गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017
सतयुग में पृथ्वी फर श्री हनुमान जन्म का अदभुत रहस्य
सतयुग में पृथ्वी पर श्री हनुमान जन्म का अदभुत रहस्य:------
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चारों युग प्रताप तुम्हारा ।
है प्रसिद्ध जगत उजियारा ।।
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रूद्र देह तजि नेह बस हर ते भे हनुमान ।
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श्री व्यास जी ने राजा परीक्षित से कहा:--
परीक्षित होनी तो होके रहती है, इसे कोई बदल नही सकता ।
आज मैं तुम्हे उस रहस्य को बताता हूँ, जो दुर्लभ है ।
एक समय सृष्टि से जल तत्व अदृश्य हो गया ।सृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गयीऔर जीवन का अंत होने लगा तब व्रम्हा जी विष्णु जी ऋषि गण तथा देवता मिलकर श्री शिव जी के शरण में गए और शिव जी से प्रार्थना की और बोले नाथों के नाथ आदिनाथ अब इस समस्या से आप ही निपटें । श्रृष्टि में पुन: जल तत्व कैसे आयेगा ।
देवों की विनती सुन कर भोलेनाथ ने ग्यारहों रुद्रों को बुलाकर पूछा आप में से कोई ऐसा है जो सृष्टि को पुनः जल तत्व प्रदान कर सके । दस रूदों ने इनकार कर दिया । ग्यारहवाँ रुद्र जिसका नाम हर था उसने कहा मेरे करतल में जल तत्व का पूर्ण निवास है ।
मैं श्रृष्टि को पुन: जल तत्व प्रदान करूँगा लेकिन इसके लिए मूझे अपना शरीर गलाना पडेगा और शरीर गलने के बाद इस श्रृष्टि से मेरा नामो निशान मिट जायेगा ।
तब भगवान शिव ने हर रूपी रूद्र को वरदान दिया और कहा:--
इस रूद्र रूपी शरीर के गलने के बाद तुम्हे नया शरीर और नया नाम प्राप्त होगा और मैं सम्पूर्ण रूप से तुम्हारे उस नये तन में निवास करूंगा जो श्रृष्टि के कल्याण हेतू होगा।
हर नामक रूद्र ने अपने शरीर को गलाकर श्रृष्टि को जल तत्व प्रदान किया ।और उसी जल से एक महाबली वानर की उत्पत्ति हुई। जिसे हम हनुमान जी के नाम से जानते हैं ।
यह घटना सतयुग के चौथे चरण में घटी ।
शिवजी ने हनुमान जी को राम नाम का रसायन प्रदान किया।
हनुमान जी ने राम नाम का जप प्रारम्भ किया ।
त्रेतायुग में अन्जना और केशरी के यहाँ पुत्र रूप में अवतरित हुए ।
इस लिए बाबा तुलसी दास जी ने हनुमान चालीसा में कहा है:---
शंकर स्वयं केशरी नन्दन
तेज प्रताप महा जग बन्दन
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दोहा---
तीन लोक चौदह भुवन कर धारे बलवान ।
राम काज हित प्रगट भे बीर बली हनुमान।
चौपाई:--
अजय शरण तुम्हरे हनुमंता ।
नहि देखा तुम सम कोउ संता ।।
कृपा करहु मो पर बलधारी ।
भवं भवानी हर तिरपुरारी ।।
दोहा---
राम नाम की है सपथ ये श्रृष्टी के नाथ ।
परम् ज्ञान मोहि दीजिए साक्षी श्री रघुनाथ
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जय सियाराम
जय हनुमान
डा.अजय दीक्षित
DrAjaiDixit@GMail.Com
सीता जी का नही -- छाया सीता का हरण किया था - रावण ने
||राम|| . कौन थीं छाया सीता__जिनका हरण
रावण ने किया था__कहाँ गईं छाया सीता
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अदभुत रहस्य:--
बाबा तुलसी दास जी ने रामचरित्र मानस में लिखा है:-----------
लक्ष्मणहुँ यह मरम ना जाना ।
जा कुछ चरित रचा भगवाना ।।
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|| राम ||
वेदवती नाम की एक कन्या थी जो भगवान विष्णु की तपस्या कर रही थी
रावण जबरन उसको अपनी पत्नी बनाना चाहता था । वेदवती ने योग क्रिया द्वारा अपने शरीर को भस्म कर दिया और रावण को श्राप दिया _मेरे ही द्वारा तेरा संहार होगा __ तुझे मारने के हित में अवतार हमारा होगा ।
अग्नि देव ने वेदवती की आत्मा को अपने तन में समाहित कर लिया ।
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एक दिन पंचवटी में मारीच नामक राक्षस का बध करने के लिए भगवान राम आश्रम से बाहर चले गये। सीता जी के कठोर बचन सुनके लक्ष्मण जी भी राम जी के पीछे --- पीछे चले गये ।
तत्पश्चात् राक्षस राज रावण सीता को हर ले जाने के लिए आश्रम के समीप आया , उस समय अग्नि देव भगवान राम के अग्नि होत्र-गृह में विद्यमान थे ।
अग्नि देव ने रावण की चेष्टा जान ली और असली सीता को साथ में लेकर पाताल लोक अपनी पत्नी स्वाहा के पास चले गये और सीता जी को स्वाहा की देख रेख में सौंप कर लौट आये ।
अग्नि देव ने वेदवती की आत्मा को अपने तन से अलग करके सीता के समान रूप वाली बना दिया।
और पर्णशाला में सीता जी के स्थान पर उसे बिठा दिया ।
रावण ने उसी का अपहरण करके लंका में ला बिठाया ।
तदन्तर रावण के मारे जाने पर अग्नि परीक्षा के समय उसी वेदवती ने अग्नि में प्रवेश किया।
उस समय अग्नि देव ने स्वाहा के समीप सुरक्षित जनकनंदनी सीतारूपा लक्ष्मी को लाकर पुन: श्री राम जी को सौंप दिया और वेदवती रूपी छाया सीता के अपने तन में समाहित कर लिया ।
तब सीता जी ने भगवान राम से कहा :---
प्रभु ! इस वेदवती ने बडे दुख सहे हैं ।
ये आप को पती रूप में पाना चाहती है इस लिए आप इसे अंगीकार कीजिए ।
भगवान राम ने कहा ! समय आने पर मै इसे पत्नी रूप में जरूर स्वीकार करूँगा ।
समय बीता :------- राजा आकाश राज यज्ञ करने के लिए आरणी नदी के किनारे
भूमि का शोधन कराया । सोने के हल से पृथ्वी जोती जाने लगी तब बीज की मुट्ठी बिखेरते समय राजा ने देखा, पृथ्वी से एक कन्या प्रकट हुई है, जो कमल की शय्या पर सोई हुई है ।सोने की पुतली सी शोभा पा रही है । राजा ने उसे गोद में उठा लिया और ' यह मेरी पुत्री है ' ऐसा बार - बार कहते हुए महल की ओर चल दिये, तभी
आकाश बाणी हुई :---
राजन ! वास्तव में ये तुम्हारी ही पुत्री है ।
इस कन्या का तुम पालन-पोषण करो ।
यह कन्या वही वेदवती है। राजा के कुलगुरू ने इस कन्या का नाम पदमावती
रखा ।
धीरे-धीरे समय बीता कन्या युवा हुई।
कन्या का विवाह वेंकटाचल निवासी श्री हरि से हुई ।
यह वही वेदवती छाया रूपी सीता है जिसे संसार :--पद्मिनी ,पदमावती ,पद्मालया के नाम से जानते हैं ।
|| राम ||
डा.अजय दीक्षित
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विवाह के कार्ड पे लडके के नाम के आगे - चिरंजीवी तथा लडकी के- नाम के आगे आयुषमती क्यों लिखा जाता है ?
विवाह के कार्ड पे लडके के नाम के आगे -चिरंजीव तथा लडकी के नाम-के आगे आयुषमती क्यों लिखा जाता है ?
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चिरंजीव:----
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एक ब्राह्मण के कोई संतान नही थी, उसने महामाया की तपस्या की, माता जी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्राह्मण से बरदान माँगने को कहा:-- ब्राह्मण ने बरदान में पुत्र माँगा
माता ने कहा :-- मेरे पास दो तरह के पुत्र हैं । पहला दस हजार वर्ष जिएेगा लेकिन महा मूर्ख होगा ।
दूसरा, पन्द्रह वर्ष (अल्पायु ) जिऐगा लेकिन महा विद्वान होगा ।
किस तरह का पुत्र चहिए । ब्राह्मण बोला माता मुझे दूसरा वाला पुत्र दे दो।
माता ने तथास्तु ! कहा ।
कुछ दिन बाद ब्राह्मणी ने पुत्र को जन्म दिया लालन- पालन किया धीरे-धीरे पाँच वर्ष बीत गये। माता का वह वरदान याद करके ब्राह्मणी ने ब्राह्मण से कहा पांच वर्ष बीत गये हैं, मेरा पुत्र अल्पायु है जिन आँखों ने लाल को बढते हुए देखा है, जिन आँखों में लाल की छवि बसी है अथाह प्रेम है वह आँखे लाल की मृत्यु कैसे देख पायेंगी कुछ भी करके मेरे लाल को बचालो ।
ब्राह्मण ने अपने पुत्र को विद्या ग्रहण करने के लिए काशी भेज दिया ।
दिन-रात दोनों पुत्र के वियोग में दुखी रहने लगे । धीरे-धीरे समय बीता पुत्र के मृत्यु का समय निकट आया ।
काशी के एक सेंठ ने अपनी पुत्री के साथ उस ब्राह्मण पुत्र का विवाह कर दिया ।
पति-पत्नी के मिलन की रात उसकी मृत्यु की रात थी ।
यमराज नाग रूप धारण कर उसके प्राण हरने के लिए आये। उसके पती को डस लिया पत्नी ने नाग को पकड के कमंडल में बंदकर दिया ।तब तक उसके पती की मृत्यु हो गयी ।
पत्नी महामाया की बहुत बडी भक्त थी वह अपने पती को जीवित करने के लिए माँ की आराधना करने लगी ।आराधना करते-करते एक माह बीत गया । पत्नी के सतीत्व के आगे श्रृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गई।
यमराज कमंडल में बंद थे यम लोक की सारी गतविधियाँ रूक गईं ।
देवों ने माता से अनुरोध किया और कहा
-हे माता हम लोंगो ने यमराज को छुडाने की बहुत कोशिश की लेकिन छुडा नही पाये -हे! जगदम्बा अब तूही यमराज को छुडा सकती है।
माता जगदम्बा प्रगटी और बोली :--
-हे! बेटी जिस नाग को तूने कमंडल में बंद किया है वह स्वयं यमराज हैं उनके बिना यम लोक के सारे कार्य रुक गये हैं ।
-हे पुत्री यमराज को आजाद करदे ।
माता के आदेश का पालन करते हुए दुल्हन ने कमंडल से यम राज को आजाद कर दिया।
यमराज कमंडल से बाहर आये ।
माता को तथा दुल्हन के सतीत्व को प्रणाम किया ।माता की आज्ञा से यमराज ने उसके पती के प्राण वापस कर दिये ।
तथा चिरंजीवी रहने का बरदान दिया, और उसे चिरंजीव कहके पुकारा।
तब से लडके के नाम के आगे चिरंजीव लिखने की पृथा चली ।
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आयुषमती:---
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राजा आकाश धर के कोई सन्तान नही थी ।
नारद जी ने कहा :-- सोने के हल से धरती का दोहन करके उस भूमि पे यज्ञ करो सन्तान जरूर प्राप्त होगी ।
राजा ने सोने के हल से पृथ्वी जोती, जोतते समय उन्हें भूमि से कन्या प्राप्त हुई ।कन्या को महल लेकर आये।
राजा देखते है :- महल में एक शेर खडा है
जो कन्या को खाना चाहता है, डर के कारण राजा के हाथ से कन्या छूट गई शेर ने कन्या को मुख में धर लिया ,कन्या को मुख में धरते ही शेर कमल पुष्प में परिवर्तित हो गया, उसी समय विष्णु जी प्रगटे और कमल को अपने हाथ से स्पर्स किया। स्पर्श करते ही कमल पुष्प उसी समय यमराज बनकर प्रगट हुआ ,और वो कन्या पच्चीस वर्ष की युवती हो गई।
राजा ने उस कन्या का विवाह विष्णु जी से
कर दिया ।
यमराज ने उसे आयुषमती कहके पुकारा
और आयुषमती का बरदान दिया
तब से विवाह मे पत्र पे कन्या के नाम के आगे आयुषमती लिखा जाने लगा
।। जय माता की ।।
डा.अजय दीक्षित
Dr Ajai Dixit@GMail.Com
|| राम ||
शनिवार, 11 फ़रवरी 2017
जानिये ! कुत्तों से जुडे शकुन और अपशकुन
।।ऊँ ।।
जानिये! कुत्तों से जुडे शकुन - अपशकुन
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डा.अजय दीक्षित
1- शकुन शास्त्र के अनुसार कुत्ता यदि अचानक धरती पर अपना सिर रगड़े और यह क्रिया बार-बार करे तो उस स्थान पर गड़ा धन होने की संभावना होती है।
2- यदि यात्रा करते समय किसी व्यक्ति को कुत्ता अपने मुख में रोटी, पूड़ी या अन्य कोई खाद्य पदार्थ लाता दिखे तो उस व्यक्ति को धन लाभ होने की संभावना बनती है।
3- जिसके घर में कोई कुत्ता बहुत देर तक आकाश, गोबर, मांस, विष्ठा देखता है तो उस मनुष्य को सुंदर स्त्री की प्राप्ति और धन का लाभ होने के योग बनते हैं।
4- यदि किसी रोगी के सामने कुत्ता अपनी पूंछ या ह्रदय स्थल बार-बार चाटे तो शकुन शास्त्र के अनुसार बहुत ही जल्दी उस रोगी की मृत्यु होने की संभावना रहती है।
5- यात्रा के लिए जाते हुए यदि कोई कुत्ता बांई ओर संग-संग चले तो सुंदर स्त्री और धन की प्राप्ति हो सकती है। यदि दाहिनी ओर चले तो चोरी या और किसी प्रकार से धन हानि की सूचना देता है।
6- यदि किसी जुआरी को जुआ खेलते जाते समय दाईं ओर कुत्ता मैथुन करता मिले तो उसे जुएं में अत्यधिक लाभ होने की संभावना रहती है।
7- यदि किसी स्थान पर बहुत से कुत्ते एकत्रित होकर भौंके तो वहां रहने वाले लोगों पर कोई बड़ी विपत्ति आती है या फिर वहां के लोगों में भयंकर लड़ाई-झगड़ा होता है।
8- यदि कुत्ता बाएं घुटने को सूंघते हुए दिखे तो धन प्राप्ति हो सकती है तथा दाहिने घुटने को सूंघता दिखे तो पत्नी से झगड़ा हो सकता है। बांई जांघ को सूंघे तो स्त्री से समागम और दाईं जांघ को सूंघे तो मित्र से वैर होने की संभावना रहती है।
9- भोजन करते समय यदि कोई कुत्ता आपके सामने आकर अपनी पूंछ उठाकर सिर को हिलाता है तो वह भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि वह भोजन करने से रोगी होने की संभावना रहती है।
10- यदि किसी यात्री को देखकर कुत्ता भय से या क्रोध से गुर्राता है अथवा बिना किसी कारण से इधर-उधर चक्कर काटे तो उस यात्रा करने वाले को धन की हानि हो सकती है।
11- यदि किसी व्यक्ति की चारपाई के नीचे घुसकर कुत्ता भौंकता है तो उस चारपाई पर सोने वाले को रोग और मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
12- यदि कुत्ता पेड़ के नीचे खड़ा होकर भौंकता है तो ये वर्षाकाल में अच्छी वर्षा का संकेत होता है।
13- किसी किसान को हल ले जाते हुए रास्ते में कुत्ता बांई और मिल जाए और फिर घर आते समय दाहिनी ओर मिले तो उसकी उपज अच्छी होती है।
14- कुत्ता यदि अपनी जीभ से अपने दाहिने अंग को चाटता है अथवा खुजलाता है तो ये कार्य सिद्धि की सूचना है या जीभ से पेट को छूता हुआ दिखाई दे तो लाभ होता है।
15- यात्रा पर जाते समय कुत्ता जूते लेकर भाग जाए या किसी ओर के जूते लेकर सामने आ जाए तो निश्चित रूप से उस व्यक्ति के धन को चोर चुरा लेते हैं।
।। राम ।।
।। इस राजा ने गर्भधारण कर दिया था पुत्र को जन्म ।।
इस राजा ने गर्भधारण कर दिया था पुत्र को जन्म::::::::::::::::::::::;::::::::::
Pregnant King Yuvanashva Story in Hindi : विज्ञान के इस दौर में एक पुरुष द्वारा गर्भधारण करके अपनी संतान को जन्म देना संभव है और हाल ही में कुछ ऐसे केस हुए भी है। लेकिन क्या आप जानते है की आज से हज़ारों साल पहले हमारे पूर्वजों का ज्ञान, हमारे आज के ज्ञान की तुलना में कहीं उच्च था। विज्ञान के जिन चमत्कारों को देख कर हम आज आश्चर्यचकित होते है वो चमत्कार तो हमारे पूर्वजों ने हज़ारों साल पहले कर दिए थे, जैसे की पुरुष द्वारा गर्भधारण कर संतान को जन्म देना। आज हम आपको श्री राम के पूर्वज राजा युवनाश्व की कहानी बताएँगे, जिन्होंने स्वयं गर्भधारण करके अपनी संतान को जन्म दिया था जो की “चक्रवती सम्राट राजा मांधाता” के नाम से प्रसिद्ध हुई।
राजा युवनाश्व की कहानी
रामायण के बालकाण्ड के अंतर्गत गुरु वशिष्ठ द्वारा भगवान राम के कुल, रघुवंश का वर्णन किया गया है, जो इस प्रकार है – ब्रह्माजी के पुत्र मरिचि से कश्यप का जन्म हुआ। कश्यप के पुत्र थे विवस्वान। विवस्वान के पुत्र थे वैवस्त मनु, जिनके दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वांकु था। राजा इक्ष्वांकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और उन्होंने ही इक्ष्वांकु वंश को स्थापित किया।
इसी वंश में राजा युवनाश्व का जन्म हुआ लेकिन उनका कोई पुत्र नहीं था। वंश की उन्नति और पुत्र प्राप्ति की कामना लिए उन्होंने अपना सारा राज-पाठ त्याग कर वन में जाकर तपस्या करने का निश्चय किया। वन में अपने निवास के दौरान उनकी मुलाकात महर्षि भृगु के वंशंज च्यवन ऋषि से हुईl
च्यवन ऋषि ने राजा युवनाश्व के लिए इष्टि यज्ञ करना आरंभ किया ताकि राजा की संतान जन्म ले। यज्ञ के बाद च्यवन ऋषि ने एक मटके में अभिमंत्रित जल रखा जिसका सेवन राजा की पत्नी को करना था ताकि वह गर्भधारण कर पाए।
राजा युवनाश्व की संतानोत्पत्ति के उद्देश्य से हुए यज्ञ में कई ऋषि-मुनियों ने भाग लिया और यज्ञ के बाद सभी जन थकान की वजह से गहरी नींद में सो गए। रात्रि के समय जब राजा युवनाश्व की नींद खुली तो उन्हे भयंकर प्यास लगी।
युवनाश्व ने पानी के लिए बहुत आवाज लगाई लेकिन थकान की वजह से गहरी नींद में सोने की वजह से किसी ने राजा की आवाज नहीं सुनी। ऐसे में राजा स्वयं उठे और पानी की तलाश करने लगे।
राजा युवनाश्व को वह कलश दिखाई दिया जिसमें अभिमंत्रित जल था। इस बात से बेखबर कि वह जल किस उद्देश्य के लिए है, राजा ने प्यास की वजह से सारा पानी पी लिया। जब इस बात की खबर ऋषि च्यवन को लगी तो उन्होंने राजा से कहा कि उनकी संतान अब उन्हीं के गर्भ से जन्म लेगी।
जब संतान के जन्म लेने का सही समय आया तब दैवीय चिकित्सकों, अश्विन कुमारों ने राजा युवनाश्व की कोख को चीरकर बच्चे को बाहर निकाला। बच्चे के जन्म के बाद यह समस्या उत्पन्न हुई कि बच्चा अपनी भूख कैसे मिटाएगा
सभी देवतागण वहां उपस्थित थे, इतने में इंद्र देव ने उनसे कहा कि वह उस बच्चे के लिए मां की कमी पूरी करेंगे। इन्द्र ने अपनी अंगुली शिशु के मुंह में डाली जिसमें से दूध निकल रहा था और कहा “मम धाता” अर्थात मैं इसकी मां हूं। इसी वजह से उस शिशु का नाम ममधाता या मांधाता पड़ा।
जैसे ही इंद्र देव ने शिशु को अपनी अंगुली से दूध पिलाना शुरू किया वह शिशु 13 बित्ता बढ़ गया। कहते हैं राजा मांधाता से सूर्य उदय से लेकर सूर्यास्त तक के राज्यों पर धर्मानुकूल शासन किया था।
इतना ही नहीं राजा मांधाता ने सौ अश्वमेघ और सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लंबे और एक योजन ऊंचे रोहित नामक सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को भी दान दिए थे।
लम्बे समय तक धर्मानुकूल रहकर शासन करने के बाद राजा मांधाता ने विष्णु के दर्शन करने के लिए वन जाकर तप करने का निर्णय किया और विष्णु के दर्शन कर लेने के बाद वन में ही अपने प्राण त्याग स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।
महाभारत कालीन पारिजात वृक्ष
बाराबंकी का पारिजात वृक्ष
पारिजात वृक्ष को लेकर गहन अध्ययन कर चुके डा.अजय दीक्षित के अनुसार यूँ तो परिजात वृक्ष की प्रजाति भारत में नहीं पाई जाती, लेकिन भारत में एक मात्र पारिजात वृक्ष आज भी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद के अंतर्गत बदोसराय तहसील सिरौलीगौसपुर क्षेत्र के गाँव बरोलिया में मौजूद है। लगभग 50 फीट तने व 45 फीट उँचाई के इस वृक्ष की अधिकांश शाखाएँ भूमि की ओर मुड़ जाती हैं और धरती को छूते ही सूख जाती हैं। एक साल में सिर्फ़ एक बार जून माह में सफ़ेद व पीले रंग के फूलों से सुसज्जित होने वाला यह वृक्ष न सिर्फ़ खुशबू बिखेरता है, बल्कि देखने में भी सुन्दर है।
आयु की दृष्टि से एक हज़ार से बीस हज़ार वर्ष तक जीवित रहने वाले इस वृक्ष को वनस्पति शास्त्री एडोसोनिया वर्ग का मानते हैं, जिसकी दुनिया भर में सिर्फ़ पाँच प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से एक 'डिजाहाट' है। पारिजात वृक्ष इसी डिजाहाट प्रजाति का है।
माना जाता है कि किन्तूर) गांव का नाम पाण्डवों की माता कुन्ती के नाम पर है। जब धृतराष्ट्र ने पाण्डु पुत्रों को अज्ञातवास दिया तो पांडवों ने अपनी माता कुन्ती के साथ यहां के वन में निवास किया था। इसी अवधि में ग्राम किन्तूर में कुंतेश्वर महादेव की स्थापना हुयी थी। भगवान शिव की पूजा करने के लिए माता कुंती ने स्वर्ग से पारिजात पुष्प लाये जाने की इच्छा जाहिर की। अपनी माता की इच्छानुसार अर्जुन ने स्वर्ग से इस वृक्ष को लेकर यहां बरोलिया गाँव में स्थापित कर दिया ।
सोमवार, 6 फ़रवरी 2017
आखिर क्यों होती है ! इस मन्दिर मे मेढक की पूजा ?
राम।
।।ऊँ राम।।
डा.अजय दीक्षित
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अद्भुत रहस्य
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इस प्राचीन मंदिर में होती है मेंढक की पूजा, जानिए क्यों?
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भारत में कई ऐसे मंदिर है जहाँ जानवरों की पूजा की जाती है। भारत के एकमात्र ऐसे मंदिर के बारे में जहां मेंढक की पूजा की जाती है। आइए जानते है कहां है ये मंदिर और क्यों की जाती है मेंढक की पूजा ?
भारत का एक मात्र मेंढक मंदिर ( Frog Temple) उत्तरप्रदेश के लखीमपुर-खीरी जिले के ओयल कस्बें में स्तिथ है। बताया जाता है कि ये मंदिर करीब 200 साल पुराना है। मान्यता है कि सूखे और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से बचाव के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया गया था।
यह जगह ओयल शैव संप्रदाय का प्रमुख केंद्र था और यहां के शासक भगवान शिव के उपासक थे। इस कस्बे के बीच मंडूक यंत्र पर आधारित प्राचीन शिव मंदिर भी है।
यह क्षेत्र ग्यारहवीं शताब्दी के बाद से 19वीं शताब्दी तक चाहमान शासकों के आधीन रहा। चाहमान वंश के राजा बख्श सिंह ने ही इस अद्भुत मंदिर का निर्माण कराया था।
तांत्रिक ने किया मंदिर का वास्तु
मंदिर की वास्तु परिकल्पना कपिला के एक महान तांत्रिक ने की थी। तंत्रवाद पर आधारित इस मंदिर की वास्तु संरचना अपनी विशेष शैली के कारण मनमोह लेती है। मेंढक मंदिर में दीपावली के अलावा महाशिवरात्रि पर भी भक्त बड़ी संख्या में आते हैं।
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