मंगलवार, 7 मई 2019

कथा नर और नारायण की

कथा नर और नारायण की
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प्रभु श्री कृष्ण जी को अर्जुन सबसे प्रिय इसलिए थे कि वो नर के अवतार थे और श्री कृष्ण स्वयं नारायण थे।
आपने नर और नारायण का नाम तो सुना ही होगा।

भारत का शिरोमुकुट हिमालय है, जो समस्त पर्वतों का पति होने से गिरिराज कहलाता है उसी के एक उत्तुंग शिखर के प्रांगण में बद्रिकाश्रम या बदरीवन है।  वहाँ पर इन चर्म चक्षुओं से न दीखने वाला बदरी का एक विशाल वृक्ष है, इसी प्रकार का प्रयाग में अक्षयवट है।  बदरी वृक्ष में लक्ष्मी का वास है, इसीलिये लक्ष्मीपति को यह दिव्य वृक्ष अत्यन्त प्रिय है।  उसकी सुखद शीतल छाया में भगवान् ऋषि मुनियों के साथ सदा तपस्या में निरत रहते हैं।  बदरी वृक्ष के कारण ही यह क्षेत्र बदरी क्षेत्र कहलाता है और नर-नारायण का निवास स्थान होने से इसे नर-नारायण या नारायणाश्रम भी कहते हैं।

सृष्टि के आदि में भगवान् ब्रह्मा ने अपने मन से 10 पुत्र उत्पन्न किये।  ये संकल्प से ही अयोनिज उत्पन्न हुए थे, इसलिये ब्रह्मा के मानस पुत्र कहाये।  उनके नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद है।  इनके द्वारा ही आगे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई।  इसके अतिरिक्त ब्रह्माजी के दायें स्तन से धर्मदेव उत्पन्न हुए और पृष्ठ भाग से अधर्म।  अधर्म का भी वंश बढ़ा उसकी स्त्री का नाम मृषा (झूठ) था, उसके दम्भ और माया नाम के पुत्र हुए।  उन दोनों से लोभ और निकृति (शठता) ये उत्पन्न हुए, फिर उन दोनों से क्रोध और हिंसा दो लड़की लडके हुए।  क्रोध और हिंसा के कलि और दुरक्ति हुए।  उनके भय ओर मृत्यु हुए तथा भय मृत्यु से यातना (दुख) और निरय नरक ये हुए।  ये सब अधर्म की सन्तति है।  ’’दुर्जनं प्रथम बन्दे सज्जनं तदनन्तरम्’’ इस न्याय से अधर्म की वंशावली के बाद अब धर्म की सन्तति -

ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह मनु पुत्री प्रसूती से हुआ।  प्रसूति में दक्ष प्रजापति ने 16 कन्यायें उत्पन्न की।  उनमें से 13 का विवाह धर्म के साथ किया।  एक कन्या अग्नि को दी, एक पितृगण को, एक भगवान् शिव को।  जिनका विवाह धर्म के साथ हुआ उनके नाम - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति।

धर्म की ये सब पत्नियाँ पुत्रवती हुई।  सबने एक एक पुत्र रत्न उत्पन्न किया।  जैसे श्रद्धा ने शुभ को उत्पन्न किया, मैनी ने प्रसाद को, दया ने अभय को, शान्ति ने सुख को, तुष्टि ने मोद को, पुष्टि ने अहंकार को, क्रिया ने योग को उन्नति ने दर्प को, पुद्धि ने अर्थ को, मेधा ने स्मृति को, तितिक्षा ने क्षेम को, और ही (लल्जा) ने प्रश्रय (विनय) को और सबसे छोटी मूर्ति देवी ने भगवान् नर-नारायण को उत्पन्न किया।  क्योंकि मूर्ति में ही भगवान् की उत्पत्ति हो सकती है।  वह मूर्ति भी धर्म की ही पत्नी है।

नर-नारायण ने अपनी माता मूर्ति की बहुत अधिक बड़ी श्रद्धा से सेवा की।  अपने पुत्रों की सेवा से सन्तुष्ट होकर माता ने पुत्रों से वर माँगने को कहा।  पुत्रों ने कहा-’’माँ, यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो वरदान दीजिये कि हमारी रूचि सदा तप में रहे और घरबार छोड़कर हम सदा तप में ही निरत रहें।’’ माता को यह अच्छा कैसे लगता कि मेरे प्राणों से भी प्यारे पुत्र घर-बार छोड़कर सदा के लिये वनवासी बन जायँ, किन्तु वे वचन हार चुकी थी।  अतः उन्होंने अपने आँखों के तारे आज्ञाकारी पुत्रों को तप करने की आज्ञा दे दी।  दोनों भाई बदरिकाश्रम में जाकर तपस्या में निरत हो गये।

बदरिकाश्रम में जाकर दोनों भाई घोर तपस्या करने लगें  इनकी तपस्या के सम्बन्ध में पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कथायें हैं।

श्रीमद्भागवत में कई स्थानों पर भगवान् नर-नारायण का उल्लेख है।  देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्द में तो नर-नारायण की बड़ी लम्बी कथा है। 

नर और नारायण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए केदारखंड में उस स्थान पर तपस्या करने लगे जहां पर आज ब्रदीनाथ धाम है।

इनकी तपस्या से इंद्र परेशान होने लगे। इंद्र को लगने लगा कि नर और नारायण इंद्रलोक पर अधिकार न कर लें। इसलिए इंद्र ने अप्सराओं को नर और नारायण के पास तपस्या भंग करने के लिए भेजा।
उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या भंग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर-थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर और नारायण ने कहा, 'तुम लोग  मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।'
भगवान नर और नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण.
कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी
आपसे यही प्रार्थना है। आप देवाधिदे विष्णु हैं।

कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि 16000 सुंदर-सुंदर नारियां नर और नारायण की सेवा कर रही हैं।  फिर नारायण ने इंद्र की अप्सराओं से भी सुंदर अप्सरा को अपनी जंघा से उत्पन्न कर दिया। उर्व से उत्पन्न होने के कारण इस अप्सरा का नाम उर्वशी रखा। नारायण ने इस अप्सरा को इंद्र को भेंट कर दिया। उन 16000 कन्याओं ने नारायण से विवाह की इच्छा जाहिर की,तब नारायण ने उन्हें कहा कि  द्वापर में मेरा कृष्ण अवतार होगा।तब तक प्रतीक्षा करने को कहा

उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर और नारायण की अतुलित महिमा के बारे में सबसे कहा, जिसे सुनकर देवराज इंद्र को काफी पश्चाताप हुआ।

केदार और बदरीवन में नर-नारायण नाम ने घोर तपस्या की थी। इसलिए यह स्थान मूलत: इन दो ऋषियों का स्थान है। दोनों ने केदारनाथ में शिवलिंग और बदरीकाश्रम में विष्णु के विग्रहरूप की स्थापना की थी।

*केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति*

भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि हे शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें।

नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो।

नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए।

दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है।

महाभारत के अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।
यही नर और नारायण द्वापर में अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे।
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सोमवार, 6 मई 2019

भगवान परशुराम

आज हम आपको भगवान परशुराम से संबंधित कुछ रोचक बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार है-

*सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप।
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप॥

भावार्थ:-शांत वेष है, परन्तु करनी बहुत कठोर हैं, स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता। मानो वीर रस ही मुनि का शरीर धारण करके, जहाँ सब राजा लोग हैं, वहाँ आ गया हो॥

महाभारत के अनुसार महाराज शांतनु के पुत्र भीष्म ने भगवान परशुराम से ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या प्राप्त की थी। एक बार भीष्म काशी में हो रहे स्वयंवर से काशीराज की पुत्रियों अंबा, अंबिका और बालिका को अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के लिए उठा लाए थे। तब अंबा ने भीष्म को बताया कि वह मन ही मन किसी और का अपना पति मान चुकी है तब भीष्म ने उसे ससम्मान छोड़ दिया, लेकिन हरण कर लिए जाने पर उसने अंबा को अस्वीकार कर दिया।

तब अंबा भीष्म के गुरु परशुराम के पास पहुंची और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। अंबा की बात सुनकर भगवान परशुराम ने भीष्म को उससे विवाह करने के लिए कहा, लेकिन ब्रह्मचारी होने के कारण भीष्म ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तब परशुराम और भीष्म में भीषण युद्ध हुआ और अंत में अपने पितरों की बात मानकर भगवान परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए। इस प्रकार इस युद्ध में न किसी की हार हुई न किसी की जीत।

ऐसे हुआ भगवान परशुराम का जन्म????

महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना।

किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा।

तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था।

महाभारत के युद्ध से पहले जब भगवान श्रीकृष्ण संधि का प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र के पास गए थे, उस समय श्रीकृष्ण की बात सुनने के लिए भगवान परशुराम भी उस सभा में उपस्थित थे। परशुराम ने भी धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण की बात मान लेने के लिए कहा था।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम भी वहां आ गए। अपने आराध्य शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर वे बहुत क्रोधित हुए और वहां उनका श्रीराम व लक्ष्मण से विवाद भी हुआ।

जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे। तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम ने बाण धनुष पर चढ़ा कर छोड़ दिया। यह देखकर परशुराम को भगवान श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया और वे वहां से चले गए।

क्यों किया माता का वध?

एक बार परशुराम की माता रेणुका स्नान करके आश्रम लौट रही थीं। तब संयोग से राजा चित्ररथ भी वहां जलविहार कर रहे थे। राजा को देखकर रेणुका के मन में विकार उत्पन्न हो गया। उसी अवस्था में वह आश्रम पहुंच गई। जमदग्रि ने रेणुका को देखकर उसके मन की बात जान ली और अपने पुत्रों से माता का वध करने को कहा। किंतु मोहवश किसी ने उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया।

तब परशुराम ने बिना सोचे-समझे अपने फरसे से उनका सिर काट डाला। ये देखकर मुनि जमदग्रि प्रसन्न हुए और उन्होंने परशुराम से वरदान मांगने को कहा। तब परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने और उन्हें इस बात का ज्ञान न रहे ये वरदान मांगा। इस वरदान के फलस्वरूप उनकी माता पुनर्जीवित हो गईं।

क्यों किया कार्तवीर्य अर्जुन का वध? एक बार महिष्मती देश का राजा कार्तवीर्य अर्जुन युद्ध जीतकर जमदग्रि मुनि के आश्रम से निकला। तब वह थोड़ा आराम करने के लिए आश्रम में ही रुक गया। उसने देखा कामधेनु ने बड़ी ही सहजता से पूरी सेना के लिए भोजन की व्यवस्था कर दी है तो वह कामधेनु के बछड़े को अपने साथ बलपूर्वक ले गया। जब यह बात परशुराम को पता चली तो उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन की एक हजार भुजाएं काट दी और उसका वध कर दिया।

इसलिए किया क्षत्रियों का संहार?

कार्तवीर्य अर्जुन के वध का बदला उसके पुत्रों ने जमदग्रि मुनि का वध करके लिया। क्षत्रियों का ये नीच कर्म देखकर भगवान परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन के सभी पुत्रों का वध कर दिया। जिन-जिन क्षत्रिय राजाओं ने उनका साथ दिया, परशुराम ने उनका भी वध कर दिया। इस प्रकार भगवान परशुराम ने 21 बार धरती को क्षत्रियविहिन कर दिया।

महाभारत के अनुसार परशुराम का ये क्रोध देखकर महर्षि ऋचिक ने साक्षात प्रकट होकर उन्हें इस घोर कर्म से रोका। तब उन्होंने क्षत्रियों का संहार करना बंद कर दिया और सारी पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर दी और स्वयं महेंद्र पर्वत पर निवास करने लगे।

परशुराम का कर्ण को श्राप,,,महाभारत के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के ही अंशावतार थे। कर्ण भी उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम को अपना परिचय एक सूतपुत्र के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे। उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया।

नींद से उठने पर जब परशुराम ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण सूतपुत्र नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे। इस प्रकार परशुरामजी के श्राप के कारण ही कर्ण की मृत्यु हुई।

राम से कैसे बने परशुराम?

बाल्यावस्था में परशुराम के माता-पिता इन्हें राम कहकर पुकारते थे। जब राम कुछ बड़े हुए तो उन्होंने पिता से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया और पिता के सामने धनुर्विद्या सीखने की इच्छा प्रकट की। महर्षि जमदग्रि ने उन्हें हिमालय पर जाकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। पिता की आज्ञा मानकर राम ने ऐसा ही किया। उस बीच असुरों से त्रस्त देवता शिवजी के पास पहुंचे और असुरों से मुक्ति दिलाने का निवेदन किया। तब शिवजी ने तपस्या कर रहे राम को असुरों को नाश करने के लिए कहा।

राम ने बिना किसी अस्त्र की सहायता से ही असुरों का नाश कर दिया। राम के इस पराक्रम को देखकर भगवान शिव ने उन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इन्हीं में से एक परशु (फरसा) भी था। यह अस्त्र राम को बहुत प्रिय था। इसे प्राप्त करते ही राम का नाम परशुराम हो गया।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार परशुराम जब भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पहुंचे तो भगवान ध्यान में थे। तब श्रीगणेश ने परशुरामजी को भगवान शिव से मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर परशुरामजी ने फरसे से श्रीगणेश पर वार कर दिया।

वह फरसा स्वयं भगवान शिव ने परशुराम को दिया था। श्रीगणेश उस फरसे का वार खाली नहीं होने देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने उस फरसे का वार अपने दांत पर झेल लिया, जिसके कारण उनका एक दांत टूट गया। तभी से उन्हें एकदंत भी कहा जाता है।

ऋषि जमदग्रि और रेणुका के चार पुत्र थे, जिनमें से परशुराम सबसे छोटे थे। भगवान परशुराम के तीन बड़े भाई थे, जिनके नाम क्रमश: रुक्मवान, सुषेणवसु और विश्वावसु था।

हिंदू धर्म ग्रंथों में कुछ महापुरुषों का वर्णन है जिन्हें आज भी अमर माना जाता है। इन्हें अष्टचिरंजीवी भी कहा जाता है। इनमें से एक भगवान विष्णु के आवेशावतार परशुराम भी हैं-

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन।।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

इस श्लोक के अनुसार अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा ऋषि मार्कण्डेय अमर हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम वर्तमान समय में भी कहीं तपस्या में लीन हैं।

भगवान परशुराम

आज हम आपको भगवान परशुराम से संबंधित कुछ रोचक बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार है-

*सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप।
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप॥

भावार्थ:-शांत वेष है, परन्तु करनी बहुत कठोर हैं, स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता। मानो वीर रस ही मुनि का शरीर धारण करके, जहाँ सब राजा लोग हैं, वहाँ आ गया हो॥

महाभारत के अनुसार महाराज शांतनु के पुत्र भीष्म ने भगवान परशुराम से ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या प्राप्त की थी। एक बार भीष्म काशी में हो रहे स्वयंवर से काशीराज की पुत्रियों अंबा, अंबिका और बालिका को अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के लिए उठा लाए थे। तब अंबा ने भीष्म को बताया कि वह मन ही मन किसी और का अपना पति मान चुकी है तब भीष्म ने उसे ससम्मान छोड़ दिया, लेकिन हरण कर लिए जाने पर उसने अंबा को अस्वीकार कर दिया।

तब अंबा भीष्म के गुरु परशुराम के पास पहुंची और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। अंबा की बात सुनकर भगवान परशुराम ने भीष्म को उससे विवाह करने के लिए कहा, लेकिन ब्रह्मचारी होने के कारण भीष्म ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तब परशुराम और भीष्म में भीषण युद्ध हुआ और अंत में अपने पितरों की बात मानकर भगवान परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए। इस प्रकार इस युद्ध में न किसी की हार हुई न किसी की जीत।

ऐसे हुआ भगवान परशुराम का जन्म????

महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना।

किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा।

तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था।

महाभारत के युद्ध से पहले जब भगवान श्रीकृष्ण संधि का प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र के पास गए थे, उस समय श्रीकृष्ण की बात सुनने के लिए भगवान परशुराम भी उस सभा में उपस्थित थे। परशुराम ने भी धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण की बात मान लेने के लिए कहा था।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम भी वहां आ गए। अपने आराध्य शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर वे बहुत क्रोधित हुए और वहां उनका श्रीराम व लक्ष्मण से विवाद भी हुआ।

जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे। तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम ने बाण धनुष पर चढ़ा कर छोड़ दिया। यह देखकर परशुराम को भगवान श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया और वे वहां से चले गए।

क्यों किया माता का वध?

एक बार परशुराम की माता रेणुका स्नान करके आश्रम लौट रही थीं। तब संयोग से राजा चित्ररथ भी वहां जलविहार कर रहे थे। राजा को देखकर रेणुका के मन में विकार उत्पन्न हो गया। उसी अवस्था में वह आश्रम पहुंच गई। जमदग्रि ने रेणुका को देखकर उसके मन की बात जान ली और अपने पुत्रों से माता का वध करने को कहा। किंतु मोहवश किसी ने उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया।

तब परशुराम ने बिना सोचे-समझे अपने फरसे से उनका सिर काट डाला। ये देखकर मुनि जमदग्रि प्रसन्न हुए और उन्होंने परशुराम से वरदान मांगने को कहा। तब परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने और उन्हें इस बात का ज्ञान न रहे ये वरदान मांगा। इस वरदान के फलस्वरूप उनकी माता पुनर्जीवित हो गईं।

क्यों किया कार्तवीर्य अर्जुन का वध? एक बार महिष्मती देश का राजा कार्तवीर्य अर्जुन युद्ध जीतकर जमदग्रि मुनि के आश्रम से निकला। तब वह थोड़ा आराम करने के लिए आश्रम में ही रुक गया। उसने देखा कामधेनु ने बड़ी ही सहजता से पूरी सेना के लिए भोजन की व्यवस्था कर दी है तो वह कामधेनु के बछड़े को अपने साथ बलपूर्वक ले गया। जब यह बात परशुराम को पता चली तो उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन की एक हजार भुजाएं काट दी और उसका वध कर दिया।

इसलिए किया क्षत्रियों का संहार?

कार्तवीर्य अर्जुन के वध का बदला उसके पुत्रों ने जमदग्रि मुनि का वध करके लिया। क्षत्रियों का ये नीच कर्म देखकर भगवान परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन के सभी पुत्रों का वध कर दिया। जिन-जिन क्षत्रिय राजाओं ने उनका साथ दिया, परशुराम ने उनका भी वध कर दिया। इस प्रकार भगवान परशुराम ने 21 बार धरती को क्षत्रियविहिन कर दिया।

महाभारत के अनुसार परशुराम का ये क्रोध देखकर महर्षि ऋचिक ने साक्षात प्रकट होकर उन्हें इस घोर कर्म से रोका। तब उन्होंने क्षत्रियों का संहार करना बंद कर दिया और सारी पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर दी और स्वयं महेंद्र पर्वत पर निवास करने लगे।

परशुराम का कर्ण को श्राप,,,महाभारत के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के ही अंशावतार थे। कर्ण भी उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम को अपना परिचय एक सूतपुत्र के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे। उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया।

नींद से उठने पर जब परशुराम ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण सूतपुत्र नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे। इस प्रकार परशुरामजी के श्राप के कारण ही कर्ण की मृत्यु हुई।

राम से कैसे बने परशुराम?

बाल्यावस्था में परशुराम के माता-पिता इन्हें राम कहकर पुकारते थे। जब राम कुछ बड़े हुए तो उन्होंने पिता से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया और पिता के सामने धनुर्विद्या सीखने की इच्छा प्रकट की। महर्षि जमदग्रि ने उन्हें हिमालय पर जाकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। पिता की आज्ञा मानकर राम ने ऐसा ही किया। उस बीच असुरों से त्रस्त देवता शिवजी के पास पहुंचे और असुरों से मुक्ति दिलाने का निवेदन किया। तब शिवजी ने तपस्या कर रहे राम को असुरों को नाश करने के लिए कहा।

राम ने बिना किसी अस्त्र की सहायता से ही असुरों का नाश कर दिया। राम के इस पराक्रम को देखकर भगवान शिव ने उन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इन्हीं में से एक परशु (फरसा) भी था। यह अस्त्र राम को बहुत प्रिय था। इसे प्राप्त करते ही राम का नाम परशुराम हो गया।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार परशुराम जब भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पहुंचे तो भगवान ध्यान में थे। तब श्रीगणेश ने परशुरामजी को भगवान शिव से मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर परशुरामजी ने फरसे से श्रीगणेश पर वार कर दिया।

वह फरसा स्वयं भगवान शिव ने परशुराम को दिया था। श्रीगणेश उस फरसे का वार खाली नहीं होने देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने उस फरसे का वार अपने दांत पर झेल लिया, जिसके कारण उनका एक दांत टूट गया। तभी से उन्हें एकदंत भी कहा जाता है।

ऋषि जमदग्रि और रेणुका के चार पुत्र थे, जिनमें से परशुराम सबसे छोटे थे। भगवान परशुराम के तीन बड़े भाई थे, जिनके नाम क्रमश: रुक्मवान, सुषेणवसु और विश्वावसु था।

हिंदू धर्म ग्रंथों में कुछ महापुरुषों का वर्णन है जिन्हें आज भी अमर माना जाता है। इन्हें अष्टचिरंजीवी भी कहा जाता है। इनमें से एक भगवान विष्णु के आवेशावतार परशुराम भी हैं-

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन।।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

इस श्लोक के अनुसार अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा ऋषि मार्कण्डेय अमर हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम वर्तमान समय में भी कहीं तपस्या में लीन हैं।

शनिवार, 4 मई 2019

शानिमहाराज ओर राजा विक्रमादित्य की कथा

                     आचार्य डा.अजय दीक्षित                               


शानि महाराज और राजा विक्रमादित्य की कथा !!
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जो भी नर - नारी इस शनि देव की कथा को स्वयं पढ़ता है या किसी के द्वारा श्रवण करता है उसके सभी संकट दूर हो कर संसार के सभी सुखों को प्राप्त करता है।
प्राचीन समय की बात है सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु अर्थात् यह नवग्रह एक स्थान पर एकत्रित हुये, परस्पर वाद-विवाद होने लगा कि हम लोगों में सबसे बड़ा और श्रेष्ठ कौन ग्रह हैं। सभी अपने आपको बड़ा मान रहे थे। कोई भी अपने आपको छोटा कहा जाना पसन्द नहीं कर रहा था।
बहुत तर्क - वितर्क के पश्चात भी जब कोई निर्णय नहीं हुआ तो, सभी ग्रह आपस में उलझते हुए अपने विषय के प्रति गंभीर हुए देवराज इंद्र के पास जा पंहुचे और बोले - " हे इन्द्र ! आप सब देवों के देव हैं । हम सभी ग्रहों में मतभेद यह हुआ है कि हममें से बड़ा कौन हैं और कौन छोटा ? आप इस बात का फैसला कीजिए।
राजा इन्द्र सारी बातें सुनकर तुरंत समझ गये । किन्तु उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया । फिर वे बात टालने की कोशिश करते हुये बोले - " मुझमें इतना सामर्थ्य तो नहीं हैं , जो आपके छोटे और बड़े का निर्णय करुं । मैं अपने मुँह से कुछ नहीं कह सकता । हां, एक उपाय हैं।
इस समय भू - लोक में उज्जैन नगरी के राजा विक्रमादित्य सबसे पहले अच्छा और न्याय करने वाला है, अतःआप सभी उनके पास जाओ , मैं आपका न्याय करने में असमर्थ हूँ । मगर राजा विक्रमादित्य अवश्य न्याय करेंगे ।"
देवराज इन्द्र के इन वचनों को सुनकर सभी ग्रह पृथ्वी लोक पर राजा विक्रमादित्य के दरबार में जा पंहुचे और अपनी समस्या से उन्हें अवगत करा दिया । राजा विक्रमादित्य उनकी बात सुनकर अत्यंत चिन्तित हो गये ।तुरंत ही उन्हें कोई जवाब ही नहीं सूझा । वह शान्त रहे । वे मन ही मन सोच रहे थे कि ये सभी ग्रह हैं किसे छोटा कहूँ और किसे बड़ा कहूँ । जिसे छोटा कहूंगा वही मुझसे कुपित हो जायेगा।
न्याय के लिए जब ये मेरे पास आये है तो मुझे न्याय तो करना ही है -किस प्रकार न्याय करुं ।" शान्त चित्त से विचार करने के पश्चात एक उपाय मानस पटल पर आ ही गया। फलस्वरूप - उन्होंने स्वर्ण, चांदी, कांसी, पीतल , शीशा , रांगा , जस्ता, अभ्रक और लोहा नौ धातुओं के नौ सिंहासन बनवाये और उन सभी आसनों को अपनी राजसभा में क्रम से विधिपूर्वक जैसे - सोने का सिंहासन सबसे आगे तथा लोहे का सबसे पीछे रखवा दिया।
इसके पश्चात नरेश ने राज ज्योतिषी को बुलवाकर आदेश दिया कि ज्योतिष ग्रन्थों में जिस क्रम में ग्रहों का स्थान है, उसी क्रम से ग्रहों के आसन ग्रहण करने की प्रार्थना की जाए । इस प्रकार सबसे उत्तम तथा सबसे आगे रखा हुआ स्वर्ण का बना सिंहासन सूर्य को मिला, चांदी का सिंहासन चन्द्रमा को तथा शेष धातुओं के सिंहासन अन्य ग्रहों को मिले । सबसे पीछे रखा हुआ और लोहे का बना सिंहासन शनिदेव को मिला ।
राजा विक्रमादित्य की इस बात को अपना अपमान समझते हुये शनि देव क्रोध से लाल हो गये । उनकी भ्रकुटियां तन गई । जबड़े भिंच गये, मुट्ठीयां भिंच गई । फिर वे आग - बबूला हो क्रोध में बोले - " हे मूर्ख राजा ! तू मेरे पराक्रम और मेरी शक्ति को नहीं जानता । सूर्य एक राशि पर एक महीना, चन्द्रमा सवा दो दिन , मंगल डेढ़ महीना , बृहस्पति तेरह महीने , बुध और शुक्र एक-एक महीने , राहु और केतु उल्टे चलते हुए केवल अठारह महीने ही एक राशि पर रहते हैं । परन्तु मैं एक राशि पर ढाई अथवा साढ़े सात साल तक रहता हूँ ।
बड़े-बड़े देवताओं को मैंने कठोर दु:ख और कष्ट दिये हैं । राजन, ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनो - मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र पर जब मैं साढ़े साती आई तो उन्हें राज त्यागकर बनवास को जाना पड़ा । रावण पर साढ़े साती आई तो राम और लक्ष्मण ने लंका पर आक्रमण कर दिया । उसकी सोने की लंका जल गई और रावण ने अपने कुल का नाश कर लिया । हे राजन ! अब तुम भी सावधान रहना ।"
विक्रमादित्य ने कुछ सोचकर कहा - " हे शनिदेव मैंने अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार जो उचित न्याय सूझा वह मैंने किया अब जो होगा वह भी देखा जाएगा । " मैं आपकी धमकी से नहीं डरता । जैसा मेरे भाग्य में होगा वह तो भोगना ही पड़ेगा । चाहे अच्छा हो अथवा बुरा हो । राजा का न्याय सुनकर सभी ग्रह तो वहां से खुशी - खुशी चले गये । मगर शनिदेव क्रोध में भरे हुए नाराज हो कर वहां से गये ।
कुछ समय तो ऐसे ही बीत गया मगर कुछ समय बाद राजा विक्रमादित्य पर शनि ग्रह की साढ़े साती का प्रवेश हुआ तो शनिदेव ने अपना प्रभाव दिखाना शुरु कर दिया । शनिदेव घोड़ों के व्यापारी का रूप धारण कर अनेक सुंदर घोड़े साथ ले राजा विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन में आ पहुंचे । जब राजा ने घोड़े के सौदागर के आने की बाबत सुना तो उन्होंने अपने अश्वपाल को सुन्दर और शक्ति शाली घोड़े खरीदकर ले आने को कहा ।
घोड़े बेहद सुन्दर और शक्ति शाली थे । अश्वपाल उनके दाम सुनकर चौंक पड़ा, उसे गहरा आश्चर्य हुआ । उसने तुरंत राजा को खबर दी । अश्वपाल के कहने पर राजा ने घोड़ों को देखा और एक अच्छा घोड़ा देखकर उस पर से सवारी को चढ़ गया । राजा के घोड़े पर चढ़ते ही घोड़ा तीव्र गति से दौड़ पडा़ ।
फिर घोड़ा राजा को लेकर एक घने जंगल में पहुंच गया तथा वहीं राजा विक्रमादित्य को अपनी पीठ से पृथ्वी पर गिराकर अदृश्य हो गया । उसके बाद राजा बियावान जंगल में भूखा - प्यासा इधर-उधर भटकने लगा । राजा के हाल -बेहाल हो गये ।
भटकते - भटकते बहुत देर बाद राजा ने एक ग्वाले को देखा । ग्वाले से निवेदन करने पर ग्वाले ने प्यास से व्याकुल राजा को पानी पिलाया और एक नगर का रास्ता भी दिखाया । जो उस स्थान के समीप ही था । उस वक्त राजा की अंगुली में एक अंगुठी थी ।
राजा ने खुश होकर ग्वाले को वह अंगुठी दे दी और फिर शहर की ओर चल पड़ा । राजा नगर पहुंच एक सेठ ( साहूकार ) की दुकान में जाकर बैठ गया । राजा ने खुद को उज्जैन का निवासी और बीका नाम बताया । साहूकार ने राजा को उच्च घराने का समझकर पानी पिलाया ।
भाग्यवश उस दिन साहूकार की बिक्री पूर्व दिनों की अपेक्षा अधिक हुई । तब सेठ ने राजा को भाग्यवान मानकर उसे अपने साथ अपने घर ले गया और भोजन कराया । भोजन करते वक्त राजा विक्रमादित्य ने एक अद्भुत बात देखी कि एक हार खूंटी पर लटक रहा था और खूंटी उस हार को निगल रही थी । इस अद्भुत दृश्य को देखकर उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसकने लगी ।
लेकिन वे मूक रहे । सहसा भोजन के बाद जब साहूकार खूंटी पर से हार उतारने के लिए गये तो खूंटी पर वह हार नहीं मिला तब उसने सोचा कि बीका के अलावा कोई और व्यक्ति उस कमरे में नहीं आया , अतः हार की चोरी इसी व्यक्ति ने की है । सेठ जी ने बीका पर चोरी का आरोप लगाते हुये हार लौटाने को कहा पर राजा ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि - हे " हे सेठ जी मैंने आपका हार नहीं चुराया । मैंने तो हार को खूंटी को निगलते हुए भर देखा है । आपका हार खूंटी निगल गई ।
" " खूंटी हार नहीं निगल सकती , भला बेजान चीजें भी किसी चीज को निगलती हैं कभी ? " इस पर विवाद बढ़ता गया और सेठ बीका को उस नगर के राजा के पास ले गया । और सारी बात कह सुनाई । राजा ने आज्ञा दी कि - " हार का चोर यही व्यक्ति हैं । इसके हाथ - पैर काट कर " चौरांग्या " कर दो । " राजा की आज्ञा पाकर उसके सैनिकों ने विक्रमादित्य के हाथ - पैर काट कर जंगल में फैंक दिया । फलस्वरूप, राजा विक्रमादित्य अपाहिज होकर इधर - उधर भटकने लगा ।
अब बेचारे राजा की हालत ऐसी हो गई कि किसी ने रोटी का टुकड़ा मुंह में डाल दिया तो खा लिया अन्यथा यों ही भूखा - प्यासा पड़ा रहा । रास्ते जाते एक तेली की नजर उस पर पड़ी और वह उस पर तरस खाकर उसे थोड़ा सा तेल उसके घावों पर लगाने को दे दिया, जिसके फलस्वरूप तेली का व्यापार उसी दिन से प्रगति करने लगा ।
2 - 4 दिन यह क्रम चलता रहा तो तेली ने व्यापार वृद्धि से प्रसन्न हो विक्रमादित्य को अपने घर ले गया और कोल्हू पर बिठा दिया । विक्रमादित्य कोल्हू पर बैठा अपनी आवाज से बैलों को हांकता रहता । कुछ वर्षों में शनि की दशा समाप्त हो गई ।
बीका अपनी उदासी काटने के लिए कभी - कभी मल्हार राग गाया करता था । एक रात वह वर्षा को देखकर राग - मल्हार गाने लगा । उसका गीत सुनकर उस शहर के राजा की कन्या उस पर मोहित हो गई । और दासी से खबर लाने के लिये कहा कि - " देख तो जरा इस राग को कौन गा रहा हैं ? " दासी ने देखा कि एक अपाहिज व्यक्ति तेली के कोल्हू पर बैठा मल्हार गा रहा हैं । दासी ने महल में आकर सारा वृतान्त कह सुनाया ।
उसी समय राजकुमारी ने निर्णय ले लिया कि वह उसी व्यक्ति से शादी करेगी जो मल्हार गा रहा था । प्रातः काल दासी जब राजकुमारी को जगाने गई तो राजकुमारी ने खाना पीना भी त्याग कर बिस्तर पर पड़ी - पड़ी रो रही थी । दासी राजकुमारी का यह हाल देखकर घबरा उठी । वह तुरंत राजा - रानी के पास जा पहुंची और उनसे सारी बातें कह सुनाई ।
राजा - रानी तुरंत राजकुमारी के पास आये और उससे उसके दु:ख का कारण पूछा - " बेटी तुम क्यों अनशन लिये पड़ी हो ? तुम्हें किस बात का दु:ख हैं ? जो भी पीड़ा हमसे कहो , हम तुम्हारा दु:ख दूर करने का प्रत्यन करेगें । " राजकुमारी ने अपने मन की मंशा राजा - रानी को बता दी । " बेटी ! वह अपाहिज ( चौरांग्या ) हैं । तेली के कोल्हू के बैल हांकता है । वह भला तुम्हें क्या सुख देगा , तुम्हारा विवाह तो किसी राजकुमार से होगा । मेरा कहा मानो और अपनी यह जिद छोड़ दो ।
" मगर राजकुमारी अपनी जिद पर अड़ गई । राजा - रानी के अतिरिक्त परिजनों ने भी राजकुमारी को काफी समझाया । मगर राजकुमारी नहीं मानी । वह अपनी जिद पर अड़ी रही । उसने कहा -"यदि मेरा विवाह उस व्यक्ति के साथ नहीं हुआ तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी । " बेटी की जिद देख राजा क्रोधित हो उठा । बोला - " तेरी ऐसी ही जिद है जो तुझे अच्छा लगे वैसा ही कर ।
" फिर राजा ने तेली को बुलवाया । उसे सारा हाल कह सुनाया । और तेली को अपाहिज व्यक्ति से अपनी बेटी के विवाह की तैयारी करने का आदेश दिया । तब फिर राजकुमारी का विवाह अपाहिज विक्रमादित्य ( बीका ) के साथ हो गया ।
रात्रि को जब राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी महल में सोये हुए थे तब आधी रात को शनिदेव ने विक्रमादित्य को स्वप्न में दर्शन दिये और कहा - हे राजा ! मुझे छोटा बताकर तूने कितने कष्ट और दु:ख सहे हैं, इसकी कल्पना कर विक्रमादित्य ने स्वप्न में ही शनिदेव से क्षमा याचना की, जिसके परिणाम स्वरूप शनि ने प्रसन्न होकर राजा को पुन: हाथ - पैर प्रदान कर दिये । राजा गद् गद् हो ।
शनि महाराज के गुणगान करने लगा तत्पश्चात विनय करते हुये राजा विक्रमादित्य ने कहा - " हे शनिदेव ! आपने जैसा दु:ख मुझे दिया , ऐसा आप दु:ख किसी को न दें ।" शनिदेव ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर बोले - " जो व्यक्ति मेरी कथा सुनेगा , कहेगा तो उसे कोई दु:ख नहीं होगा और जो व्यक्ति नित्य मेरा ध्यान करेगा शनिवार को मुझे तेल अर्पण करेगा या चीटियों को आटा खिलायेगा । उसके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्व होंगे । "इतना कहकर शनिदेव अन्तरध्यान हो गये ।
जब राजकुमारी की आँख खुली और उसने राजा के हाथ - पाँव देखे तो चकित रह गयी । विक्रमादित्य ने सब हाल कह सुनाया तो राजकुमारी बहुत प्रसन्न हुई । यह समाचार राजदरबार से लेकर पूरे शहर में तुरंत फैल गया और सब राजकुमारी को भाग्यशाली कहने लगे ।
जब सेठ ( साहूकार ) ने यह बात सुनी और यह जाना कि वह व्यक्ति कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि राजा विक्रमादित्य हैं तो वह उसके कदमों में आ गिरा और अपने किये की माफी मांगने लगा । राजा विक्रमादित्य ने कहा - " इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं हैं मुझ पर शनिदेव का प्रकोप था । " सेठ बोला - " राजन ! अब मुझे तभी आत्मीय शान्ति मिलेगी , जब आप मेरे आवास चलकर भोजन ग्रहण करेंगे । " " ठीक है मैं आऊंगा । " और फिर राजा विक्रमादित्य सेठ ( साहूकार ) के घर भोजन करने पहुंच गये । जिस समय वह भोजन कर रहे थे । एक आश्चर्य जनक बात हुई । जो खूंटी पहले हार निगल रही थी वही अब हार उगल रही थी । भोजन ग्रहण के पश्चात साहूकार ने कहा - " राजन ! मेरी श्रीकंवरी नाम की एक कन्या है । उसका पाणिग्रहण आप करें ।
" इसके बाद सेठ ने अपनी रुप - यौवन से सम्पन्न कन्या का विवाह बडी़ धूमधाम से राजा विक्रमादित्य के साथ कर दिया । राजा विक्रमादित्य कुछ दिन वहाँ रहने के पश्चात सेठ से विदा लेकर राजकुमारी मनभावती , सेठ की पुत्री श्रीकंवरी तथा दोनों स्थानों से प्राप्त रत्न - आभूषण और अनेक दास - दासियों के साथ अपनी राजधानी उज्जैन में लोट आए । आवागमन पर सारे राज्य में खुशियाँ मनाई गई ।
राजा ने अपने राज्य में ढ़ंढोरा पिटावा दिया कि " सम्पूर्ण ग्रहों में शनिदेव श्रेष्ठ और बड़े हैं । मैंने उन्हें छोटा कहा इसलिये मुझे इतने दिन कष्ट उठाने पडे़ । " तभी से उनके राज्य में शनिदेव की पूजा होने लगी । सभी घरों में शनि की कथा का पाठ होने लगा । जिसके कारण उस उज्जैन नगरी के निवासी समस्त सुखों को प्राप्त करते रहे ।
।। बोलिये - शनि महाराज की जय ।।