मंगलवार, 16 मई 2017

पवन पुत्र हनुमान के जन्म की कथा :---

पवन पुत्र हनुमान के जन्म की कथा :---

ज्योतिषीयों के सटीक गणना के अनुसार हनुमान जी का जन्म 1 करोड़ 85 लाख 58हजार 112 वर्ष पहले चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह6.03 बजे हुआ था

हनुमान की माता अंजनि के पूर्व जन्म की कहानी

कहते हैं कि माता अंजनि पूर्व जन्म में देवराज इंद्र के दरबार में अप्सरा पुंजिकस्थला थीं। ‘बालपन में वो अत्यंत सुंदर और स्वभाव से चंचल थी एक बार अपनी चंचलता में ही उन्होंने तपस्या करतेएक तेजस्वी ऋषि के साथ अभद्रता कर दी थी । 

गुस्से में आकर ऋषि ने पुंजिकस्थला को श्राप दे दिया कि जा तू वानर की तरह स्वभाव वाली वानरी बन जा, ऋषि के श्राप को सुनकर पुंजिकस्थला ऋषि से क्षमा याचना मांगने लगी,तब ऋषि ने कहा कि तुम्हारा वह रूप भी परम तेजस्वी होगा।

तुमसे एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी कीर्ति और यश से तुम्हारा नाम युगों-युगों तक अमर हो जाएगा, अंजनि को वीर पुत्र का आशीर्वाद मिला।

श्री हनुमानजी की बाल्यावस्था

ऋषि के श्राप से त्रेता युग मे अंजना मे नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा
इंद्र जिनके हाथ में पृथ्वी के सृजन की कमान है,स्वर्ग में स्थित इंद्र के दरबार (महल) में हजारोंअप्सरा (सेविकाएं) थीं, जिनमें से एक थीं अंजना(अप्सरा पुंजिकस्थला) अंजना की सेवा से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें मनचाहा वरदान मांगने को कहा, अंजना ने हिचकिचाते हुए उनसे कहा कि उन पर एक तपस्वी साधु का श्राप है, अगर हो सके तो उन्हें उससे मुक्ति दिलवा दें। इंद्र ने उनसे कहा कि वह उस श्राप के बारे में बताएं,क्या पता वह उस श्राप से उन्हें मुक्ति दिलवा दें।  

अंजना ने उन्हें अपनी कहानी सुनानी शुरू की,अंजना ने कहा ‘बालपन में जब मैं खेल रही थी तो मैंने एक वानर को तपस्या करते देखा, मेरे लिए यह एक बड़ी आश्चर्य वाली घटना थी,इसलिए मैंने उस तपस्वी वानर पर फल फेंकने शुरू कर दिए, बस यही मेरी गलती थी क्योंकि वह कोई आम वानर नहीं बल्कि एक तपस्वी साधु थे।    

मैंने उनकी तपस्या भंग कर दी और क्रोधित होकर उन्होंने मुझे श्राप दे दिया कि जब भी मुझे किसी से प्रेम होगा तो मैं वानर बन जाऊंगी। मेरे बहुत गिड़गिड़ाने और माफी मांगने पर उस साधु ने कहा कि मेरा चेहरा वानर होने के बावजूद उस व्यक्ति का प्रेम मेरी तरफ कम नहीं होगा’। अपनी कहानी सुनाने के बाद अंजना ने कहा कि अगर इंद्र देव उन्हें इस श्राप से मुक्ति दिलवा सकें तो वह उनकी बहुत आभारी होंगी।इंद्र देव ने उन्हें कहा कि इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए अंजना को धरती पर जाकर वास करना होगा, जहां वह अपने पति से मिलेंगी। शिव के अवतार को जन्म देने के बाद अंजना को इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।

इंद्र की बात मानकर अंजना धरती पर आईं और केसरी से विवाह - इंद्र की बात मानकर अंजना धरती पर चली आईं, एक शाप के कारण उन्हें नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा। उस शाप का प्रभाव शिव के अन्श को जन्म देने के बाद ही समाप्त होना था। और एक शिकारन के तौर पर जीवन यापन करने लगीं। जंगल में उन्होंने एक बड़े बलशाली युवक को शेर से लड़ते देखा और उसके प्रति आकर्षित होने लगीं,जैसे ही उस व्यक्ति की नजरें अंजना पर पड़ीं,अंजना का चेहरा वानर जैसा हो गया। अंजना जोर-जोर से रोने लगीं, जब वह युवक उनके पास आया और उनकी पीड़ा का कारण पूछा तो अंजना ने अपना चेहरा छिपाते हुए उसे बताया कि वह बदसूरत हो गई हैं। अंजना ने उस बलशाली युवक को दूर से देखा था लेकिन जब उसने उस व्यक्ति को अपने समीप देखा तो पाया कि उसका चेहरा भी वानर जैसा था।

अपना परिचय बताते हुए उस व्यक्ति ने कहा कि वह कोई और नहीं वानर राज केसरी हैं जो जब चाहें इंसानी रूप में आ सकते हैं। अंजना का वानर जैसा चेहरा उन दोनों को प्रेम करने से नहीं रोक सका और जंगल में केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया।

केसरी एक शक्तिशाली वानर थे जिन्होने एक बार एक भयंकर हाथी को मारा था। उस हाथी ने कई बार असहाय साधु-संतों को विभिन्न प्रकार से कष्ट पँहुचाया था। तभी से उनका नाम केसरी पड गया, "केसरी" का अर्थ होता है सिंह। उन्हे "कुंजर सुदान"(हाथी को मारने वाला) के नाम से भी जाना जाता है।पंपा सरोवर

अंजना और मतंग ऋषि - पुराणों में कथा है किकेसरी और अंजना ने विवाह कर लिया परसंतान सुख से वंचित थे । अंजना अपनी इस पीड़ा को लेकर मतंग ऋषि के पास गईं, तब मंतग ऋषि ने उनसे कहा-पप्पा (कई लोग इसे पंपा सरोवर भी कहते हैं) सरोवर के पूर्व में नरसिंह आश्रम है, उसकी दक्षिण दिशा में नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ है वहाँ जाकर उसमें स्नान करके, बारह वर्ष तक तप एवं उपवास करने पर तुम्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होगी। 

(उग्र नरसिंह मंदिर)

अंजना को पवन देव का वरदान - अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर तप किया था बारह वर्ष तक केवल वायु पर ही जीवित रही, एक बार अंजना ने “शुचिस्नान”करके सुंदर वस्त्राभूषण धारण किए। तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से प्रसन्न होकर उस समय पवन देव ने उसके कर्णरन्ध्र में प्रवेश करउसे वरदान दिया, कि तेरे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों का मर्मज्ञ,विश्वन्द्य महाबली पुत्र होगा।मतंग रामायण कालीन एक ऋषि थे, जो शबरी के गुरु थे

अंजना को भगवान शिव का वरदान - अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ के पास, अपने आराध्य शिव की तपस्या में मग्न थीं । शिव की आराधना कर रही थीं तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा, अंजना ने शिव को कहा कि साधु के श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्हें शिव के अवतार को जन्म देना है,इसलिए शिव बालक के रूप में उनकी कोख से जन्म लें। 

 कर्नाटक राज्य के दो जिले कोप्पल और बेल्लारी में रामायण काल का प्रसिद्ध किष्किंधा ...

‘तथास्तु’ कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गए। इस घटना के बाद एक दिन अंजना शिव की आराधना कर रही थीं और दूसरी तरफ अयोध्या में, इक्ष्वाकु वंशी महाराज अज के पुत्र और अयोध्या के महाराज दशरथ, अपनी तीन रानियों के कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी साथ पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए, श्रृंगी ऋषि को बुलाकर 'पुत्र कामेष्टि यज्ञ' के साथ यज्ञ कर रहे थे।

यज्ञ की पूर्णाहुति पर स्वयं अग्नि देव ने प्रकट होकर श्रृंगी को खीर का एक स्वर्ण पात्र (कटोरी)दिया और कहा "ऋषिवर! यह खीर राजा की तीनों रानियों को खिला दो। राजा की इच्छा अवश्य पूर्ण होगी।" जिसे तीनों रानियों को खिलाना था लेकिन इस दौरान एक चमत्कारिक घटना हुई, एक पक्षी उस खीर की कटोरी में थोड़ा सा खीर अपने पंजों में फंसाकर ले गया और तपस्या में लीन अंजना के हाथ में गिरा दिया। अंजना ने शिव का प्रसाद समझकर उसे ग्रहण कर लिया।

हनुमान जी (वानर मुख वाले हनुमान जी) का जन्म त्रेता युग मे अंजना के पुत्र के रूप मे, चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा की महानिशा में हुआ।  हनुमान जी के जन्‍मस्‍थल से नीचे की ओर एक विहंगम दृश्‍य सर्जना कर्नाटक के बैल्‍लारी

अंजना के पुत्र होने के कारण ही हनुमान जी को अंजनेय नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ होता है 'अंजना द्वारा उत्पन्न'।

उनका एक नाम पवन पुत्र भी है। जिसका शास्त्रों में सबसे ज्यादा उल्लेख मिलता है। शास्त्रों में हनुमानजी को वातात्मज भी कहा गया है, वातात्मज यानी जो वायु से उत्पन्न हुआ हो।
   

हनुमान जी ने सूर्य को  निगला

शिशु हनुमान उगते सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने के लिये आकाश में उड़ने लगे -  हनुमान अद्भुत बलवान, पराक्रमी और सद्गुण सम्पन्न हैं, परन्तु ऋषियों के शाप के कारण इन्हें अपने बल का पता नहीं था। मैं आपको इनके विषय में सब कुछ बताता हूँ। इनके पिता केसरी सुमेरु पर्वत पर राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम अंजना था। इनके जन्म के पश्चात् एक दिन इनकी माता फल लाने के लिये इन्हें आश्रम में छोड़कर चली गईं। जब शिशु हनुमान को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने के लिये आकाश में उड़ने लगे। उनकी सहायता के लिये पवन भी बहुत तेजी से चला। उधर भगवान सूर्य ने उन्हें अबोध शिशु समझकर अपने तेज से नहीं जलने दिया। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके,उसी समय राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था। हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की कि देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज जब अमावस्या के दिन मैं सूर्य को ग्रस्त करने के लिये गया तो मैंने देखा कि एक दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।

इन्द्र के वज्र प्रहार से उनका नाम हनुमान हो गया- “राहु की बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और राहु को साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमान जी सूर्य को छोड़कर राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमान जी के ऊपर वज्र का प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर जा गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी गति रोक ली। इससे कोई भी प्राणी साँस न ले सका और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे मृत हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्मा जी ने उन्हें जीवित कर दिया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सब प्राणियों की पीड़ा दूर की। चूँकि इन्द्र के वज्र से हनुमान जी की हनु (ठुड्डी) टूट गई थी, इसलिये तब से उनका नाम हनुमान हो गया।हनुमान जी के जन्‍मस्‍थल से नीचे की ओर एक विहंगम दृश्‍य कर्नाटक के बैल्‍लारी

फिर प्रसन्न होकर सूर्य ने हनुमान को अपने तेज का सौंवा भाग दिया। वरुण, यम, कुबेर,विश्वकर्मा आदि ने उन्हें अजेय पराक्रमी, अवध्य होने, नाना रूप धारण करने की क्षमता आदि के वर दिया। इस प्रकार नाना शक्तियों से सम्पन्न हो जाने पर निर्भय होकर वे ऋषि-मुनियों के साथ शरारत करने लगे। किसी के वल्कल फाड़ देते, किसी की कोई वस्तु नष्ट कर देते। इससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने इन्हें शाप दिया कि तुम अपने बल और शक्ति को भूल जाओगे। किसी के याद दिलाने पर ही तुम्हें उनका ज्ञान होगा। तब से उन्हें अपने बल और शक्ति का स्मरण नहीं रहा।

वालि और सुग्रीव के पिता ऋक्षराज थे। चिरकाल तक राज्य करने के पश्चात् जब ऋक्षराज का देहान्त हुआ तो वालि राजा बना। वालि और सुग्रीव में बचपन से ही प्रेम था। जब उन दोनों में बैर हुआ तो सुग्रीव के सहायक होते हुये भी शाप के कारण हनुमान अपने बल से अनजान बने रहे।” 
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रविवार, 14 मई 2017

कलियुग में श्री हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने का अदभुत रहस्य :-------डा.अजय दीक्षित---------"अजय"

कलियुग में श्री हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने का अदभुत रहस्य :-------डा.अजय दीक्षित---------"अजय" की सत्य सोंच     
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            होइ हैं सोइ जो राम रची राखा ।
को करि तर्क बढ़ावहि शाखा ।।
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हनुमानजी इस कलियुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे । वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं । वे कहां रहते हैं, कब–कब व कहां–कहां प्रकट होते हैं और उनके दर्शन कैसे और किस तरह किए जा सकते हैं, हम यह आपको बताएंगे एक ऐसा रहस्य जिसे जानकर आप सचमुच ही चौंक जाएंगे
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा ।।
++++++++++++++++++++++++++++++++ संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।।
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अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई ।।
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और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई ।।
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चारों युग में हनुमानजी के ही परताप से जगत में उजियारा है । हनुमान को छोड़कर और किसी देवी–देवता में चित्त धरने की कोई आवश्यकता नहीं है । द्वंद्व में रहने वाले का हनुमानजी सहयोग नहीं करते हैं । हनुमानजी हमारे बीच इस धरती पर सशरीर मौजूद हैं । किसी भी व्यक्ति को जीवन में श्रीराम की कृपा के बिना कोई भी सुख–सुविधा प्राप्त नहीं हो सकती है । श्रीराम की कृपा प्राप्ति के लिए हमें हनुमानजी को प्रसन्न करना चाहिए ।                         
+++++++++++++++++++++++++++++++++++   राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ।।
+++++++++++++++++++++++++++++++++++  ।।उनकी आज्ञा के बिना कोई भी श्रीराम तक पहुंच नहीं सकता । हनुमानजी क्यों आज भी जीवित हैं हनुमानजी ? हनुमानजी इस कलियुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे । वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं । हनुमानजी को धर्म की रक्षा के लिए अमरता का वरदान मिला था । इस वरदान के कारण आज भी हनुमानजी जीवित हैं और वे भगवान के भक्तों तथा धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं । जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि तथा मार्कण्डेय रिषि  सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे ।
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क्यों आज भी जीवित हैं हनुमानजी?
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कलियुग में श्रीराम का नाम लेने वाले और हनुमानजी की भक्ति करने वाले ही सुरक्षित रह सकते हैं । हनुमानजी अपार बलशाली और वीर हैं और उनका कोई सानी नहीं है ।      +++++++++++++++++++++++++++++++++++धर्म की स्थापना और रक्षा का कार्य ४ लोगों के हाथों में है –
+++++++++++++++++++++++++++++++++++  दुर्गा, भैरव, हनुमान और कृष्ण ।                                  चारों जुग परताप तुम्हारा ः है प्रसिद्ध जगत उजियारा ।।
++++++++++++++++++++++++++++++++++  लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब श्रीराम उन्हें युद्घ में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञतास्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमानजी श्रीराम से याचना करते हैं।
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यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले । तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशयः….
अर्थात ‘हे वीर श्रीराम ! इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहें ।’ इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते हैं ।                –‘एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशयः । चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत ते भविता कीर्तिः शरीरे प्यवस्तथा । लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा ।’          अर्थात् –‘हे कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही होगा, इसमें संदेह नहीं है । संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही । जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेंगी ।’
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा ।
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देखिए?  चारों युगों मे हनुमान जी को -------
१.    त्रेतायुग में हनुमान ः त्रेतायुग में तो पवनपुत्र हनुमान ने केसरीनंदन के रूप में जन्म लिया और वे राम के भक्त बनकर उनके साथ छाया की तरह रहे । वाल्मीकि ‘रामायण’ में हनुमानजी के संपूर्ण चरित्र का उल्लेख मिलता है ।
२.    द्वापर में हनुमान ः द्वापर युग में हनुमानजी भीम की परीक्षा लेते हैं । इसका बड़ा ही सुंदर प्रसंग है । महाभारत में प्रसंग है कि भीम उनकी पूंछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूंछ नहीं हटा पाते हैं । इस तरह एक बार हनुमानजी के माध्यम से श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र और गरूड़ की शक्ति के अभिमान का मान–मर्दन करते हैं ।
३.    कलयुग में हनुमान ः यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्घा और विश्वास से हनुमानजी का आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदासजी की भांति उसे भी हनुमान और राम–दर्शन होने में देर नहीं लगेगी । कलियुग में हनुमानजी ने अपने भक्तों को उनके होने का आभास कराया है ।                   
+++++++++++++++++++++++++++++++++++ ये वचन हनुमानजी ने ही तुलसीदासजी से कहे थे – ‘चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर । तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर …’
कहां रहते हैं हनुमानजी ? हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद् भागवत में वर्णन आता है । उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे । एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था ।
‘यत्र–यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि ।
वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक ।।’
अर्थात कलियुग में जहां–जहां भगवान श्रीराम की कथा–कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं । सीताजी के वचनों के अनुसार –‘अजर–अमर गुन निधि सुत होऊ ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ … ।’ गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन ः गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है । महाभारत की पुरा–कथाओं में भी गंधमादन पर्वत का वर्णन प्रमुखता से आता है । हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहां के विशालकाय पर्वतमाला और वन क्षेत्र में देवता रमण करते हैं । पर्वतों में श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने भी तपस्या की थी । गंधमादन पर्वत के शिखर पर किसी भी वाहन से नहीं पहुंचा जा सकता । गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवास करते हैं । वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं । वर्तमान में कहां है गंधमादन पर्वत ? ः– इसी नाम से एक और पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है, जहां से हनुमानजी ने समुद्र पार करने के लिए छलांग लगाई थी, लेकिन हम उस पर्वत की नहीं बात कर रहे हैं । हम बात कर रहे हैं हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की । यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था । सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था । आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है । पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था ।
कैसे पहुंचे गंधमादन ः पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था । इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है । पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन होते हुए । संभवत महाभारत काल में अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब हनुमानजी से भेंट की थी, तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल के रास्ते ही असम तीर्थ मे आए होंगे ।

कलियुग में श्री हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने का अदभुत रहस्य :-------डा.अजय दीक्षित---------"अजय"

कलियुग में श्री हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने का अदभुत रहस्य :-------डा.अजय दीक्षित---------"अजय" की सत्य सोंच     
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            होइ हैं सोइ जो राम रची राखा ।
को करि तर्क बढ़ावहि शाखा ।।
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हनुमानजी इस कलियुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे । वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं । वे कहां रहते हैं, कब–कब व कहां–कहां प्रकट होते हैं और उनके दर्शन कैसे और किस तरह किए जा सकते हैं, हम यह आपको बताएंगे एक ऐसा रहस्य जिसे जानकर आप सचमुच ही चौंक जाएंगे
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा ।।
++++++++++++++++++++++++++++++++ संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।।
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अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई ।।
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और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई ।।
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चारों युग में हनुमानजी के ही परताप से जगत में उजियारा है । हनुमान को छोड़कर और किसी देवी–देवता में चित्त धरने की कोई आवश्यकता नहीं है । द्वंद्व में रहने वाले का हनुमानजी सहयोग नहीं करते हैं । हनुमानजी हमारे बीच इस धरती पर सशरीर मौजूद हैं । किसी भी व्यक्ति को जीवन में श्रीराम की कृपा के बिना कोई भी सुख–सुविधा प्राप्त नहीं हो सकती है । श्रीराम की कृपा प्राप्ति के लिए हमें हनुमानजी को प्रसन्न करना चाहिए ।                         
+++++++++++++++++++++++++++++++++++   राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ।।
+++++++++++++++++++++++++++++++++++  ।।उनकी आज्ञा के बिना कोई भी श्रीराम तक पहुंच नहीं सकता । हनुमानजी क्यों आज भी जीवित हैं हनुमानजी ? हनुमानजी इस कलियुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे । वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं । हनुमानजी को धर्म की रक्षा के लिए अमरता का वरदान मिला था । इस वरदान के कारण आज भी हनुमानजी जीवित हैं और वे भगवान के भक्तों तथा धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं । जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि तथा मार्कण्डेय रिषि  सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे ।
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क्यों आज भी जीवित हैं हनुमानजी?
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कलियुग में श्रीराम का नाम लेने वाले और हनुमानजी की भक्ति करने वाले ही सुरक्षित रह सकते हैं । हनुमानजी अपार बलशाली और वीर हैं और उनका कोई सानी नहीं है ।      +++++++++++++++++++++++++++++++++++धर्म की स्थापना और रक्षा का कार्य ४ लोगों के हाथों में है –
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++++++++++++++++++++++++++++++++++  लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब श्रीराम उन्हें युद्घ में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञतास्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमानजी श्रीराम से याचना करते हैं।
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यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले । तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशयः….
अर्थात ‘हे वीर श्रीराम ! इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहें ।’ इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते हैं ।                –‘एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशयः । चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत ते भविता कीर्तिः शरीरे प्यवस्तथा । लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा ।’          अर्थात् –‘हे कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही होगा, इसमें संदेह नहीं है । संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही । जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेंगी ।’
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा ।
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देखिए?  चारों युगों मे हनुमान जी को -------
१.    त्रेतायुग में हनुमान ः त्रेतायुग में तो पवनपुत्र हनुमान ने केसरीनंदन के रूप में जन्म लिया और वे राम के भक्त बनकर उनके साथ छाया की तरह रहे । वाल्मीकि ‘रामायण’ में हनुमानजी के संपूर्ण चरित्र का उल्लेख मिलता है ।
२.    द्वापर में हनुमान ः द्वापर युग में हनुमानजी भीम की परीक्षा लेते हैं । इसका बड़ा ही सुंदर प्रसंग है । महाभारत में प्रसंग है कि भीम उनकी पूंछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूंछ नहीं हटा पाते हैं । इस तरह एक बार हनुमानजी के माध्यम से श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र और गरूड़ की शक्ति के अभिमान का मान–मर्दन करते हैं ।
३.    कलयुग में हनुमान ः यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्घा और विश्वास से हनुमानजी का आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदासजी की भांति उसे भी हनुमान और राम–दर्शन होने में देर नहीं लगेगी । कलियुग में हनुमानजी ने अपने भक्तों को उनके होने का आभास कराया है ।                   
+++++++++++++++++++++++++++++++++++ ये वचन हनुमानजी ने ही तुलसीदासजी से कहे थे – ‘चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर । तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर …’
कहां रहते हैं हनुमानजी ? हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद् भागवत में वर्णन आता है । उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे । एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था ।
‘यत्र–यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि ।
वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक ।।’
अर्थात कलियुग में जहां–जहां भगवान श्रीराम की कथा–कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं । सीताजी के वचनों के अनुसार –‘अजर–अमर गुन निधि सुत होऊ ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ … ।’ गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन ः गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है । महाभारत की पुरा–कथाओं में भी गंधमादन पर्वत का वर्णन प्रमुखता से आता है । हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहां के विशालकाय पर्वतमाला और वन क्षेत्र में देवता रमण करते हैं । पर्वतों में श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने भी तपस्या की थी । गंधमादन पर्वत के शिखर पर किसी भी वाहन से नहीं पहुंचा जा सकता । गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवास करते हैं । वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं । वर्तमान में कहां है गंधमादन पर्वत ? ः– इसी नाम से एक और पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है, जहां से हनुमानजी ने समुद्र पार करने के लिए छलांग लगाई थी, लेकिन हम उस पर्वत की नहीं बात कर रहे हैं । हम बात कर रहे हैं हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की । यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था । सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था । आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है । पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था ।
कैसे पहुंचे गंधमादन ः पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था । इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है । पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन होते हुए । संभवत महाभारत काल में अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब हनुमानजी से भेंट की थी, तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल के रास्ते ही असम तीर्थ मे आए होंगे ।

शुक्रवार, 5 मई 2017

महाभारत युद्ध में कौरवों और पांडवों ने कब-कब छल से किया योद्धाओं का वध

महाभारत युद्ध में कौरवों और पांडवों ने कब-कब छल से किया योद्धाओं का वध                

कौरवों और पांडवों ने मिलकर महाभारत युद्ध के लिए कुछ नियम बनाए थे जिनका दोनों ही पक्षों को पालन करना था। युद्ध शुरू होने से कुछ दिनों बाद तक तो इन नियमों का पालन किया गया, लेकिन बाद में इन नियमों को कई बार तोड़ा गया और छल का सहारा लेकर योद्धाओं को मारा गया। युद्ध में कब, किसने छल से योद्धाओं का वध किया, आज हम आपको यही बता रहे हैं-
शिखंडी को आगे कर किया भीष्म को पराजित
युद्ध शुरू होने पर कौरवों की ओर से भीष्म पितामाह को सेनापति बनाया गया। भीष्म ने पांडवों की सेना में हाहाकार मचा दिया। तब अर्जुन ने शिखंडी को आगे कर भीष्म से युद्ध किया। भीष्म जानते थे कि शिखंडी का जन्म स्त्री के रूप में हुआ है और पिछले जन्म में भी वह एक स्त्री था। भीष्म ने स्त्री पर वार न करने की प्रतिज्ञा की थी। इसलिए वे अर्जुन पर वार नहीं कर पाए और अर्जुन ने भीष्म को पराजित कर दिया।
कौरवों ने किया अभिमन्यु का वध
युद्ध शुरू होने से पहले ये नियम बनाया गया था कि एक योद्धा से एक योद्धा ही युद्ध करेगा। दूसरा कोई उनके बीच नहीं जाएगा, लेकिन कौरवों ने इस नियम को तोड़ा। जब अभिमन्यु अकेला चक्रव्यूह में फंस गया तो कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, शकुनि आदि योद्धाओं ने मिलकर अभिमन्यु का वध कर दिया। इसके बाद ही युद्ध के नियमों का टूटना शुरू हुआ।
सात्यकि ने किया भूरिश्रवा का वध
भूरिश्रवा बहुत ही पराक्रमी योद्धा था। युद्ध में उसने कौरवों का साथ दिया था। सात्यकि अर्जुन का शिष्य था। कुरुक्षेत्र में जब ये दोनों महावीर मल्ल युद्ध कर रहे थे तब भूरिश्रवा ने सात्यकि को उठाकर जमीन पर पटक दिया और जब वह सात्यकि का वध करना चाहता था, उसी समय अर्जुन ने दूर से ही तीर चलाकर उसका हाथ काट दिया। अर्जुन के द्वारा इस प्रकार युद्ध के नियम तोड़ने पर भूरिश्रवा को बहुत क्रोध आया और वह उपवास लेकर वहीं बैठ गया। सात्यकि ने इसी का फायदा उठाते हुए भूरिश्रवा का वध कर दिया।
छल से किया द्रोणाचार्य का वध
भीष्म के बाद द्रोणाचार्य को कौरवों का सेनापति बनाया गया। द्रोणाचार्य पर विजय पाना भी जब पांडवों के लिए मुश्किल हो गया तब भीम ने अश्वत्थामा नाम के हाथी का वध कर दिया और ऐसा कहने लगे कि- मैंने अश्वत्थामा का वध कर दिया। द्रोणाचार्य के पुत्र का नाम भी अश्वत्थामा था, इससे वे संशय में पड़ गए। जब उन्होंने इसके बारे में युधिष्ठिर से पूछा तो उन्होंने भी इसे सत्य बताया। पुत्र मोह के कारण द्रोणाचार्य ने अपने हथियार रख दिए और ध्यान की स्थिति में बैठ गए। इसी का फायदा उठाते हुए धृष्टद्युम्न (पांडवों का सेनापति) ने उनका वध कर दिया।
अर्जुन ने ऐसे किया कर्ण का वध
महाभारत युद्ध का एक नियम ये भी था कि असावधान व्यक्ति पर कोई वार नहीं करेगा और जो योद्धा अपने रथ से नीचे है, उसके साथ भी युद्ध नहीं किया जाएगा। युद्ध के दौरान जब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया था और कर्ण उसे निकालने नीचे उतरे, उसी स्थिति में अर्जुन ने उसका वध कर दिया। उस समय कर्ण के पास शस्त्र भी वहीं थे और वह असावधान स्थिति में था।
भीम ने किया दुर्योधन का वध
जब कौरवों की सेना नष्ट हो गई तब भीम व दुर्योधन में निर्णायक गदा युद्ध हुआ। गदा युद्ध के नियमों के अनुसार योद्धा कमर के नीचे वार नहीं कर सकते, लेकिन भीम ने इस नियम को तोड़ते हुए अपनी गदा से दुर्योधन की जांघ पर वार किया। जांघ पर वार होने से दुर्योधन पराजित हो गया। वहीं तड़पते हुए दुर्योधन के प्राण निकल गए।
अश्वत्थामा ने भी तोड़ा युद्ध का नियम
रात को कोई किसी पर वार नहीं करेगा, ये भी महाभारत युद्ध का एक नियम था। इस नियम को अश्वत्थामा ने तोड़ा था। दुर्योधन ने मरने से पहले अश्वत्थामा को कौरवों का अंतिम सेनापति बनाया। उस समय अश्वत्थामा के अलावा कौरवों की ओर से केवल कृपाचार्य व कृतवर्मा ही जीवित बचे थे। अश्वत्थामा रात के अंधेरे में पांडवों के शिविर में घुस गया और धृष्टद्युम्न, युधामन्यु के अलावा द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया।

बुधवार, 3 मई 2017

🔯चमत्कारी औषधि 🔯

चमत्कारी औषधि-------- डा.अजय दीक्षित
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लोग जो अन्जाने में ही किन्हीं व्यसनों से ग्रस्त हो गए हैं उनके लिए अपने वर्षों के श्रम ,शोध एवं अनुभव के आधार पर एक रामबाण तरीका बता रहा हूं । मुझे पूर्ण विश्वास है कि इसे आप धन कमाने के स्थान पर लोकहित में ही प्रयोग करेंगे । इसका उपयोग किसी एक विशेष नशे की आदत से छुटकारा पाने के लिए नहीं बल्कि कई तरह के नशों की आदत से छुटकारे के लिए मैंने प्रयोग कराया है और सफलता पाई है ।

इससे आप यदि इन नशीले पदार्थों के आदी हैं तो फिर देर किस बात की है बस अपने गुरू या इष्ट का स्मरण करके एक बार मन में यह विचार तो लाइए कि आपको उक्त नशा छोड़ना है फिर शेष काम तो यह चमत्कारी औषधि करेगी और कुछ ही दिनों में आप पाएंगे कि जादू हो रहा है कि जिस पदार्थ की आपको जानलेवा तलब होती थी वह पता नहीं कहां विलीन हो गई है ।

मैंने जिन पदार्थों पर इस श्रेष्ठ औषधि का प्रयोग किया है वे हैं : -
बीड़ी
सिगरेट
चिलम
चबाने वाली तम्बाकू
चाय
काफ़ी
अफ़ीम

अगर मौका लगेगा तो इसे नींद की गोलियां खाने वाले मरीजों के लिए भी अनुभव करूंगा ताकि उनकी इस नामुराद दवा (या जहर) से पीछा छूट जाए ।
पारस पीपल (यह एक बड़ा पेड़ होता है इसके पत्ते अचानक देखने में प्रसिद्ध पेड़ पीपल के पत्तों की तरह होते है तथा भिंडी के फूलों की तरह पीले फूल आते हैं तथा कुछ दिनों में ये फूल गाढ़े गुलाबी होकर मुर्झा जाते हैं ,इस पेड़ को मराठी में "भेंडी " ही कहा जाता है ) के पुराने पेड़ की छाल जो स्वतः ही पेड़ से अलग हो जाती है ,उसको लेकर खूब बारीक पीस कर मैदे की तरह बना लें व शीशी में भर लें । यह बारीक चूर्ण बारह ग्राम लेकर २५० मि.ली. पानी में हलकी आंच पर जैसे चाय बनाते हैं वैसे ही पकाएं और १०० मि.ली. पक कर रह जाने पर छान कर चाय की तरह ही हलका गर्म सा पी लीजिए ।

सुबह शाम नियमित रूप से पंद्रह दिनों तक सेवन कराने से मैंने पाया है कि मादक द्रव्यों की आदत छूट जाती है तथा नफ़रत सी होने लगती है । एकबार व्यसन छूट जाए तो पुनः इन दुर्व्यसनों को प्रयोग नहीं करना चाहिए फिर व्यसन से मुक्त होने के बाद मैं आदी व्यक्ति को दो माह तक बैद्यनाथ कंपनी का "दिमाग दोष हरी" नामक दवा का सेवन कराता हूं ।

अगर आपके क्षेत्र में पारस पीपल नहीं पाया जाता है तो किसी महाराष्ट्र में रहने वाले मित्र से मंगवाने में देर न करिए और लाभान्वित होइए । ईश्वर को धन्यवाद दीजिये कि उसने साधारण सी दिखने वाली चीज़ों में कैसे दिव्य गुण भर रखे हैं.......!!

Miracle Drug ----------------

For people who have unknowingly got addicted to any addictions, for them, I am telling them a sovereign way on the basis of their years of labor, research and experience. I have full faith that it will be used only in the public interest instead of making money. It has not been used to get rid of the habit of one particular addiction, but to get rid of the habit of many types of drugs, I have experimented and have succeeded.

If you are accustomed to these narcotics, then what is the matter of late, remembering only your guru or fate, take this idea in mind that you have to give up the addiction and then the remaining work will do this miraculous medicine and only a few days You will find that the magic is happening that the material that you were cured of was not known where it has merged.

The substances that I have used this excellent medicine are: -
Beidi
cigarette
Chilm
Chewing tobacco
Tea
Quite
Opium

If it is an opportunity, then I will also experience it for patients who have sleep pills so that they can not follow their dislike medicine (or poison).
Paras Peepal (It is a big tree, its leaves are suddenly seen as famous as yellow leaves of birds and yellow flowers like the flowers of the beans and in some days these flowers become thick and pink, this tree is eaten in Marathi The bark of the old tree which separates itself from the tree, is called "okra" in itself, grind it with fine finely and make it like maida and fill it in vial. Take this fine powder from twelve gm and 250 ml Cook on the same light as the tea on the flame and 100 ml of water. After cooking, after filtering, filter it like hot tea.

 By taking it for fifteen days regularly in the morning, I have found that the habit of substance abuse is gone and it starts getting cheated. Once the addiction is gone, then these drugs should not be used again. After getting rid of the addiction, I used to take the addicts 'brain defect Hari' of the Baidyanath Company for two months.

If you do not find the Paras Peepal in your area, do not delay in getting invited to a friend living in Maharashtra and get benefitted. Thanks to God how he has filled the divine qualities in ordinary things ... ..... !!

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Drajaidixit@gmail.com