रविवार, 19 मार्च 2017

💠💠राम द्वारा कौवे को वरदान💠💠

曆曆जय श्री सीताराम जी 曆曆
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राम द्वारा कौवे को वरदान



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          राम ने कौए से कहा --'तू अपने नेत्र के अतिरिक्त और जो कुछ भी वर माँगना चाहे माँग ले।' तब इस प्रकार राम की बात सुनकर वह कौआ बोला-- हे राम ! मुझ पर इसी प्रकार आपकी सर्वदा कृपा बनी रहे । मैं इस लोक  में सुखद और वरदानों को लेकर क्या करूँगा?
         तब कौए की इस बात को सुनकर रामचंद्र जी ने कहा -- किसी भी द्वीपान्तर में होने वाली भूत-भविष्य तथा वर्तमान की सब बातें तेरी आँखों के समक्ष विद्यमान रहेंगी। मेरे वरदान से तुझे सब कुछ ज्ञात होगा । यात्रा में मनुष्य सर्वदा तुम्हारा शकुन देखेंगे । तू जब तक बैठा रहेगा, तब तक दक्ष पथिक का कार्य स्थिर होगा।तू चलता रहेगा तो उसका कार्य शीघ्र पूर्ण होगा। इसी प्रकार से लोग तेरा शकुन देखेंगे । ग्राम प्रवेश में अथवा ग्रह प्रवेश के समय तुम जिसकी दाहिनी ओर से निकल जाओगे, उसके लिए वह मंगलकारक शकुन होगा।प्रेत के दशाह पिंड का जब तक तू स्पर्श न करेगा, तब तक उस प्रेत की सद्गति कदापि न होगी और उसके घर वाले भी  यही समझेंगे कि अभी प्रेत की इच्छा पूर्ण नहीं हुई है । तुम जिन- जिन पकवानों एवं उन दी हुई वस्तुओं को स्पर्श नहीं करोगे, प्रेत के वंशज यही समझेंगे कि, यह कृत्य अभी पूरा नहीं हुआ है, अतः जब वह तुमसे पूरा करा लेगा, तभी उस प्रेत को सद्गति प्राप्त होगी और तुम भी उसके दशाह पिण्ड को तभी स्पर्श करना जब वह सर्वांग पूर्ण हो।
         दूसरा वरदान यह कि जो लेखक लिखते समय भूल जावेंगे, वहाँ पर वे तुम्हारे पैर का चिन्ह बना देंगे।तब पुस्तक में तुम्हारे पैर का चिन्ह देखकर लोग समझ जायेंगे कि यहाँ भी कुछ भ्रम है ।
          इस प्रकार उस कौवे को वरदान देकर रामचंद्र जी मौन हो गये ।कौआ भी भगवान को प्रणाम कर वहाँ से उड़ गया।इस प्रकार भगवान अनेकानेक चरित्र किया करते थे।
डा.अजय दीक्षित 
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                       एक दिन जब श्री  रामचंद्र जी बहुत से मनुष्यों से घिरे अपनी सभा में बैठे थे, तब अंगूर की लताओं में बैठे हुए एक कौए पर उनकी दृष्टि पड़ी जो एक ही नेत्र से दोनों नेत्रों का काम ले रहा था ।वह अपनी आकृति से बड़ा दीन, उग्रदृष्टि, उच्च स्वर वाला और बड़ा ही चंचल ज्ञात हो रहा था ।रामचंद्र जी ने देखा कि वह बारम्बार मेरी ओर देखता हुआ काँव-काँव कर रहा है।यह देख उनके हृदय में दया आई और वे अपने पूर्व क्रोध का स्मरण करते हुए बोले -- आ, यहाँ मेरे पास आ।यह सुनकर कौआ उस अंगूर की लता से उड़कर राम के आगे जा बैठा और राम को देखकर जोर-जोर से बोलने लगा।

💠💠निर्बल भी बलवान को मार सकता है 💠💠

जय श्री सीताराम जी
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   डा.अजय दीक्षित                 
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जौं रघुवीर होति सुधि पाई।
करते नहिं बिलंबु रघुराई ।।
राम बान रबि उएँ जानकी ।
तम बरूथ कहँ जातुधान की।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई।
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुवीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना।
जातुधान अति भट बलवाना।।
मोरें  हृदय   परम  संदेहा ।
सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा।
समर भयंकर अतिबल वीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
सुनु माता साखामृग
          नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि
          खाइ परम लघु ब्याल।।
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☀☀☀☀हनुमानजी ने कहा -- माता  ! श्री रामचंद्र जी ने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते।यहाँ पर तर्क यह है कि क्या सचमुच में राम जी को खबर नहीं थी? नहीं, ऐसा नहीं है, उन्हें अच्छी तरह से ज्ञात था कि सीता जी को कौन हर कर ले गया है ।इस बात की सूचना तो गीधराज जटायु ने मरने से पहले दी थी और सुग्रीव ने भी कहा था कि रावण किसी स्त्री का हरण करके ले गया है, फिर सीता जी के आभूषणों को देखकर यह बात निश्चित हो गयी थी कि रावण ही सीता जी को हर कर ले गया है ।फिर वानरों को चारों दिशाओं में भेजने का कोई औचित्य भी नहीं था ।
           इसका एक ही कारण है कि सीता जी ने भक्त का अपराध किया था और राम जी ने यह प्रदर्शित कर दिया कि मैं अपने प्रति किए अपराध को तो ध्यान नहीं देता; किन्तु यदि कोई मेरे भक्त का अपराध करता है तो उसे अवश्य दण्ड भुगतना पड़ता है,  चाहे वह मेरी पत्नी ही क्यों न हो ।
जो अपराध भगत कर करई।
राम रोष पावक सो जरई।।
जो भक्त का अपराध करता है, उसे राम जी के क्रोधरूपी अग्नि में जलना पड़ता है ।इसलिए हमलोगों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भक्त का हमसे कहीं अपमान न होने पाये।
           हिरण का पीछा करते हुए राम जी जब दूर चले गये थे, तब 'हा लक्ष्मण ' की आवाज सुनकर सीता जी ने लक्ष्मण को जाने का आदेश दिया था, परंतु जब लक्ष्मण जी ने कहा कि भगवान पर कोई संकट आ ही नहीं सकता ।तब सीता जी ने लक्ष्मण का अपमान किया था ।वाल्मीकि रामायण में तो यहाँ तक सीता जी ने कह दिया कि मैं तुम्हारे हृदय की बात जानती हूँ, परंतु तुम्हारी इच्छा कभी पूरी नहीं होगी। मैं प्राण त्याग दूँगी; परंतु  तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं होने दूंगी।इसी अपराध के कारण भगवान ने जानते हुए भी सीता जी को खोजने का गंभीर प्रयास नहीं किया था ।जब हनुमानजी ने आकर कहा था कि माता ने लक्ष्मण सहित आपके चरणों में प्रणाम किया है, तब राम जी ने कहा कि हाँ अब उनका दोष समाप्त हो गया और तभी वे तुरंत सेना लेकर चल दिए थे ।
          हनुमान जी ने कहा कि हे जानकी जी!  रामबाण रूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेना रूपी अंधकार कहाँ रह सकता है? हे माता !  मैं आपको अभी यहाँ से लिवा जाऊँ, परंतु श्री रामचंद्र जी की शपथ है, मुझे उनकी ऐसी आज्ञा नहीं है ।अतः हे माता !  कुछ दिन और धीरज रखो।श्री राम जी वानरों सहित यहाँ आवेंगे और राक्षसों को मारकर आपको ले जायँगे ।नारद आदि ऋषि तीनों लोकों में उनका यश गायेंगे।
           सीता जी ने पूछा -- हे पुत्र! क्या सब वानर तुम्हारे इतने ही छोटे छोटे हैं । हनुमानजी ने कहा -- माता, मैं  तो बड़ा हूँ ।मुझसे तो और बहुत छोटे हैं । सीता जी ने सोचा,  तब तो हो गया मेरा उद्धार।
           हनुमान जी ने कहा -- माता, कोई संदेह है क्या?  सीता जी ने कहा -- संदेह?  मुझे तो बहुत बड़ा भारी  संदेह है ।यह सुनकर हनुमानजी ने अपना शरीर प्रकट किया । सोने के पर्वत के आकार का अत्यंत विशाल शरीर, युद्ध में शत्रुओं के  हृदय में भय उत्पन्न करने वाला।
          तब सीता जी के मन में विश्वास हुआ ।इसके बाद हनुमानजी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ।उन्होंने कहा -- हे माता !  सुनो,  वानरों में  बहुत बल- बुद्धि नहीं होती।परंतु प्रभु का प्रताप ऐसा है कि उनके  प्रताप से छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है, अर्थात अत्यंत निर्वल भी बलवान को मार सकता है ।
डा.अजय दीक्षित 
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भगवान शिव का अघोर रुप तथा रहस्यमयी प्रश्नों के उत्तर

भगवान शिव का अघोर रुप तथा रहस्यमयी प्रश्नों के उत्तर :***        



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-----शिव का अघोर रूप --------
एक बार पार्वती ने स्वपन देखा मैं अपने पती का श्रंगार
अस्थियों से कर रही हूँ।स्वप्न टूटा और प्रात: हुई ।माता ने स्कंद से कहा -- बेटा आज मै तुम्हारे पिता का अस्थियों से श्रंगार करूँगी,इसलिए तुम्हें पाँच पक्षियों
की अस्थियाँ लानी हैं ।स्कंद गये और पाँच पक्षियों की 
अस्थियाँ लेकर आये ।माता पार्वती ने विश्वकर्मा को याद किया ।विश्वकर्मा आये आैर उन अस्थियों से निर्माण कार्य प्रारम्भ किया। मोर कीहडडी से त्रिशूल,बाज की हडडी से कँडा, कबूतर की हडडी से भाला, कागा की हडडी से डमरू बनाया ।
कुन्डल बनाने के लिये जब हंस की हडडी मोडी तो
उसमें से दो बूँद जल धरती पे गिरे ।जिससे श्वेतार्क,तथा
पारिजात के दो बृक्षों की उत्पत्ति हो गई।भगवान शिव ने उन्हें अपना पुत्र माना ।इस तरह पार्वती ने शिव का श्रंगार किया।
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----------ऊँ पशुपतये नम: --------
रहस्यमयी प्रश्नों के उत्तर -----
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डा.अजय दीक्षित
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--प्रश्न-- १-- शिव जी के धनुष का क्या नाम था?

" पिनाक "
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प्रश्न-- २-- शिव धनुष को किसने बनाया था?

" स्वयं शिव जी ने "
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प्रश्न-- ३-- क्या शिव जीके पास "चक्र"था,चक्रकानाम क्या था?

शिव के चक्र का नाम " भवरेंदु" था ।
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विष्णु जी के चक्र का नाम " कांता"(सुदर्शन) था ।
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दुर्गाजी के चक्र का नाम " मृत्यु मंजरी " था 🔲🔲🔲🔲🔲🔲🔲🔲🔲🔲🔲🔲🔲

प्रश्न--४ -- कृष्ण जी को सुदर्शन चक्र कहाँ से मिला ?

शिवजी ने विष्णुजी को दिया, विष्णुजी ने पार्वती माता को दिया, माताजी ने परसुराम जी को दिया, परसुराम जी ने श्री कृष्णजी को दिया ।
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प्रश्न-- ५-- गुरू शिष्य परम्परा किसने चलाई ?

" भगवान शिव ने"
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प्रश्न-- ६-- शिवजी के प्रथम शिष्य कौन थे ?

शिवजी के प्रथम शिष्य " सप्तरिषी " थे ।
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प्रश्न-- ७-- शिवजी के प्रमुख गण कौन थे ?

भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, भृगिरिटी, शैल गोकर्ण, घंटाकर्ण आदि
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                  डा.अजय दीक्षित
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शनिवार, 18 मार्च 2017

💠💠💠 कथा दिति, अदिति और कश्यप ऋषि की 💠💠💠

कथा दिति, अदिति और कश्यप ऋषि की
                               
पूर्व जन्म में देवकी द्वारा किये गये कर्म ही देवकी के दु:खों का कारण:- दक्ष प्रजापति की दिति और अदिति नाम की दो सुन्दर कन्याओं का विवाह कश्यप मुनि के साथ हुआ। अदिति के अत्यन्त तेजस्वी पुत्र इन्द्र हुए। भगवान विष्णु ने इन्द्र का पक्ष लेकर दिति के दोनों पुत्रों हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष को मार डाला। तब दिति ने सोचा–मैं कोई ऐसा उपाय करूंगी जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो इन्द्र को मार डाले। भगवान की कैसी माया है, लोग अपने को और अपने आत्मीय को तो बचाना चाहते हैं, लेकिन दूसरों से द्रोह करते हैं। यह द्रोह नरक में ले जाने का रास्ता है।

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तब इन्द्र जैसे ओजस्वी पुत्र के लिए दिति के मन में इच्छा जाग्रत हुई। अत: वह अपने पति कश्यपजी को प्रसन्न करने के लिए उनकी सेवा करने लगी। दिति ने अपने मन का संयम कर प्रेम, विवेक, मधुर भाषण, मुस्कान व चितवन से कश्यपजी के मन को जीत लिया। वे दिति की सेवाओं से मुग्ध होकर जड़ हो गये। उन्होंने दिति से कहा–’अब तुम जो चाहो हम करने को तैयार हैं।’ दिति ने देखा कि ये वचनबद्ध हो गये हैं, तो उसने कश्यपजी से प्रार्थना की कि मुझे बलशाली एवं परम शक्तिसम्पन्न पुत्र देने की कृपा करें, जो इन्द्र को मार दे। यह सुनकर कश्यपजी को बहुत दु:ख हुआ क्योंकि इन्द्र अदिति के गर्भ से कश्यपजी के बेटे हैं। उन्होंने सोचा कि माया ने मुझे पकड़ लिया। संसार में लोग स्वार्थ के लिए पति-पुत्रादि का भी नाश कर देते हैं। अब क्या हो? मैंने जो वचन दिया है, न तो वह व्यर्थ होना चाहिए और न इन्द्र का अनिष्ट होना चाहिए।
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इस प्रकार सोच-विचार करके कश्यप मुनि ने दिति को एक वर्ष का ‘पुंसवन व्रत’ धारण करने के लिए कहा। कश्यपजी ने कहा कि यदि तुम एक वर्ष तक व्रत का पालन करोगी तो तुम्हारे जो बेटा होगा वह इन्द्र को मारने वाला होगा लेकिन यदि व्रत में कोई त्रुटि हो जायेगी तो वह इन्द्र का मित्र हो जायेगा। कश्यप मुनि ने व्रत के लिए दिति को इन नियमों का पालन करने के लिए कहा–

इस व्रत में किसी भी प्राणी को मन, वचन या कर्म के द्वारा सताये नहीं। किसी को शाप या गाली न दे, झूठ न बोले, शरीर के नख व बाल न काटे, किसी भी अशुभ वस्तु का स्पर्श न करे, क्रोध न करे, बिना धुला वस्त्र न पहने और किसी की पहनी हुई माला न पहने। जूठा न खाय, मांसयुक्त अन्न का भोजन न करे, शूद्र का और रजस्वला स्त्री का अन्न भी न खाये, जूठे मुँह, संध्या के समय, बाल खोले हुये घर से बाहर न जाये, सुबह शाम सोना नहीं चाहिए। इस प्रकार इन निषिद्ध कर्मों का त्याग कर सदैव पवित्र और सौभाग्य के चिह्नों से सुसज्जित रहे। प्रात: गाय, ब्राह्मण, लक्ष्मीजी और भगवान नारायण की पूजा करके ही कलेवा करे। सुहागिन स्रियों व पति की सेवा में संलग्न रहे। और यही भावना करती रहे कि पति का तेज मेरी कोख में है।💠💠
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अपने पति की बात मानकर दिति उनके ओज से सुन्दर गर्भ धारणकर पुंसवन व्रत का पालन करने लगी। वह भूमि पर सोती थी और पवित्रता का सदा ध्यान रखती थी। इस प्रकार जब उसका तेजस्वी गर्भकाल पूर्ण होने को आया तो दिति के अत्यन्त दीप्तिमान अंगों को देखकर अदिति को बड़ा दु:ख हुआ। उसने अपने मन में सोचा कि यदि दिति के गर्भ से इन्द्र के समान महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तो निश्चय ही मेरा पुत्र निस्तेज हो जायेगा।

इस प्रकार चिन्ताग्रस्त अदिति ने अपने पुत्र इन्द्र से कहा–इस समय दिति के गर्भ में तुम्हारा शत्रु पल रहा है। अत: ऐसा कोई प्रयत्न करो कि गर्भस्थ शिशु नष्ट हो जाये। दिति का वह गर्भ मेरे हृदय में लोहे की कील के समान चुभ रहा है। अत: जिस किसी भी उपाय से तुम उसे नष्ट कर दो।
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जब शत्रु बढ़ जाता है तब राजयक्ष्मा रोग की भाँति वह नष्ट नहीं हो पाता है। इसलिए बुद्धिमान मनुष्य का कर्तव्य है कि वह ऐसे शत्रु को अंकुरित होते ही नष्ट कर डाले।’

चतुर राजनीतिज्ञ वही है जिसे शत्रु के घर की एक-एक बात का पता हो। इन्द्र कोई साधारण राजनीतिज्ञ नहीं हैं। अपनी माता की बात मानकर इन्द्र मन-ही-मन उपाय सोचकर अपनी सौतेली माता के पास गये। उस पापबुद्धि इन्द्र ने ऊपर से मधुर किन्तु भीतर से विषभरी वाणी में विनम्रतापूर्वक दिति से कहा–’हे माता ! व्रत के कारण आप अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं अत: मैं आपकी सेवा करने के लिए आया हूँ।’ जिस प्रकार बहेलिया हिरन को मारने के लिए हिरन की सी सूरत बनाकर उसके पास जाता है, वैसे ही देवराज इन्द्र भी कपट-वेष धारण करके व्रतपरायणा दिति के व्रत-पालन की त्रुटि पकड़ने के लिए उसकी सेवा करने लगे।
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एक दिन व्रत के नियमों का पालन करते-करते बहुत दुर्बल हो गयी दिति से इन्द्र ने कहा–माता मैं आपके चरण दबाऊँगा; क्योंकि बड़ों की सेवा से मनुष्य अक्षय गति प्राप्त कर लेता है। ऐसा कहकर इन्द्र उनके दोनों चरण पकड़कर दबाने लगे।

चरण दबने से दिति को बहुत सुख हुआ और उसे नींद आने लगी। उस दिन वह पैर धोना भूल गयी और बाल खोले ही सो गयी।

दिति को नींद के वशीभूत देखकर इन्द्र योगबल से अत्यन्त सूक्ष्म रूप बनाकर हाथ में शस्त्र लेकर बड़ी सावधानी से दिति के उदर में प्रवेश कर गये और वज्र से उस गर्भस्थ बालक के सात टुकड़े कर डाले। तब वे सातों टुकड़े सूर्य के समान तेजस्वी सात कुमारों के रूप में परिणत हो गये।

वज्र के आघात से गर्भस्थ शिशु रोने लगे। तब दानवशत्रु इन्द्र ने उससे ‘मा रुद’ ‘मत रोओ’ कहा। फिर इन्द्र ने उन सातों टुकड़ों के सात-सात टुकड़े और कर दिये। इस प्रकार उनचास (49) कुमारों के रूप में होकर वे जोर-जोर से रोने लगे। तब उन सबों ने हाथ जोड़कर इन्द्र से कहा–’देवराज ! तुम हमें क्यों मार रहे हो? हम तो तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं।’ इन्द्र ने मन-ही-मन सोचा कि निश्चय ही यह सौतेली माँ दिति के व्रत का परिणाम है कि वज्र से मारे जाने पर भी इनका विनाश नहीं हुआ। ये एक से अनेक हो गये, फिर भी उदर की रक्षा हो रही है। इसमें सन्देह नहीं कि ये अवध्य हैं, इसलिए ये देवता हो जायँ। जब ये रो रहे थे, उस समय मैंने इन गर्भ के बालकों को ‘मा रुद’ कह कर चुप कराया था, इसलिए ये मरुद्गण नाम से प्रसिद्ध होंगे। इन्द्र ने सौतेली माता के पुत्रों के साथ शत्रुभाव न रखकर उन्हें सोमपायी (सोमरस का पान करने वाले) देवता बना लिया।

छली इन्द्र द्वारा अपने गर्भ को विकृत किया जानकर दिति जाग गयी और दु:खी होकर क्रोध करने लगी। यह सब मेरी बहन अदिति द्वारा कराया गया है–ऐसा जानकर दिति ने कुपित होकर अदिति और इन्द्र दोनों को शाप दे दिया कि इन्द्र ने छलपूर्वक मेरा गर्भ छिन्न-भिन्न कर डाला है, उसका त्रिभुवन का राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाय। जिस प्रकार पापिनी अदिति ने गुप्त पाप के द्वारा मेरे गर्भ को नष्ट करवा डाला है, उसी प्रकार उसके पुत्र भी क्रमश: उत्पन्न होते ही नष्ट हो जायेंगे और वह पुत्र-शोक से अत्यन्त चिन्तित होकर कारावास में रहेगी।

तब कश्यपजी ने दिति को शांत करते हुए कहा–देवी ! तुम क्रोध मत करो। तुम्हारे ये उनचास पुत्र मरुद् देवता होंगे, जो इन्द्र के मित्र बनेंगे। तुम्हारा शाप अट्ठाईसवें द्वापरयुग में सफल होगा। वरुणदेव ने भी उसे शाप दिया है। इन दोनों शापों के संयोग से यह अदिति मनुष्य योनि में जन्म लेकर देवकी के रूप में उत्पन्न होगी और अपने किये कर्म का फल भोगेगी।
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                         डा.अजय दीक्षित
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शुक्रवार, 17 मार्च 2017

जब सती के भयंकर रूप से डर कर भागना पड़ा भगवान शिव को ।🔘🔘🔘🔘🔘🔘🔘🔘🔘🔘🔘🔘

                         ।।राम।।
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डा.अजय दीक्षित
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जब सती के भयंकर रूप से डर कर भागना पड़ा भगवान शिव को ।
           

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देवी पुराण के अनुसार जब सती के पिता दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया तो उसमें अपनी पुत्री सती और दामाद भगवान शिव को निमंत्रित नहीं किया। यज्ञ के बारे में जान कर सती बिना निमंत्रण ही पिता के यज्ञ में जाने की जिद करने लगी।
तब भगवान महादेव ने सती से कहा कि- किसी भी शुभ कार्य में बिना बुलाए जाना और मृत्यु- ये दोनों ही एक समान है। मेरा अपमान करने की इच्छा से ही तुम्हारे पिता ये महायज्ञ कर रहे हैं। यदि ससुराल में अपमान होता है तो वहां जाना मृत्यु से भी बढ़कर होता है।
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देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव की ये बात सुनकर देवी सती बोलीं- महादेव। आप वहां जाएं या नहीं। लेकिन मैं वहां अवश्य जाऊंगी। पिता के घर में महायज्ञ के महोत्सव का समाचार सुनकर कोई कन्या धैर्य रखकर अपने घर में कैसे रह सकती है।
देवी सती के ऐसा कहने पर शिवजी ने कहा- मेरे रोकने पर भी तुम मेरी बात नहीं सुन रही हो। दुर्बुद्धि व्यक्ति स्वयं गलत कार्य कर दूसरे पर दोष लगाता है। अब मैंने जान लिया है कि तुम मेरे कहने में नहीं रह गई हो। अत: अपनी रूचि के अनुसार तुम कुछ भी करो, मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा क्यों कर रही ।
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जब महादेव ने यह बात कही तो सती क्षणभर के लिए सोचने लगीं कि इन शंकर ने पहले तो मुझे पत्नी रूप में प्राप्त करने के लिए प्रार्थना की थी और अब ये मेरा अपमान कर रहे हैं, इसलिए अब मैं इन्हें अपना प्रभाव दिखाती हूं। यह सोचकर देवी सती ने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया।
क्रोध से फड़कते हुए ओठों वाली तथा कालाग्नि के समान नेत्रों वाली उन भगवती सती को देखकर महादेव ने अपने नेत्र बंद कर लिए। भयानक दाढ़ों से युक्त मुखवाली भगवती ने अचानक उस समय अट्टाहस किया, जिसे सुनकर महादेव भयभीत हो गए। बड़ी कठिनाई से आंखों को खोलकर उन्होंने भगवती के इस भयानक रूप को देखा।
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देवी भगवती के इस भयंकर रूप को देखकर भगवान शिव भय के मारे इधर-उधर भागने लगे। शिव को दौड़ते हुए देखकर देवी सती ने कहा-डरो मत-डरो मत। इस शब्द को सुनकर शिव अत्यधिक डर के मारे वहां एक क्षण भी नहीं रूके और बहुत तेजी से भागने लगे।
इस प्रकार अपने स्वामी को भयभीत देख देवी भगवती अपने दस श्रेष्ठ रूप धारण कर सभी दिशाओं में स्थित हो गईं। महादेव जिस ओर भी भागते उस दिशा में वे भयंकर रूप वाली भगवती को ही देखते थे। तब भगवान शिव ने अपनी आंखें बंद कर ली और वहीं ठहर गए।
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जब भगवान शिव ने अपनी आंखें खोली तो उन्होंने अपने सामने भगवती काली को देखा। तब उन्होंने कहा- श्यामवर्ण वाली आप कौन हैं और मेरी प्राणप्रिया सती कहां चली गईं। तब देवी काली बोली- क्या अपने सामने स्थित मुझ सती को आप नहीं देख रहे हैं। ये जो अलग-अलग दिशाओं में स्थित हैं ये मेरे ही रूप हैं। इनके नाम काली, तारा, लोकेशी, कमला, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, षोडशी, त्रिपुरसुंदरी, बगलामुखी, धूमावती और मातंगी हैं।
देवी सती के ये वचन सुनकर शिवजी बोले- मैं आपको पूर्णा तथा पराप्रकृति के रूप में जान गया हूं। अत: अज्ञानवश आपको न जानते हुए मैंने जो कुछ कहा है, उसे क्षमा करें। ऐसा कहने पर देवी सती का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने महादेव से कहा कि- यदि मेरे पिता दक्ष के यज्ञ में आपका अपमान हुआ तो मैं उस यज्ञ को पूर्ण नहीं होने दूंगी। ऐसा कहकर देवी सती अपने पिता के यज्ञ में चली गईं।
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                      डा.अजय दीक्षित
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DrAjaiDixit@gmail.Com
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गुरुवार, 16 मार्च 2017

अदभुत रहस्य -> श्रीविष्णु जी का सुदर्शन चक्र

अदभुतरहस्य->श्रीविष्णुजी कासुदर्शन चक्र
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डा.अजय दीक्षित
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१--कहाँ से आया सुदर्शन चक्र ?
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२--किसने बनाया सुदरशन चक्र ?
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३-- कैसे मिला श्री विष्णु जी को ?
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पौराणिक शास्त्रों के अनुसार श्रीदामा नाम का एक क्रूर असुर था जो देवताओं को परेशान किया करता था वो बचपन से ही दैत्येगुरु शुक्राचार्य का शिष्य था। गुरु कृपा से उसको दिव्य शक्तियां और वज्र के समान शरीर प्राप्त था, उसने अपने बल और पराक्रम से देवताओ से स्वर्ग छीन लिया और उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया, समस्त देवता दुखी हो ब्रह्म देव की शरण में पहुंचे। ब्रह्म देव उन्हें साथ लेकर नारायण के समक्ष पहुंचे।
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नारायण ने सबसे बैकुंठ में आने का कारण पूछा तब ब्रह्माजी ने उन्हें श्रीदामा असुर के विषय में सब बताया ये सुनकर विष्णु बोले,” हे देवो! तुम चिंता मत करो शीघ्र ही श्रीदामा का अंत निकट है जल्द ही उसके अत्याचारों से आपको मुक्ति मिलेगी।”
श्री विष्णु ने ये कहकर देवो को विदा किया। जब श्रीदामा को ये पता चला कि देवगण विष्णु से सहायता मांगने गए थे तो वो बड़ा क्रोधित हुआ उसने नारायण का श्रीवत्स चुराने की योजना बनाई।
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जब श्री विष्णु को ये पता लगा कि श्रीदामा उनका श्री वत्स चुराने की योजना बना रहा है तो श्री विष्णु ने श्रीदामा को युद्ध के लिए ललकारा तब श्रीदामा और विष्णु जी में घोर युद्ध हुआ। श्री विष्णु ने श्रीदामा पर दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया लेकिन वो सब भी निष्फल रहे। विष्णु यह समझ गए थे की शुक्राचार्य की कृपा से श्रीदामा का शरीर वज्र समान हो गया है।
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अतः श्रीदामा को किसी भी अस्त्र या शस्त्र से मारा नहीं जा सकता। इस युद्ध में श्रीदामा का पलड़ा भारी पड़ा। भगवान विष्णु को युद्ध छोड़कर जाना पड़ा और श्रीदामा ने विष्णु पत्नी महालक्ष्मी का हरण कर लिया।
महालक्ष्मी के कारण चिंतित विष्णु ने कैलाश पहुंचकर वहां “हरिश्वरलिंग” की स्थापना की। नारायण ने बद्री क्षेत्र पहुंचकर वहां से 1000 ब्रह्मकमल लिए तथा शिव पूजन करना शुरू किया। नारायण हर एक ब्रह्मकमल को शिव जी का एक नाम लेकर चढ़ाते थे। इस तरह नारायण ने 999 ब्रह्मकमलो से शिव पूजन किया और शिव नाम जपकर “शिवसहस्त्रनाम स्तोत्र” की रचना कर दी।
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जब विष्णु जी आखरी ब्रह्मकमल चढाने लगे तो उन्होंने देखा कि एक ब्रह्मकमल कहीं लुप्त हो गया है। विष्णु पूजन छोड़ ब्रह्मकमल लेने नहीं जा सकते थे। तब श्री विष्णु को याद आया कि देवगण उन्हें कमलनयन कहकर पुकारते हैं। विष्णु ने अपना दाहिना नेत्र निकालकर हरिश्वरलिंग पर अर्पण किया। परमेश्वर शिव तत्काल ही वहां प्रकट हो गए।
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परमेश्वर शिव ने भगवन विष्णु से प्रसन्न होकर इच्छित वर मांगने को कहा। शिव जी के ये वचन सुन विष्णु बोले कि श्रीदामा के आतंक से सारा जगत आतंकित है देवता स्वर्ग से निकाल दिए गए है तथा श्रीदामा ने लक्ष्मी का भी अपहरण कर लिया है।
श्रीदामा के गुरु व शिवभक्त शुक्राचार्य की कृपा से अभय बना हुआ है उसके वज्र के समान शरीर पर किसी भी अस्त्र या शस्त्र का प्रभाव नहीं पड़ता। अतः आप मुझे वो दिव्यास्त्र प्रदान करें जिससे अपने महाशक्तिशाली असुर जालंधर का वध किया था।
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तभी शिव की दाहिनी भुजा से महातेजस्वी सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ।
उन्होंने सुदर्शन चक्र को देते हुए भगवान विष्णु से कहा- "देवेश! यह सुदर्शन नाम का श्रेष्ठ आयुध बारह अरों, छह नाभियों एवं दो युगों से युक्त, तीव्र गतिशील और समस्त आयुधों का नाश करने वाला है।
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सज्जनों की रक्षा करने के लिए इसके अरों में देवता, राशियाँ, ऋतुएँ, अग्नि, सोम, मित्र,वरुण, शचीपति इन्द्र, विश्वेदेव, प्रजापति, हनुमान, धन्वन्तरि, तप तथा चैत्र से लेकर फाल्गुन तक के बारह महीने प्रतिष्ठित हैं। आप इसे लेकर निर्भीक होकर शत्रुओं का संहार करें।
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भगवान शिव ने कहा कि यह अमोघ है, इसका प्रहार कभी खाली नहीं जाता।
भगवान विष्णु ने कहा कि प्रभु यह अमोघ है इसे परखने के लिए मैं सबसे पहले इसका प्रहार आप पर ही करना चाहता हूं।
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भगवान शिव ने कहा अगर आप यह चाहते हैं तो प्रहार करके देख लीजिए। सुदर्शन चक्र के प्रहार से भगवान शिव के तीन खंड हो गए। इसके बाद भगवान विष्णु को अपने किए पर प्रयश्चित होने लगा और शिव की आराधना करने लगे।
भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि सुदर्शन चक्र के प्रहार से मेरा प्राकृत विकार ही कटा है। मैं और मेरा स्वभाव क्षत नहीं हुआ है यह तो अच्छेद्य और अदाह्य है।
भगवान शिव विष्णु से कहा कि आप निराश न होइये। मेरे शरीर के जो तीन खंड हुए हैं अब वह हिरण्याक्ष, सुवर्णाक्ष और विरूपाक्ष महादेव के नाम से जाना जाएगा। भगवान शिव अब इन तीन रुपों में भी पूजे जाते हैं।
इसके बाद भगवान विष्णु ने श्रीदामा से युद्ध किया और सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। इसके बाद से सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु के साथ सदैव रहने लगा।
डा.अजय दीक्षित
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DrAjaiDixit@gmail.Com

12 ज्योतिर्लिंग + सप्तपुरी + चार धाम + 51शक्ति पीठ

12 ज्योतिर्लिंग + सप्तपुरी + चार धाम + 51शक्ति पीठ 
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धरती पर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग माने गए हैं। हिंदू धार्मिक पुराणों के अनुसार इन्हीं 12 जगहों पर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए।
1. सोमनाथ
यह शिवलिंग गुजरात के सौराष्ट्र में स्थापित है।
2. श्री शैल मल्लिकार्जुन
मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग।
3. महाकाल
उज्जैन में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, जहां शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था।
4. ओंकारेश्वर ममलेश्वर
मध्यप्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदान देने यहां प्रकट हुए थे शिवजी। जहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया।
5. नागेश्वर
गुजरात के दारूका वन के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।
6. बैद्यनाथ
झारखंड के देवघर में बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग।
7. भीमशंकर
महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग।
8. त्र्यंम्बकेश्वर
नासिक (महाराष्ट्र) से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग।
9. घुष्मेश्वर
महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग।
10. केदारनाथ
हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग। उत्तराखंड में स्थित है।
11. विश्वनाथ
बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग।
12. रामेश्वरम्
त्रिचनापल्ली (मद्रास) समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग।
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7 सप्तपुरी :
सनातन धर्म मे सात नगरों को बहुत पवित्र मानता है जिन्हें सप्तपुरी कहा जाता है।
1. अयोध्या,
2. मथुरा,
3. हरिद्वार,
4. काशी,
5. कांची,
6. उज्जैन
7. द्वारका
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चारधाम
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चारधाम की स्थापना आद्य शंकराचार्य ने की। उद्देश्य था उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चार दिशाओं में स्थित इन धामों की यात्रा कर मनुष्य भारत की सांस्कृतिक विरासत को जाने-समझें।
1. बदरीनाथ धाम
कहां है- उत्तर दिशा में हिमालय पर अलकनंदा नदी के पास
प्रतिमा- विष्णु की शालिग्राम शिला से बनी चतुर्भुज मूर्ति। इसके आसपास बाईं ओर उद्धवजी तथा दाईं ओर कुबेर की प्रतिमा।
2. द्वारका धाम
कहां है- पश्चिम दिशा में गुजरात के जामनगर के पास समुद्र तट पर।
प्रतिमा- भगवान श्रीकृष्ण।
3. रामेश्वरम
कहां है- दक्षिण दिशा में तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में समुद्र के बीच रामेश्वर द्वीप।
प्रतिमा- शिवलिंग
4. जगन्नाथपुरी
कहां है- पूर्व दिशा में उड़ीसा राज्य के पुरी में।
प्रतिमा- विष्णु की नीलमाधव प्रतिमा जो जगन्नाथ कहलाती है। सुभद्रा और बलभद्र की प्रतिमाएं भी।
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51 शक्तिपीठ :
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ये देश भर में स्थित देवी के वो मंदिर है जहाँ देवी के शरीर क़े अंग या आभूषण गीरे थे। सबसे ज्यादा शक्ति पीठ बंगाल में है। शक्तिपीठों के बारे में सम्पूर्ण जानकारी आप हमारे पिछले लेख 51 शक्ति पीठ पर प्राप्त कर सकते है।
बंगाल के शक्तिपीठ
1. काली मंदिर – कोलकाता
2. युगाद्या- वर्धमान (बर्दमान)
3. त्रिस्त्रोता- जलपाइगुड़ी
4. बहुला- केतुग्राम
5. वक्त्रेश्वर- दुब्राजपुर
6. नलहटी- नलहटी
7. नन्दीपुर- नन्दीपुर
8. अट्टहास- लाबपुर
9. किरीट- बड़नगर
10. विभाष- मिदनापुर
मध्यप्रदेश के शक्तिपीठ
12. हरसिद्धि- उज्जैन
13. शारदा मंदिर- मेहर
14. ताराचंडी मंदिर- अमरकंटक
तमिलनाडु के शक्तिपीठ
15. शुचि- कन्याकुमारी
16. रत्नावली- अज्ञात
17. भद्रकाली मंदिर- संगमस्थल
18. कामाक्षीदेवी- शिवकांची
बिहार के शक्तिपीठ
19. मिथिला- अज्ञात
20. वैद्यनाथ- बी. देवघर
21. पटनेश्वरी देवी- पटना
उत्तरप्रदेश के शक्तिपीठ
22. चामुण्डा माता- मथुरा
23. विशालाक्षी- मीरघाट
24. ललितादेवी मंदिर- प्रयाग
राजस्थान के शक्तिपीठ
25. सावित्रीदेवी- पुष्कर
26. वैराट- जयपुर
गुजरात के शक्तिपीठ
27. अम्बिक देवी मंदिर- गिरनार
11. भैरव पर्वत- गिरनार
आंध्रप्रदेश के शक्तिपीठ
28. गोदावरीतट- गोदावरी स्टेशन
29. भ्रमराम्बादेवी- श्रीशैल
महाराष्ट्र के शक्तिपीठ
30. करवीर- कोल्हापुर
31. भद्रकाली- नासिक
कश्मीर के शक्तिपीठ
32. श्रीपर्वत- लद्दाख
33. पार्वतीपीठ- अमरनाथ गुफा
पंजाब के शक्तिपीठ
34. विश्वमुखी मंदिर- जालंधर
उड़ीसा के शक्तिपीठ
35. विरजादेवी- पुरी
हिमाचल प्रदेश के शक्तिपीठ
36. ज्वालामुखी शक्तिपीठ- कांगड़ा
असम के शक्तिपीठ
37. कामाख्यादेवी- गुवाहाटी
मेघालय के शक्तिपीठ
38. जयंती- शिलांग
त्रिपुरा के शक्तिपीठ
39. राजराजेश्वरी त्रिपुरासुंदरी- राधाकिशोरपुर
हरियाणा के शक्तिपीठ
40. कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ- कुरुक्षेत्र
41. कालमाधव शक्तिपीठ- अज्ञात
नेपाल के शक्तिपीठ
42. गण्डकी- गण्डकी
43. भगवती गुहेश्वरी- पशुपतिनाथ
पाकिस्तान के शक्तिपीठ
44. हिंगलाजदेवी- हिंगलाज
श्रीलंका के शक्तिपीठ
45. लंका शक्तिपीठ- अज्ञात
तिब्बत के शक्तिपीठ
46. मानस शक्तिपीठ- मानसरोवर
बांगलादेश के शक्तिपीठ
47. यशोर- जैशौर
48. भवानी मंदिर- चटगांव
49. करतोयातट- भवानीपुर
50. उग्रतारा देवी- बारीसाल
51 वीं पंचसागर शक्तिपीठ है। यह कहां स्थित है इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।  खोजकर अगली पोस्ट में प्रकाशित करेंगे