बुधवार, 15 मार्च 2017

💠💠💠श्री गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र💠💠💠

                    
श्रीमद्भागवतान्तर्गत
गजेन्द्र कृत भगवान का स्तवन
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                डा.अजय दीक्षित
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श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहा
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥

बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने लगा ॥१॥

गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा –

ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥१॥

जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भांति व्यवहार करने लगते हैं), ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥२॥
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥

जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह निकला है , जिन्होने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप – बिना किसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूं ॥३॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम ।

अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोवतु मां परात्परः ॥४॥

अपने संकल्प शक्ति के द्वार अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र प्रसिद्ध कार्य कारण रूप जगत को जो अकुण्ठित दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं उनसे लिप्त नही होते, वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥४॥
कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।

तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥

समय के प्रवाह से सम्पूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादि लोकपालों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी परमकरुणारूप प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥५॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।

यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥

भिन्न भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रधान देवता तथा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नही जानते , फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है – वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें ॥६॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।

चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥

आसक्ति से सर्वदा छूटे हुए , सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले , सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रह कर अखण्ड ब्रह्मचार्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गति हैं ॥७॥

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।

तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यः
स्वमायया तान्युलाकमृच्छति ॥८॥

जिनका हमारी तरह कर्मवश ना तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ॥८॥

तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥

उन अन्नतशक्ति संपन्न परं ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । उन प्राकृत आकाररहित एवं अनेको आकारवाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारंबार नमस्कार है ॥९॥
नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥

स्वयं प्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं, बार बार नमस्कार है ॥१०॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥

विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणविशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष सुख की अनुभूति रूप प्रभु को नमस्कार है ॥११॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥

सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त , रजोगुण को स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके मूढ से प्रतीत होने वाले, भेद रहित, अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥१२॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥
शरीर इन्द्रीय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी रूप आपको नमस्कार है । सबके अन्तर्यामी , प्रकृति के भी परम कारण, किन्तु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥१३॥
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः ॥१४॥

सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण रूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥१४॥

नमो नमस्ते खिल कारणाय
निष्कारणायद्भुत कारणाय ।

सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥

सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण, अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है । सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है ॥१५॥ ॥

गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय ।

नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥

जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानरूप अग्नि हैं, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य वृत्ति जागृत हो उठती है तथा आत्म तत्त्व की भावना के द्वारा विधि निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१।६॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।

स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥

मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्याधिक दयालू एवं दया करने में कभी आलस्य ना करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है । अपने अंश से संपूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्व नियन्ता अनन्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥१७॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।

मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥

शरीर, पुत्र, मित्र, घर, संपंत्ती एवं कुटुंबियों में आसक्त लोगों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाले तथा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित ज्ञानस्वरूप , सर्वसमर्थ भगवान को नमस्कार है ॥१८॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।

किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम ॥१९॥

जिन्हे धर्म, अभिलाषित भोग, धन तथा मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं अपितु जो उन्हे अन्य प्रकार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्ती से सदा के लिये उबार लें ॥१९॥

एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।

अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥

जिनके अनन्य भक्त -जो वस्तुतः एकमात्र उन भगवान के ही शरण है-धर्म , अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नही चाह्ते, अपितु उन्ही के परम मंगलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥२०॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम ।

अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥

उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादि के भी नियामक, अभक्तों के लिये प्रकट होने पर भी भक्तियोग द्वारा प्राप्त करने योग्य, अत्यन्त निकट होने पर भी माया के आवरण के कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होने वाले , इन्द्रियों के द्वारा अगम्य तथा अत्यन्त दुर्विज्ञेय, अन्तरहित किंतु सबके आदिकारण एवं सब ओर से परिपूर्ण उन भगवान की मैं स्तुति करता हूँ ॥२१॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥

ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा संपूर्ण चराचर जीव नाम और आकृति भेद से जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥२२॥

यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः ।

तथा यतोयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥

जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि से लपटें तथा सूर्य से किरणें बार बार निकलती है और पुनः अपने कारण मे लीन हो जाती है उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीर – यह गुणमय प्रपंच जिन स्वयंप्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और पुनः उन्ही में लीन हो जात है ॥२३॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः ।

नायं गुणः कर्म न सन्न चासन
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४॥
वे भगवान न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक (मनुष्य से नीची – पशु , पक्षी आदि किसी) योनि के प्राणी है । न वे स्त्री हैं न पुरुष और नपुंसक ही हैं । न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश हो सके । न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही । सबका निषेध हो जाने पर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ है । ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिये आविर्भूत हों ॥२४॥

जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।

इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥

मैं इस ग्राह के चंगुल से छूट कर जीवित नही रहना चाहता; क्योंकि भीतर और बाहर – सब ओर से अज्ञान से ढके हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है । मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान की निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका कालक्रम से अपने आप नाश नही होता , अपितु भगवान की दया से अथवा ज्ञान के उदय से होता है ॥२५॥

सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम ॥२६॥

इस प्रकार मोक्ष का अभिलाषी मैं विश्व के रचियता, स्वयं विश्व के रूप में प्रकट तथा विश्व से सर्वथा परे, विश्व को खिलौना बनाकर खेलने वाले, विश्व में आत्मरूप से व्याप्त , अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्त्य वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्री भगवान को केवल प्रणाम ही करता हूं, उनकी शरण में हूँ ॥२६॥

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम ॥२७॥

जिन्होने भगवद्भक्ति रूप योग के द्वारा कर्मों को जला डाला है, वे योगी लोग उसी योग के द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदय में जिन्हे प्रकट हुआ देखते हैं उन योगेश्वर भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२७॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।

प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥

जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप ) शक्तियों का रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे हैं, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयों में ही रची पची रहती हैं-ऐसे लोगों को जिनका मार्ग भी मिलना असंभव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपारशक्तिशाली आपको बार बार नमस्कार है ॥२८॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम ॥२९॥

जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढंके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नही पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण आया हूँ ॥२९॥

श्री शुकदेव उवाच – श्री शुकदेवजी ने कहा –

एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।

नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत ॥३०॥

जिसने पूर्वोक्त प्रकार से भगवान के भेदरहित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था , उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नही आये, जो भिन्न भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब सक्षात श्री हरि- जो सबके आत्मा होने के कारण सर्वदेवस्वरूप हैं-वहाँ प्रकट हो गये ॥३०॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि : ।

छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान –
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥

उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुःखी देख कर तथा उसके द्वारा पढी हुई स्तुति को सुन कर सुदर्शनचक्रधारी जगदाधार भगवान इच्छानुरूप वेग वाले गरुड जी की पीठ पर सवार होकर स्तवन करते हुए देवताओं के साथ तत्काल उस स्थान अपर पहुँच गये जहाँ वह हाथी था ।

सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरि ख उपात्तचक्रम ।

उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा –
न्नारायण्खिलगुरो भगवान नम्स्ते ॥३२॥

सरोवर के भीतर महाबली ग्राह के द्वारा पकडे जाकर दुःखी हुए उस हाथी ने आकाश में गरुड की पीठ पर सवार चक्र उठाये हुए भगवान श्री हरि को देखकर अपनी सूँड को -जिसमें उसने (पूजा के लिये) कमल का एक फूल ले रक्खा था-ऊपर उठाया और बडी ही कठिनाई से “सर्वपूज्य भगवान नारायण आपको प्रणाम है” यह वाक्य कहा ॥३२॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।

ग्राहाद विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम ॥३३॥
उसे पीडित देख कर अजन्मा श्री हरि एकाएक गरुड को छोडकर नीचे झील पर उतर आये । वे दया से प्रेरित हो ग्राहसहित उस गजराज को तत्काल झील से बाहर निकाल लाये और देवताओं के देखते देखते चक्र से मुँह चीर कर उसके चंगुल से हाथी को उबार लिया ॥३३॥
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मंगलवार, 14 मार्च 2017

💠💠💠💠💠अदभुत रहस्य :------शिव जीकी अष्ट मूर्तियां कहां -कहां हैं ।

।।ऊँ पूर्णं शिवं धीमहि ऊँ।।
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अदभुत रहस्य :------शिव जीकी अष्ट मूर्तियां कहां -कहां हैं ।
                              डा.अजयदीक्षित
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१--शिवजी की अष्टमूर्तियों के नाम क्या हैं ?
२--मनुष्य केशरीरमें अष्टमूर्तियाँ कहाँ कहाँ हैं ?
३--अष्ट मूर्तियों के तीर्थ कहाँ - कहाँ हैं ?
(१)
अष्टमूर्तियों के नाम :-------
भगवान शिव के विश्वात्मक रूप ने ही चराचर जगत को धारण किया है| यही अष्टमूर्तियाँ क्रमश: पृथ्वी, जल, अग्नि,वायु,आकाश, जीवात्मा सूर्य और चन्द्रमा को अधिष्ठित किये हुए हैं | किसी एक मूर्ति की पूजा- अर्चना से सभी मूर्तियों की पूजा का फल मिल जाता है |
१-------_--- शर्व
२------------भव
३------------रूद्र
४------------ उग्र
५------------ भीम
६------------- पशुपति
७-------------- महादेव
८-------------- ईशान
(२)
मनुष्यों के शरीर में अष्ट मूर्तियों का निवास :---
१-- आँखों में "रूद्र" नामक मूर्ति प्रकाशरूप है | जिससे प्रणी देखता है |
२--"भव " ऩामक मूर्ति अन्न पान करके शरीर की वृद्धि करती है | यह स्वधा कहलाती है |
३--"शर्व " नामक मूर्ती अस्थिरूप से आधारभूता है |यह आधार शक्ति ही गणेश कहलाती है |
४-- "ईशान" शक्ति प्राणापन - वृत्ति को प्राणियों में जीवन शक्ती है |
५--"पशुपति " मूर्ति उदर में रहकर अशित- पीत को पचाती है | जिसे जठराग्नि कहा जाता है |
६-- "भीमा " मूर्ति देह में छिद्रों का कारण है |
७--"उग्र " नामक मूर्ति जीवात्मा के ऐश्वर्य रूप में रहती है |
८-- "महादेव " नामक मूर्ति संकल्प रूप से प्राणियों के मन में रहती है |
इस संकल्प रूप चन्द्रमा के लिए " नवो नवो भवति जायमान: " कहा गया है , अर्थात संकल्पों के नये नये रूप बदलते हैं ||
अष्टमूर्तियों के तीर्थ स्थल :-------
१-- सूर्य :-- सूर्य ही दृश्यमान प्रत्यक्ष देवता हैं|
सूर्य और शिव मेंकोई अन्तर नही है , सभी सूर्य मन्दिर वस्तुत: शिव मन्दिर ही हैं | फिर भी काशीस्थ " गभस्तीश्वर " लिंग सूर्य का शिव स्वारूप है |
२-- चन्द्र -: शोमनाथ का मन्दिर है |
३-- यजमान -: नेपालका पशुपतिनाथ मन्दिर है |
४-- क्षिति लिंग :-- तमिलनाडु के शिव कांची में स्थित आम्रकेश्वर हैं |
५-- जल लिंग :-- तमिलनाडु के त्रिचिरापल्ली में जम्बुकेश्वर मन्दिर है |
६-- तेजो लिंग --: अरूणांचल पर्वत पर है |
७-- वायु लिंग :-- आन्ध्रप्रदेश के अरकाट जिले में कालहस्तीश्वर वायु लिंग है |
८-- आकाश लिंग :-- तमिलनाडु के चिदम्बरम् मे स्थित है |
जय महाकाल
जय शिव शंकर
।।भवं भवानी सहितं नमामि।।
आप की माया आप को ही समर्पित है मुझ अग्यानी में इतना सामर्थ्य कहाँ है जो आप की माया का वर्णन कर सकूँ |
ऊँ पूर्णं शिवं धीमहि करो मेरा कल्यान |
चरणों में प्रभु "अजय" को दे दो हर स्थान ||

मंगलवार, 7 मार्च 2017

रविवार, 5 मार्च 2017

क्या आप जानना चाहेंगे--की-- पती और पत्नी में किसकी होगी:-- मृत्यु पहले ?

आप अपना नाम और पत्नी का नाम मुझे भेजें ।

           

 (भेजें :--*राशि का नाम) ९९℅ सत्य भविष्यवाणी  ।यदि राशि का नाम नहीं है तो वह नाम भेजें जिस नाम से आप का विवाह हुआ है ।
यह अद्भुत रहस्य जानकर अपने पार्टनर का साथ दें ।

तो करिये--- ई मेल-----और पायें ९९℅सत्य जानकारी ।        DrAjaidixit@gmail.com
                          ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

महराज अजयानंद
हनुमान गढ़ी अयोध्या धाम

शनिवार, 4 मार्च 2017

अल्सर का सफल इलाज




                 अल्सर
(Ulcer)
कारण :              
खान-पान में गड़बड़ी के कारण पेट में
जख्म बन जाता है जिसे अल्सर कहते हैं। चाय ,
कॉफी , सिगरेट व शराब का अधिक सेवन करने से
अल्सर होता है। अधिक खट्टे, मसालेदार,
गर्म चीजों का सेवन करने से अल्सर
होता है। चिन्ता, ईर्ष्या गुस्सा, काम
का बोझ, मानसिक परेशानी, बैचेनी
आदि कारणों से भी यह रोग होता है। कभी-
कभी पेट में जहरीला रोग पैदा होकर दूषित
द्रव्य एकत्रित होकर आमाशय और पक्वाशय में
जख्म बना देता है। इस तरह आमाशय में घाव
होने से पाचक रसों का बनना रुक जाता है और
अल्सर उत्पन्न हो जाता है।
लक्षण :
अल्सर के रोग में अक्सर पेट में जलन
होती है, खट्टी डकारे आती हैं, उल्टी
होती है, सिर चकराता है, भोजन
अच्छा नहीं लगता, कब्ज की शिकायत होती है,
दस्त के साथ खून आता है, शरीर में कमजोरी आ
जाती है और मन बैचेन रहता है।
भोजन और परहेज :
अल्सर में आराम मिलने पर भोजन में दूध,
सब्जियों का सूप, मसाले, कस्टर्ड और
दलिया लेना चाहिए।
सब्जियां मिलाकर बनाया गया दलिया,
चपाती और पका चावल का सेवन करना रोगी के
लिए लाभकारी होता है।
अल्सर से पीड़ित रोगी को बीच-बीच में थोड़े
समय के बाद कुछ न कुछ खाते रहना चाहिए।
शारीरिक और मानसिक कार्य से बचना चाहिए
ताकि पेट का सिकुड़न कम होकर अल्सर ठीक
हो जाए।
अल्सर रोग में रोगी को हर 2 घंटे के अंतर
पर ठंडा दूध, पका केला , चीकू , शरीफा और
उबला हुआ सेब खाना चाहिए।
अल्सर के रोगी को तले हुए और मसालेदार
मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए
क्योंकि इससे श्लैष्मिक झिल्ली में जलन
होती है।
चाय, कॉफी, शराब और धूम्रपान
नहीं करना चाहिए।
खट्टे फल और फलों का रस सेवन
नहीं करना चाहिए।
रेशे वाले पदार्थो का सेवन करना चाहिए
क्योंकि इसके सेवन से अल्सर से उत्पन्न
पेट की जलन शांत होती है।
अधिक मीठे और खट्टे पदार्थो का सेवन
नहीं करना चाहिए।
अनन्नास, संतरा , अमरूद और टमाटर
खाना रोगी के लिए हानिकारक होता है।
दूध, पका हुआ केला, चीकू, शरीफा और सेब
खाना चाहिए।
मैदा, कार्नफलोर, पेस्ट्री, केक, जैम और
जैली का सेवन नहीं करना चाहिए।
कच्ची सब्जियां, अंकुरित दाल और पत्तेदार
सब्जियां नहीं खानी चाहिए।
विभिन्न औषधियों के द्वारा रोग का उपचार-
1. संतरा : भोजन करने के बाद 2 चम्मच संतरे
का रस प्रतिदिन पीने से पेट का घाव व दर्द
ठीक होता है।
2. आंवला :
एक चम्मच आंवले का रस और एक चम्मच शहद
मिलाकर पीने से पेट में दूषित द्रव्य
जमा होने के कारण उत्पन्न अल्सर ठीक
होता है।
आंवले का चूर्ण एक चम्मच, सोंठ का चूर्ण
आधा चम्मच, जीरे का चूर्ण आधा चम्मच और
मिश्री एक चम्मच को मिलाकर सुबह-शाम सेवन
करने से पेट का जख्म ठीक होता है और दर्द व
उल्टी में आराम मिलता है।
3. केले : केले में अम्ल की मात्रा कम करने
और घाव को भरने की शक्ति होती है। पेट में
जख्म होने पर प्रतिदिन 3 केला खाना खाने
के बाद खाना चाहिए।
4. पान : पान के हरे पत्तों का आधा चम्मच रस
प्रतिदिन पीने से पेट का घाव व दर्द शांत
होता है।
5. हरड़ : 2 छोटी हरड़ और 4 मुनक्के को पीसकर
सुबह खाने से पेट की जलन व उल्टी समाप्त
होती है।
6. एरण्ड : 2 चम्मच एरण्ड का तेल गौमूत्र
या दूध में मिलाकर सेवन करने से
आंतों का अल्सर ठीक होता है।
7. देवदारु :
देवदारू, ढाक, आम की जड़, गजपीपल, सहजन और
असगंध को गाय के ताजे मूत्र में पीसकर पेट
पर लेप करने से पेट का जख्म ठीक होता है।
देवदारु, सहजन और बिजौरा नींबू बराबर
मात्रा में लेकर गौमूत्र में मिलाकर
रोगी को सेवन करना चाहिए।
8. सोंठ : 1 चम्मच चव्य और 1 चम्मच सोंठ
को पीसकर गाय के पेशाब में मिलाकर सेवन
करने से पेट का जख्म व दर्द ठीक होता है।
9. असगंध : पेट जख्म से परेशान रोगी को 4
ग्राम असगंध को गौमूत्र में पीसकर सेवन
करना चाहिए।
10. मुलहठी : पेट और आंत के घाव में
मुलहठी की जड़ का चूर्ण एक चम्मच
की मात्रा में एक कप दूध के साथ दिन में 3
बार सेवन करने से अल्सर कुछ सप्ताह में
ही ठीक हो जाता है। ध्यान रखें कि मिर्च-
मसालों का प्रयोग खाने में बिल्कुल न
करें।
11. दूध : अल्सर से पीड़ित रोगी को बार-बार
दूध पीना चाहिए और अनार का रस और आंवले
का मुरब्बा खाना चाहिए।
12. मूली : पुरानी कब्ज, तीखे व जलन
पैदा करने वाले पदार्थों का सेवन करने से
आन्तों का घाव होता है। मीठे मूली का 100
मिलीलीटर रस दिन में 2-3 बार सेवन करने से
अल्सर ठीक होता है।
13. गाजर : गाजर के 150 मिलीलीटर रस, 100
मिलीलीटर पालक का रस और 50 मिलीलीटर
गोभी का रस मिलाकर कुछ महीने तक पीने से
अल्सर में बहुत लाभ मिलता है।
14. घी : हल्दी और मुलेठी का चूर्ण पानी में
उबालकर ठंडा करके पेट पर लगाने से अल्सर
रोग में आराम मिलता है।
15. केला : अल्सर की बीमारी में दूध और
केला एक साथ खाने से लाभ होता है।
16. निर्गुण्डी : 50 ग्राम निर्गुण्डी के
पत्ते को आधा लीटर पानी में धीमी आग पर
पकाकर चौथाई भाग शेष बचे तो 10-20
मिलीलीटर दिन में 2 से 3 बार पीएं। इससे
पेप्टिक अल्सर के रोग से
छुटकारा मिलता है।

डा.अजय दीक्षित

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

।। राम एक रामायण अनेक ।।

|| राम एक || रामायण अनेक || डा.अजय दीक्षित ||
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राम कथा के प्रणेता के रूप में वाल्मीकि रामायण का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है । वाल्मीकि रामयाण को स्मृत ग्रंथ माना गया है इस ग्रंथ की रचना माता सरस्वती की कृपा से हुई थी । इस ग्रंथ को ॠतम्भरा प्रज्ञा की देन बताया जाता है । रामायण की रचना संस्कृत भाषा में हुई है ।

श्री रामचरित मानस की रचना गोस्वामी दुसलीदास द्वारा संवत 1633 में सम्पन्न हुई थी । अवधी भाषा में रचित इस महाकाव्य की रचना दो वर्ष सात महीने छब्बीस दिन लगे थे । इस ग्रंथ में बालकाण्ड, आयोध्या कांड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धा काण्ड, सुन्दरकाड, लंकाकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के रूप में सात काण्ड है । गागर में सागर की भांति इन सात काण्डों में ही श्री राम के सम्पूर्ण चरित्रको समाहित किया गया है ।

आध्यात्म रामायण की रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई है । ब्राह्मण्ड पुराण के उत्तरखण्ड के अंतर्गत एक आख्ययान के रूपमें इसकी रचना हुई है । इसकी रचना संस्कृत भाषा में की गई है । प्रस्तु ग्रंथ में भगवान श्री राम को आध्यात्मिक तत्व माना गया है । आनन्द रामायण महर्षि वाल्मीकि की ही रचना है । इस रामायण को भी सारकाण्ड, जन्म काण्ड, मनोहर काण्ड, राज्य काण्ड आदि काण्डों में बांटा गया है । संस्कृत भाषा में रचित इस रामायण में राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्व के साथ ही श्री राम के मर्यादा पुरूषत्व की नींव को सुदृढ़ बनाया है ।

अदभुत रामायण की रचना भी संस्कृत भाषा में की गई है । इस रामायण की रचना भी महर्षि वाल्मिकी द्वारा ही की गयी है । इस रामायण में सत्ताईस सर्ग के अंतर्गत लगभग चौदह हजार श्लोक है । इस रामायण में भगवती सीता के महात्म्य को विशेष रूप से दर्शाया गया है । इस रामायण के अनुसार सहस्रसुख का भी रावण था जो दशमुख रामवण का अग्रज था । सीता ने महाकाली का रूप धारण करके सहस्रसुख रावण का वध कर दिया था ।

योगवशिष्ठ - रामायण की रचना भी महर्षि वाल्मीकि द्वारा संपन्न हुई है । इसे महारामायण, आर्य रामायण (आर्ष रामायण), वशिष्ठ रामायण, ज्ञान वशिष्ठ रामायण के नामों से भी जाना जाता है । यह ग्रंथ वैराग्य प्रकरण, मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण, उत्तप्ति प्रकरण, स्थिति प्रकरण, उपशम प्रकरण तथा निर्वाण प्रकरण (पुर्वार्द एवं अत्तरार्द) के रूप में श्रीराम के चरित्र को छ: प्रकरणों में विभक्त किया गया है । संस्कृत भाषा में रचित इस रामायण में श्रीराम के मानवीय चरित्र के पक्ष में विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है ।

कृति वास रामायण की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी के जन्म से लगभग सौ वर्ष पूर्व हुई थी । इस रामायण की भाषा बंगला है। बंग्लादेश स्थित मनीषी कवि कृतिवास द्वारा रचित इस रामायण में भी बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धा काण्ड,उत्तरकाण्ड इत्यादि है । इस रामायण में भी सात काण्ड है । पवार छन्दों में पांचाली गान के रूप में रचित इस ग्रंथ में श्रीराम के उदार चरित्रों का बखान किया गया है ।

रंगनाथ रामायण की रचना द्रविड़ भाषा में (तेलगु) में श्री मोनबुध्द राज द्वारा देशज छन्दों में 1380 ई. के आसपास की गई । इस रामायण में युध्दकाण्ड के माध्यम से श्रीराम को महाप्रतापी बताया गया है । रावण के कुकृत्यों की निन्दा के साथ ही उसके गुणों की भी इसमें मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की गई है ।

प्रियंका रामायण की रचना उड़िया भाषा में आदिकवि श्री शरलादास द्वारा की गई है । यह रामायण पूर्वकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के रूप में थी तथा दो खण्डों में है । शिव पार्वती के संवाद के रूप में रचित यह रामायण भगवती महिषासुर मर्दिनी की वन्दना से प्रारंभ है । कश्मीरी रामायण की रचना दिवाकर प्रकाश भट्ट द्वारा कश्मीरी भाषा में की गई है । इस रामायण को रामावतार चरित्र के नाम से भी जाना जाता है । इसका एक नाम प्रकाश रामायण भी है । काशुर रामायण के नाम से इसका हिन्दी रूपान्तर भी प्राप्त है । इस रामायण में भक्ति ज्ञान एवं वैराग्य की त्रिवेणी प्रवाहित होती दिखाई देती है ।

उपरोक्त रामायणों के अतिरिक्त विष्णु प्रताप रामायण, मैथिली रामायण, दिनकर रामायण, शंकर रामायण, जगमोहन रामायण, शर्मा नारायण, ताराचंद रामायम, अमर रामायण, प्रेम रामायण, कम्बा रामायण, तोखे रामायण, गड़बड़ रामायण नेपाली रामायण, विचित्र रामायण मंत्र रामायण तिब्बती रामायण, राधेश्याम रामायण, चरित्र रामायण, कर्कविन रामायण जावी रामायम, जानकी रामायण आदि अनेक रामायण की रचना सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी की गई है ।

रामायम शत कोटि अपारा की भांति रामकथा के सागर में गोता (डुबकी) लगाने वाले कवियों ने राम का जितना साक्षातकार किया उसे अपने ग्रंथों में ढाल दिया ।

हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता के अनुसार राम कथा के रस से परिपूर्ण सभी ग्रंथ अपने आप में अलौकिक एवं आध्यात्मिक है ।

जय सिया राम
जय हनुमान
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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

भुंइहार ब्राह्मण :--काश्यपगोत्र:-वंशावली

सम्वत्सर १८८४ में मदारपुर के जमींदार
भुंइहार ब्राह्मणों से और यवनों से घोर युद्ध
हुआ। सारे भुंइहार ब्राह्मण मारे गये ।

                   
केवल अनन्तराम बिप्र की गर्भवती स्त्री
बची। जिसके एक पुत्र हुआ । जिसका नाम गर्भू रखा  उसी से भुंइहार वंश आगे बढा ।
कश्यप गोत्रीय चिलौली के सुखमणि त्रिपाठी ने पालन पोषण किया। और व्याह कराके कुतमऊ गांव में बसा दिया। और कुतमउहा तिवारी काश्यप गोत्र की उपाधि दी । स्योना नाई ने गर्भू की मां को दुश्मनों से बचाया था। इस लिए इनके यहां स्मृति चिन्ह के रूप में आज भी :--मांगलिक कार्यों में  अस्तुरा और कटोरी की पूजा होती है ।
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काश्यप गोत्र भुंइहार ब्रह्मण तिवारियों का स्थान
:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
स्थान.                असामी.          विस्वा
कुतमऊ के         / गर्भू.             /    ७
मदारपुर के.     / गौरी.            /.     १०
"""""""""""'''''''.     / मोहन           /.        ९
""""""""""""''"""""/ परमसुख.       /        ९
"'""""""""""""""""'/ कमोरी          /.        ९
""""""""""""""""'/, रमनी.          /.       
विहारपुर के.    / गणेश.          /.      ८
कुलमऊ पुर के  / सीताराम      /.      ५
बडौरा के.         / शांति           /.       १०
तिलौरी के         / कर्ण.          /.          ५
गलाथे के          / जयराम.      ,/.        ७
तिवारी पुर के.  / तिवारी.        /          २
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काश्यप गोत्र भुंइहार ब्राह्मण दीक्षितों का स्थान:-+-----
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::. :::::::::::
स्थान.                   असामी          विस्वा
भागीरथ के.          /परमाई.         /.   ३
क्युना के              /, रतने.          /       १०
क्युना मदारपुर के / गोपी.       /.       ५
:::::::कुतमऊ के.     / देवदत्त     /.      ६
:::::::::::::::::::::.       / थलई      /.        ४
::::::::::::::::;:;;;;;;    / रूपई          /.       ४
शिवली के.         / गिरधर.      /.       ४
विहारपुर के.      / गोपाल.      /.       २
बानपुर के.         / गंगा.         /.        १०
बिहारपुर के.     / चन्द.          /.         २
सिहुडा के        /खेमे.          /.             १
कोडरी के.       / खेमे.         /             २
गरहा के.          / खेमे.           /.      .  २
शाहाबाद के.     / खेमे.            /.      २
:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
काश्यप गोत्र भुंइहार ब्राह्मण दुबे:--------
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::;:::::::::::::;:: 
स्थान                       असामी        विस्वा
सगुनापुर के.           / चंदन.        /.     ४
चिनहारपुर के.       / त्रिभुवन.      /.     ३
गल्हैया के.            / ठकुरी.         /.      ४
खुडहा बिनवारी. के.  / लखनी.      /     २
मगरोयल के.           / बहादुर         /.     ७
विठूर के.             / जयपाल.        /. .    ४
लहुरी के.            / दुबे.               /      २
इक्षावरी के.        / दुबे.                /.     २
ठाठविलार के.     ,/ दुबे.              /.       २
सदनिहा के.        ,/सीरू.              /.      २
बिहार के.           / सीरू.                /.    २
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
काश्यप गोत्र भुंइहार ब्राह्मण अग्निहोत्री;----------
:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
स्थान.                     असामी.        विस्वा
विनौर के.               / जगनु.           /.  ५
अमृतपुर के.           / भग्गा.            /.    ४
लखनऊ के.           / जुडावन.         /.   ४
कठेरूआ के.           /. शीतल.        /.    ४
कलहा के.                / खिरऊ          /. १०
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काश्यप गोत्र भुंइहार ब्राह्मण शुक्ल अवस्थी मिश्र:-----
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स्थान                   असामी.          विस्वा
घिघौली के.    / गोबर्धन शुक्ल      /.  ५
रिवाडी के.  /  सुन्दर शुक्ल.        /.     ४
मिगलानी के. ,/ साहब अवस्थी.   /.     ३
खुरभुवाआ के  / यज्ञ अवस्थी.     /.      ४
ख्युरा के.    / आशादत्ती अवस्थी.  /.    २
बबुआ के.   / हरी अवस्थी.        /.    १०
कृपानपुर के  / रामकृष्ण मिश्र.     /.   ५
नगरा के.   / देवकीनंदन मिश्र.     /.   ३
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।। इति भुंइहार ब्राह्मण काश्यप गोत्रम  ।।