोले बाबा के लिंगाष्टकम का पाठ करेगा उसकी सभी मनोकामना तथा इच्छाओं की पूर्ति स्वयं शिव शंकर  करते हैं,  श्री शिव लिंगाष्टकम अर्थ सहित इस प्रकार है:-
   
ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगम्
निर्मलभासित शोभित लिंगम्।
जन्मज दुःख विनाशक लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥1॥

भावार्थः- जो ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवगणों के इष्टदेव हैं, जो परम पवित्र, निर्मल, तथा सभी जीवों की मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं और जो लिंग के रूप में चराचर जगत में स्थापित हुए हैं, जो संसार के संहारक है और जन्म और मृत्यु के दुखो का विनाश करते है ऐसे भगवान आशुतोष को नित्य निरंतर प्रणाम है |

देवमुनि प्रवरार्चित लिंगम्
कामदहन करुणाकर लिंगम्।
रावणदर्प विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥2॥

भावार्थः- भगवान सदाशिव जो मुनियों और देवताओं के परम आराध्य देव हैं, तथा देवो और मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं, जो काम (वह कर्म जिसमे विषयासक्ति हो) का विनाश करते हैं, जो दया और करुना के सागर है तथा जिन्होंने लंकापति रावन के अहंकार का विनाश किया था, ऐसे परमपूज्य महादेव के लिंग रूप को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ |

सर्वसुगन्धि सुलेपित लिंगम्
बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्।
सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गम्
 तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥3॥

भावार्थः- लिंगमय स्वरूप जो सभी तरह के सुगन्धित इत्रों से लेपित है, और जो बुद्धि तथा आत्मज्ञान में वृद्धि का कारण है, शिवलिंग जो सिद्ध मुनियों और देवताओं और दानवों सभी के द्वारा पूजा जाता है, ऐसे अविनाशी लिंग स्वरुप को प्रणाम है |

कनक महामणि भूषित लिंगम्
फणिपति वेष्टित शोभित लिंगम् ।
दक्ष सुयज्ञ विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥4॥

भावार्थः- लिंगरुपी आशुतोष जो सोने तथा रत्नजडित आभूषणों से सुसज्जित है, जो चारों ओर से सर्पों से घिरे हुए है, तथा जिन्होंने प्रजापति दक्ष (माता सती के पिता) के यज्ञ का विध्वस किया था, ऐसे लिंगस्वरूप श्रीभोलेनाथ को बारम्बार प्रणाम |

कुंकुम चन्दन लेपित लिंगम् 
पंकज हार सुशोभित लिंगम् । 
सञ्चित पाप विनाशन लिंगम्  
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥5॥

भावार्थः- देवों के देव जिनका लिंगस्वरुप कुंकुम और चन्दन से सुलेपित है और कमल के सुंदर हार से शोभायमान है, तथा जो संचित पापकर्म का लेखा-जोखा मिटने में सक्षम है, ऐसे आदि-अन्नत भगवान शिव के लिंगस्वरूप को मैं नमन करता हूँ |

देवगणार्चित सेवित लिंगम्
भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्। 
दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम् 
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥6॥

भावार्थः- जो सभी देवताओं तथा देवगणों द्वारा पूर्ण श्रृद्धा एवं भक्ति भाव से परिपूर्ण तथा पूजित है, जो हजारों सूर्य के समान तेजस्वी है, ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को प्रणाम है |

अष्टदलो परिवेष्टित लिंगम् 
सर्व समुद्भव कारण लिंगम्।
अष्टदरिद्र विनाशित लिंगम् 
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥7॥

भावार्थः- जो पुष्प के आठ दलों (कलियाँ) के मध्य में विराजमान है, जो सृष्टि में सभी घटनाओं (उचित-अनुचित) के रचियता हैं, और जो आठों प्रकार की दरिद्रता का हरण करने वाले ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूँ |

सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगम् 
सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम्।
परात्परं परमात्मक लिंगम् 
तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥8॥

भावार्थः- जो देवताओं के गुरुजनों तथा सर्वश्रेष्ठ देवों द्वारा पूजनीय है, और जिनकी पूजा दिव्य-उद्यानों के पुष्पों से कि जाती है, तथा जो परमब्रह्म है जिनका न आदि है और न ही अंत है ऐसे अनंत अविनाशी लिंगस्वरूप भगवान भोलेनाथ को मैं सदैव अपने ह्रदय में स्थित कर प्रणाम करता हूँ | 

लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

भावार्थः- जो कोई भी इस लिंगाष्टकम को शिव या शिवलिंग के समीप श्रृद्धा सहित पाठ करेगा उसको शिवलोक प्राप्त होता है तथा भगवान भोलेनाथ उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

जानिये घर में किस चीज़ की धूनी (धूप) करने से होता है क्या फायदा✴️✴️✴️

जानिये घर में किस चीज़ की धूनी (धूप) करने से होता है क्या फायदा
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आचार्य डा.अजय दीक्षित
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 घरों में धूनी (धूप) देने की परंपरा काफी प्राचीन है। धूप देने से मन को शांति और प्रसन्नता मिलती है। साथ ही, मानसिक तनाव दूर करने में भी इससे बहुत लाभ मिलता है। घरों में धूनी देने के लिए कई तरह की चीज़ें आती है। आइए जानते है किस चीज़ की धूनी करने से क्या फायदे होते है।

1- कर्पूर और लौंग

रोज़ाना सुबह और शाम घर में कर्पूर और लौंग जरूर जलाएं। आरती या प्रार्थना के बाद कर्पूर जलाकर उसकी आरती लेनी चाहिए। इससे घर के वास्तुदोष ख़त्म होते हैं। साथ ही पैसों की कमी नहीं होती।

2- गुग्गल की धूनी

हफ्ते में 1 बार किसी भी दिन घर में कंडे जलाकर गुग्गल की धूनी देने से गृहकलह शांत होता है। गुग्गल सुगंधित होने के साथ ही दिमाग के रोगों के लिए भी लाभदायक है।

3- पीली सरसों

पीली सरसों, गुग्गल, लोबान, गौघृत को मिलाकर सूर्यास्त के समय उपले (कंडे) जलाकर उस पर ये सारी सामग्री डाल दें। नकारात्मकता दूर हो जाएगी।

4- धूपबत्ती

घर में पैसा नहीं टिकता हो तो रोज़ाना महाकाली के आगे एक धूपबत्ती लगाएं। हर शुक्रवार को काली के मंदिर में जाकर पूजा करें।

5- नीम के पत्ते

घर में सप्ताह में एक या दो बार नीम के पत्ते की धूनी जलाएं। इससे जहां एक और सभी तरह के जीवाणु नष्ट हो जाएंगे। वही वास्तुदोष भी समाप्त हो जाएगा।

6- षोडशांग धूप

अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागर, चंदन, इलायची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गल, ये सोलह तरह के धूप माने गए हैं। इनकी धूनी से आकस्मिक दुर्घटना नहीं होती है।

7- लोबान धूनी

लोबान को सुलगते हुए कंडे या अंगारे पर रख कर जलाया जाता है, लेकिन लोबान को जलाने के नियम होते हैं इसको जलाने से पारलौकिक शक्तियां आकर्षित होती है। इसलिए बिना विशेषज्ञ से पूछे इसे न जलाएं।

8- दशांग धूप

चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे दशांग धूप कहते हैं। इससे घर में शांति रहती है।

9- गायत्री केसर

घर पर यदि किसी ने कुछ तंत्र कर रखा है तो जावित्री, गायत्री केसर लाकर उसे कूटकर मिला लें। इसके बाद उसमें उचित मात्रा में गुग्गल मिला लें। अब इस मिश्रण की धुप रोज़ाना शाम को दें। ऐसा 21 दिन तक करें।