बुधवार, 10 जून 2020

श्री मद् भगवद। गीता :---प्रथम अध्याय

अध्याय एक - कर्मयुद्ध-योग
(योद्धाओं की गणना और सामर्थ्य)
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ (१)

भावार्थ : धृतराष्ट्र ने कहा - हे संजय! धर्म-भूमि और कर्म-भूमि में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? (१)
संजय उवाच
दृष्टा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌ ॥ (२)

भावार्थ : संजय ने कहा - हे राजन्! इस समय राजा दुर्योधन पाण्डु पुत्रों की सेना की व्यूह-रचना को देखकर आचार्य द्रोणाचार्य के पास जाकर कह रहे हैं। (२)
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌ ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।।


भवार्थ : हे आचार्य! पाण्डु पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न ने इतने कौशल से व्यूह के आकार में सजाया है। (३)
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ (४)
भावार्थ : इस युद्ध में भीम तथा अर्जुन के समान अनेकों महान शूरवीर और धनुर्धर है, युयुधान, विराट और द्रुपद जैसे भी महान योद्धा है। (४)
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌ ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः ॥ (५)
भावार्थ : धृष्टकेतु, चेकितान तथा काशीराज जैसे महान शक्तिशाली और पुरुजित्, कुन्तीभोज तथा शैब्य जैसे मनुष्यों मे श्रेष्ठ योद्धा भी है। (५)
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌ ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ (६)
भावार्थ : युधामन्यु जैसे महान पराक्रमी तथा उत्तमौजा जैसे अत्यन्त शक्तिशाली, सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्रों सहित ये सभी महान योद्धा हैं। (६)
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ (७)
भावार्थ : हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हमारी तरफ़ के भी उन विशेष शक्तिशाली योद्धाओं को भी जान लीजिये और आपकी जानकारी के लिये मेरी सेना के उन योद्धाओं के बारे में बतलाता हूँ। (७)
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ (८)
भावार्थ : मेरी सेना में स्वयं आप-द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा जैसे योद्धा है, जो सदैव युद्ध में विजयी रहे हैं। (८)
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ (९)
भावार्थ : ऎसे अन्य अनेक शूरवीर भी है जो मेरे लिये अपने जीवन का बलिदान देने के लिये अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है और यह सभी युद्ध-विधा में निपुण है। (९)
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥ (१०)
भावार्थ : इस प्रकार भीष्म पितामह द्वारा अच्छी प्रकार से संरक्षित हमारी सेना की शक्ति असीमित है, किन्तु भीम द्वारा अच्छी प्रकार से संरक्षित होकर भी पांडवों की सेना की शक्ति सीमित है। (१०)
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ (११)
भावार्थ : अत: सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहकर आप सभी निश्चित रूप से भीष्म पितामह की सभी ओर से सहायता करें। (११)
(योद्धाओं द्वारा शंख-ध्वनि)

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌ ॥ (१२)

भावार्थ : तब कुरुवंश के वयोवृद्ध परम-प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए सिंह-गर्जना के समान उच्च स्वर से शंख बजाया। (१२)
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌ ॥ (१३)

भावार्थ : तत्पश्चात् अनेक शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और सींग आदि बाजे अचानक एक साथ बज उठे, उनका वह शब्द बड़ा भयंकर था। (१३)
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ (१४)

भावार्थ : तत्पश्चात् दूसरी ओर से सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ पर आसीन योगेश्वर श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए। (१४)
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः ॥ (१५)

भावार्थ : हृदय के सर्वस्व ज्ञाता श्रीकृष्ण ने "पाञ्चजन्य" नामक, अर्जुन ने "देवदत्त" नामक और भयानक कर्म वाले भीमसेन ने "पौण्ड्र" नामक महाशंख बजाया। (१५)
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ (१६)

भावार्थ : हे राजन! कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने "अनन्तविजय" नामक और नकुल तथा सहदेव ने "सुघोष" और "मणिपुष्पक" नामक शंख बजाए। (१६)
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ (१७)

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌ ॥ (१८)

भावार्थ : श्रेष्ठ धनुष वाले काशीराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और कभी न हारने वाला सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजा वाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु आदि सभी ने अलग-अलग शंख बजाए। (१७-१८)
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌ ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌ ॥ (१९)

भावार्थ : उस भयंकर ध्वनि ने आकाश और पृथ्वी को गुंजायमान करते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय में शोक उत्पन्न कर दिया। (१९)
(अर्जुन द्वारा सैन्य-निरीक्षण)

अर्जुन उवाचः
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ (२०)

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ (२१)

भावार्थ : हे राजन्‌! इसके बाद हनुमान से अंकित पताका लगे रथ पर आसीन पाण्डु पुत्र अर्जुन ने धनुष उठाकर तीर चलाने की तैयारी के समय धृतराष्ट्र के पुत्रों को देखकर हृदय के सर्वस्व ज्ञाता श्री कृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहा कि हे अच्युत! कृपा करके मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खडा़ करें। (२०-२१)
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌ ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ (२२)

भावार्थ : जिससे मैं युद्धभूमि में उपस्थित युद्ध की इच्छा रखने वालों को देख सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन से एक साथ युद्ध करना है। (२२)
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ (२३)

भावार्थ : मैं उनको भी देख सकूँ जो यह राजा लोग यहाँ पर धृतराष्ट् के दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधन के हित की इच्छा से युद्ध करने के लिये एकत्रित हुए हैं। (२३)
संजय उवाचः
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌ ॥ (२४)

भावार्थ : संजय ने कहा - हे भरतवंशी! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृदय के पूर्ण ज्ञाता श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस उत्तम रथ को खड़ा कर दिया। (२४)
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌ ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति ॥

भावार्थ : इस प्रकार भीष्म पितामह, आचार्य द्रोण तथा संसार के सभी राजाओं के सामने कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए एकत्रित हुए इन सभी कुरु वंश के सद्स्यों को देख। (२५)
तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌ ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ (२६)

भावार्थ : वहाँ पृथापुत्र अर्जुन ने अपने ताऊओं-चाचाओं को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को और मित्रों को देखा। (२६)
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌ ॥ (२७)

भावार्थ : कुन्ती-पुत्र अर्जुन ने ससुरों को और शुभचिन्तकों सहित दोनों तरफ़ की सेनाओं में अपने ही सभी सम्बन्धियों को देखा। (२७)
(अर्जुन की अज्ञानता का निरूपण )

अर्जुन उवाच
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌ ।
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌ ॥ (२८)

भावार्थ : तब करुणा से अभिभूत होकर शोक करते हुए अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा वाले इन सभी मित्रों तथा सम्बन्धियों को उपस्थित देखकर। (२८)
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते ॥ (२९)

भावार्थ : मेरे शरीर के सभी अंग काँप रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है, और मेरे शरीर के कम्पन से रोमांच उत्पन्न हो रहा है। (२९)
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ (३०)

भावार्थ : मेरे हाथ से गांडीव धनुष छूट रहा है और त्वचा भी जल रही है, मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा भी नही रह पा रहा हूँ। (३०)
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ (३१)

भावार्थ : हे केशव! मुझे तो केवल अशुभ लक्षण ही दिखाई दे रहे हैं, युद्ध में स्वजनों को मारने में मुझे कोई कल्याण दिखाई नही देता है। (३१)
न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ (३२)

भावार्थ : हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न ही राज्य और सुखों की इच्छा करता हूँ, हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य, सुख अथवा इस जीवन से भी क्या लाभ है। (३२)
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ (३३)

भावार्थ : जिनके साथ हमें राज्य आदि सुखों को भोगने की इच्छा हैं, जब वह ही अपने जीवन के सभी सुखों को त्याग करके इस युद्ध भूमि में खड़े हैं। (३३)
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा ॥ (३४)

भावार्थ : गुरुजन, परिवारीजन, पुत्रगण, पितामह, मामा, ससुर, पौत्रगण, साले और सभी सम्बन्धी भी मेरे सामने खडे़ है। (३४)
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ (३५)

भावार्थ : हे मधुसूदन! मैं इन सभी को मारना नहीं चाहता हूँ, भले ही यह सभी मुझे ही मार डालें, तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सभी को मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है? (३५)
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः ॥(३६)

भावार्थ : हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी? बल्कि इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। (३६)
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌ ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ (३७)

भावार्थ : हे माधव! अत: मुझे धृतराष्ट्र के पुत्रों को उनके मित्रों और सम्बन्धियों सहित मारना उचित नही लगता है, क्योंकि अपने ही कुटुम्बियों को मार कर हम कैसे सुखी हो सकते हैं? (३७)
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌ ॥ (३८)

भावार्थ : यधपि लोभ के कारण इन भ्रमित चित्त वालों को कुल के नाश से उत्पन्न होने वाले दोष दिखाई नही देते हैं, और मित्रों से विरोध करने में कोई पाप दिखाई नही देता है।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌ ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ (३९)

भावार्थ : हे जनार्दन! हम लोग तो कुल के नाश से उत्पन्न दोष को समझने वाले हैं क्यों न हमें इस पाप से बचने के लिये विचार करना चाहिये। (३९)
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ (४०)

भावार्थ : कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में अधर्म फैल जाता है। (४०)
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ (४१)

भावार्थ : हे कृष्ण! अधर्म अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, स्त्रियों के दूषित हो जाने पर अवांछित सन्ताने उत्पन्न होती है। (४१)
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ (४२)

भावार्थ : अवांछित सन्तानों की वृद्धि से निश्चय ही कुल में नारकीय जीवन उत्पन्न होता है, ऎसे पतित कुलों के पितृ गिर जाते है क्योंकि पिण्ड और जल के दान की क्रियाऎं समाप्त हो जाती है। (४२)
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ (४३)

भावार्थ : इन अवांछित सन्तानो के दुष्कर्मों से सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं। (४३)
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ (४४)

भावार्थ : हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में रहना पडता है, ऐसा हम सुनते आए हैं। (४४)
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌ ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ (४५)

भावार्थ : ओह! कितने आश्चर्य की बात है कि हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने प्रियजनों को मारने के लिए आतुर हो गए हैं। (४५)

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌ ॥ (४६)

भावार्थ : यदि मुझ शस्त्र-रहित विरोध न करने वाले को, धृतराष्ट्र के पुत्र हाथ में शस्त्र लेकर युद्ध में मार डालें तो भी इस प्रकार मरना मेरे लिए अधिक श्रेयस्कर होगा। (४६)

संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌ ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ (४७)

भावार्थ : संजय ने कहा - इस प्रकार शोक से संतप्त हुआ मन वाला अर्जुन युद्ध-भूमि में यह कहकर बाणों सहित धनुष को त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ गया। (४७)
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे कृष्णार्जुनसंवादे धर्मकर्मयुद्धयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः॥
इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद भगवदगीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में धर्मकर्मयुद्ध-योग नाम का पहला अध्याय संपूर्ण हुआ॥

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

सोमवार, 18 मई 2020

आखिर!क्या है उपयोग :--जीवन में पीतल के बर्तनों का !

।। हरी ओम् धन्वंतराय नमः ।।
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आखिर!क्या है उपयोग :--जीवन में पीतल के बर्तनों का !
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                  आचार्य डा. अजय दीक्षित

पीतल के पात्रों का महत्व :-----
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पीतल के पात्रों का महत्व ज्योतिष व धार्मिक शास्त्रों में भी बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सुवर्ण व पीतल की ही भांति पीला रंग देवगुरु बृहस्पति को संबोधित करता है तथा ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार पीतल पर देवगुरु बृहस्पति का आधिपत्य होता है। बृहस्पति ग्रह की शांति हेतु पीतल का उपयोग किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रह शांति व ज्योतिष अनुष्ठानों में दान हेतु भी पीतल के बर्तन दिए जाते हैं।

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पीतल के बर्तनों का कर्मकांड में अत्यधिक महत्व है। वैवाहिक कार्य में वेदी पढ़ने हेतु व कन्यादान के समय पीतल का कलश प्रयोग किया जाता है। शिवलिंग पर दूध चढ़ाने हेतु भी पीतल के कलश का उपयोग किया जाता है तथा बगलामुखी देवी के अनुष्ठानों में मात्र पीतल के बर्तन ही प्रयोग लिए जाते हैं।

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पीतल के बर्तनों का उपयोग
भारत के कई क्षेत्रों में आज भी सनातनधर्मी जन्म से लेकर मृत्यु के उपरांत तक पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। स्थानिक मान्यताओं के अनुसार बालक के जन्म पर नाल छेदन करने के उपरांत पीतल की थाली तो छुरी से पीटा जाता है। मान्यता है कि इससे पितृगण को सूचित किया जाता है कि आपके कुल में जल और पिंडदान करने वाले वंशज का जन्म हो चुका है। 

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मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि क्रिया के 10वें दिन अस्थि विसर्जन के उपरांत नारायणवली व पीपल पर पितृ जलां‍जलि मात्र पीतल कलश से दी जाती है। मृत्यु संस्कार के अंत में 12वें दिन त्रिपिंडी श्राद्ध व पिंडदान के बाद 12वीं के शुद्धि हवन व गंगा प्रसादी से पहले पीतल के कलश में सोने का टुकड़ा व गंगा जल भरकर पूरे घर को पवित्र किया जाता है।

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पीतल के बर्तन घर में रखना शुभ माना जाता है। सेहत की दृष्टि से पीतल के बर्तनों में बना भोजन स्वादिष्ट तुष्टि-प्रदाता होता है तथा इससे आरोग्य और शरीर को तेज प्राप्त होता है। पीतल का बर्तन जल्दी गर्म होता है जिससे गैस तथा अन्य ऊर्जा की बचत होती है। पीतल का बर्तन दूसरे बर्तनों से ज्यादा मजबूत और जल्दी न टूटने वाला धातु है। पीतल के कलश में रखा जल अत्यधिक ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है।

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पीतल पीले रंग का होने से हमारी आंखों के लिए टॉनिक का काम करता है। पीतल का उपयोग थाली, कटोरे, गिलास, लोटे, गगरे, हंडे, देवताओं की मूर्तियां व सिंहासन, घंटे, अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र, ताले, पानी की टोंटियां, मकानों में लगने वाले सामान और गरीबों के लिए गहने बनाने में होता है।

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पीतल के बर्तनों से लाभ :---------
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1. भाग्योदय हेतु पीतल की कटोरी में चना दाल भिगोकर रातभर सिरहाने रखें व सुबह चना दाल पर गुड़ रखकर गाय को खिलाएं।

2. अटूट धन प्राप्ति हेतु पूर्णिमा के दिन भगवान श्रीकृष्ण पर शुद्ध घी से भरा पीतल का कलश चढ़ाकर निर्धन विप्र को दान करें।

3. लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु वैभवलक्ष्मी का पूजन कर पीतल के दीये में शुद्ध घी का दीपक करें।

4. दुर्भाग्य से मुक्ति पाने हेतु पीतल की कटोरी में दही भरकर कटोरी समेत पीपल के नीचे रखें।

5. सौभाग्य प्राप्ति हेतु पीतल के कलश में चना दाल भरकर विष्णु मंदिर में चढ़ाएं।
पीतल के बर्तन में खट्टे पदार्थ कभी भी न रखें।

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जय सियाराम जय जय हनुमान

         किसी भी शंका समाधान के लिए :----
         ह्वाटसप नम्बर :-9559986789 पर मैसेज करें ।

                  .आचार्य डा. अजय दीक्षित

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

वैशाख-स्नान से पाँच प्रेतों का उद्धार :---आचार्य डा.अजय दीक्षित

वैशाख-स्नान से पाँच प्रेतों का उद्धार :---आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया ।

अम्बरीष ने कहा – मुने ! जिसके चिन्तन मात्र से पाप राशि का लय हो जाता है, उस पाप प्रशमन नामक स्तोत्र को मैं भी सुनना चाहता हूँ। आज मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, आपने मुझे उस शुभ विधि का श्रवण कराया, जिसके सुनने मात्र से पापों का क्षय हो जाता है। वैशाख मास में जो भगवान केशव के कल्याणमय नामों का कीर्तन किया जाता है, उसी को मैं संसार में सबसे बड़ा पुण्य, पवित्र, मनोरम तथा एकमात्र सुकृत से ही सुलभ होने वाला शुभ कर्म मानता हूँ।। अहो ! जो लोग माधव मास में भगवान मधुसूदन के नामों का स्मरण करते हैं वे धन्य हैं। अत: यदि आप उचित समझें तो मुझे पुन: माधवमास की ही पवित्र कथा सुनाएँ।

सूतजी कहते हैं – राजाओं में श्रेष्ठ हरिभक्त अम्बरीष का वचन सुनकर नारद मुनि को बड़ी प्रसन्नता हुई। यद्यपि वे वैशाख स्नान के लिये जाने को उत्कंठित थे, तथापि सत्संग में आनन्द आने के कारण रुक गये और राजा से बोले।

नारद जीने कहा – महीपाल ! मुझे ऎसा जान पड़ता है कि यदि दो व्यक्तियों में परस्पर भगवत्कथा-संबंधी सरस वार्तापाल छिड़ जाए तो वह अत्यन्त विशुद्ध – अन्त:करण को शुद्ध करने वाला होता है। आज तुम्हारे साथ जो माधवमास के माहात्म्य की चर्चा चल रही है, यह वैशाख-स्नान की अपेक्षा अधिक पुण्य प्रदान करने वाली है क्योंकि माधवमास के देवता भगवान श्रीविष्णु हैं (अत: उनका कीर्तन भगवान का ही कीर्तन है)। जिसका जीवन धर्म के लिए और धर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए है तथा जो रातों-दिन पुण्योपार्जन में ही लगा रहता है, उसी को इस पृथ्वी पर मैं वैष्णव मानता हूँ। राजन् ! अब मैं वैशाख स्नान से होने वाले पुण्य फल का संक्षेप में वर्णन करता हूँ। विस्तार के साथ सारा वर्णन तो मेरे पिता – ब्रह्माजी भी नहीं कर सकते। वैशाख में डुबकी लगाने मात्र से समस्त पाप छूट जाते हैं।

पूर्वकाल की बात है कोई मुनीश्वर तीर्थयात्रा के प्रसंग से सर्वत्र घूम रहे थे। उनका नाम था मुनिशर्मा। वे बड़े धर्मात्मा, सत्यवादी, पवित्र तथा शम, दम एवं शान्तिधर्म से युक्त थे। वे प्रतिदिन पितरों का तर्पण और श्राद्ध करते थे। उन्हें वेदों और स्मृतियों के विधानों का सम्यक् ज्ञान था। वे मधुर वाणी बोलते और भगवान का पूजन करते रहते थे। वैष्णवों के संसर्ग में ही उनका समय व्यतीत होता था। वे तीनों कालों के ज्ञाता, मुनि, दयालु, अत्यन्त तेजस्वी, तत्वज्ञानी और ब्राह्मणभक्त थे। वैशाख का महीना था, मुनिशर्मा स्नान के लिए नर्मदा के किनारे जा रहे थे। उसी समय उन्होंने अपने सामने पाँच पुरुषों को देखा, जो भारी दुर्गति में फँसे हुए थे। वे अभी-अभी एक-दूसरे से मिले थे। उनके शरीर का रंग काला था। वे एक बरगद की छाया में बैठे थे और पापों के कारण उद्विग्न होकर चारों ओर दृष्टिपात कर रहे थे।

उन्हें देखकर द्विजवर मुनिशर्मा बड़े विस्मय में पड़े और सोचने लगे – इस भयानक वन में मनुष्य कहाँ से आए? इनकी चेष्टा बड़ी दयनीय है किन्तु इनका आकार बड़ा भयंकर दिखाई देता है। ये पापभागी चोर तो नहीं हैं? विप्रवर मुनिशर्मा की बुद्धि बड़ी स्थिर थी, वे ज्यों ही इस प्रकार विचार करने लगे, उसी समय उपर्युक्त पाँचों पुरुष उनके पास आये और हाथ जोड़कर मुनिशर्मा से बोले।

उन पुरुषों ने कहा – विप्रवर ! हमें आप कल्याणमय पुरुषोत्तम जान पड़ते हैं, हम दु:खी जीव हैं। अपना दु:ख विचारकर आपको बताना चाहते हैं। द्विजराज ! आप कृपा करके हमारी कष्ट कथा सुनें। दैववश जिनके पाप प्रकट हो गए हैं, उन दीन दु:खी प्राणियों के आधार आप जेसे संत महात्मा ही हैं। साधु पुरुष अपनी दृष्टिमात्र से पीड़ितों की पीड़ाएँ हर लेते हैं, अब उनमें से एक ने सबका परिचय देना आरंभ किया – मैं पंचाल देश का क्षत्रिय हूँ, मेरा नाम नरवाहन है।

मैंने मार्ग में मोहवश बाण द्वारा एक ब्राह्मण की हत्या कर डाली। मुझसे ब्रह्म हत्या का पाप हो गया इसलिए शिखा, सूत्र और तिलक से रहित होकर इस पृथ्वी पर घूमता हूँ और सबसे कहता फिरता हूँ कि “मैं ब्रह्महत्यारा हूँ।” मुझ महापापी ब्रह्मघाती को आप कृपा की भिक्षा दें। इस दशा में पड़े-पड़े मुझे एक वर्ष बीत गया। मैं पाप से जल रहा हूँ, मेरा चित्त शोक से व्याकुल है तथा ये जो सामने दिखाई देते हैं, इनका नाम चन्द्रशर्मा है। ये जाति के ब्राह्मण है, इन्होंने मोह से मलिन होकर गुरु का वध किया है और ये मगध देश के निवासी हैं। इनके स्वजनों ने इनका परित्याग कर दिया है। ये भी घूमते-घामते दैवात् यहाँ आ पहुँचे हैं। इनके भी न शिखा है न सूत्र। ब्राह्मण का कोई भी चिह्न इनके शरीर में नहीं रह गया है।

इनके सिवा जो ये तीसरे व्यक्ति हैं, इनका नाम देवशर्मा है। स्वामिन् ! ये भी बड़े कष्ट में है। ये भी जाति के ब्राह्मण हैं, किन्तु मोहवश वेश्या की आसक्ति में फँसकर शराबी हो गए थे। इन्होंने भी पूछने पर अपना सारा हाल सच-सच कह सुनाया है। अपने प्रथम पापाचार को याद करके इनके हृदय में बड़ा संताप होता है। ये सदा मनस्ताप से पीड़ित रहते हैं। इनको इनकी स्त्री ने, बन्धु-बान्धवों ने तथा गाँव के सब लोगों ने वहाँ से निकाल दिया है। ये अपने उसी पाप के साथ भ्रमण करते हुए यहाँ आए हैं।

ये चौथे महाशय जाति के वैश्य हैं। इनका नाम विधुर है। ये गुरुपत्नी के साथ समागम करने वाले हैं। इनकी माता मिथिला में जाकर वेश्या हो गई थी। इन्होंने मोहवश तीन महीनों तक उसी का उपभोग किया है परन्तु जब असली बात का पता लगा है तो बहुत दु:खी होकर पृथ्वी पर विचरते हुए ये भी यहाँ आ पहुँचे हैं। हम में से ये जो पाँचवें दिखाई दे रहे हैं, ये भी वैश्य ही हैं, इनका नाम नन्द है। ये पापियों का संसर्ग करने वाले महापापी हैं। इन्होंने प्रतिदिन धन के लालच में पड़कर बहुत चोरी की है। पातकों से आक्रान्त हो जाने पर इन्हें स्वजनों ने त्याग दिया है तब ये स्वयं भी खिन्न होकर दैवात् यहाँ आ पहुँचे हैं।

इस प्रकार हम पाँचों महापापी एक स्थान पर जुट गए हैं। हम सब के सब दु:खों से घिरे हुए हैं। अनेकों तीर्थों में घूम आए मगर हमारा घोर पातक नहीं मिटता। आपको तेज से उद्दीप्त देखकर हम लोगों का मन प्रसन्न हो गया है। आप जैसे साधु पुरुष के पुण्यमय दर्शन से हमारे पातकों के अन्त होने की सूचना मिल रही है। स्वामिन् ! कोई ऎसा उपाय बताइए, जिससे हम लोगों के पापों का नाश हो जाए। प्रभो ! आप वेदार्थ के ज्ञाता और परम दयालु जान पड़ते हैं, आपसे हमें अपने उद्धार की बड़ी आशा है।

मुनिशर्मा ने कहा – तुम लोगों ने अज्ञानवश पाप किया, किन्तु इसके लिए तुम्हारे हृदय में अनुताप है तथा तुम सब के सब सत्य बोल रहे हो, इस कारण तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करना मेरा कर्तव्य है। मैं अपनी भुजा उठाकर कहता हूँ, मेरी सत्य बातें सुनो। पूर्वकाल में जब मुनियों का समुदाय एकत्रित हुआ था, उस समय मैंने महर्षि अंगिरा के मुख से जो कुछ सुना था वही वेद शास्त्रों में भी देखा। वह सबके लिए विश्वास करने योग्य है। मेरी आराधना से संतुष्ट हुए स्वयं भगवान विष्णु ने भी पहले ऎसी ही बात बताई थी, वह इस प्रकार है।

भोजन से बढ़कर दूसरा कोई तृप्ति का साधन नहीं है। पिता से बढ़कर कोई गुरु नहीं है। ब्राह्मणों से उत्तम दूसरा कोई पात्र नहीं है तथा भगवान विष्णु से श्रेष्ठ दूसरा कोई देवता नहीं है। गंगा की समानता करने वाला कोई तीर्थ, गोदान की तुलना करने वाला कोई दान, गायत्री के समान जप, एकादशी के तुल्य व्रत, भार्या के सदृश मित्र, दया के समान धर्म तथा स्वतंत्रता के समान सुख नहीं है। गार्हस्थ्य से बढ़कर आश्रम और सत्य से बढ़कर सदाचार नहीं है। इसी प्रकार संतोष के समान सुख तथा वैशाख माह के समान महान् पापों का अपहरण करने वाला दूसरा कोई मास नहीं है।

वैशाख मास भगवान मधुसूदन को बहुत ही प्रिय है। गंगा आदि तीर्थों में तो वैशाख स्नान का सुयोग अत्यन्त दुर्लभ है। उस समय गंगा, जमुना तथा नर्मदा की प्राप्ति कठिन होती है। जो शुद्ध हृदय वाला मनुष्य भगवान के भजन में तत्पर हो पूरे वैशाख भर प्रात:काल गंगा स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है। इसलिए पुण्य के सारभूत इस वैशाख मास में तुम सभी पातकी मेरे साथ नर्मदा तट पर चलो और उसमें गोते लगाओ। नर्मदा के जल का मुनि लोग भी सेवन करते हैं, वह समस्त पापों के भय का नाश करने वाला है। मुनि के यों कहने पर वे सब पापी उनके साथ अद्भुत पुण्य प्रदान करने वाली नर्मदा की प्रशंसा करते हुए उसके तट पर गए।

किनारे पहुँचकर ब्राह्मण श्रेष्ठ मुनिशर्मा का चित्त परसन्न हो गया। उन्होंने वेदोक्त विधि के अनुसार नर्मदा के जल में प्रात: स्नान किया। उपर्युक्त पाँचों पापियों ने भी ब्राह्मण के कहने से ज्यों ही नर्मदा में डुबकी लगाई त्यों ही उनके शरीर का रंग बदल गया। वे तत्काल सुवर्ण के समान कान्तिमान हो गए फिर मुनिशर्मा ने सब लोगों के सामने उन्हें पाप-प्रशमन नामक स्तोत्र सुनाया।

भूपाल ! अब तुम पाप-प्रशमन नामक स्तोत्र सुनो। इसका भक्तिपूर्वक श्रवण करके भी मनुष्य पाप राशि से मुक्त हो जाता है। इसके चिन्तन मात्र से बहुतेरे पापी शुद्ध हो चुके हैं। इसके सिवा और भी बहुत-से मनुष्य इस स्तोत्र का सहारा लेकर अज्ञानजनित पाप से मुक्त हो गए हैं। जब मनुष्यों का चित्त परायी स्त्री, पराए धन तथा जीव-हिंसा आदि की ओर जाए तो इस प्रायश्चित्तरुपा स्तुति की शरण लेनी चाहिए, यह स्तुति इस प्रकार है –

 

विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नम:।

नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतं हरिम्।।

चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम्।

विष्णुमीड्यमशेषाणामनादिनिधनं हरिम्।।

अर्थ – संपूर्ण विश्व में व्यापक भगवान श्रीविष्णु को सर्वदा नमस्कार है। विष्णु को बारम्बार प्रणाम है। मैं अपने चित्त में विराजमान विष्णु को नमस्कार करता हूँ। अपने अहंकार में व्याप्त श्रीहरि को मस्तक झुकाता हूँ। श्रीविष्णु चित्त में विराजमान ईश्वर (मन और इन्द्रियों के शासक), अव्यक्त, अनन्त, अपराजित, सबके द्वारा स्तवन करने योग्य तथा आदि-अन्त से रहित है, ऎसे श्रीहरि को मैं नित्य-निरन्तर प्रणाम करता हूँ।

 

विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्।

योsहंकारगतो विष्णुर्यो विष्णुर्मयि संस्थित:।।

करोति कर्तृभूतोsसौ स्थावरस्य चरस्य च।

तत्पापं नाशमायाति तस्मिन् विष्णौ विचिन्तिते।।

अर्थ – जो विष्णु मेरे चित्त में विराजमान हैं, जो विष्णु मेरी बुद्धि में स्थित हैं, जो विष्णु मेरे अहंकार में व्याप्त हैं तथा जो विष्णु सदा मेरे स्वरुप में स्थित हैं, वे ही कर्ता होकर सब कुछ करते हैं। उन विष्णु भगवान का चिन्तन करने पर चराचर प्राणियों का सारा पाप नष्ट हो जाता है।

 

ध्यातो हरति य: पापं स्वप्ने दृष्टश्च पापिनाम्।

तमुपेन्द्रमहं विष्णुं नमामि प्रणतप्रियम्।।

अर्थ – जो ध्यान करने और स्वप्न में दिख जाने पर भी पापियों के पाप हर लेते हैं तथा चरणों में पड़े हुए शरणागत भक्त जिन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, उन वामनरूपधारी भगवान श्रीविष्णु को नमस्कार करता/करती हूँ।

 

जगत्यस्मिन्निरालम्बे ह्यजमक्षरमव्ययम्।

हस्तावलम्बनं स्तोत्रं विष्णुं वन्दे सनातनम्।।

अर्थ – जो अजन्मा, अक्षर और अविनाशी हैं तथा इस अवलम्बशून्य संसार में हाथ का सहारा देने वाले हैं, स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति की जाती है, उन सनातन श्रीविष्णु को मैं सदा प्रणाम करता/करती हूँ।

 

सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज।

हृ्षीकेश हृ्षीकेश हृ्षीकेश नमोsस्तु ते।।

अर्थ – हे सर्वेश्वर ! हे ईश्वर ! हे व्यापक परमात्मन् ! हे अधोक्षज ! हे इन्द्रियों का शासन करने वाले अन्तर्यामी हृषीकेश ! आपको बारम्बार नमस्कार है।

 

नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव।

दुरुक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाशु जनार्दन।।

अर्थ – हे नृसिंह ! हे अनन्त ! हे गोविन्द ! हे भूतभावन ! हे केशव ! हे जनार्दन ! मेरे दुर्वचन, दुष्कर्म और दुश्चिन्तन को शीघ्र नष्ट कीजिए।

 

यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना।

आकर्णय महाबाहो तच्छमं नय केशव।।

अर्थ – महाबाहो ! मेरी प्रार्थना सुनिए – अपने चित्त के वश में होकर मैंने जो कुछ बुरा चिन्तन किया हो, उसको शान्त कर दीजिए।

 

ब्रह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण।

जगन्नाथ जगद्धात: पापं शमय मेsच्युत।।

अर्थ – ब्राह्मणों का हित साधन करने वाले देवता गोविन्द ! परमार्थ में तत्पर रहने वाले जगन्नाथ ! जगत को धारण करने वाले अच्युत ! मेरे पापों का नाश कीजिए।

 

यच्चापराह्णे सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि।

कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता।।

जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।

नामत्रयोच्चारणत: सर्वं यातु मम क्षयम्।।

अर्थ – मैंने पूर्वाह्न, सायाह्न, मध्याह्न तथा रात्रि के समय शरीर, मन और वाणी के द्वारा, जानकर या अनजान में जो कुछ पाप किया हो, वह सब “हृषीकेश, पुण्डरीकाक्ष और माधव” – इन तीन नामों के उच्चारण से नष्ट हो जाए।

 

शारीरं मे हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष मानसम्।

पापं प्रशममायातु वाक्कृतं मम माधव।।

अर्थ – हृषीकेश ! आपके नामोच्चारण से मेरा शारीरिक पाप नष्ट हो जाए, पुण्डरीकाक्ष ! आपके स्मरण से मेरा मानस पाप शान्त हो जाए तथा माधव ! आपके नाम-कीर्तन से मेरे वाचिक पाप का नाश हो जाए।

 

यद् भुज्जान: पिबंस्तिष्ठन् स्वपण्जाग्रद् यदा स्थित:।

अकार्षं पापमर्थार्थं कायेन मनसा गिरा।।

महदल्पं च यत्पापं दुर्योनिनरकावहम्।

तत्सर्वं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात् ।।

अर्थ – मैंने खाते, पीते, खड़े होते, सोते, जागते तथा ठहरते समय मन, वाणी और शरीर से, स्वार्थ या धन के लिए जो कुत्सित योनियों और नरकों की प्राप्ति कराने वाला महान या थोड़ा पाप किया है, वह सब भगवान वासुदेव का नामोच्चारण करने से नष्ट हो जाए।

 

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्।

अस्मिन् संकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु।।

अर्थ – जिसे परब्रह्म, परम धाम और परम पपवित्र कहते हैं, वह तत्त्व भगवान विष्णु ही है, इन श्रीविष्णु भगवान का कीर्तन करने से मेरे जो भी पाप हों, वे नष्ट हो जाएँ।

 

यत्प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शविवर्जितम्।

सूरयस्तत्पदं विष्णोस्तत्सर्वं मे भवत्वलम्।।

अर्थ – जो गन्ध और स्पर्श से रहित हैं, ज्ञानी पुरुष जिसे पाकर पुन: इस संसार में नहीं लौटते, वह श्रीविष्णु का ही परम पद है। वह सब मुझे पूर्णरूप से प्राप्त हो जाए।

 

पापप्रशमनं स्तोत्रं य: पठेच्छृृणुयान्नर:।

शारीरैर्मानसैर्वाचा कृतै: पापै: प्रमुच्यते।।

मुक्त: पापग्रहादिभ्यो याति विष्णो:परं पदम्।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रं  सर्वाघनाशनम्।।

प्रायश्चित्तमघौघानां पठितव्यं नरोत्तमै: (अध्याय 88, श्लोक 72 से 91 तक)

अर्थ – यह “पाप-प्रशमन” नामक स्तोत्र है. जो मनुष्य इसे पढ़ता और सुनता है वह शरीर, मन और वाणी द्वारा किए हुए पापों से मुक्त हो जाता है. इतना ही नहीं वह पाप ग्रह आदि के भय से भी मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है. यह स्तोत्र सब पापों का नाश करने वाला तथा पाप राशि का प्रायश्चित है. इसलिए श्रेष्ठ मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न कर के इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए.

राजन् ! इस स्तोत्र के श्रवण मात्र से पूर्वजन्म तथा इस जन्म के किये हुए पाप भी तत्काल नष्ट हो जाते हैं। यह स्तोत्र पापरूपी वृक्ष के लिए कुठार और पापमय ईंधन के लिए दावानल है। पापराशिरूपी अन्धकार-समूह का नाश करने के लिए यह स्तोत्र सूर्य के समान है। मैंने सम्पूर्ण जगत पर अनुग्रह करने के लिए इसे तुम्हारे सामने प्रकाशित किया है। इसके पुण्यमय माहात्म्य का वर्णन करने में स्वयं श्रीहरि भी समर्थ नहीं हैं

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

सर्वार्थ सिद्धि योग – 2020आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

सर्वार्थ सिद्धि योग – 2020

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

कुछ विशेष कार्य जैसे – कोई व्यापार या बिजनेस शुरु करना हो, कोई सरकारी अथवा राजकीय कॉन्ट्रैक्ट करना हो, परीक्षा देनी हो, नौकरी पर जाना हो, चुनाव के लिए आवेदन पत्र देना हो, भूमि से संबंधित कोई कार्य हो, यात्रा पर जाना हो, वस्त्र या आभूषण आदि लेने हो या फिर मुकदमा आरंभ करना हो लेकिन कोई शुभ मूहुर्त ना मिल रहा हो तब सर्वार्थ सिद्धि योग में ये सभी काम शुरु किए जा सकते हैं. कई बार शुक्र या गुरु अस्त होता है या अधिकमास पड़ जाता है या फिर वेध आदि की वजह से भी नया काम प्रारंभ करने की मनाही होती हैं लेकिन इन सब के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग उस दिन बन रहा हो तब उपरोक्त काम शुरु किए जा सकते हैं. 

 

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सर्वार्थ सिद्धि योग – मई 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                             समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
3 मई 21:434 मई सूर्योदय 
8 मई 08:38 9 मई सूर्योदय 
10 मई सूर्योदय 11 मई 04:13 
17 मई 13:59 18 मई सूर्योदय 
19 मई 19:53 20 मई सूर्योदय 
23 मई सूर्योदय 24 मई 04:52 
25 मई सूर्योदय 25 मई 06:10 
28 मई सूर्योदय 28 मई 07:27 
31 मई सूर्योदय 1 जून सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – जून 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                             समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
1 जून सूर्योदय तक 
4 जून 18:37 5 जून 16:44
7 जून सूर्योदय 7 जून 14:11 
14 जून सूर्योदय 14 जून 24:22
16 जून सूर्योदय 17 जून सूर्योदय 
20 जून सूर्योदय 20 जून 12:02
26 जून 11:26 27 जून सूर्योदय 
28 जून सूर्योदय 29 जून सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – जुलाई 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                        समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 जुलाई 02:343 जुलाई 01:14
5 जुलाई 23:026 जुलाई सूर्योदय 
6 जुलाई 23:12 7 जुलाई सूर्योदय 
12 जुलाई सूर्योदय 12 जुलाई 08:18 
14 जुलाई सूर्योदय 14 जुलाई 14:07
15 जुलाई 16:4316 जुलाई सूर्योदय 
20 जुलाई 21:2121 जुलाई सूर्योदय 
24 जुलाई सूर्योदय 24 जुलाई 16:03
26 जुलाई सूर्योदय 26 जुलाई 12:37
29 जुलाई 08:3330 जुलाई 07:41


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – अगस्त 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                      समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 अगस्त 06:523 अगस्त सूर्योदय 
3 अगस्त 07:194 अगस्त सूर्योदय 
7 अगस्त सूर्योदय 7 अगस्त 13:33
9 अगस्त 19:0610 अगस्त सूर्योदय 
11 अगस्त 24:5713 अगस्त 03:26
17 अगस्त 06:4418 अगस्त 05:43 
18 अगस्त सूर्योदय 19 अगस्त 04:08 
26 अगस्त सूर्योदय 26 अगस्त 13:04
30 अगस्त सूर्योदय 30 अगस्त 13:52 
31 अगस्त सूर्योदय 31 अगस्त 15:04


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – सितंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                      समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
4 सितंबर 23:285 सितंबर सूर्योदय 
6 सितंबर सूर्योदय 7 सितंबर 05:24
8 सितंबर 08:2610 सितंबर सूर्योदय 
13 सितंबर 16:3414 सितंबर 15:52
15 सितंबर सूर्योदय 15 सितंबर 14:25
21 सितंबर 20:4922 सितंबर सूर्योदय 
26 सितंबर 19:2627 सितंबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – अक्तूबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                   समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 अक्तूबर 05:573 अक्तूबर सूर्योदय 
4 अक्तूबर सूर्योदय 4 अक्तूबर 11:52
6 अक्तूबर सूर्योदय 6 अक्तूबर 17:54
7 अक्तूबर सूर्योदय 8 अक्तूबर सूर्योदय 
9 अक्तूबर 24:27 10 अक्तूबर सूर्योदय 
11 अक्तूबर सूर्योदय 11 अक्तूबर 25:19 (रात्रि 01:19)
17 अक्तूबर 11:5218 अक्तूबर सूर्योदय 
19 अक्तूबर सूर्योदय 20 अक्तूबर 03:53
23 अक्तूबर 25:28 (रात्रि 01:28)24 अक्तूबर 26:38 (रात्रि 02:38) 
29 अक्तूबर 12:0031 अक्तूबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – नवंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                    समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
2 नवंबर 23:503 नवंबर सूर्योदय 
4 नवंबर सूर्योदय 5 नवंबर 04:51
6 नवंबर 06:457 नवंबर सूर्योदय 
8 नवंबर सूर्योदय 8 नवंबर 08:45
12 नवंबर 04:2512 नवंबर सूर्योदय 
14 नवंबर सूर्योदय 14 नवंबर 20:09
16 नवंबर सूर्योदय 16 नवंबर 14:37
20 नवंबर 09:2221 नवंबर 09:53
24 नवंबर 15:3225 नवंबर सूर्योदय 
26 नवंबर सूर्योदय 27 नवंबर 24:23
30 नवंबर सूर्योदय 1 दिसंबर सूर्योदय 


 

सर्वार्थ सिद्धि योग – दिसंबर 2020

 प्रारंभ काल (Starting Time)                                                        समाप्ति काल  (Ending Time)

तिथियाँ (Dates)समय (Time) तिथियाँ (Dates) समय (Time) 
1 दिसंबर सूर्योदय तक 
2 दिसंबर सूर्योदय 2 दिसंबर 10:38 
3 दिसंबर 12:21 4 दिसंबर 13:39 
9 दिसंबर 12:3310 दिसंबर सूर्योदय 
18 दिसंबर सूर्योदय 18 दिसंबर 19:04
22 दिसंबर सूर्योदय 22 दिसंबर 25:37 (रात्रि 01:37) 
24 दिसंबर सूर्योदय 25 दिसंबर 07:36 
28 दिसंबर सूर्योदय 29 दिसंबर सूर्योदय 
31 दिसंबर सूर्योदय 1 जनवरी (2021) सूर्योदय 

अथ कीलकम् :------आचार्य डा.अजय दीक्षित

अथ कीलकम् :------

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आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

ऊँ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य शिव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्रीमहासरस्वती देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोग: ।

 

ऊँ नमश्चण्डिकायै ।।

 

मार्कण्डेय उवाच 

ऊँ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।

श्रेय:प्राप्तिनिमित्ताय नम: सोमार्धधारिणे ।।1।।

सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् ।

सोsपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्पर: ।।2।।

सिद्धय्न्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि ।

एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति ।।3।।

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किंचिदपि विद्यते ।

विना जाप्येन सिद्धयेत सर्वमुच्चाटनादिकम् ।।4।।

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशंकामिमां हर: ।

कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ।।5।।

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार स: ।

समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ।।6।।

सोsपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशय: ।

कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहित: ।।7।।

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति ।

इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ।।8।।

यो निष्कीलां विधायैना नित्यं जपति संस्फुटम् ।

स सिद्ध: स गण: सोsपि गन्धर्वो जायते नर: ।।9।।

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते ।

नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।।10।।

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति ।

ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधै: ।।11।।

सौभाग्यादि च यत्किंचिद् दृश्यते ललनाजने ।

तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ।।12।।

शनैस्तु जप्यमानेsस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकै: ।

भवत्येव समग्रापि तत: प्रारभ्यमेव तत् ।।13।।

ऎश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पद: ।

शत्रुहानि: परो मोक्ष: स्तूयते सा न किं जनै: ।।14।।

 

।। इति देव्या: कीलकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

अथ देव्या कवचम :---आचार्य डा.अजय दीक्षित

अथ देव्या कवचम🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया:--
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महर्षि मार्कण्डेयजी बोले – हे पितामह! संसार में जो गुप्त हो और जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करता हो और जो आपने आज तक किसी को बताया ना हो, वह कवच मुझे बताइए। श्री ब्रह्माजी कहने लगे – अत्यन्त गुप्त व सब प्राणियों की भलाई करने वाला कवच मुझसे सुनो, प्रथम शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघंटा, चौथी कूष्माण्डा, पाँचवीं स्कन्दमाता। छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्री, आठवीं महा गौरी, नवीं सिद्धि दात्री यह देवी की नौ मूर्त्तियाँ, “नवदुर्गा” कहलाती हैं। आग में जलता हुआ, रण में शत्रु से घिरा हुआ, विषम संकट में फँसा हुआ मनुष्य यदि दुर्गा के नाम का स्मरण करे तो उसको कभी भी हानि नहीं होती। रण में उसके लिए कुछ भी आपत्ति नहीं और ना उसे किसी प्रकार का दुख या डर ही होता है।

हे देवी! जिसने श्रद्धा पूर्वक तुम्हारा स्मरण किया है उसकी वृद्धि होती है। और जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करने वाली हो। चामुण्डा प्रेत पर, वाराही भैंसे पर, रौद्री हाथी पर, वैष्णवी गरुड़ पर अपना आसन जमाती है। माहेश्वरी बैल पर, कौमारी मोर पर, और हाथ में कमल लिए हुए विष्णु प्रिया लक्ष्मी जी कमल के आसन पर विराजती है। बैल पर बैठी हुई ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित ब्राह्मी देवी हंस पर बैठती है और इस प्रकार यह सब देवियाँ सब प्रकार के योगों से युक्त और अनेक प्रकार के रत्न धारण किये हुए है।

भक्तों की रक्षा के लिए संपूर्ण देवियाँ रथ मेंबैठी तथा क्रोध में भरी हुई दिखाई देती हैं तथा चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, भाला और त्रिशूल एवं उत्तम शारंग आदि शस्त्रों को दैत्यों के नाश के लिए और भक्तों की रक्षा करने के लिए और देवताओं के कल्याण के लिए धारण किया है। हे महारौद्रे! अत्यन्त घोर पराक्रम, महान बल और महान उत्साह वाली देवी! तुमको मैं नमस्कार करता हूँ। हे देवि! तुम्हारा दर्शन दुर्लभ है तथा आप शत्रुओं के भय को बढ़ाने वाली हैं।

हे जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऎंन्द्री मेरी रक्षा करें, अग्निकोण में शक्ति, दक्षिण कोण में वाराही देवी, नैऋत्यकोण में खड्ग धारिणी देवी मेरी रक्षा करें। वारुणी पश्चिम दिशा में, वायुकोण में मृगवाहिनी, उत्तर में कौमारी और ईशान में शूलधारिणी देवी मेरी रक्षा करें, ब्राह्मणी ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करें और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करें और इसी प्रकार शव पर बैठ  चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें।

जया देवी आगे, विजया पीछे की ओर, अजिता बायीं ओर, अपराजिता दाहिनी ओर मेरी रक्षा करें, उद्योतिनी देवी शिखा की रक्षा करें तथा उमा शिर में स्थित होकर मेरी करें, इसी प्रकार मस्तक में मालाधारी देवी रक्षा करें और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करें। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा, नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे, नेत्रों के मध्य में शंखिनी देवी और द्वारवासिनी देवी कानों की रक्षा करें, सुगंधा नासिका में और चर्चिका ऊपर के होंठ में, अमृतकला नीचे के होंठ की, सरस्वती देवी जीभ की रक्षा करे, कौमारी देवी दाँतों की और चण्डिका कण्ठ प्रदेश की रक्षा करे, चित्रघण्टा गले की घण्टी की और महामाया तालु की रक्षा करे, कामाक्षी ठोढ़ी की, सर्वमंगला वाणी की रक्षा करे।

भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी पीठ के मेरुदण्ड की रक्षा करें, कण्ठ के बाहरी भाग की नील ग्रीवा और कण्ठ की नली की नलकूबरी रक्षा करे, दोनो कन्धों की खड्गिनी और वज्रधारिणी मेरी दोनों बाहों की रक्षा करे, दण्डिनी दोनों हाथों की और अम्बिकादेवी समस्त अंगुलियों की रक्षा करे, शूलेश्वरी देवी संपूर्ण नखोंकी, कुलेश्वरी देवी मेरी कुक्षि की रक्षा करे, महादेवी दोनों स्तनों की, शोक विनाशिनी मन की रक्षा करे, ललितादेवी ह्रदय की, शूलधारिणी उदर की रक्षा करे।

कामिनी देवी नाभि की गुह्येश्वरी गुह्य स्थान की, पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे, सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने वाली महाबलादेवी दोनों जंघाओं की रक्षा करे, विन्ध्यावासिनी दोनों घुटनों की और तैजसी देवी दोनों पाँवों के पृष्ठ भग की, श्रीधरी पाँवों की अंगुलियों की, स्थलवासिनी तलुओं की, दंष्ट्रा करालिनीदेवी नखों की, ऊर्ध्वकेशिनी केशों की, बागेश्वरी वाणी की रक्षा करे, रोमाबलियों के छिद्रों की कौबेरी और त्वचा की बागेश्वरी देवी रक्षा करे। पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी की रक्षा करे।

कालरात्री आँतों की रक्षा करें, मुकुटेश्वरी देवी पित्त की, पद्मावती कमलकोष की, चूड़ामणि कफ की रक्षा करें, ज्वालामुखी नसों के जल की रक्षा करें, अभेद्यादेवी शरीर के सब जोड़ो की रक्षा करें, बह्माणी मेरे वीर्य की, छत्रेश्वरी छाया की और धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन तथा बुद्धि की रक्षा करें। प्राण अपान, समान, उदान और व्यान की वज्रहस्ता देवी रक्षा करें, कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे, रस, रूप, गन्ध शब्द और स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी मेरी रक्षा करें तथा मेरे सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें।

आयु की रक्षा बाराही देवी करे, वैष्णवी धर्म की तथा चक्रिणी देवी मेरी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन, विद्या की रक्षा करे, इन्द्राणी मेरे शरीर की रक्षा करे और हे चण्डिके! आप मेरे पशुओं की रक्षा करिये। महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करे, मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षमाकरी देवी रक्षा करे, राजा के दरबार में महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी चारों ओर से मेरी रक्षा करे।

जो स्थान रक्षा से रहित हो और कवच में रह गया हो उसकी पापों का नाश करने वाली जयन्ती देवी रक्षा करे। अपना शुभ चाहने वाले मनुष्य को बिना कवच के एक पग भी कहीं नहीं जाना चाहिए क्योंकि कवच रखने वाला मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता हैं, वहाँ-वहाँ उसे अवश्य धन लाभ होता है तथा विजय प्राप्त करता है। वह जिस अभीष्ट वस्तु की इच्छा करता है वह उसको इस कवच के प्रभाव से अवश्य मिलती हैऔर वह इसी संसार में महा ऎश्वर्य को प्राप्त होता है, कवचधारी मनुष्य निर्भय होता है, और वह तीनों लोकों में माननीय होता है, देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी कठिन है।

जो नित्य प्रति नियम पूर्वक तीनों संध्याओं को श्रद्धा के साथ इसका पठन-पाठन करता है उसे देव-शक्ति प्राप्त होती है, वह तीनों लोकों को जीत सकता है तथा अकाल मृत्यु से रहित होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है, उसकी लूता, चर्मरोग, विस्फोटक आदि समस्त व्याधियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं और स्थावर, जंगम तथा कृत्रिम विष दूर होकर उनका कोई असर नहीं होता है तथा समस्त अभिचारक प्रयोग और इस तरह के जितने यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र इत्यादि होते हैं इस कवच के हृदय में धारण कर लेने पर नष्ट हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त पृथ्वी पर विचरने वाले भूचर, नभचर, जलचर प्राणी उपदेश मात्र से, सिद्ध होने वाले निम्न कोटि के देवता, जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुल देवता, कण्ठमाला आदि डाँकिनी शाँकिनी अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाँकिनियाँ, गृह, भूत, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस वैताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी उस मनुष्य को जिसने कि अपने हृदय में यह कवच धारण किया हुआ है, देखते ही भाग जाते हैं। इस कवच के धारण करने से मान और तेज बढ़ता है।

जो मनुष्य इस कवच का पाठ करके उसके पश्चात सप्तशती चंडीका का पाठ करता है उसका यश जगत में विख्यात होता है, और जब तक वन पर्वत और काननादि इस भूमण्डल पर स्थित हैं, तब तक यहाँ पुत्र पौत्र आदि सन्तान परम्परा बनी रहती है, फिर देहान्त होने पर मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है जो देवताओं के लिए भी कठिन है और अन्त में सुन्दर रूप को धारण करके भगवान शंकर के साथ आनन्द करता हुआ परम मोक्ष को प्राप्त होता है।

 

संतान गोपाल स्तोत्र :----आचार्य डा.अजय दीक्षित

संतान गोपाल स्तोत्र :-----🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

आचार्य डा.अजय दीक्षित द्वारा प्रकाशित किया गया

श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् ।

सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ।।1।।

नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम् ।

यशोदांकगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम् ।।2।।

अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।

नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा ।।3।।

गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम् ।

पुत्रसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुंगवम् ।।4।।

पुत्रकामेष्टिफलदं कंजाक्षं कमलापतिम् ।
देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम ।।5।।

पद्मापते पद्मनेत्र पद्मनाभ जनार्दन ।

देहि में तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते ।।6।।

यशोदांकगतं बालं गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।

अस्माकं पुत्रलाभाय नमामि श्रीशमच्युतम् ।।7।।

श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिहरणाच्युत ।

गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन ।।8।।

भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।।9।।

रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा ।

भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गत: ।।10।।

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।11।।

वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।12।।

कंजाक्ष कमलानाथ परकारुरुणिकोत्तम ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।13।।

लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।14।।

कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।

नमामि पुत्रलाभार्थं सुखदाय बुधाय ते ।।15।।

राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे कवे ।

तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ।।16।।

अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ।।17।।

श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।।18।।

अस्माकं पुत्रसम्प्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।

रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।।19।।

वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।

पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ।।20।।

डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।

भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ।।21।।

नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।

कमलानाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ।।22।।

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ।।23।।

यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनम् ।

वन्देsहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ।।24।।

नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।

रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ।।25।।

पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।

अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ।।26।।

गोपालडिम्भ गोविन्द वासुदेव रमापते ।

अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ।।27।।

मद्वांछितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।

मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ।।28।।

याचेsहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसम्पदम् ।

भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ।।29।।

आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।

अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ।।30।।

वन्दे सन्तानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।

अस्माकं पुत्रसम्प्राप्त्यै सदा गोविन्दच्युतम् ।।31।।

ऊँकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।

कलींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ।।32।।

वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।

देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ।।33।।

राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।

समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ।।34।।

अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।

देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ।।35।।

नन्दपाल धरापाल गोविन्द यदुनन्दन ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।।36।।

दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।

गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ।।37।।

यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।

देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ।।38।।

अस्माकं वांछितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।

भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ।।39।।

रमाहृदयसम्भार सत्यभामामन:प्रिय ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।।40।।

चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।

अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ।।41।।

कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।

देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ।।42।।

देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।

समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ।।43।।

भक्तमन्दार गम्भीर शंकराच्युत माधव ।

देहि मे तनयं गोपबालवत्सल श्रीपते ।।44।।

श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।

भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ।।45।।

जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।

वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ।।46।।

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।47।।

दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।48।।

गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।49।।

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।

मत्पुत्रफलसिद्धयर्थं भजामि त्वां जनार्दन ।।50।।

स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखाम्बुजं 

विलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलांगम् ।

स्पृशन्तमन्यस्तनमंगुलीभि-

र्वन्दे यशोदांकगतं मुकुन्दम् ।।51।।

याचेsहं पुत्रसन्तानं भवन्तं पद्मलोचन ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।52।।

अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।

शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ।।53।।

वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।

कुरु मां पुत्रदत्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ।।54।।

कुरु मां पुत्रदत्तं च यशोदाप्रियनन्दन ।

मह्यं च पुत्रसंतानं दातव्यं भवता हरे ।।55।।

वासुदेव जगन्नाथ गोविन्द देवकीसुत ।

देहि मे तनयं राम कौसल्याप्रियनन्दन ।।56।।

पद्मपत्राक्ष गोविन्द विष्णो वामन माधव ।

देहि मे तनयं सीताप्राणनायक राघव ।।57।।

कंजाक्ष कृष्ण देवेन्द्रमण्डित मुनिवन्दित ।

लक्ष्मणाग्रज श्रीराम देहि मे तनयं सदा ।।58।।

देहि मे तनयं राम दशरथप्रियनन्दन ।

सीतानायक कंजाक्ष मुचुकुन्दवरप्रद ।।59।।

विभीषणस्य या लंका प्रदत्ता भवता पुरा ।

अस्माकं तत्प्रकारेण तनयं देहि माधव ।।60।।

भवदीयपदाम्भोजे चिन्तयामि निरन्तरम् ।

देहि मे तनयं सीताप्राणवल्लभ राघव ।।61।।

राम मत्काम्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद ।

देहि मे तनयं श्रीश कमलासनवन्दित ।।62।।

राम राघव सीतेश लक्ष्मणानुज देहि मे ।

भाग्यवत्पुत्रसंतानं दशरथात्मज श्रीपते ।।63।।

देवकीगर्भसंजात यशोदाप्रियनन्दन ।

देहि मे तनयं राम कृष्ण गोपाल माधव ।।64।।

कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शंकर ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।65।।

गोपबालमहाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।।66।।

दिशतु दिशतु पुत्रं देवकीनन्दनोsयं 

दिशतु दिशतु शीघ्रं भाग्यवत्पुत्रलाभम् ।

दिशति दिशतु श्रीशो राघवो रामचन्द्रो 

दिशतु दिशतु पुत्रं वंशविस्तारहेतो: ।।67।।

दीयतां वासुदेवेन तनयो मत्प्रिय: सुत: ।

कुमारो नन्दन: सीतानायकेन सदा मम ।।68।।

राम राघव गोविन्द देवकीसुत माधव ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।69।।

वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।70।।

ममाभीष्टसुतं देहि कंसारे माधवाच्युत ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।71।।

चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।72।।

विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।

देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ।।73।।

नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।

मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ।।74।।

भगवन कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।

देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गत: ।।75।।

स्वामिंस्त्वं भगवन् राम कृष्ण माधव कामद ।

देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गत: ।।76।।

तनयं देहि गोविन्द कंजाक्ष कमलापते ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।77।।

पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्नजनक प्रभो ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।78।।

शंखचक्रगदाखड्गशांर्गपाणे रमापते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।79।।

नारायण रमानाथ राजीवपत्रलोचन ।

सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ।।80।।

राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।

रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ।।81।।

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।82।।

मुनिवन्दित गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।83।।

गोपिकार्जितपंकेजमरन्दासक्तमानस ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।84।।

रमाहृदयपंकेजलोल माधव कामद ।

ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ।।85।।

वासुदेव रमानाथ दासानां मंगलप्रद ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।86।।

कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।87।।

पुत्रप्रद मुकुन्देश रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।88।।

पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।89।।

दयानिधे वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।90।।

पुत्रसम्पत्प्रदातारं गोविन्दं देवपूजितम् ।

वन्दामहे सदा कृष्णं पुत्रलाभप्रदायिनम् ।।91।।

कारुण्यनिधये गोपीवल्लभाय मुरारये ।

नमस्ते पुत्रलाभार्थं देहि मे तनयं विभो ।।92।।

नमस्तस्मै रमेशाय रुक्मिणीवल्लभाय ते ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।93।।

नमस्ते वासुदेवाय नित्यश्रीकामुकाय च ।

पुत्रदाय च सर्पेन्द्रशायिने रंगशायिने ।।94।।

रंगशायिन् रमानाथ मंगलप्रद माधव ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।।95।।

दासस्य मे सुतं देहि दीनमन्दार राघव ।

सुतं देहि सुतं देहि पुत्रं देहि रमापते ।।96।।

यशोदातनयाभीष्टपुत्रदानरत: सदा ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।97।।

मदिष्टदेव गोविन्द वासुदेव जनार्दन ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।98।।

नीतिमान् धनवान् पुत्रो विद्यावांश्च प्रजायते ।

भगवंस्त्वत्कृपायाश्च वासुदेवेन्द्रपूजित ।।99।।

य: पठेत् पुत्रशतकं सोsपि सत्पुत्रवान् भवेत् ।

श्रीवासुदेवकथितं स्तोत्ररत्नं सुखाय च ।।100।।

जपकाले पठेन्नित्यं पुत्रलाभं धनं श्रियम् ।

ऎश्वर्यं राजसम्मानं सद्यो याति न संशय: ।।101।।

।।इति सन्तानगोपालस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

श्री मद् देवी भागवत महापुराण :-- बारहवां अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

।। ओम् कामाख्या देव्यै नमः ।।
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श्री मद् देवी भागवत महापुराण :---- बारहवां अध्याय
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                ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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                       ओम् गं गणपतये नमः

इस अध्याय में शंकर जी का योनिपीठ कामरूप (कामाख्या) में जाकर तपस्या करना है, जगदम्बा द्वारा प्रकट होकर शीघ्र ही गंगा तथा हिमालय पुत्री पार्वती के रूप में आविर्भूत होने का उन्हें वर प्रदान करना है, भगवान शंकर द्वारा इक्यावन शक्तिपीठों में प्रधान कामरूप पीठ के माहात्म्य का प्रतिपादन है ।

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श्रीमहादेवजी बोले – तब नारदजी ने विष्णु भगवान के पास जाकर घटित घटनाओं और देवाधिदेव के सारे व्यवहार का यथावत वर्णन किया।।1।।

 शिवजी के व्याकुलचित्त होकर शापित करने की बात सुनकर ब्रह्मा सहित भगवान विष्णु कामरूपप्रदेश में गये।।2।।

 वे वहाँ शोक से व्याकुलचित्त हुए भगवान महेश को, जिनका सारा शरीर आँसुओं से भीग-सा गया था, देखने और सान्त्वना देने गये थे. उन दोनों को आया देखकर भगवान शिव अपनी पत्नी सती को अनेक प्रकार से याद करते हुए सामान्य जन की तरह मुक्तकण्ठ से रुदन करने लगे।।3-4।।

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ब्रह्मा और विष्णु बोले – देवदेवेश शंकर ! आप इस प्रकार व्यर्थ ही क्यों रो रहे हैं? आप जानते हैं कि सती विद्यमान हैं, अत: सारी बात जानने वाले आपका मूढ़वत शोक करना उचित नहीं है।।5।।

शिवजी बोले – आप लोग ठीक कहते हैं. मैं जानता हूँ कि सती प्रकृतिरूपा हैं, वे शुद्धा, नित्या, ब्रह्ममयी और सृष्टि, स्थिति तथा संहार करने वाली हैं।।6।। 

दक्षयज्ञ के नष्ट होने के बाद मैंने उन्हें अपनी आँख से उसी रूप में देखा भी है, लेकिन पहले की तरह पत्नी भाव से अपने घर में उन महेश्वरी को न पाकर इस समय मेरा मन अत्यन्त व्याकुल हो रहा है. इसलिए ब्रह्मन् विष्णो ! मैं पूर्ववत् उन्हें कैसे प्राप्त करूँगा? आप मुझे अब इसका उपाय बताएँ।।7-8½।।        

ब्रह्मा और विष्णु बोले – देव ! आप शान्तचित्त होकर इस कामरूपपीठ में रहकर मन में महादेवी का ध्यान करते हुए समाहित चित्त से तपस्या करें. यह महापीठ है, यहाँ ही परमेश्वरी साक्षात् विराजमान होकर अपने साधकों को प्रत्यक्ष फल प्रदान करती हैं. इसमें संशय नहीं है. इस सिद्धपीठ का माहात्म्य कौन बता सकता है! आप तो परमेश्वर हैं, सर्वज्ञ हैं, सब कुछ जानते हैं, हम लोग आपको क्या बतायें? शिव ! अब आप शान्तचित्त हो जाएँ।।9-12।।

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शिवजी बोले – मैं अब यहीं रहकर स्थिरचित्त हो उग्र तपस्या करूँगा, जैसा कि आप दोनों ने अभी कहा है।।13।।

श्रीमहादेवजी बोले – इतना कहकर शिवजी ने कामरूप सिद्धपीठ पर उन परमेश्वरी जगदम्बा का ध्यान करते हुए शान्त एवं समाहितचित्त होकर तप किया. ब्रह्मा और विष्णु भी उसी महापीठ पर रहते हुए समाहितचित्त होकर कठोर और परम तप करने लगे।।14-15।।

 बहुत समय बीतने पर जगदम्बा प्रसन्न हुईं और उन जगन्माता ने त्रैलोक्य मोहिनी रूप में उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया. महादेवी ने पूछा कि आपकी क्या अभिलाषा है, बताएँ।।16½।।

शिवजी बोले – परमेश्वरी ! जिस प्रकार आप पहले मेरी गृहिणी बनकर रहती थीं, वैसे ही कृपापूर्वक पुन: रहें।।17½।।

देवीजी बोलीं – महेश्वर ! शीघ्र ही मैं हिमालाय की पुत्री बनकर स्वयं अवतार लूँगी और निश्चय ही मैं दो रूपों में सामने आऊँगी. चूँकि आपने सती के शरीर को सिर पर उठाकर हर्षपूर्वक नृत्य किया था, अत: मैं उनके अंश से जलमयी गंगा का रूप धारन करके आपको ही पतिरूप में प्राप्त कर आपके सिर पर विराजमान रहूँगी. दूसरे रूप से मैं पार्वती होकर आपके घर में पत्नीभाव से रहूँगी. शंकर ! महामति ! मेरा यह रूप पूर्णावतार होगा।।18-21।।

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श्रीमहादेवजी बोले – तब ब्रह्मा और विष्णु को भी उनका अभिलषित वर प्रदान करके भगवती जगदम्बा स्वयं अन्तर्धान हो गयीं।।22।। 

इसके अनन्तर महादेवी दुर्गा ने हिमालय के यहाँ मेनका के गर्भ में दो रूपों में अवतार लिया. भगवती ने ज्येष्ठा-रूप से गंगा और कनिष्ठा-रूप से शुभ लक्षणों वाली पार्वती बनकर जन्म लिया. महामति शिव भी प्रसन्नचित्त होकर कामरूप पर्वत पर कामाख्यापीठ के निकट पुन: कठोर तपस्या करने लगे. उस महापीठ के माहात्म्य से भगवती ने स्वयं प्रसन्न होकर शिव को अभीष्ट वर प्रदान किया. इसी प्रकार जब भी अन्य कोई उस सिद्धपीठ में भगवती की आराधना करता है तो उसे वे देवी मनिवाँछित फल प्रदान करती हैं।।23-26½।। 

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श्रीनारदजी बोले – महेश्वर ! मुझे कामरूप का माहात्म्य बतायें, जहाँ साक्षात् प्रकट होकर भगवती प्रत्यक्ष फल देती हैं. परमेश्वर ! चूँकि सभी पीठों की क्रमिक गणना में वह श्रेष्ठ पीठ है इसीलिए आपने भी वहीं तपस्या करके जगदम्बा की आराधना की थी।।27-28½।।

श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! धरातल पर छाया सती के अंग-प्रत्यंग गिरने से इक्यावन शक्तिपीठ बन गये. महामते ! उनमें कामरूप श्रेष्ठतम शक्तिपीठ है।।29-30।। 

जहाँ भगवती साक्षात् निवास करती हैं, उस सिद्धपीठ में जाकर ब्रह्मपुत्र नद के लिए लालिमा लिए जल में स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से भी सद्य: संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है. ब्रह्मपुत्र नद भगवान विष्णु का साक्षात् जलरूप है, उसमें स्नान करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।।31-32½।।

वहाँ विधिपूर्वक स्नान एवं पितरों का तर्पण करके साधक को भक्तिपूर्वक भगवती कामेश्वरी को इस मन्त्र से नमस्कार करना चाहिए – “मैं कामरूप में निवास करने वाली उन भगवती कामाख्या कामेश्वरी को नमस्कार करता हूँ, जिन सुरेश्वरी का स्वरुप तपे हुए स्वर्ण की कान्ति के समान सुशोभित है.” तत्पश्चात मानस-कुण्डादि तीर्थों में जाकर विधिपूर्वक स्नान करके यथाविधि कामरूपक्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए. सिद्धपीठ कामाख्या के दर्शन करके मनुष्य सद्य: मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, अन्य कोई उपाय नहीं है।।33-36।।

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वहाँ तन्त्रोक्त विधि से परमेश्वरी का पूजन करके जप-होमादि करने से जैसा फल प्राप्त होता है, करोड़ों मुखों से भी मैं उसका वर्णन करने में समर्थ नहीं हूँ।।37½।।

 महामुने ! उस पवित्र क्षेत्र में जिसकी मृत्यु हो जाती है, उसे सद्य: मुक्ति निश्चित ही प्राप्त हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है. महामुने ! अधिक क्या कहूँ, मनुष्यों की तो बात छोड़िए, देवता भी उस पुण्यक्षेत्र में मृत्यु की कामना करते हैं. वत्स ! मैंने आपको संक्षेप में कामरूपक्षेत्र का माहात्म्य बताया, जो सभी पापों का नाश करने वाला है।।38-40½।। 

उस पवित्र क्षेत्र में महादेवी की स्तुति करके भगवान शिव तपस्या करने लगे. सती ने हिमवान के घर में दो रूपों में जन्म लिया. इस प्रकार जिन परा प्रकृति भगवती ने दक्ष के घर में जन्म लिया था, उन्होंने परमकीर्ति स्थापित करके लोकरक्षण के लिए भगवान महेश्वर को पुन: प्राप्त करने हेतु मेनका के गर्भ में प्रवेश किया।।41-43।। 

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महापातकों का नाश करने वाले जगदम्बा के इस चरित्र का जो परम भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह शिवत्व को प्राप्त करता है।।44।। 

सभी देवता, मनुष्य, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और चारणादि उस पुण्यात्मा मनुष्य के इसी जन्म में आज्ञा के वशवर्ती हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं. इस पुण्य-चरित्र का श्रवण करने वाले मनुष्य की आज्ञा का उल्लंघन करने में कहीं कोई समर्थ नहीं होता. उसके दुर्गम और अति दुष्कर कार्य भी क्षण मात्र में ही अवश्य सिद्ध हो जाते हैं।।45-46।।

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इस पुण्य चरित्र के श्रवण से जन्म-जन्मार्जित पाप नष्ट हो जाए हैं, शत्रुओं का नाश होता है और वंश की वृद्धि होती है।।47।।

 महामते ! सत्य तो यह है कि जिन्होंने संसार में जन्म लेकर इस पुण्यचरित्र का श्रवण नहीं किया, उनका इस मृत्युलोक में जन्म लेना ही व्यर्थ है. संसाररूपी रोग के परमौषधरूप देवी के इस पवित्र आख्यान को सुनकर महान् पातकी मनुष्य भी सद्य: जीवन्मुक्त हो जाता है।।48-49।।

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।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “कामरूपादिमाहात्म्यवर्णन” नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।      

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁😞🍁जय सियाराम जय जय हनुमान

श्री मद् देवी भागवत महापुराण :--द्वितीय अध्याय 🏵️ आचार्य डा.अजय दीक्षित

।। ओम् ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमः ।।
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श्री मद् देवी भागवत महापुराण :---द्वितीय अध्याय
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             ।। आचार्य डा.अजय दीक्षित ।।
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                  ओम् गं गणपतये नमः
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इस अध्याय में महामुनि जैमिनि द्वारा श्रीवेदव्यास जी से शिव-नारद-संवाद के रूप में वर्णित देवी के माहात्म्य वाले महाभागवत को सुनाने की प्रार्थना करना है ।

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सूतजी बोले – बहुत से पौराणिक आख्यानों का श्रवण (सुनना) कर लेने के बाद मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ने भूमि पर दण्ड की भाँति गिरकर व्यास जी को प्रणाम करके उनसे आदरपूर्वक पूछा !!1।।

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जैमिनि बोले – समस्त वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ मुनिवर ! आपको नमस्कार है. महामते ! इस लोक में आपसे बढ़कर वक्ता और कोई नहीं है।।2।। 

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मुने ! आपके मुखारविन्द से पुण्यमयी कथा सुनकर मैं कृतार्थ हो गया हूँ, कृतार्थ हो गया हूँ, कृतार्थ हो गया हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं है।।3।। 

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अब एक दूसरी बात जो मेरे मन में चिरकाल से स्थित है, उसके विषय में सुनना चाहता हूँ. जगत के आदि में उत्पन्न, भक्तों के दुर्गम कष्टों को दूर करने वाली, तीनों लोकों की माता, नित्यस्वरुपा, सच्चिदानन्दस्वरुपिणी जो भगवती दुर्गा हैं, ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए भी दुर्लभ जिनके दोनों चरणाविन्दों को अपने हृदय कमल पर धारण करते हुए विश्वेश्वर शिव शवरूप से स्थित हैं, उनके अनुपम माहात्म्य का आपने जो संक्षेप में वर्णन किया है, उससे मेरी तृप्ति नहीं हुई है. अत: महाभाग ! अब आप उसका विस्तार से वर्णन करने की कृपा कीजिए. मुनिश्रेष्ठ ! आपको नमस्कार है ।।4-7।।

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यह मनुष्य शरीर अत्यन्त दुर्लभ है. अनेक सैकड़ों जन्मों के बाद इसे प्राप्त कर जिसने उस भगवाती माहात्म्य का श्रवण नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है।।8।। उनका वह वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासजी ने मुनिवर जैमिनि की प्रशंसा करके उनसे कहा ।।9।।

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व्यासजी बोले – महामति ! जैमिनि ! आप परम भक्ति तथा ज्ञान से युक्त हैं. वत्स ! आपने इस समय बड़ी ही कल्याणप्रद बात पूछी है, इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं।।10।। 

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जिनका श्रवण करके भक्ति और धर्म से शून्य महान पापी मनुष्यों का भी इस लोक में पुनर्जन्म नहीं होता और जिसे सुनकर पापी मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पातकों से भी छूट जाता है, उस कथा को आप सुनना चाहते हैं, अत: आप परम भाग्यशाली हैं ।।11-12।।

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मुने ! ब्रह्महत्या अदि समस्त पाप भी तभी तक मनुष्य को ग्रस्त किए रहते हैं, जब तक भगवती का चरित्र उसके कान में पड़ नहीं जाता है. यदि सैकड़ों पाप किया हुआ मनुष्य भी इस दुर्गा चरित्र का श्रवण करता है तो उसे देखकर यमराज भी अपना दण्ड छोड़कर उसके चरणों पर गिर पड़ते हैं।।13-14

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मुने ! उन भगवती के अतुलनीय माहात्म्य को बता सकने में भला कौन समर्थ है? जिस माहात्म्य का अपने पाँच मुखों से भगवान शंकर भी वर्णन नहीं कर सके हैं।।15।। 

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वाराणसी क्षेत्र में भगवान शिव स्वयं उन भगवती का ही ब्रह्मसंज्ञक तारक महामन्त्र जो गुरुकृपा से मुझे प्राप्त हुआ, उसे तत्परतापूर्वक आकर मुमुक्षुजनों के कान में कहते हुए उन्हें निर्वाण नामक महामोक्षपद प्रदान करते हैं. ब्रह्मर्षि जैमिनि ! मोक्ष तथा निर्वाणपद प्रदान करने वाली वे भगवती सभी मन्त्रों की एकमात्र बीजस्वरुपिणी हैं. महामते ! सभी वेद मोक्ष प्रदान करने वाली उन भगवती को वहाँ के समस्त मन्त्रों की अधिष्ठात्री देवता कहते हैं ।।16-19।।

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शशक (खरगोश), मशक (मच्छर) आदि तथा और भी जो अन्य प्राणी इस पृथ्वी पर हैं, उन्हें मोक्ष देने के लिए भगवान शिव वाराणसीपुरी में “दुर्गा” – यह तारक मन्त्र कान में स्वयं प्रदान करते हैं. मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ! एकाग्रचित्त होकर आप उसे सुनिए।।20-21।

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मैं शिव-नारद-संवादरूप महान पापों का नाश करने वाले अतुलनीय दुर्गामाहात्म्य का विशेष विस्तार के साथ वर्णन करूँगा ।।22।। 

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एक समय की बात है – सभी देवतागण मन्दर पर्वत पर एकत्र हुए थे. वहाँ पर गन्धर्वों सहित सभी ऋषिगण भी आये हुए थे. अनेक प्रकार के वृक्षों से व्याप्त, सुगन्धित और विकसित पुष्पों की गन्ध से दिशाओं को सुरभित करने वाले और सुमेरु शिखर के समान प्रतीत होने वाले उस रमणीक गिरिश्रेष्ठ मन्दराचल के पृष्ठ पर बैठे हुए भगवान कृष्ण और भगवान शिव को देखकर महर्षि नारद मुनि ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक भगवान शिव से पूछा ।।23-25½।।  

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नारदजी बोले – भक्तों पर कृपा करने वाले तथा तीनों लोकों में वन्दनीय देवेश ! ज्ञानियों में श्रेष्ठ और विशुद्ध आत्मा वाले आप ही ब्रह्म नाम से जाने जाते हैं. परमेश्वर ! केवल आप ही वास्तविक तत्त्व को जानते हैं. आप तीनों लोकों को पवित्र करने वाली गंगा जी को आदरपूर्वक अपने सिर पर धारण करते हैं और चन्द्रमा को अत्यन्त सुन्दर देखकर आपने उन्हें अपने सिर का आभूषण बनाया है. सर्वज्ञ ! इस समय मैं आपसे जो पूछ रहा हूँ, उसे आप मुझे बताने की कृपा करें।।26-29।। 

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महेश्वर ! स्वयं आप, भगवान विष्णु और जगत्पति ब्रह्मा – इन देवताओं की भक्तिपूर्वक उपासना करने से परम पद प्राप्त होता है तो फिर तप के द्वारा आप लोगों का उपास्य देवता कौन है? आपके समान इस बात को वाणी से बताने में इस भूमण्डल में और कोई भी समर्थ नहीं है. कृपामूर्ति महेश्वर ! इस प्रकार के प्रभाव वाले आप लोगों के जो उपास्य देवता हैं, उनके विषय में मुझे भी अवश्य जान लेना चाहिए. अत: कृपापूर्वक मुझे बताइए।।30-32।।

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व्यासजी बोले – मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ! इस प्रकार उन देवर्षि नारद का वचन सुनकर और उस पर बार-बार विचार करके महादेवजी ने उनसे यह कहा ।।33।।

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श्रीमहादेवजी बोले – तात ! आपने जो बात पूछी है, वह तो परम गोपनीय है. वत्स ! ऎसी बात भला आपको बताने योग्य क्यों नहीं है? मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपको बताऊँगा।।34।।

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व्यासजी बोले – देवाधिदेव शिव के ऎसा कहने पर देवर्षि नारदजी दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गए और सर्वव्यापी जगन्नाथ नारायण से कहने लगे – भक्तों पर कृपा करने वाले देवाधिदेव भगवान महेश्वर अपने उपास्य इष्टदेव के विषय में बताने में कृपणता कर रहे हैं, अत: शरणागतों पर कृपा करने वाले देवेश ! आप उनसे कहने की कृपा करें।।35-36½ ।।

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श्रीनारायण बोले – तात ! उस देवता से आपका क्या प्रयोजन? आप सबके देवता तो हम हैं ही. हमारी ही आराधना करके आप परम पद प्राप्त कर लेगें, अत: हम सबके देवता से आपका क्या प्रयोजन?।।37-38।।

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व्यासजी बोले – इस प्रकार उन नारायण का भी वह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद हाथ जोड़कर स्तुति वचनों से शिव तथा विष्णु का स्तवन करने लगे ।।39।।

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नारदजी बोले – विश्वेश्वर ! देवदेव ! प्रसन होइए. नारायण ! वासुदेव ! प्रसन्न होइए. अपने शुभ्र शरीर के अंगों में सर्वरूपी आभूषण धारण करने वाले शिव ! प्रसन्न होइए. कौस्तुभमणि से विभूषित शरीर वाले नारायण ! मुझ पर प्रसन होइए।।40।। शरण देने वाले गंगाधर ! मुझ पर प्रसन्न होइए. सुदर्शन चक्र को धारण करने वाले पूजनीय विष्णो ! मुझ पर प्रसन्न होइए. दिगम्बररूप विश्वेश्वर ! मुझ पर प्रसन्न होइए. गदा धारण करने वाले विश्वेश्वर ! मुझ पर प्रसन्न होइए।।41।।

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त्रिपुर का वध करने वाले शिव को नमस्कार है. असुर कंस का वध करने वाले (कृष्णरूप) विष्णु को नमस्कार है. अन्धकासुर का विनाश करने वाले शिव को नमस्कार है और तृणावर्त का संहार करने वाले विष्णु को नमस्कार है. विष्णु को बार-बार नमस्कार है. गरुड आसन पर विराजमान आप विष्णु को तथा नन्दी पर आरुढ़ आप शिव को नमस्कार है।।42-43।। 

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व्यासजी बोले – परमपूज्य उन देवर्षि नारद को इस प्रकार स्तुति करते हुए देखकर महादेव जी की ओर दृष्टि करके भगवान विष्णु ने कहा ।।44।।

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विष्णु जी बोले – देव ! ये ब्रह्मापुत्र देवर्षि नारद परम भक्त, ज्ञानी एवं विनम्र स्वभाव वाले हैं. आप भक्तवत्सल हैं, इसलिए आपको इन पर अवश्य ही कृपा करनी चाहिए।।45।। 

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व्यासजी बोले – भगवान शिव ने भी भगवान विष्णु द्वारा कही हुई बात को सुनकर कहा – आप शरणागतों पर कृपा करने वाले हैं और आपने मेरे लिए अत्यन्त कल्याणकारी बात कही है।।46।। तत्पश्चात महान ज्ञानी और बुद्धिमान नारद ने कृपासिन्धु देवाधिदेव महादेव से पुन: पूछा।।47।।

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नारदजी बोले – इन्द्र आदि समस्त लोकपालों ने आप (शिव), विष्णु तथा जगत्पति ब्रह्मा की उपासना करके श्रेष्ठ पद प्राप्त किया है. देवेश ! यदि मेरे ऊपर आपका अनुग्रह हो तो आप लोग जिस पूर्ण तथा अविनाशी देवता की आराधना करते हैं, उसके विषय में मुझे बताइए. देव ! जिसकी कृपा से आपने ऎसा महान ऎश्वर्य प्राप्त किया है, उस देवता के विषय में यदि आप मुझे बताते हैं तो मेरे ऊपर यह आपका अनुग्रह होगा।।48-50।।

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व्यासजी बोले – योगीश्वर मुनिवर नारदजी द्वारा इस प्रकार प्रार्थना करने पर निर्मलपति भगवान शंकर पहले तो सतत समाधिस्थ हो गये. पुन: भगवती श्रीदुर्गा के चरण कमल का अपने हृदय में ध्यान करते हुए और उन्हें ही एकमात्र पूर्णब्रह्म जानकर उन्होंने आदरपूर्वक कहना प्रारम्भ किया।।51।।

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।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीव्यास-जैमिनि-संवाद में “व्रतोपासनावर्णन” नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ।।

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जय सियाराम जय जय हनुमान

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

मातासती का भ्रम, श्री रामजी का ऐश्वर्य ,और सती का खेद!!!!!!!!!का मनोरम वर्णन किया है,

मेरे अत्यंत प्रिय सभी मित्र जनो में सादर यथोचित प्रणाम। श्री राममचरितमानस जी के अनुसार,श्री मातासती का भ्रम, श्री रामजी का ऐश्वर्य ,और सती का खेद!!!!!!!!!का मनोरम वर्णन किया है ।----------------🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑------------
                    आचार्य डा.अजय दीक्षित
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*रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥

रिषि याज्ञवल्क्य जी भारद्वाज ऋषि से कह रहे हैं,श्री रामजी की कथा चंद्रमा की किरणों के समान है, जिसे संत रूपी चकोर सदा पान करते हैं। ऐसा ही संदेह पार्वतीजी ने किया था, तब महादेवजी ने विस्तार से उसका उत्तर दिया था॥

*कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।
भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद॥

भावार्थ:-अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही उमा और शिवजी का संवाद कहता हूँ। वह जिस समय और जिस हेतु से हुआ, उसे हे मुनि! तुम सुनो, तुम्हारा विषाद मिट जाएगा॥

*एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥
संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥

भावार्थ:-एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य ऋषि के पास गए। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषि ने संपूर्ण जगत्‌ के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया॥

*रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी॥
रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई॥

भावार्थ:-मुनिवर अगस्त्यजी ने रामकथा विस्तार से कही, जिसको महेश्वर ने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने शिवजी से सुंदर हरिभक्ति पूछी और शिवजी ने उनको अधिकारी पाकर (रहस्य सहित) भक्ति का निरूपण किया॥

*कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी।।

भावार्थ:-श्री रघुनाथजी के गुणों की कथाएँ कहते-सुनते कुछ दिनों तक शिवजी वहाँ रहे। फिर मुनि से विदा माँगकर शिवजी दक्षकुमारी सतीजी के साथ घर (कैलास) को चले॥

*तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥
पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥

भावार्थ:-उन्हीं दिनों पृथ्वी का भार उतारने के लिए श्री हरि ने रघुवंश में अवतार लिया था। वे अविनाशी भगवान्‌ उस समय पिता के वचन से राज्य का त्याग करके तपस्वी या साधु वेश में दण्डकवन में विचर रहे थे॥

*हृदयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।
गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ॥

भावार्थ:-शिवजी हृदय में विचारते जा रहे थे कि भगवान्‌ के दर्शन मुझे किस प्रकार हों। प्रभु ने गुप्त रूप से अवतार लिया है, मेरे जाने से सब लोग जान जाएँगे॥ 

*संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।
तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥

भावार्थ:-श्री शंकरजी के हृदय में इस बात को लेकर बड़ी खलबली उत्पन्न हो गई, परन्तु सतीजी इस भेद को नहीं जानती थीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि शिवजी के मन में (भेद खुलने का) डर था, परन्तु दर्शन के लोभ से उनके नेत्र ललचा रहे थे॥

*रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा॥
जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा॥

भावार्थ:-रावण ने (ब्रह्माजी से) अपनी मृत्यु मनुष्य के हाथ से माँगी थी। ब्रह्माजी के वचनों को प्रभु सत्य करना चाहते हैं। मैं जो पास नहीं जाता हूँ तो बड़ा पछतावा रह जाएगा। इस प्रकार शिवजी विचार करते थे, परन्तु कोई भी युक्ति ठीक नहीं बैठती थी॥

*ऐहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेही समय जाइ दससीसा॥
लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरउ सोइ कपट कुरंगा॥

भावार्थ:-इस प्रकार महादेवजी चिन्ता के वश हो गए। उसी समय नीच रावण ने जाकर मारीच को साथ लिया और वह (मारीच) तुरंत कपट मृग बन गया॥

*करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही॥
मृग बधि बंधु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए॥

भावार्थ:-मूर्ख (रावण) ने छल करके सीताजी को हर लिया। उसे श्री रामचंद्रजी के वास्तविक प्रभाव का कुछ भी पता न था। मृग को मारकर भाई लक्ष्मण सहित श्री हरि आश्रम में आए और उसे खाली देखकर (अर्थात्‌ वहाँ सीताजी को न पाकर) उनके नेत्रों में आँसू भर आए॥

*बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥
कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुखु ताकें॥

भावार्थ:-श्री रघुनाथजी मनुष्यों की भाँति विरह से व्याकुल हैं और दोनों भाई वन में सीता को खोजते हुए फिर रहे हैं। जिनके कभी कोई संयोग-वियोग नहीं है, उनमें प्रत्यक्ष विरह का दुःख देखा गया॥

*अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन॥

भावार्थ:-श्री रघुनाथजी का चरित्र बड़ा ही विचित्र है, उसको पहुँचे हुए ज्ञानीजन ही जानते हैं। जो मंदबुद्धि हैं, वे तो विशेष रूप से मोह के वश होकर हृदय में कुछ दूसरी ही बात समझ बैठते हैं॥

*संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा ॥
भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारी॥

भावार्थ:-श्री शिवजी ने उसी अवसर पर श्री रामजी को देखा और उनके हृदय में बहुत भारी आनंद उत्पन्न हुआ। उन शोभा के समुद्र (श्री रामचंद्रजी) को शिवजी ने नेत्र भरकर देखा, परन्तु अवसर ठीक न जानकर परिचय नहीं किया॥

*जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन॥
चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता॥

भावार्थ:-जगत्‌ को पवित्र करने वाले सच्चिदानंद की जय हो, इस प्रकार कहकर कामदेव का नाश करने वाले श्री शिवजी चल पड़े। कृपानिधान शिवजी बार-बार आनंद से पुलकित होते हुए सतीजी के साथ चले जा रहे थे॥

*सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी॥
संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥

भावार्थ:-सतीजी ने शंकरजी की वह दशा देखी तो उनके मन में बड़ा संदेह उत्पन्न हो गया। (वे मन ही मन कहने लगीं कि) शंकरजी की सारा जगत्‌ वंदना करता है, वे जगत्‌ के ईश्वर हैं, देवता, मनुष्य, मुनि सब उनके प्रति सिर नवाते हैं॥

*तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधामा॥
भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥

भावार्थ:-उन्होंने एक राजपुत्र को सच्चिदानंद परधाम कहकर प्रणाम किया और उसकी शोभा देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गए कि अब तक उनके हृदय में प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती॥

*ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥

भावार्थ:-जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेदरहित है और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है?॥

*बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥

भावार्थ:-देवताओं के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करने वाले जो विष्णु भगवान्‌ हैं, वे भी शिवजी की ही भाँति सर्वज्ञ हैं। वे ज्ञान के भंडार, लक्ष्मीपति और असुरों के शत्रु भगवान्‌ विष्णु क्या अज्ञानी की तरह स्त्री को खोजेंगे?॥

*संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई॥
अस संसय मन भयउ अपारा। होइ न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥

भावार्थ:-फिर शिवजी के वचन भी झूठे नहीं हो सकते। सब कोई जानते हैं कि शिवजी सर्वज्ञ हैं। सती के मन में इस प्रकार का अपार संदेह उठ खड़ा हुआ, किसी तरह भी उनके हृदय में ज्ञान का प्रादुर्भाव नहीं होता था॥

*जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ॥

भावार्थ:-यद्यपि भवानीजी ने प्रकट कुछ नहीं कहा, पर अन्तर्यामी शिवजी सब जान गए। वे बोले- हे सती! सुनो, तुम्हारा स्त्री स्वभाव है। ऐसा संदेह मन में कभी न रखना चाहिए॥

*जासु कथा कुंभज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई॥
सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥

भावार्थ:-जिनकी कथा का अगस्त्य ऋषि ने गान किया और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को सुनाई, ये वही मेरे इष्टदेव श्री रघुवीरजी हैं, जिनकी सेवा ज्ञानी मुनि सदा किया करते हैं॥

*मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥
सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी॥

भावार्थ:-ज्ञानी मुनि, योगी और सिद्ध निरंतर निर्मल चित्त से जिनका ध्यान करते हैं तथा वेद, पुराण और शास्त्र 'नेति-नेति' कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापक, समस्त ब्रह्मांडों के स्वामी, मायापति, नित्य परम स्वतंत्र, ब्रह्मा रूप भगवान्‌ श्री रामजी ने अपने भक्तों के हित के लिए (अपनी इच्छा से) रघुकुल के मणिरूप में अवतार लिया है।

*लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु।
बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ॥

भावार्थ:-यद्यपि शिवजी ने बहुत बार समझाया, फिर भी सतीजी के हृदय में उनका उपदेश नहीं बैठा। तब महादेवजी मन में भगवान्‌ की माया का बल जानकर मुस्कुराते हुए बोले-॥

*जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं॥

भावार्थ:-जो तुम्हारे मन में बहुत संदेह है तो तुम जाकर परीक्षा क्यों नहीं लेती? जब तक तुम मेरे पास लौट आओगी तब तक मैं इसी बड़ की छाँह में बैठा हूँ॥

*जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी॥
चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बेचारु करौं का भाई॥

भावार्थ:-जिस प्रकार तुम्हारा यह अज्ञानजनित भारी भ्रम दूर हो, (भली-भाँति) विवेक के द्वारा सोच-समझकर तुम वही करना। शिवजी की आज्ञा पाकर सती चलीं और मन में सोचने लगीं कि भाई! क्या करूँ (कैसे परीक्षा लूँ)?॥

*इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना॥
मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं॥

भावार्थ:-इधर शिवजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि दक्षकन्या सती का कल्याण नहीं है। जब मेरे समझाने से भी संदेह दूर नहीं होता तब (मालूम होता है) विधाता ही उलटे हैं, अब सती का कुशल नहीं है॥

*होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥

भावार्थ:-जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। (मन में) ऐसा कहकर शिवजी भगवान्‌ श्री हरि का नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गईं, जहाँ सुख के धाम प्रभु श्री रामचंद्रजी थे॥

*पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि सीता कर रूप।
आगें होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नरभूप॥

भावार्थ:-सती बार-बार मन में विचार कर सीताजी का रूप धारण करके उस मार्ग की ओर आगे होकर चलीं, जिससे (सतीजी के विचारानुसार) मनुष्यों के राजा रामचंद्रजी आ रहे थे॥

*लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा॥
कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा॥

भावार्थ:-सतीजी के बनावटी वेष को देखकर लक्ष्मणजी चकित हो गए और उनके हृदय में बड़ा भ्रम हो गया। वे बहुत गंभीर हो गए, कुछ कह नहीं सके। धीर बुद्धि लक्ष्मण प्रभु रघुनाथजी के प्रभाव को जानते थे॥

*सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी॥
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥

भावार्थ:-सब कुछ देखने वाले और सबके हृदय की जानने वाले देवताओं के स्वामी श्री रामचंद्रजी सती के कपट को जान गए, जिनके स्मरण मात्र से अज्ञान का नाश हो जाता है, वही सर्वज्ञ भगवान्‌ श्री रामचंद्रजी हैं॥

*सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ॥
निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी॥

भावार्थ:-स्त्री स्वभाव का असर तो देखो कि वहाँ (उन सर्वज्ञ भगवान्‌ के सामने) भी सतीजी छिपाव करना चाहती हैं। अपनी माया के बल को हृदय में बखानकर, श्री रामचंद्रजी हँसकर कोमल वाणी से बोले॥

*जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥

भावार्थ:-पहले प्रभु ने हाथ जोड़कर सती को प्रणाम किया और पिता सहित अपना नाम बताया। फिर कहा कि वृषकेतु शिवजी कहाँ हैं? आप यहाँ वन में अकेली किसलिए फिर रही हैं?॥

*राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु।
सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु॥

भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी के कोमल और रहस्य भरे वचन सुनकर सतीजी को बड़ा संकोच हुआ। वे डरती हुई (चुपचाप) शिवजी के पास चलीं, उनके हृदय में बड़ी चिन्ता हो गई॥

*मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना॥
जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा॥

भावार्थ:-कि मैंने शंकरजी का कहना न माना और अपने अज्ञान का श्री रामचन्द्रजी पर आरोप किया। अब जाकर मैं शिवजी को क्या उत्तर दूँगी? (यों सोचते-सोचते) सतीजी के हृदय में अत्यन्त भयानक जलन पैदा हो गई॥

*जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा॥
सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता॥

भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी ने जान लिया कि सतीजी को दुःख हुआ, तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट करके उन्हें दिखलाया। सतीजी ने मार्ग में जाते हुए यह कौतुक देखा कि श्री रामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी सहित आगे चले जा रहे हैं। (इस अवसर पर सीताजी को इसलिए दिखाया कि सतीजी श्री राम के सच्चिदानंदमय रूप को देखें, वियोग और दुःख की कल्पना जो उन्हें हुई थी, वह दूर हो जाए तथा वे प्रकृतिस्थ हों।)॥

*फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर बेषा॥
जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना॥

भावार्थ:-(तब उन्होंने) पीछे की ओर फिरकर देखा, तो वहाँ भी भाई लक्ष्मणजी और सीताजी के साथ श्री रामचन्द्रजी सुंदर वेष में दिखाई दिए। वे जिधर देखती हैं, उधर ही प्रभु श्री रामचन्द्रजी विराजमान हैं और सुचतुर सिद्ध मुनीश्वर उनकी सेवा कर रहे हैं॥

*देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका॥
बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥

भावार्थ:-सतीजी ने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे, जो एक से एक बढ़कर असीम प्रभाव वाले थे। (उन्होंने देखा कि) भाँति-भाँति के वेष धारण किए सभी देवता श्री रामचन्द्रजी की चरणवन्दना और सेवा कर रहे हैं॥

*सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।
जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप॥

भावार्थ:-उन्होंने अनगिनत अनुपम सती, ब्रह्माणी और लक्ष्मी देखीं। जिस-जिस रूप में ब्रह्मा आदि देवता थे, उसी के अनुकूल रूप में (उनकी) ये सब (शक्तियाँ) भी थीं॥

*देखे जहँ जहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥

भावार्थ:-सतीजी ने जहाँ-जहाँ जितने रघुनाथजी देखे, शक्तियों सहित वहाँ उतने ही सारे देवताओं को भी देखा। संसार में जो चराचर जीव हैं, वे भी अनेक प्रकार के सब देखे॥

*पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥
अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे॥

भावार्थ:-(उन्होंने देखा कि) अनेकों वेष धारण करके देवता प्रभु श्री रामचन्द्रजी की पूजा कर रहे हैं, परन्तु श्री रामचन्द्रजी का दूसरा रूप कहीं नहीं देखा। सीता सहित श्री रघुनाथजी बहुत से देखे, परन्तु उनके वेष अनेक नहीं थे॥

*सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भईं सभीता॥
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं॥

भावार्थ:-(सब जगह) वही रघुनाथजी, वही लक्ष्मण और वही सीताजी- सती ऐसा देखकर बहुत ही डर गईं। उनका हृदय काँपने लगा और देह की सारी सुध-बुध जाती रही। वे आँख मूँदकर मार्ग में बैठ गईं॥

*बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥

भावार्थ:-फिर आँख खोलकर देखा, तो वहाँ दक्षकुमारी (सतीजी) को कुछ भी न दिख पड़ा। तब वे बार-बार श्री रामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाकर वहाँ चलीं, जहाँ श्री शिवजी थे॥

*गईं समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।
लीन्हि परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात॥

भावार्थ:-जब पास पहुँचीं, तब श्री शिवजी ने हँसकर कुशल प्रश्न करके कहा कि तुमने रामजी की किस प्रकार परीक्षा ली, सारी बात सच-सच कहो॥

*सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥
कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं॥

भावार्थ:-सतीजी ने श्री रघुनाथजी के प्रभाव को समझकर डर के मारे शिवजी से छिपाव किया और कहा- हे स्वामिन्‌! मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, (वहाँ जाकर) आपकी ही तरह प्रणाम किया॥

*जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥
तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना॥

भावार्थ:-आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मन में यह बड़ा (पूरा) विश्वास है। तब शिवजी ने ध्यान करके देखा और सतीजी ने जो चरित्र किया था, सब जान लिया॥

*बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा॥
हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना॥

भावार्थ:-फिर श्री रामचन्द्रजी की माया को सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सती के मुँह से भी झूठ कहला दिया। सुजान शिवजी ने मन में विचार किया कि हरि की इच्छा रूपी भावी प्रबल है॥

*सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा॥
जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥

भावार्थ:-सतीजी ने सीताजी का वेष धारण किया, यह जानकर शिवजी के हृदय में बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि मैं अब सती से प्रीति करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है॥