शुक्रवार, 15 जून 2018

कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करें

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कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है इस बारे में जानकारी देंगें भारतीय चिकित्सा परिषद के सदस्य डॉ जितेंद्र गिल

                         *सोना*

सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।

                        *चाँदी*

चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है  इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।

                           *कांसा*

काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में  शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल ३ प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

                         *तांबा*

तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।

                        *पीतल*

पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल ७ प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

                         *लोहा*

लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से  शरीर  की  शक्ति बढती है, लोहतत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और  पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।

                         *स्टील*

स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी  नहीं पहुँचता।

                      *एलुमिनियम*

एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।

                           *मिट्टी*

मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते हैं । इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त हैं मिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे १०० प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।
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मंगलवार, 22 मई 2018

रामायण के अनुसार,नारी गहने क्यों पहनती हैं?

रामायण के अनुसार,नारी गहने क्यों पहनती हैं?

जनकसुता जग जननि जानकी।
अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ।
जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥

भावार्थ:-राजा जनक की पुत्री, जगत की माता और करुणा निधान श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री जानकीजी के दोनों चरण कमलों को मैं मनाता हूँ, जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि पाऊँ॥

भगवान राम ने धनुष तोड दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, ‘‘माताश्री इतना श्रृंगार क्यों?’’

‘‘बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है?’’ उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था।

‘‘अर्थात?’’ सीताजी ने पुनः पूछा, ‘‘इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध?’’

‘‘बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।’’

‘‘और मेहंदी का अर्थ?’’

मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।’’

‘‘और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी?’’

‘‘बेटी! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।’’

‘‘बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री?’’

‘‘बेंदी का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशमान रहना होगा।’’

‘‘यह नथ क्यों?’’

‘‘नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।’’

‘‘और यह टीका?’’

‘‘पुत्री टीका यश का प्रतीक है, तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो, क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।’’

‘‘और यह बंदनी क्यों?’’

‘‘बेटी बंदनी का अर्थ है कि पति, सास ससुर आदि की सेवा करनी होगी।’’

‘‘पत्ती का अर्थ?’’

‘‘पत्ती का अर्थ है कि अपनी पत यानी लाज को बनाए रखना है, लाज ही स्त्री का वास्तविक गहना होता है।’’

‘‘कर्णफूल क्यों?’’

‘‘हे सीते! कर्णफूल का अर्थ है कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर हमेशा प्रसन्न रहना होगा।’’

*‘‘और इस हंसली से क्या तात्पर्य है?’’

‘‘हंसली का अर्थ है कि हमेशा हंसमुख रहना होगा सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।’’

‘‘मोहनलता क्यों?’’

‘‘मोहनमाला का अर्थ है कि सबका मन मोह लेने वाले कर्म करती रहना।’’

‘‘नौलखा हार और बाकी गहनों का अर्थ भी बता दो माताश्री?’’

‘‘पुत्री नौलखा हार का अर्थ है कि पति से सदा हार स्वीकारना सीखना होगा, कडे का अर्थ है कि कठोर बोलने का त्याग करना होगा, बांक का अर्थ है कि हमेशा सीधा-सादा जीवन व्यतीत करना होगा, छल्ले का अर्थ है कि अब किसी से छल नहीं करना, पायल का अर्थ है कि बूढी बडियों के पैर दबाना, उन्हें सम्मान देना क्योंकि उनके चरणों में ही सच्चा स्वर्ग है और अंगूठी का अर्थ है कि हमेशा छोटों को आशीर्वाद देते रहना।’’
‘‘माताश्री फिर मेरे अपने लिए क्या श्रृंगार है?’’

‘‘बेटी आज के बाद तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस दुनिया में है ही नहीं, तुम तो अब से पति की परछाई हो, हमेशा उनके सुख-दुख में साथ रहना, वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।’’

‘‘हे राम!’’ कहते हुए सीताजी मुस्करा दी। शायद इसलिए कि शादी के बाद पति का नाम भी मुख से नहीं ले सकेंगी, क्योंकि अर्धांगिनी होने से कोई स्वयं अपना नाम लेगा तो लोग क्या कहेंगे।
।।जय जय श्री राम।।

मंगलवार, 8 मई 2018

A B C ये अंग्रेजी वर्ण हमें सिखाते हैं

तीन बुरी खबरों ने देश को हिला दिया...?

{1} _12000 करोड़ की रेमण्ड कम्पनी का मालिक आज बेटे की बेरुखी के कारण किराये के घर में रह रहा है।_

{2} _अरबपति महिला मुम्बई के पॉश इलाके के अपने करोड़ो के फ्लैट में पूरी तरह गल कर कंकाल बन गयी! विदेश में बहुत बड़ी नौकरी करने वाले करोड़पति बेटे को पता ही नहीं माँ कब मर गयी।_

{3} _सपने सच कर आई. ए. एस. का पद पाये बक्सर के क्लेक्टर ने तनाव के कारण आत्महत्या की।_

ये तीन घटनायें बताती हैं जीवन में पद पैसा प्रतिष्ठा ये सब कुछ काम का नहीं। यदि आपके जीवन में खुशी संतुष्टी और अपने नहीं हैं तो कुछ भी मायने नहीं रखता।

वरना एक क्लेक्टर को क्या जरुरत थी जो उसे आत्महत्या करना पड़ा।

खुशियाँ पैसो से नहीं मिलती अपनों से मिलती है।_

पैसा बहुत कुछ है, लेकिन सब कुछ नही है।

जीवन आनन्द के लिए है, चाहे जो हों बस मुस्कुराते रहो...?_

_यदि आप चिंतित हो, तो खुद को थोड़ा आराम दों कुछ आइसक्रीम, चॉकलेट, केक लो_

ये अंग्रेजी वर्ण हमें सिखाते हैं :-

A B C....?
Avoid Boring Company​
_​मायूस संगत से दूरी​_

_D E F...?_
Dont Entertain Fools​
_​मूर्खो पर समय व्यर्थ मत करों_

_G H I...?_
Go For High Ideas​
_​ऊँचे विचार रखो​_

_J K L M...?_
Just Keep A Friend Like Me​
_​मेरे जैसा मित्र रखों_

_N O P...?_
Never Overlook The Poor n Suffering​
_​गरीब व पीड़ित को कभी अनदेखा मत करों_

_Q R S...?_
Quit Reacting To Silly Tales​_
_​मूर्खो को प्रतिक्रिया मत दो​_

_T U V...?_
Tune Urself For Ur Victory​
_​खुद की जीत सुनिश्चित करों_

_W X Y Z...?_
We Xpect You To Zoom Ahead In Life​
_​हम आपसे जीवन मे आगे देखने की आशा करते हैं_

यदि आपने चाँद को देखा, तो आपने ईश्वर की सुन्दरता देखी!

यदि आपने सूर्य को देखा, तो आपने ईश्वर का बल देखा!

और यदि आपने आईना देखा तो आपने ईश्वर की सबसे सुंदर रचना देखी!

इसलिए स्वयं पर विश्वास रखो.

जीवन में हमारा उद्देश्य होना चाहिए :-

​9, 8, 7, 6, 5, 4, 3, 2, 1, 0​

_9 - गिलास पानी_
_8 - घण्टे नींद_
_7 - यात्रायें परिवार के साथ_
_6 - अंकों की आय_
_5 - दिन हफ्ते में काम_
_4 - चक्का वाहन_
_3 - बेडरूम वाला फ्लैट_
_2 - अच्छे बच्चें_
_1 - जीवन साथी_
_0 - चिन्ता...?_

ये सिर्फ Message नहीं एक सीख है।

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

⛔ महीने के हिसाब से चंद्रमा का बास

ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा पूर्णिमा के दिन जिस माह में निवास करता है उनके नाम इस प्रकार हैं जैसे चैत्र के वाद वैशाख ही क्यों आता है ध्यान पूर्वक पढ़ेंगे तो सब समझ में आजायेगा।

1 चैत्र : चित्रा, स्वाति।

2 वैशाख : विशाखा, अनुराधा।

3 ज्येष्ठ : ज्येष्ठा, मूल।

4 आषाढ़ : पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, सतभिषा।

5 श्रावण : श्रवण, धनिष्ठा।

6 भाद्रपद : पूर्वभाद्र, उत्तरभाद्र।

7 आश्विन : अश्विन, रेवती, भरणी।

8 कार्तिक : कृतिका, रोहणी।

9 मार्गशीर्ष : मृगशिरा, उत्तरा।

10 पौष : पुनर्वसु, पुष्य।

11 माघ : मघा, अश्लेशा।

12 फाल्गुन : पूर्वाफाल्गुन, उत्तराफाल्गुन, हस्त।
आचार्य भूदत्त

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

हनुमान् के कई अर्थ हैं-(१) पराशर संहिता के अनुसार उनके मनुष्य रूप में ९ अवतार हुये थे।

रामायण - RAMAYAN

हनुमान् के कई अर्थ हैं-(१) पराशर संहिता के अनुसार उनके मनुष्य रूप में ९ अवतार हुये थे।

हनुमान् के कई अर्थ हैं-(१) पराशर संहिता के अनुसार उनके मनुष्य रूप में ९ अवतार हुये थे।
(२) आध्यात्मिक अर्थ तैत्तिरीय उपनिषद् में दिया है-दोनों हनु के बीच का भाग ज्ञान और कर्म की ५-५ इन्द्रियों का मिलन विन्दु है। जो इन १० इन्द्रियों का उभयात्मक मन द्वारा समन्वय करता है, वह हनुमान् है।
(३) ब्रह्म रूप में गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ३ रूप हैं-स्रष्टा रूप में यथापूर्वं अकल्पयत् = पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि है। मूल तत्त्व के समुद्र से से विन्दु रूपों (द्रप्सः -ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह, -सभी विन्दु हैं) में वर्षा करता है वह वृषा है। पहले जैसा करता है अतः कपि है। अतः मनुष्य का अनुकरण करने वाले पशु को भी कपि कहते हैं। तेज का स्रोत विष्णु है, उसका अनुभव शिव है और तेज के स्तर में अन्तर के कारण गति मारुति = हनुमान् है। वर्गीकृत ज्ञान ब्रह्मा है या वेद आधारित है। चेतना विष्णु है, गुरु शिव है। उसकी शिक्षा के कारण जो उन्नति होती है वह मनोजव हनुमान् है।
(४) हनु = ज्ञान-कर्म की सीमा। ब्रह्माण्ड की सीमा पर ४९वां मरुत् है। ब्रह्माण्ड केन्द्र से सीमा तक गति क्षेत्रों का वर्गीकरण मरुतों के रूप में है। अन्तिम मरुत् की सीमा हनुमान् है। इसी प्रकार सूर्य (विष्णु) के रथ या चक्र की सीमा हनुमान् है। ब्रह्माण्ड विष्णु के परम-पद के रूप में महाविष्णु है। दोनों हनुमान् द्वारा सीमा बद्ध हैं, अतः मनुष्य (कपि) रूप में भी हनुमान् के हृदय में प्रभु राम का वास है।
(५) २ प्रकार की सीमाओं को हरि कहते हैं-पिण्ड या मूर्त्ति की सीमा ऋक् है,उसकी महिमा साम है-ऋक्-सामे वै हरी (शतपथ ब्राह्मण ४/४/३/६)। पृथ्वी सतह पर हमारी सीमा क्षितिज है। उसमें २ प्रकार के हरि हैं-वास्तविक भूखण्ड जहां तक दृष्टि जाती है, ऋक् है। वह रेखा जहां राशिचक्र से मिलती है वह साम हरि है। इन दोनों का योजन शतपथ ब्राह्मण के काण्ड ४ अध्याय ४ के तीसरे ब्राह्मण में बताया है अतः इसको हारियोजन ग्रह कहते हैं। हारियोजन से होराइजन हुआ है।
(६) हारियोजन या पूर्व क्षितिज रेखा पर जब सूर्य आता है, उसे बाल सूर्य कहते हैं। मध्याह्न का युवक और सायं का वृद्ध है। इसी प्रकार गायत्री के रूप हैं। जब सूर्य का उदय दीखता है, उस समय वास्तव में उसका कुछ भाग क्षितिज रेखा के नीचे रहता है और वायुमण्डल में प्रकाश के वलन के कारण दीखने लगता है। सूर्य सिद्धान्त में सूर्य का व्यास ६५०० योजन कहा है, यह भ-योजन = २७ भू-योजन = प्रायः २१४ किमी. है। इसे सूर्य व्यास १३,९२,००० किमी. से तुलना कर देख सकते हैं। वलन के कारण जब पूरा सूर्य बिम्ब उदित दीखता है तो इसका २००० योजन भाग (प्रायः ४,२८,००० किमी.) हारियोजन द्वारा ग्रस्त रहता है। इसी को कहा है-बाल समय रवि भक्षि लियो …)। इसके कारण ३ लोकों पृथ्वी का क्षितिज, सौरमण्डल की सीमा तथा ब्रह्माण्ड की सीमा पर अन्धकार रहता है। यहां युग सहस्र का अर्थ युग्म-सहस्र = २००० योजन है जिसकी इकाई २१४ कि.मी. है।
तैत्तिरीय उपनिषद् शीक्षा वल्ली, अनुवाक् ३-अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपं, उत्तरा हनुरुत्तर रूपम्। वाक् सन्धिः, जिह्वा सन्धानम्। इत्यध्यात्मम्।
अथ हारियोजनं गृह्णाति । छन्दांसि वै हारियोजनश्चन्दांस्येवैतत्संतर्पयति तस्माद्धारियोजनं गृह्णाति (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/३/२) एवा ते हारियोजना सुवृक्ति ऋक् १/६१/१६, अथर्व २०/३५/१६)
तद् यत् कम्पायमानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषाकपित्वम्। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर ६/१२)आदित्यो वै वृषाकपिः। ( गोपथ ब्राह्मण उत्तर ६/१०) स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर २/१२)
(७) सुन्दर काण्ड-मूल वैदिक शब्द सु-नर था जिससे लौकिक शब्द सुन्दर हुआ है। सु = अच्छा, समन्वय, मिला हुआ। दुः = अलग-अलग, असम्बद्ध। जैसे सुख-दुःख।
सु-नर = अच्छा नर, जो लोगों को मिलाये। जैसे इसाई विवाह में पति-पत्नी को मिलाने वाला सु-नर (Best man) कहलाता है।
वेद में सुनर वह है जो पति-पत्नी, भक्त भगवान् को मिला दे।
रामायण में हनुमानजी सीता-राम को मिलाने के लिए दूत बने, भक्त विभीषण या शत्रु पक्ष के व्यक्ति को भगवान् राम से मिलाया तथा परस्पर विरोधी सुग्रीव तथा अंगद को भी राम से मिलाया।
हनु = दोनों ओठ। इनके बीच का भाग ५ ज्ञानेन्द्रिय तथा ५ कर्मेन्द्रिय का समन्वय है। जो ज्ञान-कर्म दोनों में श्रेष्ठ है, वही हनुमान है (तैत्तिरीय उपनिषद्, शीक्षा वल्ली)।
सु-नर हनुमान का चरित्र वर्णन होने के कारण इस अध्याय को सुन्दर काण्ड कहते हैं।
(८) हनुमान की जन्म तिथि-
पंचांग में हनुमान जयन्ती की कई तिथियों दी गई हैं पर उनका स्रोत मैंने कहीं नहीं देखा है। पंचांग निर्माताओं के अपने अपने आधार होंगे। पराशर संहिता, पटल 6 में यह तिथि दी गई है-
तस्मिन् केसरिणो भार्या कपिसाध्वी वरांगना।
अंजना पुत्रमिच्छन्ति महाबलपराक्रमम्।।29।।
वैशाखे मासि कृष्णायां दशमी मन्द संयुता।
पूर्व प्रोष्ठपदा युक्ता कथा वैधृति संयुता।।36।।
तस्यां मध्याह्न वेलायां जनयामास वै सुतम्।
महाबलं महासत्त्वं विष्णुभक्ति परायणम्।।37।।
इसके अनुसार हनुमान जी का जन्म वैशाख मास कृष्ण दशमी तिथि शनिवार (मन्द = शनि) युक्त पूर्व प्रोष्ठपदा (पूर्व भाद्रपद) वैधृति योग में मध्याह्न काल में हुआ।

 

गुरुवार, 15 मार्च 2018

राम रावण युद्ध की तिथियां

लंका में श्रीराम ने युद्ध कब आरम्भ किया और कितने दिन चला ? इस विषय में लोगों को बड़ी भ्रान्तियाँ हैं । यहाँ सप्रमाण इस विषय का निरूपण किया जा रहा है । श्रीराम समुद्र पार करके सुबेल पर्वत पर विश्राम हेतु पहुँचे । तत्पश्चात् सूर्यास्त हुआ और वह पूर्णिमा की रात्रि थी–

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।। आचार्य,डा.अजय दीक्षित
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मो. 09559986789
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ततोSस्तमगमत् सूर्य: सन्ध्यया प्रतिरञ्जित: । पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता च क्षपा समतिवर्तत ।।
-वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड-३८/१९,
रात्रि बीतने के बाद कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को सुग्रीव ने रावण से मल्लयुद्ध किया और उसी तिथि को श्रीराम ने वानरवीरों के साथ लंका को पूरी तरह घेर लिया–युद्धकाण्ड-४१/२२-५२, वालितनय अंगद को दूत बनाकर रावण को समझाने भेजा गया । न मानने पर उसी दिन लंका पर प्रबल आक्रमण हुआ । -युद्धकाण्ड-४१-४२सर्ग,
यह तिथि कृष्णपक्ष की प्रतिपदा थी ।
युद्धारम्भ की तिथि के मास का निर्णय
वानरवीर स्वयंप्रभा के अनुग्रह से गुफा के बाहर आये और सागरतट पर बैठे हैं । उस समय कुमार अंगद ने कहा कि हम लोग आश्विन मास में सीतान्वेषण हेतु प्रस्थान किये और वह महीना बीत गया । अब क्या करें–
वयमाश्वयुजे मासि कालसंख्याव्यवस्थिता: । प्रस्थिता: सोSपि चातीत: किमत: कार्यमुत्तरम् ।।
-वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड-४३/९,
अर्थात् वे वीर समुद्रतट पर कार्तिक मास में विराजमान हैं । अब हम युद्धारम्भ की तिथि आश्विन (कुआर) माह के बाद ही किसी मास की मान सकते हैं । और “ऐसा होने पर आश्विन शुक्ल पक्ष की विजयदशमी को “रावणदहन” शास्त्रसम्मत नही हो सकता । और समग्र भारत चिरकाल से भ्रान्त हो” – यह कल्पना करना भी प्रज्ञापराध है । इसलिए हमें सूक्ष्मता से विचार करना होगा ।
महापण्डित श्रीनागेशभट्ट जी ने ब्रह्मवैवर्त का उद्धरण देते हुए लिखा है कि वनवास के १३वें वर्ष में श्रीराम के आदेश पर लक्ष्मण जी ने शूर्पणखा का नाक कान काटा । तत्पश्चात् रावण ने विन्द मुहूर्त में माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को सीताहरण किया । कहीं माघशुक्स चतुर्दशी भी पाठ मिलता है ।
सम्पाति ने सीताहरण के दशवें महीने में मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की दशमी को वानरवीरों से लंका में स्थित मैथिली का पता बतलाया है -
मार्गशुक्लदशम्यां तु वसन्तीं रावणालये । संपातिर्दशमे मासे आचख्य़ौ वानरेषु ताम् ।।
-ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रथम अंश,
और हनुमान् जी से जानकी जी ने यही बात कही है कि यह दशवां महीना चल रहा है–
“वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषो प्लवंगम।”
रावण ने जो अवधि दी है उसका दशवां महीना चल रहा है केवल २ मास ही शेष बचे हैं ।
इसलिए ब्रह्मवैवर्त का कथन वाल्मीकि रामायण से सटीक बैठ रहा है ।
एकादशी को आञ्जनेय द्वारा सागरलंघन, उसी रात्रि में सीतादर्शन तथा दिन भर द्वादशी तिथि को वृक्ष में छिपकर रहना और रात्रि को माँ जानकी से वार्तालाप हुआ । त्रयोदशी को वाटिकाविध्वंस रावण की सेना का संहार करते हुए अक्षकुमार का वध हनुमान जी ने किया । मार्गशीर्ष शुक्लचतुर्दशी को मेघनाद से युद्ध, ब्रह्मास्त्र से बँधना और लंकादहन –
ब्रह्मास्त्रेणचतुर्दश्यां बद्ध: शक्रजिता कपि: । वह्निना पुच्छयुक्तेन लङ्काया दहनं तथा ।।
पौष शुक्ल प्रतिपदा को श्रीराम ने किष्किन्धा से ससैन्य प्रस्थान किया और तृतीया तिथि तक सेना सागर तट पर पहुँच गयी–
“पौषशुक्लप्रतिपदस्तृतीया यावदम्बुधे: । उपस्थानं ससैन्यस्य राघवस्य बभूव ह ।।
अब ध्यातव्य है कि श्रीराम जब सुवेल पर्वत पर पहुँचे हैं तब रात्रि में चन्द्रमा पूर्ण था –
“ततोSस्तमगमत् सूर्य: सन्ध्यया प्रतिरञ्जित: । पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता च क्षपा समतिवर्तत ।।
-वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड-३८/१९,
अर्थात् यह पौषमास की पूर्णिमा तिथि है । इसके बाद तो माघ ही है । अत: माघ कृष्णपक्ष की प्रतिपदा ( परिवा )
को लंका में युद्ध शुरू हुआ । यह निर्णय ब्रह्मवैवर्त और वाल्मीकि रामायण की एकवाक्यता से सिद्ध हुआ । या यों कहें कि ब्रह्मवैवर्त से रामायणोक्त तिथि प्रतिपदा का निश्चय किया गया कि वह माघ की कृष्णपक्ष की प्रतिपदा
थी ।
राक्षसों की प्रबल पराजय हुई और युद्ध अब रात्रि में चल रहा है –”सम्प्रवृत्तं निशायुद्धं तदा वानररक्षसाम् ।।”युद्धकाण्ड-४४/२ , यह भीषण युद्ध लंका के बाहर काफ़ी दिनों तक चला है । राक्षसों का भीषण संहार हुआ । रात्रि में अंगद ने मेघनाद के रथ,सारथी का वध करके उसे भी मारा । वह अन्तर्धान होकर छल से श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश में बाँध देता है ।– युद्धकाण्ड-४४/३५ से ३९,
यह युद्ध कितना लम्बा चला है ? कितनी राक्षसी सेना मारी गयी है ? इसका परिचय उस समय मिलता है जब नागपाश में बँधे श्रीराम को जनकपुत्री देखकर कहती हैं कि अक्षोभ्य राक्षससैन्य रूपी सागर को पार करके ये दोनों भाई गोखुर जैसी थोड़ी सेना बचने पर मारे गये –
” तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं भ्रातरौ गोष्पदे हतौ ।–युद्धकाण्ड-४८/
यही बात मेघनादवध के पूर्व विभीषण जी वानरों से कहते हैं कि आप लोग अक्षोभ्य राक्षससैन्यसागर को पार कर लिये हो । यह गोखुर जितनी सेना बची हुई है–
कुम्भकर्ण के प्रति कहे गये रावण के वचनों से भी निश्चित होता है कि युद्ध लम्बा खिंचा है । कु्म्भकर्ण ७-८-९-१० महीने की निद्रा सुखपूर्वक लेता था-
“सुखं स्वपिति निश्चिन्त: कामोपहतचेतन: । नव सप्त दशाष्टौ च मासान् स्विपिति राक्षस: ।-१६-१७,
जब उसे जगाया गया और वह दशानन के पास पहुँचा तो रावण बोला कि तुम्हे सोये हुए बहुत दिन बीत गये-
अद्य ते सुमहान् काल: शयानस्य महाबल ।-युद्धकाण्ड-६२/१३,
यहाँ सुमहान् शब्द उसके सोये काल का विशेषण है । कुम्भकर्ण को शाप तो ६ महीने सोने का था ही–६१/२८,  और यह युद्ध के विषय में मन्त्रणा करके सोया है । तत्पश्चात् विभीषण लंका से श्रीराम की शरण में आये हैं । वह समय पौषमास की शुक्लपक्ष चतुर्थी का है–
“विभीषणश्चतुर्थ्यां वै रामेण सह संगत: .”-युद्धकाण्ड-१११/३५, तिलकटीका,
अब विचार करें कि रावण के द्वारा यहाँ कुम्भकर्ण के सोने का समय क्या बतलाया जा रहा है ? जो सुमहान् ( बहुत अधिक) है । जितने समय में लंका में युद्ध के कारण बालवृद्ध ही बचे हों । कोष ख़ाली हो गया हो, सेना का महान् संहार हुआ हो ।-
“सर्वक्षपितकोशं च स त्वमभ्युपपद्य माम् । त्रायस्वेमां पुरीं लङ्कां बालवृद्धावशेषिताम् ।।-युद्धकाण्ड-६२/१९,
हमें उसके सोने का समय एवं रावणदहन का समय भी ध्यान में रखकर विचार करना है । कालिकापुराण से रावणदहन आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को प्रमाणित है । और वह युद्ध करने अमावस्या को आया है । जिसके पहले मेघनाद मारा जा चुका है । मेघनाद के पूर्व कुम्भकर्ण का वध हुआ है ।
मेघनाद आश्विन एकादशी कृष्णपक्ष से दिन रात युद्ध करता हुआ ३अहोरात्र में मारा गया । उसकी सूचना रावण को मिली और वह पुत्रशोक में जानकी जी को मारने पहुँचा । उसे अमात्य सुपार्श्व रोककर कहता है कि आज कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी है । अमावस्या को आप सेना के साथ युद्ध के लिए निकलें –
“अभ्युत्थानं त्वमद्यैव कृष्णपक्ष चतुर्दशी । कृत्वा निर्याह्यमावास्यां विजयाय बलैर्वृत: ।।-युद्धकाण्ड-९२/६६,
एकादशी से पूर्व देवान्तक ,नरान्तक,त्रिशिरा, मकराक्ष एवं धान्यमालिनी से रावण द्वारा उत्पन्न महाबली अतिकाय जैसे योद्धा रणभूमि की भेंट चढ़ चुके हैं । अत: कुम्भकर्ण का वध आश्विन कृष्णपक्ष के आसपास ही मानना होगा । चूँकि उसे जगाया गया है । अत: हमें देखना होगा कि वह स्वयं कब सोकर उठता है ??
वह कभी ७ तो कभी ८ और कभी ९ तो कभी १० मास सोता है । अर्थात् इन चारों मासों में उसकी नींद स्वत: टूटती है । यहाँ उसे जगाया गया है । और विभीषण के लंका से आने के बाद वह पौष शुक्लपक्ष की चतुर्थी के समय सोया है । यहाँ से गणना करें तो उसके सोने का महान् काल का पता चल सकता है ।
पौषमास में शुक्लपक्ष के ११दिन और पूरा भादंव । ८ महीने ११ दिन हो गये । आठंवे मास में तो ख़ुद जागता था । अब उसे नवें या दशवें महीने में जगना है । और आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी से पहले रणभूमि में उसकी मृत्यु सुनिश्चित है । इस कृष्णपक्ष में अनुमानत: पञ्चमी के आसपास ही उसकी मृत्यु माननी पड़ेगी ; क्योंकि उसके बाद अतिकाय जैसे अन्य योद्धा भी युद्ध किये हैं ।
मेघनाद के युद्ध में आने की तिथि एकादशी है । अर्थात् भादंव के बाद मात्र १० दिन हैं । उन्हें भी जोड़ लें तो ८ महीने २१ दिन होते हैं । अर्थात् नवाँ या दशवां महीना कुम्भकर्ण की नींद का अभी पूरा नहीं हुआ । और बीच में ही उसे जगाया गया । यही उसकी निद्रा का सुमहान् ( अधिक ) काल है । जिसमें पूरे प्रधान सैनिक मारे गये और कोश रिक्त हो गया । लंका में बालवृद्ध ही बचे हैं –बालवृद्धावशेषिता ।।
इससे भी लंका में दीर्घकाल तक युद्ध हुआ – यह अनुमान लगाया जा सकता है ।
दूसरी बात की वाल्मीकि रामायण से युद्ध का प्रारम्भ माघकृष्ण की प्रतिपदा से निश्चित हो चुका है । कालिकापुराण से रावणवध का समय सुनिश्चित है । और कुम्भकर्ण के सोने का काल सुमहान् भी लिखा है । अत: ये युद्ध माघ कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से आश्विन शुक्लपक्ष की नवमी तक चला । तत्पश्चात् दशमी को रावण का विधिवत् दाहसंस्कार विभीषण ने किया । अत: दशहरा आश्विन शुक्लपक्ष की विजयदशमी को मनाया जाना शास्त्रसम्मत है ।
इस पर आक्षेप करना शास्त्रज्ञान तथा तर्कशून्यता के साथ महामूर्खता का भी द्योतक है ।
कालिकापुराण के अनुसार–
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से युद्ध करने के लिए लंकापति रावण आश्विन मास की अमावस्या को रणभूमि में आया । –वाल्मीकिरामायण–युद्धकाण्ड,92/66, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को देवराज इन्द्र ने अपने सारथि मातलि को रथ लेकर श्रीराम की सहायता हेतु भेजा । इधर अमावस्या की रात्रि को ही राघव पर अनुग्रह करने के लिए ब्रह्मा जी द्वारा प्रेषित रणचण्डी भगवती महाकाली दशरथनन्दन के समीप लंका में पहुंच गयीं । रामरावणयुद्ध प्रतिपदा से अष्टमी की रात तक निरन्तर चला । नवमी को मध्याह्न के आस पास रावण का वध हुआ –
“नवम्यां रावणं ततः । रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी”..
– कालिकापुराण,
;क्योंकि उसके वध के समय सूर्य स्थिर प्रभा वाले थे–वा0रा0108/32,
यह भीषण युद्ध प्रतिपदा से चला तो मध्य में दिन या रात कभी भी क्षणमात्र के लिए भी इसका विराम नही हुआ –
नैव रात्रिं न दिवसं न मुहूर्तं न च क्षणम् ।रामरावणयोर्युद्धं विराममुपगच्छति ।।
–वा0रा0यद्धकाण्ड–107/66
इन आठ रातों तक सभी देवों से सुपूजित होकर भगवती चण्डी लंका में ही रहीं ।–
“तावत्तु अष्टरात्राणि सर्वैर्देवैः सुपूजिता” .
दशमी को रावण का दाहसंस्कार अनुज विभीषण द्वारा किया गया । इसी उपलक्ष में हम सब आज इस पर्व को बड़े हर्षोल्लास से रावण का पुतला बनाकर उसे जलाकर मनाते हैं । अयोध्या में इस पर्व को अन्य शहरों की अपेक्षा बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । जगह -जगह रामलीला का मञ्चन यहां देखने लायक होता है ।

रविवार, 4 मार्च 2018

कवितावली 🕎🕎 लंका दहन

🌱🌱जय श्री सीताराम जी 🌱🌱
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                लंका दहन
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कोपि दसकंध तब प्रलय पयोद बोले,
रावन-रजाइ धाए आइ जूथ जोरि कै।
कह्यो लंकपति लंक बरत, बुताओ बेगि,
बानरु बहाइ मारौ महाबारि बोरि कै।।
'भलें नाथ!' नाइ माथ चले पाथप्रदनाथ,
बरषैं मुसलधार बार-बार घोरि कै।
जीवन तें जागी आगि, चपरि चौगुनी लागी,
'तुलसी' भभरि मेघ भागे मुखु मोरि कै।।

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          लंका जलती देख रावण ने क्रोधित होकर प्रलयकाल के मेघों को बुलाया और वे रावण की आज्ञा से सब अपना दल बटोरकर दौड़े आये। उनसे लंकापति ने कहा--'अरे मेघो! जलती हुई लंकापुरी को शीघ्र बुझाओ और बन्दर को बहाकर गम्भीर जल में डुबाकर मार डालो।' तब मेघों के स्वामी 'महाराज! बहुत अच्छा ' ऐसा कहकर प्रणाम करके चल दिए और बार-बार गरज-गरजकर  मूसलाधार पानी बरसाने लगे; किन्तु जल से अग्नि और भी प्रज्वलित हो गई और चपलतापूर्वक चौगुनी बढ़ गई । तुलसीदास जी कहते हैं--- तब सब मेघ घवड़ाकर मुँह मोड़कर भागे।

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इहाँ ज्वाल जरे जात, उहाँ ग्लानि गरे गात।
सूखे सकुचात सब कहत पुकार हैं।
'जुग षट भानु देखे प्रलयकृषानु देखे,
सेष-मुख-अनल बिलोके बार-बार हैं।।
'तुलसी' सुन्यो न कान सलिलु सर्पी-समान,
अति अचिरिजु कियो केसरीकुमार है '।
बारिद-बचन सुनि धुने सीस सचिवन्ह,
कहैं दससीस! 'ईस- बामता-विकार हैं।।

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          बादल इधर तो अग्नि की लपटों से जले जाते हैं और उधर उनके शरीर ग्लानि से गले जाते हैं। सब मेघ शुष्क हो सकुचाकर पुकारने लगे---'हम लोगों ने बारहों सूर्य देखे, प्रलय का अग्नि देखा और कई बार शेष जी के मुख की ज्वाला देखी। परंतु कभी जल को घृत के समान हुए नहीं सुना। यह महान आश्चर्य केसरीनन्दन हनुमान जी ने कर दिखलाया ।'
         मेघों के वचन सुनकर मन्त्रीगण सिर धुनने लगे और रावण से बोले--- 'यह सब ईश्वर की प्रतिकूलता का विकार है'।।

                  (कवितावली)
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